हमें चुरकी वाला कहते हैं…UGC में इसके लिए क्या नियम?:लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रों में दो फाड़; प्रोफेसर बोले- ये विरोध सियासी

हमारे साथ भी भेदभाव होता है। हमें ‘चुरकी वाला’ कहकर चिढ़ाया जाता है। हमारी जाति देखकर बयानबाजी होती है, हमारे खिलाफ साजिशें रची जाती हैं…तो फिर नियम सिर्फ OBC और बाकी समुदायों के लिए ही क्यों? जनरल कैटेगरी के लिए क्यों नहीं? ये कहना है लखनऊ यूनिवर्सिटी के जनरल कैटेगरी के MA फर्स्ट ईयर के छात्र हर्ष मिश्रा का। जबसे UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में असमानता और भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से UGC नियम 2026 लागू किए हैं, तभी से जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट प्रदर्शन कर रहे हैं। सड़क से लेकर यूनिवर्सिटी तक छात्र हों या शिक्षक, कैंपस हो या राजनीतिक गलियारे हर जगह इसे लेकर घमासान मचा हुआ है। एक तरह से माहौल मंडल आयोग लागू होने के बाद जैसा बन रहा है। वहीं OBC छात्रों का कहना है कि रोहित वेमुला जैसे मामले आते रहते हैं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए यह नियम लाया गया। हालांकि गरीब सवर्ण छात्रों को भी इस दायरे में लाना चाहिए। जबकि प्रोफेसरों का कहना है कि यह विरोध सामाजिक नहीं बल्कि पूरी तरह राजनीतिक है। दैनिक भास्कर की टीम लखनऊ यूनिवर्सिटी पहुंची और जनरल छात्रों से उनके मुद्दा और समस्या, OBC से विवाद पर उनका नजरिया और प्रोफेसरों से उनकी चिंता पर बात की। पढ़िए रिपोर्ट… सवर्ण छात्रों को पहले से ही बॉर्न विलेन मानते हैं
भास्कर टीम जब यूनिवर्सिटी पहुंची, तो वहां UGC के खिलाफ नारेबाजी चल रही थी। करीब 100 स्टूडेंट थे। ये सभी जनरल कैटेगरी के थे। वहां छात्र नेता जतिन शुक्ला से हमने पूछा- UGC से क्या दिक्कत है? इस पर वो कहते हैं- यूजीसी ने जिन नियमों के तहत अलग-अलग वर्गों को कैटेगराइज किया है और जिस तरह इसके लिए कमेटी गठित की है, उसका ऐतिहासिक संदर्भ देखा जाए तो यह प्रक्रिया पहले हैदराबाद यूनिवर्सिटी के एक मामले से भी जुड़ती है। यूजीसी ने छात्रों से सर्वे किए बगैर और शिक्षकों से बातचीत किए बिना, ये नियम सीधे थोप दिए हैं। सवर्ण छात्रों को पहले से ही ‘बॉर्न विलेन’ (जन्म से विलेन) घोषित कर दिया है। हम विश्वविद्यालय में पढ़ने आते हैं। यहां हमारे माता-पिता नहीं होते, लेकिन यही हमारा दूसरा परिवार होता है। हम एक ही क्लास में बैठते हैं, एक ही हॉस्टल में रहते हैं और एक ही थाली में खाना खाते हैं, लेकिन OBC, SC-ST और EWS को अलग-अलग कैटेगरी में बांटकर हमें आपस में बांट दिया है। जतिन ने कहा कि जब छात्र एक साथ रहते और खाते हैं, तब उनके दिमाग में यह नहीं होता कि कौन, किस जाति का है। विश्वविद्यालय से निकले विचारों को छात्र अपने गांव और समाज तक ले जाते हैं और बताते हैं कि यहां सभी जातियों के लोग साथ रहते हैं, सब बराबर होते हैं। “यहां कोई पंडित, बनिया या ठाकुर नहीं होता।” इसमें सवर्ण छात्र क्यों नहीं?
