राजा सुहेलदेव के मेले से राजभर 110 सीटें साधेंगे:3 जातियों को एकजुट करने की प्लानिंग, बहराइच में पहले लगता था गाजी मियां का मेला

“बहराइच को उसकी सही पहचान देने का वक्त आ चुका है। अभी तक हम गलत इतिहास पढ़ रहे थे। खास वर्ग के वोटबैंक के लिए एक विदेशी आक्रांता को महिमामंडित करके उसकी दरगाह पर मेला लगवाया जाता रहा।” यह कहना है यूपी के कैबिनेट मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर का। दरअसल, इस साल बहराइच में 10 जून से महाराजा सुहेलदेव की याद में मेला लगाया जाना है। अब तक महमूद गजनवी के कमांडर सैयद सालार मसूद की कब्र पर मेला लगता रहा है। हालांकि, पिछले साल प्रशासन ने इसकी इजाजत नहीं दी थी। सालार मसूद 10 जून को महाराजा सुहेलदेव के साथ हुए युद्ध में मारा गया था। मेले में सीएम योगी आदित्यनाथ को बुलाने की भी तैयारी है। लेकिन, यह मामला इतना सीधा भी नहीं है। एक मेले के जरिए भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी सुभासपा तीन जातियों को अपने पाले में लाना चाह रही है। सवाल है कि आखिर मेला लगाकर से तीन जातियों को अपने पक्ष में कैसे किया जा सकता है? क्या इस बार दरगाह पर मेला लगेगा या नहीं? 10 जून मेले को लेकर क्या तैयारी है? पढ़िए खास रिपोर्ट… सबसे पहले मेले की सियासत को समझिए… विधानसभा की 110 सीटों पर पड़ सकता है असर
राजभर समाज का प्रदेश में 3-4 प्रतिशत वोटबैंक ही है। लेकिन, 40 से 60 विधानसभा सीटों पर इनकी निर्णायक भूमिका मानी जाती है। राजभर समाज महाराजा सुहेलदेव को अपना नायक मानता है। ऐसे में उनकी याद में मेला लगाकर ओमप्रकाश राजभर इसी वोटबैंक को मजबूत करने की कोशिश में हैं। इसी तरह दलित वर्ग में पासी समाज की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी मानी जाती है। ये करीब 50 सीटों पर असर डालते हैं। इस समाज में भाजपा और सपा दोनों की पकड़ है। भाजपा मेले के जरिए पासी समाज को साधने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं, राजपूत समाज पहले से ही भाजपा के समर्थन में माना जाता है। ऐसे में यह मेला तीन प्रमुख जातियों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पासी, राजभर और क्षत्रियों के नायक महाराजा सुहेलदेव
महाराजा सुहेलदेव को लेकर इतिहास में अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। क्षत्रिय समाज उन्हें सूर्यवंशी मानता है। इस वजह से उनके विजयोत्सव में बड़ी संख्या में क्षत्रिय समाज के लोग शामिल होते रहे हैं। पासी समाज भी महाराजा को अपना मानता है। सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर उन्हें ‘राजभर महाराज सुहेलदेव’ कहते हैं। राजभर का कहना है कि वे उस समय के 165 राजभर राजाओं में सबसे प्रतापी थे। इतिहास में इसे लेकर मतभेद भी रहे हैं। माना जाता है कि वे श्रावस्ती के राजा हरिदेव (या मंगलध्वज) के पुत्र थे। उनके बड़े भाई मल्लदेव एक मंदिर को बचाते हुए शहीद हो गए थे। इसके बाद सुहेलदेव ने स्थानीय हिंदू राजाओं, राजभर, पासी और राजपूत सेनानायकों को साथ लेकर सालार मसूद को हराया। यही वजह है कि कई जाति समूह महाराजा सुहेलदेव को अपने समाज के नायक के रूप में पूजते हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- महाराजा सुहेलदेव के प्रति राजभर, पासी और राजपूत समाज में गहरी श्रद्धा है। सैयद सालार गाजी को विदेशी आक्रांता माना जाता है। ऐसे में भाजपा और सुभासपा के लिए यह मेला राजनीतिक रूप से भी अनुकूल माना जा रहा है। इससे एनडीए को सीधा फायदा मिलने की संभावना है। गाजी मियां की दरगाह पर प्रशासन ने पिछले साल मेला रोका
