‘अखिलेश सांसद बनने के बाद कन्नौज नहीं आते’:असीम अरुण बोले- मुझे DM-SP ने 45 मिनट वेट कराया, मैंने उन्हें माफ किया

कन्नौज में डीएम-एसपी के नहीं आने पर कार्यक्रम छोड़कर जाने वाले समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण चर्चा में हैं। उन्होंने कहा – ये मेरी व्यक्तिगत बात नहीं है। मुझे 45 मिनट तक वेट करना पड़ा। वहां 100-200 लोगों को भी वेट करना पड़ा, रोज ही ऐसा होता है। कन्नौज से अखिलेश यादव सांसद हैं। उनके साथ बतौर BJP विधायक तालमेल पर कहते हैं- वो सांसद रहते हुए सिर्फ कब्रिस्तान की दीवारें बनवा रहे, 2 महीने में यहां आते हैं, एक्सप्रेस-वे से ही लौट जाते हैं। बतौर पुलिस अफसर सपा के शासन में कैसा दबाव रहता था? इस सवाल पर मंत्री अरुण ने कहा- ‘वो (सपा) तो ATS को ही खत्म कर देना चाहते थे। आतंकवादियों के केस वापस लेने के लिए अर्जी दाखिल कर दी थी। उस वक्त ज्यूडिशियरी ने स्टैंड लिया था। सपा आतंकवादियों को लेकर कैसा रुख रखती है, ये सबको पता है।’ पढ़िए BJP विधायक असीम अरुण का पूरा इंटरव्यू… सवाल. अखिलेश यादव कन्नौज के सांसद हैं, उनके साथ कैसा तालमेल है? असीम. अखिलेशजी से तालमेल तो कुछ भी नहीं है। उनके चुने जाने पर मैंने बधाई दी थी, कन्नौज के विकास के लिए मिलकर काम करना चाहिए, लेकिन उनकी तरफ से ऐसा कभी मुझे कुछ नहीं दिखा। बल्कि मैं तो अखबार में रिपोर्ट भी देख रहा था कि सांसद निधि उन्होंने केवल कुछ कब्रिस्तानों की दीवारों को बनाने के लिए दी है। सांसद के रूप में दो-ढाई साल में उन्होंने कुछ भी काम नहीं किया। कन्नौज भी शायद 2 महीने में एक बार आते हैं। एक्सप्रेस-वे पर लोगों से मिलकर वापस चले जाते हैं। इस तरह का उनका व्यवहार रहता है। मगर, ये उनका विषय है। वो अपनी राजनीति अलग तरीके से करते हैं। हम लोग जमीन की राजनीति करते हैं। सवाल. सपा सरकार में आप एटीएस चीफ थे। कभी किसी तरह कोई दबाव आया हो? असीम. सपा सरकार ने तो एटीएस को बंद करने का ही मूड बना लिया था। आपने देखा होगा, किस तरीके से आतंकवादियों के खिलाफ जितने भी केस थे, उन्होंने सारे वापस लेने का निर्णय लिया और अर्जी भी दाखिल की थी। मैं धन्यवाद दूंगा अपनी ज्यूडिशियरी का, जिन्होंने स्टैंड लिया। आतंकवादियों के खिलाफ सपा का क्या रुख था, ये तो हम सब जानते हैं। सवाल. विपक्ष आरोप लगाता है कि अधिकारी जनता और जनप्रतिनिधियों की सुनते नहीं हैं? क्या आप इससे सहमत हैं? असीम. ऐसा नहीं है, बेसिकली डेमोक्रेसी और ब्यूरोक्रेसी, ये दोनों सरकार के अहम पहलू हैं। संविधान ने तय किया कि सांसद-विधायक होंगे। जो डायरेक्शन देना है, वो चयनित लोगों को देना है। अब ब्यूरोक्रेसी, पुलिस विभाग अपने काम को अच्छे से कर रहा है। हां, जवाबदेही योगी सरकार ने बढ़ा दी है। शिकायतों पर जांच के बाद दंडित भी किया जाता है। सवाल. कन्नौज में आपको डीएम ने लंबा इंतजार कराया, नाराजगी जाहिर की, पत्र भी लिखा।
