नसीमुद्दीन की एंट्री से सपा क्या साधना चाहती है:ओवैसी–मायावती गठजोड़ का डर या परसेप्शन की जंग

यूपी में सपा–कांग्रेस ने मिलकर 2024 लोकसभा का चुनाव लड़ा था। 2027 विधानसभा भी दोनों महागठबंधन के बैनर तले लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन चर्चा में कांग्रेस छोड़कर सपा का दामन थामने जा रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी हैं। आखिर कांग्रेस के एक बड़े नेता को सपा क्यों पार्टी में शामिल कराने जा रही है। क्या सपा को 2027 में मुस्लिम वोट बैंक खिसकने का अंदेशा है या वह ओवैसी–मायावती के संभावित गठजोड़ की काट ढूंढने में जुटे हैं। पढ़िए ये खास खबर… सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुद 15 फरवरी को नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी की सदस्यता दिलाएंगे। उनके साथ बड़ी संख्या में पूर्व विधायक व सांसद के अलावा अलग–अलग जिलों के कार्यकर्ता भी सपा में शामिल होंगे। 2027 चुनाव से पहले सपा को नसीमुद्दीन सिद्दीकी के तौर पर एक बड़ा मुस्लिम चेहरा मिला है। प्रदेश में 19 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं। अभी उनका झुकाव सपा के पक्ष में अधिक है। सपा की पूरी राजनीति ही MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर टिकी है। हालांकि सपा वर्तमान में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर अपना जनाधार बढ़ाने में जुटी है। इसमें भी मुस्लिम निर्णायक भूमिका में हैं। सपा में सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा आजम खान को माना जाता है, लेकिन वर्तमान में वे जेल में हैं और उनके खिलाफ कई IPC और सिविल के मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। सजा के चलते फिलहाल आजम, उनकी पत्नी तंजीन फातिमा या बेटा अब्दुल्ला कोई चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश बाजपेयी कहते हैं- उत्तर प्रदेश में सपा के पास आजम खान से बड़ा कोई चेहरा आज की तारीख में नहीं है। लेकिन ये भी सच है कि जिलों में उसके पास अच्छे जनाधार वाले कई मुस्लिम चेहरे हैं। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक भी आज की तारीख में सपा के साथ ही मजबूती से खड़े हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि सपा ही वह पार्टी है, जो आज की तारीख में भाजपा को हराने का दम रखती है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव, नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी में शामिल करके परसेप्शन की लड़ाई में भी आगे दिखना चाहते हैं। और इसकी वजह भी है…। बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने सीमांचल में राष्ट्रीय जनता दल और महागठबंधन को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। वहीं, महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में सपा के आधार वाले क्षेत्रों में भी इस बार AIMIM बाजी मारने में सफल रही। कुछ इसी तरह की कोशिश AIMIM यूपी में भी करना चाहती है। इसके लिए उसकी आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और बहुजन समाज पार्टी पर नजर है। पहला प्रयास उसका बसपा से गठबंधन करने पर है। यदि किसी कारण बसपा से गठबंधन नहीं हो पाता है, तो वह आजाद समाज पार्टी के साथ भी जा सकती है। ओवैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी में हैं। उत्तर प्रदेश में भले ही आज तक AIMIM को किसी भी चुनाव में कोई सफलता न मिली हो, लेकिन मुस्लिमों के बीच असदुद्दीन ओवैसी काफी लोकप्रिय हैं। युवाओं में तो उनका अलग