यहां पर पंत परिवार के मुश्किल से 7 घर बचे हैं। जो बचे हैं, उनकी मजबूरी है। न यहां मेडिकल सुविधा है, न स्कूल, और न ही रोजगार। हम हाउस वाइफ हैं, एक गाय पाल रखी है, बस उसी के सहारे दिन काट रहे हैं। रास्ते इतने जर्जर हैं कि कोई सुध लेने वाला नहीं है। हमारी पीढ़ी तो जैसे-तैसे कट गई, लेकिन बच्चों का भविष्य यहां अंधकार में है यह दर्द भरी दास्तां रमा पंत की है। यह किसी आम महिला का बयान नहीं, बल्कि उस गांव की एक बाशिंदे की आवाज है, जिस गांव ने देश को ‘भारत रत्न’ गोविंद बल्लभ पंत दिया। आज 26 जनवरी है। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर देश अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। तिरंगा शान से लहरा रहा है और हम आजादी के नायकों को नमन कर रहे हैं। लेकिन, ठीक इसी वक्त, उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और देश के पूर्व गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत का पैतृक गांव ‘खूंट’ (अल्मोड़ा) अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। दैनिक भास्कर की टीम जब इस गांव में पहुंची, तो वहां गणतंत्र का जश्न नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का मातम पसरा मिला। खूंट गांव में घुसते ही जो पहली चीज आपका स्वागत करती है, वह है- सन्नाटा। पहाड़ की वादियों में गूंजता हुआ सन्नाटा। यह सन्नाटा सुकून का नहीं, बल्कि वीराने का है। गांव की एक और निवासी रश्मि आर्या का दर्द भी रमा पंत जैसा ही है। वे कहती हैं, “यहां पर 7 परिवार अभी तक बचे हैं। पलायन का कारण साफ़ है… न अस्पताल है, न स्कूल की ढंग की सुविधा। बच्चे बेरोजगार पड़े हैं। हम औरतों के लिए भी कुछ नहीं है। सिवाय जानवरों को संभालने के हमारे पास कोई काम नहीं। रास्तों की हालत देखिए, लगता है सालों से किसी ने इनकी खबर नहीं ली।” यह बयान उस हकीकत पर मुहर लगाता है जिसे सरकारी फाइलें अक्सर छुपा ले जाती हैं। खूंट ग्राम पंचायत, जिसके अंतर्गत खूंट और बालसा दो गांव आते हैं, आज डेमोग्राफिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आंकड़े गवाह हैं कि इस क्षेत्र में सबसे अधिक पलायन उसी ‘पंत परिवार’ का हुआ है, जिसके नाम पर यह गांव जाना जाता है। गोविंद बल्लभ पंत के वंशज और रिश्तेदार, जो कभी इस गांव की रौनक हुआ करते थे, अब शहरों में बस गए हैं। सुविधाओं के अभाव ने उन्हें अपनी जड़ों को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। गांव में अब पंत और भोज परिवारों की आबादी सिमट गई है। जो युवा पढ़-लिख गए, वे सबसे पहले निकले। पीछे रह गए हैं तो सिर्फ बुजुर्ग, महिलाएं या वो लोग जिनके पास जाने का कोई विकल्प नहीं था। पानी के लिए संघर्ष: एक पेड़ जिसे दो साल से हटाया नहीं गया गांव की मूलभूत समस्याओं की गहराई को समझने के लिए हमने मीना पंत से बात की। उनकी बात सुनकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रशासन यहां कितना निष्क्रिय है। मीना पंत एक नौले (प्राकृतिक जल स्रोत) की तरफ इशारा करते हुए बताती हैं, “हम लोग यहां पीने का पानी भरने आते हैं। रास्ते में यह पेड़ टूटा पड़ा है, इसे गिरे हुए दो साल हो गए हैं। हमने कितनी बार कंप्लेन कर दी, लेकिन इसे हटाने वाला कोई नहीं है। रास्ता इतना उबड़-खाबड़ है कि पानी सिर पर रखकर लाने में जान निकल जाती है। हमारी