एलयू के छात्र आकर्ष मिश्रा का कहना है कि यूजीसी की नई गाइडलाइंस समाज और छात्रों के बीच जातीय संघर्ष और वैमनस्य फैलाने के उद्देश्य से लाई हैं। इन दिशा-निर्देशों में सवर्ण छात्रों के साथ होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव का उल्लेख नहीं किया है, जो गंभीर सवाल खड़े करता है। कमेटी और स्क्वाड के गठन में भी सवर्णों की भागीदारी को लेकर कहीं कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। गाइडलाइंस में एससी-एसटी, महिलाओं और अन्य वर्गों की बात तो की है, लेकिन सवर्ण छात्रों का जिक्र नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी भी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ है। विश्वविद्यालय को शिक्षा का मंदिर माना जाता है, जहां 24 घंटे पढ़ाई की बात होती है, लेकिन हकीकत यह है कि 24 घंटे लाइब्रेरी खोलने की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि 24 घंटे हेल्पलाइन चालू रखने की बात की जा रही है। इन गाइडलाइंस के जरिए शैक्षणिक नहीं बल्कि राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। एससी-एसटी के लिए नियम पहले से मौजूद
पीएचडी स्कॉलर पीयूष डोगरियाल का कहना है कि एससी-एसटी से जुड़े नियम पहले से ही मौजूद हैं, लेकिन अब सरकार यूजीसी के माध्यम से इन्हें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जमीनी स्तर पर लागू करने की कोशिश कर रही है। यूजीसी की ओर से जो ड्राफ्ट लाया है, उसमें विभिन्न कमेटियों के गठन का प्रावधान है। अब OBC छात्रों की बात… ओबीसी स्टूडेंट बोले- रोहित वेमुला जैसे मामले रुकेंगे
ओबीसी छात्र शैलेन्द्र यादव का कहना है कि ‘एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है’ इसी सोच के तहत इस बिल को देखा जाना चाहिए। उन्होंने रोहित वेमुला प्रकरण को याद करते हुए कहा कि सवर्णों के कथित अत्याचारों से परेशान होकर उन्होंने आत्महत्या जैसा कदम उठाया था। इस तरह के मामले हर साल सामने आते हैं और इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए यह नियम लाया है। उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा नहीं है कि गरीब सवर्ण छात्रों या ठाकुरों का मजाक नहीं उड़ाया जाता या उनके साथ भेदभाव नहीं होता। उनका कहना है कि ऐसे सवर्ण छात्रों को भी इस दायरे में शामिल किया जाना चाहिए था। शैलेन्द्र यादव ने कहा कि भले ही कई लोग इस बिल के दुरुपयोग की आशंका जता रहे हों, लेकिन अगर ऐसा होता है तो उससे संबंधित एजेंसियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। कुछ कमियां जरूर हैं, लेकिन कुल मिलाकर वे इस बिल के समर्थन में हैं। कुछ कमियां हो सकती हैं, लेकिन उसका समर्थन है
एक अन्य ओबीसी छात्र अमितेश पाल का कहना है कि पहले भी एससी-एसटी छात्रों के लिए कई कानून और प्रावधान मौजूद रहे हैं। विश्वविद्यालयों में पहले से ही विभिन्न आयोग और कमेटियां काम कर रही हैं। हालांकि, शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले भेदभाव के मामलों को देखते हुए यह नया नियम लाया है। अमितेश पाल का कहना है कि कुछ कमियां हो सकती हैं, लेकिन कुल मिलाकर वे इस नियम के समर्थन में हैं और इसे जरुरी मानते हैं। एक अन्य छात्र का कहना है कि पहले देश को धर्म के नाम पर बांटा गया, फिर क्षेत्र, जाति और मजहब के आधार पर विभाजन किया और यह क्रम आज भी थमा नहीं है। छात्र के अनुसार, अब यूजीसी के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था में विभाजन किया जा रहा है। उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने और बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने पर काम करने के बजाय, नीतियों के जरिए छात्रों को आपस में बांटने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे कदम शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के बजाय सामाजिक तनाव को और गहरा करते हैं। कुछ छात्रों को पता ही नहीं क्या हैं नियम, बस मचा रहे हो-हल्ला
