यूपी के योद्धा-3:गोलीबारी के बीच ठहाके लगाते रहे, साथी से बोले- घायल शेर कभी शिकार नहीं छोड़ता; शाहजहांपुर के वीर दृगपाल सिंह की कहानी

3 दिसंबर 1971, शाम के धुंधलके में अचानक आसमान गूंज उठा। पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों ने एक साथ भारत के कई हवाई अड्डों पर हमला कर दिया। पिछले कुछ महीनों से ही जंग के आसार बन रहे थे। इस हमले के बाद भारत और पाकिस्तान तीसरी बार आमने-सामने थे। ये कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं था। पाकिस्तानी सेना पहले से ही पूरी तरह तैयार थी। हवाई हमलों के तुरंत बाद पाकिस्तान ने पंजाब के फाजिल्का सेक्टर में सुलेमानकी बॉर्डर से जमीनी हमला शुरू कर दिया। भारतीय सेना जवाबी कार्रवाई की तैयारी कर ही रही थी कि दुश्मन का दबाव अचानक बहुत बढ़ गया। शुरुआती दौर में भारतीय टुकड़ियां इस तेज हमले को पूरी तरह रोक नहीं पाईं। पाकिस्तान ने जानबूझकर बॉर्डर के आसपास बसे गांवों को निशाना बनाया। ये पूरा खेतीबाड़ी वाला इलाका था। किसान खेतों में काम कर रहे थे। अचानक गोलाबारी, टैंकों की आवाज और धमाकों से लोग घबरा गए। पाकिस्तानी सेना तेजी से आगे बढ़ी और भारतीय सीमा में करीब 7 किलोमीटर अंदर घुस आई। बेरीवाला और कुर्मीखेड़ा जैसे अहम इलाके दुश्मन के कब्जे में चले गए। अब अगला निशाना फाजिल्का शहर था। इस पर कब्जा होते ही पंजाब के अंदरूनी हिस्सों में घुसना बेहद आसान हो जाता। भटिंडा और राजस्थान के श्रीगंगानगर तक रास्ता खुल जाता। पाकिस्तान के इस कब्जे की खबर मिलते ही वेस्टर्न कमांड आर्मी हेडक्वार्टर से लेकर दिल्ली तक खलबली मच गई। हेडक्वार्टर से आदेश आया- “फाजिल्का को किसी भी कीमत पर बचाना है और दुश्मन को उसकी सीमा में वापस खदेड़ना है।” 8 दिसंबर, 1972 पाकिस्तान को जवाब देने की जिम्मेदारी 15 राजपूत रेजिमेंट, 4 जाट रेजिमेंट और 3 असम रेजिमेंट को सौंपी गई। 15 राजपूत रेजिमेंट की कमान लेफ्टिनेंट कर्नल शाम थत्ते के हाथ में थी। उन्होंने हमला करने से पहले सभी जवानों को इकट्ठा किया। उनके साथ मेजर ललित मोहन, मेजर एके घोष समेत कई अधिकारी थे। साथ में लांस नायक दृगपाल सिंह, कुलदीप सिंह और रणबीर सिंह जैसे कई बहादुर सिपाही भी थे। लेफ्टिनेंट कर्नल थत्ते ने सामने खड़े जवानों की आंखों में देखा। सबकी आंखों में जोश और पाकिस्तान को धूल चटाने का इरादा साफ नजर आ रहा था। कर्नल थत्ते भारी आवाज में बोले- “सोल्जर्स, व्हाई वी जॉइन आर्मी?” किसी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने सिपाही कुलदीप की ओर इशारा किया- “यंगमैन, व्हाई यू जॉइंड आर्मी?” सिपाही कुलदीप ने बंदूक का बट सीधा किया और तनकर हुआ- “ताकि देश के लिए काम आ सकूं साब।” उन्होंने एक-एककर यही सवाल सभी से किया। सबने अलग-अलग जवाब दिए। तभी उनकी नजर लांस नायक दृगपाल सिंह पर गई। उनकी आंखों में गंभीरता थी। दृगपाल ने जवाब दिया- “जब मरूं तो कफन तिरंगा हो, सफेद