ही क्रेज है। यही आशंका सपा प्रमुख को भी है। यही कारण है कि वे नसीमुद्दीन जैसे नेता को पार्टी में शामिल कराकर मुस्लिमों को संदेश देना चाहते हैं कि भाजपा को हराने के लिए सभी लोग सपा के साथ आ रहे हैं। सपा ही 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को हरा सकती है। ओवैसी लड़े तो नुकसान, नहीं लड़े तो सपा को फायदा 2024 लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने महागठबंधन के तहत मिलकर चुनाव लड़ा था। सपा को मुस्लिम वोटों का भारी समर्थन मिला, जिससे पार्टी ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी सफलता हासिल की। 2027 विधानसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियां इसी बैनर तले उतरने की तैयारी में हैं। लेकिन मुस्लिम वोट बैंक पर खतरा मंडरा रहा है। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने हाल के महाराष्ट्र निकाय चुनावों में 125 से ज्यादा सीटें जीतीं, जिसमें मुंबई के गोवंडी-मानखुर्द जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में सपा के पारंपरिक गढ़ को छीन लिया। सपा महज 2 सीटों पर सिमट गई। यह नतीजे सपा के लिए चिंता का विषय हैं। महाराष्ट्र में AIMIM ने सपा के वोटबैंक में सेंध लगाई, जहां अबू आसिम आजमी जैसे नेता लंबे समय से मजबूत थे। ओवैसी ने खुलकर अखिलेश यादव को निशाना बनाया था और कहा था कि मुस्लिम नेतृत्व आगे आएगा तो अखिलेश की ‘दुकान बंद’ हो जाएगी। AIMIM का दावा है कि सपा और कांग्रेस मुस्लिमों को सिर्फ वोटबैंक मानते हैं, प्रतिनिधित्व नहीं देते। यूपी में 2022 विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन कोई सीट नहीं जीती। हालांकि उसने कई जगह सपा को नुकसान पहुंचाया था। उदाहरण के तौर पर देखें तो बाराबंकी की कुर्सी सीट पर सपा 217 वोटों से हारी। जबकि AIMIM को 8,541 वोट मिले थे। इसका भाजपा को फायदा हुआ। जब 2024 लोकसभा में AIMIM ने यूपी में प्रत्याशी नहीं उतारे, तो मुस्लिम वोटर एकजुट रहे और सपा को फायदा मिला। बिहार–महाराष्ट्र की जीत के बाद AIMIM यूपी में होने वाले 2027 विधानसभा के लिए कमर कस चुकी है। उसका फोकस यूपी में पश्चिमी इलाकों पर है। यहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है। 2022 में सीडीएसएस-लोकनीति सर्वे के अनुसार, मुस्लिम वोटों में से 79% सपा को मिले थे। भाजपा को 8% मिला। सपा मुस्लिमों का पूरा वोट बटोरना चाहती है। 2017 में मुस्लिम वोटरों के बंटवारे से सपा को हुआ था नुकसान प्रदेश में भाजपा 2017 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर सत्ता में लौटी थी। तब मुस्लिमों के बंटवारे को ही बड़ी वजह बताया गया था। तब मुस्लिम बसपा–सपा के बीच बंटे थे। इसका नतीजा ये रहा था कि भाजपा ने मुस्लिम बहुल 82 में से 62 ऐसी सीटें जीत ली थी, जहां मुस्लिम वोटरों की आबादी एक तिहाई है। आंकड़े गवाह हैं कि तब करीब 2 दर्जन सीटों पर मुस्लिम वोटों के विभाजन से बीजेपी को फायदा पहुंचा था। इसमें मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर, बरेली, बिजनौर, मेरठ की सरधना, गोरखपुर की खलीलाबाद, अंबेडकर नगर की टांडा, श्रावस्ती जिले की श्रावस्ती और गैंसड़ी और मुरादाबाद सीट शामिल थीं। 1.25 लाख मुस्लिम आबादी वाले देवबंद में भी भाजपा जीत गई थी। मुस्लिम समुदाय सपा के माविया अली और बसपा के माजिद अली के बीच बंट गया था। फैजाबाद की रुदौली सीट से बीजेपी के रामचंद्र यादव ने सपा के अब्बास अली जैदी को 30 हजार वोटों से मात दी थी। इसी तरह शामली की थाना भवन सीट, लखनऊ (पूर्व), लखनऊ (सेंट्रल), अलीगढ़, सिवलखास, नानपुरा, शाहाबाद, बहेड़ी, फिरोजाबाद, चांदपुर और कुंदरकी की सीट भी रही। 