कैंपस में विरोध और समर्थन के बीच एक वर्ग ऐसा भी है, जिसे यूजीसी-2026 के नियमों की वास्तविक जानकारी ही नहीं है। चाहे ओबीसी छात्र हों या सवर्ण वर्ग के, कई छात्रों को यह तक स्पष्ट नहीं है कि नए दिशा-निर्देशों में क्या प्रावधान किए हैं। कुछ छात्रों ने तो यह भी स्वीकार किया कि उन्हें यूजीसी क्या है, इसकी भी पूरी जानकारी नहीं है। छात्रों के बीच भ्रम की स्थिति यह है कि कुछ का मानना है कि नया नियम इसलिए लाया है, क्योंकि सवर्ण छात्रों द्वारा अत्याचार किया जाता है। जबकि अन्य छात्रों का कहना है कि यह नियम छात्रों के ऊपर हो रहे उत्पीड़न को देखते हुए बनाया है। जानकारी के अभाव में कैंपस में चर्चा और हंगामा बढ़ता जा रहा है, लेकिन नियमों की वास्तविक समझ अब भी सीमित है। अब पढ़िए प्रोसेसरों की बात… प्रोफेसर सुरेश बहादुर का कहना है कि सरकार ने यह नियम कई केस स्टडी और अनुभवों के आधार पर तैयार किए हैं, ताकि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव चाहे वह शिक्षक स्तर पर हो या छात्र स्तर पर रोका जा सके। इस नियम के लागू होने के बाद कुछ सकारात्मक सुधार जरूर देखने को मिलेंगे, हालांकि बहुत कुछ लोगों की मानसिकता पर निर्भर करता है। प्रोफेसर सुरेश ने विरोध पर कहा- यह विरोध सामाजिक नहीं बल्कि पूरी तरह राजनीतिक है। इस मुद्दे को सामाजिक चिंता के बजाय राजनीतिक बहस का रूप दे दिया है। प्रोफेसर आनित्य गौरव का कहना है कि जो लोग इस नियम का विरोध कर रहे हैं, चाहे वे शिक्षक हों या छात्र, शायद उन्हें वास्तव में यह पता ही नहीं है कि नियमों में क्या प्रावधान किए हैं। अधिकतर लोगों ने यूजीसी का ड्राफ्ट पढ़ा ही नहीं है, फिर भी विरोध किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नियम आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगों और महिलाओं के संरक्षण के उद्देश्य से लाए गए हैं। यह सभी वर्गों की महिलाओं पर लागू होते हैं और इनमें किसी जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया है। सरकार को लगा कि कुछ वर्ग ऐसे हैं जिन्हें अतिरिक्त सुरक्षा की आवश्यकता है, इसी सोच के तहत यह नियम लाए हैं ताकि समानता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। क्या हैं UGC के नए इक्विटी नियम? UGC ने इस साल इक्विटी इन हायर एजुकेशन रेगुलेशंस 2026 लागू किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भेदभाव को रोकना और सभी छात्रों व कर्मचारियों को समान अवसर देना है। इन नियमों के तहत हर हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट को Equal Opportunity Centre (समान अवसर केंद्र) बनाना होगा। भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के लिए विशेष समितियां गठित करनी होंगी और 24 घंटे की हेल्पलाइन सेवा भी शुरू करनी होगी। इसके अलावा, तय समय सीमा में शिकायतों पर कार्रवाई भी करनी होगी और अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो UGC उस पर कार्रवाई या जुर्माना भी लगा सकता है। UGC के नए नियमों का विरोध क्यों? UGC ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था। इसका नाम है- ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन, 2026।’ इसके तहत, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के के लिए विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने के निर्देश दिए हैं। ये टीमें खासतौर पर SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों को देखेंगी। सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं। हालांकि, नियमों को जनरल कैटेगरी के खिलाफ बताकर विरोध हो रहा है। आलोचकों का कहना है कि सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ बना दिए हैं। जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स का कहना है कि नए नियम कॉलेज या यूनिवर्सिटी कैंपसों में उनके खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं। इससे कॉलेजों में अराजकता पैदा होगी। यूपी में नए यूजीसी के नियमों को लेकर विरोध तेज
यूपी में UGC के नए नियमों के खिलाफ विरोध तेज हो गया है। लखनऊ, वाराणसी समेत कई शहरों में सवर्ण समाज के लोग और छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दिया। इसके बाद 6 से ज्यादा भाजपा नेताओं ने भी इस्तीफा दे दिया। अयोध्या के संत जगद्गुरु परमहंसाचार्य ने पीएम मोदी को लेटर लिखकर नए नियमों को अन्यायपूर्ण बताते हुए इच्छामृत्यु की मांग की। …………. ये खबर भी पढ़ें… अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्यों में सबसे कम सुरक्षा मिली:उनके गुरु को मिली थी Y+, सेफ्टी के मामले में पुरी गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य नंबर-1 ‘प्रशासन के जिम्मे पूरा मेला है। अगर इस तरह की कोई घटना होती है, तो वही जिम्मेदार होगा। हमारी कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। हम भगवान भरोसे बैठे हैं।’ यह बात प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कही। वो 10 दिन से धरने पर बैठे हैं। शिविर में हंगामे के बाद अब शंकराचार्य की ओर से कल्पवासी थाना अध्यक्ष को एक तहरीर दी गई है। इसमें उन्होंने अपनी जान को खतरा होने की बात कही है। सुरक्षा के लिए 12 सीसीटीवी लगाए गए हैं। पढ़िए पूरी खबर…