नहीं साब…।” जवाब सुनकर लेफ्टिनेंट कर्नल थत्ते मुस्कुरा दिए। उन्होंने कहा- “जिस भी अरमान से ये वर्दी पहनी है, उसे पूरा करने का वक्त आ गया है। क्या आप तैयार हैं?” सभी जवानों ने जमीन पर एक साथ पैर पटका और एक सुर में कहा- “तैयार हैं साब…!” इसके बाद लेफ्टिनेंट कर्नल थत्ते ने हमले का प्लान बताना शुरू किया। “दुश्मन सात किलोमीटर अंदर घुस आए हैं। हमें सिर्फ दुश्मन को पीछे ही नहीं हटाना है, उनकी गाजी पोस्ट भी कब्जानी है। ये पाकिस्तान की सबसे मजबूत पोस्ट है।” बोलते-बोलते उन्होंने लांस नायक दृगपाल के कंधे पर हाथ रखा और बोले- “दुश्मन नंबर में ज्यादा हो सकता है। उनके हथियार हमसे बेहतर हो सकते हैं। लेकिन वो कलेजा नहीं है उनके पास, जो राजपूत रेजिमेंट के सीने में धड़कता है।” कर्नल थत्ते की आवाज अब और सख्त हो चुकी थी। “मेजर ललित, मेजर घोष… मूव योर कंपनी…। एंड रिमेंबर, हम इतिहास लिखने के लिए आगे बढ़ रहे हैं…। या तो हमारी जीत होगी, या फिर ऐसी शहादत होगी कि आने वाली पीढ़ियां हमारे नाम के गीत गाएंगी।” कर्नल थत्ते की हौसला-अफजाई से पूरी रेजिमेंट जोश में भर गई थी। 12 दिसंबर की सर्द रात बेरीवाला पर पाकिस्तानियों में मजबूती से कब्जा जमा रखा था। कई दिनों की लड़ाई के बाद भी पाकिस्तानी फौज भारत को आगे नहीं बढ़ने दे रही थी। चार्ली कंपनी के कमांडिंग ऑफिसर मेजर ललित मोहन परेशान थे। गाजी पोस्ट तबाह करने की जिम्मेदारी भी इसी कंपनी की थी। कंपनी के एक सेक्शन को भारी नुकसान हुआ था। मेजर ललित अपने जवानों के साथ बैठे थे। मेजर ने नक्शा खोलकर आगे का प्लान बताना शुरू किया- “आज हमने अपने कई साथी खोए हैं, लेकिन हमारी कंपनी में वीर सपूतों की कमी नहीं है। अगली टुकड़ी लांस नायक दृगपाल की कमांड में आगे जाएगी।” दृगपाल चुपचाप खड़े थे। अब उनके सेक्शन (आर्मी की सबसे छोटी यूनिट) के आगे जाने की बारी है, ये सुनकर उनका सीना चौड़ा हो गया। दृगपाल की नजरें नक्शे पर टिकी थीं। मेजर ललित ने कहा- “फाजिल्का दुश्मन के हाथ नहीं जाना चाहिए। इस इलाके पर हमेशा से उनकी नजर रही है। पैंसठ की जंग में भी इसे कब्जाने की कोशिश हुई थी। इसकी वजह जानते हैं?” दृगपाल ने धीमी आवाज में जवाब दिया- “साब, वजह साफ है। फाजिल्का उनके हाथ आया तो पूरे पंजाब पर भारत की पकड़ कमजोर हो जाएगी।” ललित मोहन ने दृगपाल का जवाब सुनकर कहा- “शाबाश…! लेकिन हमें उनकी गाजी पोस्ट भी चाहिए। इसका कोई प्लान है?” दृगपाल ने कहा- “सतलुज नदी बीच में है। सीधे जाना आसान नहीं होगा। पानी ठंडा है और धार भी तेज है। हमें गाजी पोस्ट तक पहुंचना है तो पीछे से अटैक करना होगा। ताकि पाकिस्तानियों के डायरेक्ट रेंज में जवान न आएं।” दृगपाल ने कुछ देर रुककर फिर कहा- “साब, हम रेंगकर जाएंगे। चाहे कितना भी रेंगना पड़े, दुश्मन को भनक भी नहीं लगेगी।” लांस नायक दृगपाल का प्लान सुनकर मेजर ललित मोहन को उम्मीद की एक किरण नजर आ रही थी। 