उम्र अब इतनी हो गई है कि शरीर साथ नहीं देता, लेकिन मजबूरी है। कोसी नदी का पानी आता तो है, लेकिन वो पीने लायक नहीं है। पीने के लिए हमें इसी खतरनाक रास्ते से होकर नौले तक आना पड़ता है।” सोचिये, जिस गांव के बेटे ने देश की जल और बिजली परियोजनाओं की नींव रखी हो (रिहंद बांध आदि), आज उसी के गांव की बुजुर्ग महिलाएं एक टूटे हुए पेड़ को रास्ते से हटवाने के लिए दो साल से गुहार लगा रही हैं। यह सिर्फ एक पेड़ नहीं है, यह प्रशासन की संवेदनहीनता का स्मारक है। स्मारक या खंडहर? ‘भारत रत्न’ का अपमान गांव के बीचोबीच वह स्थान है जहाँ 10 सितंबर 1887 को गोविंद बल्लभ पंत का जन्म हुआ था। 1987 में, उनकी जन्म शताब्दी पर यहां एक स्मारक बनाया गया था। तब तत्कालीन उपराष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा आये थे। वादे हुए थे, भाषण हुए थे। आज उस स्मारक की हालत देखिये। बाहर से रंग-रोगन करके चमका दिया गया है, लेकिन हकीकत पीछे की दीवारों पर लिखी है। गांव के शंकर सिंह भोज हमें वो असली तस्वीर दिखाते हैं। वे कहते हैं, “भारत रत्न पंडित जी का यह ऐतिहासिक भवन अब बस अवशेष बनकर रह गया है। पहले दीवारें ऊंची थीं, अब पत्थर गिर रहे हैं। पीछे देखिये, जंगली झाड़ियाँ और बिच्छू घास उग आई है। क्या प्रशासन यहां एक सफाई कर्मचारी भी नियुक्त नहीं कर सकता? बाहर से पर्यटक आते हैं, पंत जी की धरोहर देखने, और उन्हें यहां झाड़ियाँ और गिरते पत्थर मिलते हैं। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में यहां कुछ नहीं बचेगा।” शंकर सिंह की चिंता वाजिब है। 10 सितंबर को जब पंत जी की जयंती होती है, तो नेताओं का तांता लग जाता है। मालाएं चढ़ती हैं, फोटो खिंचती हैं, और फिर अगले एक साल के लिए गांव को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है। स्मारक पर चढ़ी वो सूखी मालाएं आज भी लटकी हैं, जो 10 सितंबर को चढ़ाई गई थीं। यह सूखापन केवल फूलों का नहीं, बल्कि सरकारी दावों का भी है। ताले में बंद भविष्य: गांव में सिर्फ नाम की लाइब्रेरी शिक्षा पंत जी के जीवन का मूल मंत्र था। गांव वालों की मांग पर यहां एक वाचनालय और पुस्तकालय भवन बनाया गया। भवन खड़ा है, लेकिन दरवाजे पर ताला जड़ा है। गांव के युवा रोहित पंत हमें उस बंद इमारत के सामने ले जाते हैं। उनके शब्दों में गुस्सा और हताशा दोनों है। रोहित कहते हैं, “मेरे पीछे जो बिल्डिंग आप देख रहे हैं, यह पुस्तकालय है। जब से बना है, तब से बंद है। इसे बनाने का क्या फायदा जब इसमें ताला ही लटकाना था? अगर यहां किताबें होतीं, अखबार आते, कंप्यूटर होता, तो हम जैसे गरीब बच्चे यहीं रहकर एसएससी (SSC) या समूह-ग की तैयारी कर सकते थे। हमें अल्मोड़ा जाकर महंगा किराया नहीं देना पड़ता। बच्चे यहां से पलायन क्यों कर रहे हैं? क्योंकि यहां संसाधन होकर भी नहीं हैं। इस ताले को खोलिये, इसमें इंटरनेट दीजिये, ताकि गांव का युवा भी दुनिया से जुड़ सके।” रोहित का यह सवाल सिस्टम के मुंह पर तमाचा है। लाखों रुपये खर्च करके ईंट-गारे का ढांचा खड़ा कर देना विकास नहीं है। उसका उपयोग होना विकास है। आज खूंट का युवा पढ़ना चाहता है, लेकिन उसे पढ़ने के लिए अपना घर छोड़ना पड़ रहा है। डर के साये में खेती: बाघ, बंदर और सुअर का राज पहाड़ की रीढ़ खेती है, लेकिन खूंट में खेती अब घाटे और जान के जोखिम का