असीम. उस कार्यक्रम में मुझे बुलाया गया था। 45 मिनट तक कार्यक्रम शुरू ही नहीं हुआ। अधिकारी आए ही नहीं, मैंने ऐतराज जताया। उन अधिकारियों ने माफी मांग ली। मैंने उनको माफ भी कर दिया, यहां बात खत्म हो गई। ये मेरी व्यक्तिगत बात नहीं है कि मुझे 45 मिनट तक वेट करना पड़ा। वहां 100-200 लोगों को वेट करना पड़ा। रोज ही ऐसा होता है। इस घटनाक्रम को अच्छे पहलू के रूप में यूज करना भी जरूरी है, इसलिए मैंने एक अभियान शुरू किया है कि हम ऑफिस समय पर आएंगे। परिवार को भी समय देंगे। सवाल. आपने कन्नौज कलेक्ट्रेट का निरीक्षण किया, कई अफसर अनुपस्थित रहे, कोई फर्क क्यों नहीं पड़ रहा? असीम. अपने विभाग में हमने फेशियल रिकग्निशन अटेंडेंस लगाई। अब निरीक्षण कम करना पड़ता है, क्योंकि एप पर ही मुझको दिख जाता है। हमने जो नियम बनाए, उसमें कोई 15 मिनट लेट आता है, तो उसको वार्निंग दी जाती है। दोबारा लेट हो जाता है तो उसकी छुट्‌टी कर दी जाती है। सवाल. लंबे समय से यूपी में स्थाई डीजीपी नहीं है, इस परिपाटी को आप कैसे देखते हैं? असीम. यूपी में डीजीपी तो है ही, सुप्रीम कोर्ट का एक ऑर्डर आया था। उसके आधार पर यूपीएससी की एक प्रक्रिया निर्धारित की गई। मैं समझता हूं कि वो प्रक्रिया भेदभाव करने वाली है। आप समझिए उसके तहत तीन लोगों का पैनल बनाया जाएगा। 10 साल की स्टडी करें, तो सिर्फ वो लोग चयनित होंगे, जो 21-22 साल की उम्र पर सेवा में आए। 25-26 साल पर सेवा में आने वाले कभी डीजीपी नहीं बन सकते हैं। दूसरे, जो आरक्षण से आए हैं, अनुसूचित जाति या शेड्यूल ट्राइब हैं, वो 10 साल तक कभी डीजीपी बन ही नहीं पाएंगे, क्योंकि इंपैनलमेंट में टॉप तीन में आएंगे ही नहीं। ये मेरी व्यक्तिगत राय है और मुझे लगता है कि इस पर सुप्रीम कोर्ट को पुनर्विचार करना चाहिए। मुझे लगता है कि प्रदेश सरकार को चीफ सेक्रेटरी, डीजीपी जैसे महत्वपूर्ण पद को चुनने का पूरा अधिकार होना चाहिए। सवाल. आप 4 साल पहले कन्नौज के विधायक बने, जनता से जो वादे किए थे, उन्हें कितना पूरा कर सके? असीम. कन्नौज की लाइफलाइन जीटी रोड और PWD की सभी सड़कें मजबूत बना दी गईं हैं। आप समझिए कि 30% कम कॉस्ट पर काम करवाए गए। मतलब 1 करोड़ स्वीकृत हुआ, लेकिन कंस्ट्रक्शन 70 लाख में पूरे करवा दिए गए। क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार निरीक्षण किए गए। लोकल लोगों ने बहुत सपोर्ट किया। समाज कल्याण विभाग की बड़ी जिम्मेदारी वृद्धों को पेंशन देना है, पूरे यूपी में अभियान चलाया। सिर्फ कन्नौज के 400 बच्चे सर्वोदय विद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं। सवाल. विधायक के रूप में कोई ऐसा काम, जो लगता हो कि बहुत पहले हो जाना चाहिए था? असीम. मुझे लगता है कि कन्नौज में 3 अच्छे तालाब हैं, पिछली सरकार में उपेक्षा के कारण वो गंदे रहे, अमृत-2 योजना के तहत 1 करोड़ रुपए से तीनों तालाब को खोदा गया, अब उसमें फ्रेश पानी है। इसमें मछलियां हैं, जहां गंदगी थी, वहां अब सुंदरता है। सवाल. कोई ऐसा काम जो अभी तक आप करवा नहीं सके हैं? असीम. ऐसे तो बहुत लंबी लिस्ट होगी, हमने