13 दिसंबर लांस नायक दृगपाल की टुकड़ी आगे बढ़ रही थी। उधर दुश्मन की रेजिस्टेंस कड़ी थी। मीडियम मशीन गन (MMG) के भारी फायर आ रहे थे। यूनिट को काफी नुकसान हो रहा था, लेकिन वो आगे बढ़ते रहे। फायरिंग से बचने के लिए लांस नायक दृगपाल, सिपाही जमील अहमद और रणवीर सिंह एक छोटी खाई में छिपे थे। आर्टिलरी के गोले आस-पास गिर रहे थे। दृगपाल ने धीमी आवाज में कहा- “जमील, रणवीर अच्छे से सुनो…। उधर दो MMG से फायरिंग हो रही है। हमें घिसटते हुए बंकर तक पहुंचना है। फिर ग्रेनेड से हमला करेंगे। कोई जल्दबाजी नहीं, जितना वक्त लेना है लेंगे। एक-दूसरे को कवर देंगे।” जमील ने सिर हिलाया और कहा- “जी साब समझ गया… लेकिन ठंड बहुत है, उंगलियां जम रही हैं। राइफल पकड़ना मुश्किल हो रहा।” दृगपाल ने उसकी ओर देखकर कहा- “सबको हो रहा है। ध्यान हाथों पर नहीं, दुश्मन पर रखो।” इसके बाद लांस नायक दृगपाल की टुकड़ी, पाकिस्तानियों पर कहर बनकर टूट पड़ी। पीछे आर्टिलरी से दागे जा रहे गोले दुश्मन पोस्ट पर गिर रहे थे और फ्रंट फुट पर सिपाही गोलियां बरसा रहे थे। फिर भी वो बंकर जहां से पाकिस्तानी मशीन गन से बर्स्ट मार रहे थे, वो वैसे ही खड़ा था। लांस नायक ने चिल्लाकर सभी साथियों का कहा- “इससे अच्छा कवर हमें नहीं मिलेगा। जितना तेजी से बंकर की तरफ जा सकते हो, जाओ। मैं आगे से जाऊंगा। जमील और रणवीर पश्चिम से, बाकी दक्षिण से। अंग्रेजी के यू अक्षर की तरह आगे बढ़ेंगे।” चार्ली कंपनी के अटैक में कई पाकिस्तानी सिपाही अपनी जगह से पीछे हट गए। कुछ देर बैकफुट पर रहे, लेकिन अचानक मशीनगन फिर गरज उठी। दनदनाती हुई गोलियां भारतीय जवानों के पास से निकलने लगीं। कई जवान घायल हो गए। कुछ वीरगति को प्राप्त हुए। भारत का एक टैंक भी उड़ गया। अब सोचने का कोई वक्त नहीं था। जो करना था तुरंत करना था। दृगपाल ने सिर उठाया, हालात को परखा और चिल्लाए- “क्रॉल… मूव फॉरवर्ड… क्रॉल…” दृगपाल की नजर अब भी उसी पाकिस्तानी बंकर पर थी। दृगपाल बंकर से करीब 200 मीटर दूर थे। वो ठंडी जमीन पर पेट के बल रेंगते हुए आगे बढ़ने लगे। अचानक पीछे के साथियों को इशारा किया, बोले- “कवर फायर दो…।” पश्चिम और दक्षिण से दृगपाल को कवर मिलना शुरू हो गया। दृगपाल बीच से आगे बढ़ने लगे। पाकिस्तानी सैनिक कभी दक्षिण में फायर करते तो कभी पश्चिम में। मशीन गन से लगातार फायरिंग आ रही थी। अचानक एक गोली सीधे रणवीर की ओर आई। वो छाती पकड़कर वहीं गिर पड़ा। जमील दौड़ते हुए उसके पास आया। रणवीर कुछ बोलना चाह रहा था- “सर…” लेकिन इससे पहले ही उसने दम तोड़ दिया। दृगपाल ने पीछे मुड़कर देखा। अपने साथी को यूं गिरते देख उनका गला भर आया, ये आंसू बहाने के वक्त नहीं था। उन्होंने सख्त आवाज में ऑर्डर दिया- “जामील… आगे बढ़ो। बंकर साइलेंस करना है। रणवीर के वास्ते आगे बढ़ो। जिस @@# की गोली लगी है, उसकी मां @#₹@ है।” जामील ने दांत भीचकर कहा- “जी सर…।” पश्चिमी दिशा में कवर देने के लिए अब सिर्फ जमील