2022 में मुस्लिमों का बड़ा समर्थन सपा को मिला था 2017 की तुलना में 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को मुस्लिमों का बड़ा समर्थन मिला था। लोकनीति–सीएसडीएस सर्वे के मुताबिक इस चुनाव में मुस्लिमों का 77–79 प्रतिशत वोट सपा को मिला था। यही कारण रहा कि सपा का वोट बैंक 32 प्रतिशत तक पहुंच गया और उसकी सीटों की संख्या बढ़कर 111 पहुंच गई थी। जबकि बसपा ने सबसे अधिक टिकट मुस्लिमों को दिए थे। लेकिन उसे 6–7 प्रतिशत ही मुस्लिमों का वोट मिला और उसका वोट बैंक 22 से गिरकर 13 प्रतिशत से नीचे आ गया। उसके सिर्फ एक प्रत्याशी रसड़ा से उमाशंकर सिंह ही जीत पाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों का 90–92 प्रतिशत समर्थन मिला था। तब सपा अपने गठबंधन साथी कांग्रेस के साथ मिलकर यूपी की 43 सीटें जीत ली थीं। इसमें कांग्रेस के 6 सांसद शामिल हैं। बसपा भी मुस्लिमों को रिझाने में जुटी है बसपा भी पिछले छह महीने से सक्रिय है। मायावती ने मुस्लिम भाई–चारा की बैठक में खुद शामिल होकर खुले तौर पर ऑफर दिया कि मुस्लिम समाज यदि साथ दे तो वह भाजपा को हरा देंगी। उन्होंने ये तर्क भी दिया कि मुस्लिमों का पूरा समर्थन पाकर भी सपा भाजपा को हरा नहीं पा रही है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस से पहले बसपा में ही रहे। उनकी राजनीति की शुरूआत भी बसपा से ही हुई। वह पश्चिमी यूपी में सबसे अधिक सक्रिय भी रहे। ऐसे में सपा प्रमुख सिद्दीकी के माध्यम से बसपा की काट का जवाब भी देना चाहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- नसीमुद्दीन कभी जनाधार वाले नेता नहीं रहे। बसपा में भी वह एक ही बार चुनाव जीत सके। इसके बाद हर चुनाव में वे हारे ही। ये अलग बात है कि बसपा में वे प्रभावशाली रहे और कई विभागों के मंत्री रहे। उनकी पहचान बसपा में भी फंड मैनेजर की ही रही। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के शामिल होने से सपा को बहुत अधिक फायदा नहीं है, लेकिन खुद उनको इसका बड़ा लाभ मिल सकता है। वो अपने बेटे को राजनीति में सेट करा सकते हैं। सपा में मौजूद पुराने बसपाई और कांग्रेस के नाराज होने का कितना खतरा नसीमुद्दीन से पहले सपा में कई ऐसे नेता विधायक–सांसद हैं, जो कभी बसपा में रहे। हालांकि बसपा में रहते हुए नसीमुद्दीन से उनकी कभी अच्छी नहीं बनी। अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में शामिल हो रहे हैं, तो इन नेताओं का असहज होना लाजिमी है। सपा से जुड़े सोर्स कहते हैं कि नसीमुद्दीन के पार्टी में शामिल होने के निर्णय से पुराने बसपाइयों में शामिल बाबू सिंह कुशवाहा, आरके चौधरी, इंद्रजीत सरोज, रामअचल राजभर, लालजी वर्मा जैसे लोग नाखुश हैं। हालांकि सपा प्रमुख का निर्णय होने की वजह से वे खुलकर इसका विरोध भी नहीं कर पा रहे हैं। दूसरा, बसपा की तरह नसीमुद्दीन को सपा के दूसरे मुस्लिम नेता भी भाव देने वाले नहीं हैं। सभी का अपने–अपने क्षेत्रों में खुद का जनाधार है। सपा के ही कई नेता दबी जुबान कह रहे हैं कि उन्हें फंड मैनेजर की जरूरत नहीं है। पर अधिकृत रूप से कोई भी कुछ भी कहने से बच रहा है। नसीमुद्दीन के सपा में शामिल होने पर कांग्रेस की नाराजगी को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि वह काफी दिन पहले पार्टी छोड़ चुके थे। अब वे कहां जा रहे हैं और क्या कर रहे हैं, इसकी चिंता उनको करनी चाहिए। कांग्रेस तो अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी है। कांग्रेस पर क्यों नहीं हमलावर, अब वजह सामने आई नसीमुद्दीन कांग्रेस पर हमलावर नहीं थे। यहां तक कि कांग्रेस नेता राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी की तस्वीरें तक उनके आवास पर टंगी हैं। इसके अलावा कांशीराम की तस्वीर भी उनके आवास पर टंगी है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा था कि उनकी मंशा कांग्रेस को कमजोर करने की नहीं रही। अब सपा में शामिल होने की खबरों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि वे क्यों कांग्रेस पर नरम रहे। यूपी में सपा और कांग्रेस का गठबंधन है। 2027 के विधानसभा चुनाव में भी यह गठबंधन बना रहेगा, इसका संकेत दोनों पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं की ओर से दिया जा चुका है। ऐसे में नसीमुद्दीन पहले से ही सजग थे और ऐसी कोई टिप्पणी कांग्रेस के प्रति नहीं कर रहे थे, जिससे कांग्रेस मुद्दा बनाए। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बारे में पढ़िए रेलवे ठेकेदार से शुरू हुआ था करियर उत्तर प्रदेश की सियासत में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम लंबे समय से चर्चित रहा है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जन्म 4 जून 1959 को हुआ। परिवार में कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। मां की बीमारी के चलते सेना की नौकरी छोड़ने के बाद वे रेलवे की ठेकेदारी में सक्रिय हुए। 1990 के आसपास नसीमुद्दीन बसपा संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आए। शुरुआत पालिका (नगर पालिका) चुनाव से हुई। 1984 में बसपा में शामिल हुए। 1991 में पहली बार बांदा विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे बसपा के पहले मुस्लिम विधायक थे। बसपा सरकार में मिनी सीएम कहलाते थे बसपा की सभी सरकारों में वे मंत्री बने। साल 2007–2012 की बसपा सरकार में नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास 18 मंत्रालय थे और उन्हें मिनी सीएम कहा जाता था। नसीमुद्दीन बसपा में बहन मायावती के सबसे करीबी लोगों में गिने जाते थे। टिकट बंटवारे से लेकर वित्तीय मामलों और पार्टी संगठन में उनका दखल रहता था। 2012–2017 तक वे विपक्ष के नेता भी रहे। 2017 में मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था। इसके बाद उन्होंने नई पार्टी बना ली। फिर 2018 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। पार्टी ने उन्हें मुस्लिम चेहरे के तौर पर प्रमोट किया था। अब विधानसभा चुनाव से एक साल पहले उन्होंने कांग्रेस को भी अलविदा कह दिया। 24 जनवरी को कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले नसीमुद्दीन का अब नया सियासी घर सपा बनने जा रही है। 15 फरवरी को अखिलेश यादव की मोजूदगी में वे समर्थकों के साथ सपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे। ———————– ये खबर भी पढ़ें- ‘कांशीराम साहब का मर्ज…1991 की वो रात नहीं भूलती’:नसीमुद्दीन बोले- भाजपा को हराने के लिए उसकी काट खोजनी होगी ‘1991 की बात है। मैं कांशीराम साहब के साथ फतेहपुर के पुराने पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में रुका था। एक बड़े कमरे में वह सोए, बगल के छोटे कमरे में मैं था। रात करीब 2 बजे नींद टूटी, तो उन्हें कमरे में टहलते और खांसते देखा। तबीयत के बारे में पूछा तो बोले- नींद नहीं आती। दवा की बात की तो कहा- दवा नहीं मिलेगी। फिर बोले- बैठ जा, पहले मर्ज तो समझ ले। ये बातें नसीमुद्दीन सिद्दकी ने दैनिक भास्कर से कहीं। पढ़ें पूरी खबर..