सौदा बन गई है। धामस निवासी संतोष सिंह बिष्ट बताते हैं कि कैसे जंगली जानवरों ने जीना मुहाल कर दिया है। संतोष कहते हैं, “यहां स्वास्थ्य और रोजगार की तो दिक्कत है ही, लेकिन जंगली जानवरों का आतंक सबसे बड़ा है। बंदर, सुअर और बाघ… इनका डर सुबह-शाम बना रहता है। दिनदहाड़े बाघ दिख रहे हैं। सुअर रात भर में पूरी खेती खोद डालते हैं। पिछले तीन साल से गांव में रबी की फसल बोना ही बंद कर दिया गया है। लोग खेती छोड़ रहे हैं क्योंकि फसल बचाने के लिए जान जोखिम में कौन डाले? बच्चों के खेलने के लिए कोई स्टेडियम नहीं है, जबकि दूसरे गांवों में बन रहे हैं। यहां विकास के नाम पर शून्य है।” खेत बंजर हो रहे हैं। जब खेत बंजर होते हैं, तो पेट नहीं भरता, और जब पेट नहीं भरता, तो इंसान घर छोड़ने को मजबूर होता है। खूंट का पलायन इसी चक्रव्यूह का नतीजा है। बुजुर्गों की यादों में पंत, हकीकत में सिर्फ मलाल गांव के 79 वर्षीय बुजुर्ग आनंद सिंह भोज, पंत जी के दौर की कड़ियां जोड़ते हैं। वे कहते हैं, “पंत जी हमारे दादाजी की उम्र के थे। हमने सुना है कि उनका बचपन यहीं बीता। यह जो खंडर दिख रहा है, यहीं वो पैदा हुए थे। पहले यहां गड़महल का पेड़ था, बच्चे खेलते थे। सरकार ने स्मारक तो बना दिया, लेकिन गांव को नहीं बचा पाई। अब यहां पंत परिवार के सिर्फ 5-7 मवासे (परिवार) बचे हैं। बाकी सब सप्लाई (पलायन) कर गए।” आनंद सिंह की आंखों में वो चमक नहीं है जो किसी ‘भारत रत्न’ के पड़ोसी होने पर होनी चाहिए। उनकी आंखों में एक खालीपन है—एक ऐसा खालीपन जो तब आता है जब आप अपने ही लोगों को एक-एक करके जाते हुए देखते हैं। जमीन की लूट: धरोहर पर भू-माफिया की नजर जिस दौरान हम गांव में थे तो दबी जबान में लोगों ने ऑफ कैमरा बताया कि ‘भारत रत्न’ के गांव की मिट्टी अब बिकाऊ हो गई है। कुछ स्थानीय बिचौलिए ग्रामीणों की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। 50 हजार से डेढ़ लाख रुपए में जमीनें खरीदी जा रही हैं और बाहरी रसूखदारों को 15-20 लाख रुपए में बेची जा रही हैं। बाहरी लोग यहां रिसॉर्ट या हॉलिडे होम बनाने की फिराक में हैं। जिस गांव में पंत जी ने सादगी और स्वावलंबन का पाठ पढ़ा था, वहां अब कंक्रीट के जंगल उगने की तैयारी है। गांव वाले डरते हैं, इसलिए कैमरे के सामने नाम नहीं लेते, लेकिन दबी जुबान में सब कह रहे हैं- “हमारी जमीनें लुट रही हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे।” गोविंद बल्लभ पंत ने कहा था, “भारत की आत्मा गांवों में बसती है।” विडंबना देखिये कि उनकी अपनी ही आत्मा (उनका गांव) तिल-तिल कर मर रही है। धामस का छोटा सा केंद्र रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। एम्बुलेंस तक नहीं है। लाइब्रेरी में ताला है, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। मनरेगा के अलावा कोई काम नहीं। पगडंडियां टूटी हैं, पेड़ रास्तों को रोके खड़े हैं। पलायन कर चुके पंत परिवारों के बंद घरों के दरवाजों पर लटके जंग लगे ताले संकेत दे रहे हैं- हमें याद मत करो, बस हमें बचा लो। दैनिक भास्कर की टीम जब हम गांव से लौट रही थी, तो पीछे पंत जी की प्रतिमा खड़ी थी। धूप ढल रही थी और प्रतिमा की परछाईं उन झाड़ियों पर पड़ रही थी जिन्हें काटने वाला कोई नहीं है। शायद यही आज के भारत की सबसे सच्ची और कड़वी तस्वीर है।