था। बंकर अब 50 मीटर ही दूर था। खतरा बढ़ने के साथ ही लांस नायक दृगपाल का हौसला भी बढ़ रहा था। अब ये क्लोज क्वार्टर की लड़ाई थी। दृगपाल ने पॉकेट से एक ग्रेनेड निकाला। पिन खींची और बंकर के ऊपर फेंक दिया। जोरदार धमाका हुआ और पहला पाकिस्तानी बंकर राख हो गया। धमाके के साथ एक पाकिस्तानी फौजी उड़कर बाहर आ गिरा था। उसे सिर्फ मामूली चोटें ही आई थीं। दृगपाल ने जमील को इशारा किया। जमील ने उसे पकड़ने की कोशिश की तो दोनों में हाथापाई होने लगी। जमील ने अपनी राइफल से चाकू निकालकर वार किया, लेकिन दुश्मन ने पलटकर हमला कर दिया। चाकू जमील की बाजू में धंस गया। जमील गिर पड़ा। पाकिस्तानी फौजी जमील के सीने में चाकू मारने ही वाला था कि दृगपाल ने उसे गोली मार दी। तभी एक गोली दृगपाल के बाएं कंधे पर आ लगी। लांस नायक दृगपाल और जमील दोनों खून से लथपथ थे। जमील ने कराहते हुए पूछा- “सर… आप ठीक तो हैं।” दृगपाल जमीन पर लेट गए थे। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा- “जमील… तू जिंदा है?” जमील बोला- “आप भी तो जिंदा हैं साब…।” दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया। दुश्मन का एक बंकर तो तबाह हो चुका था, लेकिन चार्ली कंपनी को भी भारी नुकसान पहुंचा था। रणवीर शहीद हो चुका था। दृगपाल, जमील और कुछ साथी घायल थे, लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी। फर्स्ट एड के बाद लांस नायक दृगपाल सिंह फिर आगे बढ़ने लगे। साथियों को उनकी पोजिशन समझाई और जमीन से चिपके हुए आगे बढ़ने लगे। अब भी दो बंकर एक्टिव थे और उनकी फायरिंग चार्ली कंपनी को आगे बढ़ने नहीं दे रही थी। भारतीय जवान सिर उठाने की कोशिश करते, गोलियों की बौछार उन्हें फिर झुकने या छिपने पर मजबूर कर देती। रेडियो सेट से बार-बार संदेश आ रहे थे- “कैजुअल्टी बढ़ रही है… आगे मूवमेंट रुक गई है।” दृगपाल जानते थे कि अगर ये दो बंकर नहीं गिराए तो दुश्मन पोस्ट पर कब्जा तो दूर भारत अपना इलाका भी खाली नहीं करा पाएगा। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। खाई में छिपे जवान थके लग रहे थे। रेडियो सेट से ये खबर पहुंच चुकी थी कि बेरीवाला ब्रिज कैप्चर करने में भारत को काफी नुकसान हुआ है। सिपाहियों का हौसला डगमगा रहा था। तभी चार्ली कंपनी के कमांडिंग ऑफिसर मेजर ललित मोहन एकदम सामने के मोर्चे पर आ पहुंचे। उन्हें देखते ही दृगपाल घबरा गए, बोले- “साब, आप इतना फॉरवर्ड… पीछे चलिए।” मेजर नहीं माने। मोर्चे की फ्रंट लाइन का मंजर खौफनाक था। धुएं और गोलाबारी के बीच जवानों के चेहरों पर थकान और साथियों को खोने का गम साफ दिख रहा था। मेजर ललित मोहन ने थके हुए जवानों के बीच ऊंची और कड़क आवाज में कहा- “नजरें ऊपर करो सिपाहियों…! मुझे यहां कोई हारा हुआ सिपाही नहीं, बल्कि वो शेर चाहिए जिसने दुश्मन को खदेड़ने की कसम खाई थी। फिर याद करो ये वर्दी क्यों पहनी थी…?” मेजर ने जवानों में जोश भरना जारी