विधानसभा के साथियों से पूछा- विधायक निधि कहां खर्च होनी चाहिए। सबने कहा- स्वास्थ्य और शिक्षा पर ही खर्च करना चाहिए। नतीजा ये हुआ कि 40 स्कूल ऐसे हैं, जिनमें 20-20 लाख रुपए हमने दिए। हमने पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) को अपग्रेड किया। जिला अस्पताल के 3 मुख्य वार्ड को आधुनिक बना दिया। आगे हम कन्नौज के जिला अस्पताल की इमरजेंसी को बेस्ट बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसका प्रस्ताव सीएमएस तैयार कर रहे हैं। 1.5 करोड़ के फंड का संकल्प लिया गया है। हम चाहते हैं कि विषम परिस्थिति में ही कोई कन्नौज से दिल्ली, लखनऊ, कानपुर रेफर किया जाए। सवाल. आपने खाकी छोड़कर खादी पहन ली, 4 साल हो गए। कैसा अनुभव रहा? असीम. वर्दी में पुलिस के काम करने का तरीका अलग होता है, वहां आदेश दिया जाता है, लेकिन पॉलिटिक्स में अनुरोध होता है, क्योंकि यहां सब समान कार्यकर्ता हैं। रही समाज कल्याण विभाग की बात, तो वहां ऑर्डर चलता है, लेकिन पुलिस विभाग की तरह हुकुम की तामील नहीं होती, ये मैंने समझा। मुझे कुछ तेज अधिकारी मिल गए हैं, रिजल्ट भी अच्छे मिल रहे हैं। सवाल. 28 साल बनाम 4 साल कौन सा बेहतर है? असीम. दोनों बहुत अच्छे हैं। क्या पुलिस की जॉब में सब कुछ मीठा-मीठा था…नहीं। कभी कड़वा भी मिला। कभी पत्थर भी खाए, कई बार गोली भी खानी पड़ी। अब राजनीति में हैं, क्या हमेशा यहां सब कुछ मीठा-मीठा मिलेगा। दोनों स्वीकार हैं। सवाल. आप कानपुर में पुलिस कमिश्नर थे। चुनाव की घोषणा हुई। आपने अचानक इस्तीफा देकर भाजपा जॉइन कर ली। अचानक ख्याल कैसे आ गया? असीम. भाजपा बड़ी स्ट्रॉन्ग पार्टी है। दूसरी पार्टियों का परिवारवाद नए नेता को उभरने नहीं देता। भाजपा में नए नेता क्रिएट किए जाते हैं। यही नीति भाजपा को आगे लेकर जा रही है। मैं अकेला नहीं हूं, 12 डॉक्टर भी भाजपा में MLA हैं, पीएचडी होल्डर्स हैं, वकील, बिजनेसमैन और मीडिया के लोग हैं। भाजपा विविधता और विशेषज्ञता को डेवलप करने के लिए काम करती है। मैं भी उसी का हिस्सा हूं। सवाल. भाजपा ने आपको चुना या आपने भाजपा को? असीम. मैं भाजपा का बहुत आभारी हूं, क्योंकि अवसर देना भाजपा की ही रीति-नीति है। मैं समझता हूं, बाकी पार्टियां परिवारवाद देखती हैं। वो अपने बच्चों को बढ़ाने में बिजी हैं, भाजपा में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी नेता निकलकर आते हैं। चुनाव और लोगों का दिल कैसे जीता जाता है, भाजपा इसको समझती है। सवाल. आपने परिवारवाद की बात की। कल्याण सिंह की तीसरी पीढ़ी सियासत में है, राजनाथ सिंह के बेटे विधायक हैं। क्या यह परिवारवाद नहीं है? असीम. परिवारवाद से मेरा मतलब ये है कि किसी का बेटा-बेटी काबिल नहीं हैं, लेकिन उन्हें आगे बढ़ाया जा रहा है, ये गलत है। लेकिन कोई काबिल है, लेकिन उसको सिर्फ इसलिए नहीं चुना जा रहा है कि वो किसी नेता का बेटा-बेटी है। ये संतुलन समझने की जरूरत है। भाजपा में हमारे साथियों के माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी राजनीति में रहे, वो मेहनत कर रहे हैं। उनके लिए टिकट से लेकर चुनाव लड़ना, उतना ही कठिन है, जितना मेरे जैसे फर्स्ट जनरेशन पॉलिटिशियन के लिए है। सवाल. कभी ऐसा लगा कि खाकी छोड़ने का फैसला गलत हो गया? असीम. बिल्कुल भी नहीं, खाकी पहनने का आनंद है, लेकिन अब मैं पॉलिटिक्स में हूं, सौभाग्य से कन्नौज के लोगों ने मुझे आशीर्वाद दिया। सवाल. भाजपा संगठन और सरकार में दलितों की भागीदारी को आप पर्याप्त मानते हैं? असीम. भाजपा में हम सबको साथ लेकर चलते हैं। हम उसके लिए भी काम करते हैं, जो हमको वोट नहीं देता है। मान लेते हैं कि अगली बार उनके भी वोट मिल जाएंगे। मुझे कन्नौज का विधायक चुना गया है, तो जिसने मुझे वोट नहीं दिया, वो भी मेरी जिम्मेदारी में है। भाजपा सबको जोड़ने का काम करती है। सवाल. मायावती को दलितों का मसीहा भी कहा जाता है। दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही हैं। इसके पीछे की वजह क्या मानते हैं? असीम. अगर 1989 से शुरू करें, तो अगले 30 साल एक सामाजिक न्याय की राजनीति का समय था। बैकवर्ड राजनीति आगे बढ़ी, इसके कुछ अच्छे परिणाम भी हुए। लेकिन हमारी पॉलिटिक्स मेच्योर हो रही है। मोदीजी ने देश को वोट बैंक पॉलिटिक्स से बाहर निकाला है। लोकतंत्र में एक प्रत्याशी की तरह किसी बिरादरी के 20 हजार वोट को अपना मान लूं, तो मैं काम करना ही बंद कर दूंगा। अगर शंका रहेगी तो दौड़-दौड़कर उनके लिए काम करूंगा। बसपा में कांशीरामजी ने बहुत बड़ा काम किया। मगर, वोट बैंक पॉलिटिक्स से बाहर आने की जरूरत है, क्योंकि तब भी पार्टियां आपके दरवाजे पर आएंगी। सवाल. संभल में एक सीओ कहते हैं कि जो ईरान का समर्थन करता है, वो ईरान चला जाए, पुलिस में इसको आप कैसे देखते हैं? असीम. यह बयान मेरी जानकारी में नहीं है। लेकिन जब हम पुलिस की वर्दी पहनते हैं तो हम धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा के भाव से अलग हो जाते हैं। अब भास्कर के सबसे बड़े सर्वे में हिस्सा लीजिए… यूपी में विधायकों के 4 साल पूरे हो चुके हैं। क्या आपके मौजूदा विधायक को 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट मिलना चाहिए? भास्कर सर्वे में हिस्सा लेकर बताइए… …………… ये पढ़ें – ब्रजेश पाठक हाथ जोड़कर प्रदर्शनकारियों के पास पहुंचे:बोले- मैं खुद सवर्ण, लखनऊ में UGC नियमों के खिलाफ शंख बजाकर प्रदर्शन लखनऊ में सवर्ण मोर्चा के लोगों ने बुधवार को डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का आवास घेर लिया। प्रदर्शनकारी यूजीसी के नए नियमों को काला कानून बताते हुए शंख बजाकर नारेबाजी करने लगे। इसी बीच ब्रजेश पाठक उनके बीच पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रदर्शन कर रहे लोगों अभिवादन किया। डिप्टी सीएम के इस तरह सम्मान करने पर प्रदर्शनकारियों ने हंगामा बंद कर दिया। सभी ने ब्रजेश पाठक को उन्हीं के अंदाज में प्रणाम किया। इसके बाद डिप्टी सीएम खुद सभी को अंदर ले गए। पढ़िए पूरी खबर…