रखा- “क्या तुम चाहते हो कि हमारे साथियों का खून बेकार जाए? अगर हम रुक गए, तो कल फाजिल्का का नाम नक्शे पर नहीं होगा।” लांस नायक दृगपाल सिंह ने कहा- “जवान डरे नहीं हैं साब, ये मशीन गन हमारे कदम बांधे हुए हैं। ऑर्डर दीजिए साब, मैं इन दोनों बंकरों को उड़ाकर आता हूं।” मेजर ललित ने कहा- “सामने मौत नाच रही है दृगपाल। कोई कवर नहीं है। तुम अकेले कैसे जाओगे? कुछ साथियों को लेकर जाओ। कवर देने के लिए होना चाहिए।?” दृगपाल ने जवाब दिया- “साब, मौत तो वैसे भी ताक लगाए बैठी है। मरना ही है, तो क्यों न लड़कर मरा जाए। आप बस पीछे से इतना शोर कीजिए कि दुश्मन को मेरी आहट न लगे।” दृगपाल ने उन जवानों की ओर देखा जिनका मनोबल गिर रहा था। बोले- “याद है कर्नल साब ने क्या कहा था? कर्ज चुकाने का वक्त है जिसका हम इंतजार कर रहे थे। जिसे अपनी मिट्टी से प्यार है, वो मेरे गिरने के बाद भी रुकना मत। बस आगे बढ़ना…!” दृगपाल की ललकार ने मुरझाए हुए जवानों में नई जान फूंक दी। उन्होंने अपनी राइफलें कस लीं। सिपाही कुलदीप ने कहा- “साब, मैं आपके साथ आता हूं। जब तक मेरी बंदूक में आखिरी गोली है, दुश्मन आपकी तरफ देख भी नहीं पाएगा।” मेजर ललित मोहन ने भारी मन से, लेकिन गर्व के साथ लांस नायक दृगपाल सिंह के कंधे पर हाथ रखा। “जाओ दृगपाल… इतिहास तुम्हारा इंतजार कर रहा है।” कमांडिंग ऑफिसर का ऑर्डर मिलते ही दृगपाल और कुलदीप खाई से निकलकर आगे बढ़ने लगे। हाड़ कंपा देने वाली सर्द रात में दृगपाल के कंधे से लगातार खून बह रहा था। उस तरफ की वर्दी गीली होकर भारी हो गई थी। दृगपाल की आंखों में अब भी सिर्फ वो ‘गाजी पोस्ट’ थी, जो जीत और हार के बीच दीवार बनकर खड़ी थी। जैसे ही दृगपाल और कुलदीप आगे बढ़े, मंजर बदलने लगा। पाकिस्तानी सेना बौखला गई थी। उन्हें समझ आ गया था कि अब भारतीय सैनिकों ने अपने सिर पर कफन बांध लिया है। दुश्मन अब बिना सिर देखे, हर उस दिशा में गोलियां दाग रहे थे जहां जरा भी हलचल दिखती। हवा में केवल गोलियों की आवाज थी। रह-रहकर तोप के गोले गिर रहे थे, जिनके स्प्लिंटर्स (छर्रे) जमीन से टकराकर चिंगारियां पैदा कर रहे थे। दृगपाल अचानक चिल्लाए- “लेट जाओ कुलदीप…।” दृगपाल ने अपने साथी सिपाही का हाथ कसकर पकड़ा और फुसफुसाते हुए कहा- “यहां से हम भागकर आगे नहीं जा सकते। मशीन गन की रेंज बहुत सटीक है। हमें एक-एक इंच रेंगकर जाना होगा।” कुलदीप ने दृगपाल के लटके हुए कंधे और खून से लथपथ वर्दी को देखा। उसकी आवाज भर्रा गई- “लेकिन साब, आपका कंधा बुरी तरह जख्मी है। आप उसे हिला भी नहीं पा रहे। रेंगने के लिए दोनों हाथों का सहारा चाहिए होगा। आप यहीं रुककर मुझे कवर दीजिए। मैं आगे जाता हूं।” दृगपाल ने दर्द के साथ कठोर मुस्कान दी- “कुलदीप, क्या तूने कभी घायल शेर को शिकार छोड़ते देखा है…?” कुलदीप ने समझाने के लहजे में कहा- “साब, आप घिसटकर जाएंगे तो कंधे से और खून रिसेगा।” दृगपाल के कुछ तमककर कहा- “आज रुक गया तो कर्नल साब आंखें कैसे मिलाऊंगा? एक दिन तो मरना ही है, मरने के बाद रणवीर को क्या जवाब दूंगा?” कुलदीप कुछ कहता इससे पहले ही दृगपाल एक हाथ से रेंगकर आगे बढ़ने लगे। हर बार जब वो रेंगने के लिए जोर लगाते, कंधे का जख्म जैसे आग उगलने लगता। दर्द से शरीर का आधा हिस्सा बेजान हो चुका था। बाकी आधे हिस्से से दृगपाल अपनी पूरी देह का भार आगे खींच रहे थे। हर इंच के साथ जमीन पर खून की एक लकीर खिंचती जा रही थी। दुश्मन का बंकर पांच-छह मीटर ही दूर था। उन्हें पाकिस्तानियों के चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। दृगपाल ने अपने दाहिने हाथ से पाउच खोलकर एक ग्रेनेड निकाला। उन्होंने जैसे ही ग्रेनेड फेंकने के लिए अपना शरीर थोड़ा ऊपर उठाया, मशीन गन का एक सीधा ‘बर्स्ट’ (गोलियों की बौछार) उनके सीने के आर-पार हो गया। दृगपाल का शरीर झटकों के साथ पीछे की ओर झुका। सीने से गर्म खून का फव्वारा फूट पड़ा, लेकिन मौत भी उनके इरादों को नहीं हरा सकी। उन्होंने अपनी आखिरी सांस की पूरी ताकत झोंक दी और बंकर के मुहाने से ग्रेनेड अंदर फेंक दिया। धमाके की गूंज के साथ ही मशीन गन खामोश हो गई। कुलदीप दौड़कर उनके पास पहुंचा। दृगपाल की आंखों के सामने धुंधलका छा रहा था। उनके होंठ हिल रहे थे। कुलदीप अपना कान उनके मुंह के नजदीक ले गया। दृगपाल ने लड़खड़ाती आवाज में कहा- “याद रखना… थत्ते साब बोले थे… गाजी पर तिरंगा लहराना चाहिए। कुलदीप… पीछे मत हटना… गाजी पर तिरंगा लहराना चाहिए…।” इतना कहते ही लांस नायक दृगपाल सिंह की गर्दन एक तरफ झुक गई। भारत मां का एक बेटा उसकी गोद में सो चुका था। उसके आखिरी शब्दों ने पूरी रेजिमेंट में आग भर दी थी। करीब 14 दिन चली इस जंग में भारत के सैकड़ों सैनिक शहीद हुए थे। लांस नायक दृगपाल सिंह की वीरता को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। *** स्टोरी एडिट- कृष्ण गोपाल ग्राफिक्स- सौरभ कुमार *** कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है। ——————————————————— सीरीज की ये स्टोरीज भी पढ़ें… अपनी लाइफ जैकेट जूनियर को दी, बोले- बच्चू कूदकर जान बचाओ; 1971 में शहीद कैप्टन मुल्ला की कहानी दिसंबर 1971 का खौफनाक हफ्ता… अरब सागर की लहरें उफान पर थी। समंदर में दुश्मन के छक्के छुड़ाने के लिए INS खुकरी तैनात था। पाकिस्तान से जंग छिड़ चुकी थी। भारत के पुराने जहाजों को पाकिस्तान की मॉडर्न डैफ्ने क्लास पनडुब्बियों से जूझना था। पूरी स्टोरी पढ़ें… पाकिस्तानी हथियार से उसी का बंकर उड़ाया, दुश्मन फौज भागी; गाजीपुर के राम उग्रह की कहानी 20, माउंटेन डिवीजन को एक अहम जिम्मेदारी दी गई। आमतौर पर इसे बॉर्डर के काफी ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में तैनात किया जाता है, लेकिन खास रणनीति के तहत इसे पूर्वी पाकिस्तान की बोगुरा पोस्ट पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। पूरी स्टोरी पढ़ें…