बहराइच शहर के बैंकुंठा इलाके में सैयद सालार मसूद (गाजी मियां) की कब्र है। वह 11वीं सदी के आक्रमणकारी महमूद गजनवी का सेनापति था। राजा सुहेलदेव के साथ युद्ध में मारा गया था। करीब 500 साल पहले मसूद को सूफी संत बताकर सालाना जेठ मेला लगना शुरू हुआ था। यह मेला हिंदू कलेंडर के हिसाब से ज्येष्ठ महीने के पहले रविवार से शुरू होकर करीब एक महीने तक चलता था। मेले में देश के अलावा नेपाल से बड़ी संख्या में मुस्लिम और हिंदू श्रद्धालु शामिल होते थे। इसके अलावा भी लोग सालभर यहां आते रहते हैं। दरगाह परिसर में मस्जिद, लाइब्रेरी और दुकानें हैं। पिछले साल सरकार ने सुरक्षा कारणों से मेला लगाने की परमीशन नहीं दी थी। महाराजा सुहेलदेव स्मारक पर 10 दिन का लगेगा मेला
दरगाह से करीब 8 किमी दूर गोंडा रोड पर चित्तौरा गांव के पास 84 बीघा में महाराजा सुहेलदेव का स्मारक है। चित्तौरा झील के पास ही महाराजा ने 10 जून, 1034 को आक्रांता सैयद सालार मसूद और उसकी सेना को हराया था। इसी वजह से इलाके के लोग 10 जून को विजयोत्सव मनाते हैं। फरवरी, 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस स्मारक की आधारशिला रखी थी। 10 जून, 2025 को सीएम योगी ने महाराजा सुहेलदेव की घोड़े पर सवार 40 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया था। इस साल यहां 10 से 19 जून तक मेला लगाया जाएगा। अब पढ़िए ओपी राजभर ने क्या कहा 17 दिन चले युद्ध के बाद मारा गया सालार मसूद
सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर बताते हैं- सालार मसूद अफगानिस्तान से आया एक विदेशी लुटेरा था। उसके आक्रमण के समय देश में 585 राजा थे। बहराइच और आसपास के इलाकों में 165 राजभर राजा थे। इनमें राजा सुहेलदेव सबसे प्रतापी थे। उन्होंने आसपास के राजाओं को इकट्ठा किया। बहराइच के नानपारा मैदान के पास सालार मसूद से युद्ध किया। 17 दिन युद्ध के बाद 10 जून, 1034 को कोटला नदी (चित्तौरा झील) के किनारे सालार मसूद की हार हुई। इतिहासकारों ने वीर योद्धा महाराजा सुहेलदेव को भुला दिया। एक आक्रमणकारी का महिमामंडन किया। सूफी संत बताकर अंग्रेजी शासन में उसकी कब्र पर दरगाह बनाई गई। हर साल एक महीने तक मेला होने लगा। आईने अकबरी में है सुहेलदेव की वीरता का उल्लेख
राजभर बताते हैं- महाराजा सुहेलदेव की वीरता की कहानी 17वीं शताब्दी में फारसी इतिहासकार अब्दुर रहमान चिश्ती की किताब मिरात-ए-मसूदी में है। इसमें सैयद सालार मसूद की जीवनी के साथ राजा सुहेलदेव का विस्तृत उल्लेख मिलता है। आईने अकबरी में भी महाराजा सुहेलदेव की वीरता का जिक्र है। वहीं, ब्रिटिश काल के जिला गजेटियर और स्थानीय लोककथाओं में भी इस घटना का उल्लेख मिलता है। दुर्भाग्य से आजादी के बाद हम एक विदेशी आक्रांता को पूजने लगे। मुस्लिमों के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदू भी उसकी कब्र पर चादर चढ़ाने लगे। इतिहास में महाराजा के शौर्य को भुला दिया गया था। अब सरकार इसे ठीक कर रही है। अब तक 3 दिन का होता था विजयोत्सव कार्यक्रम
महाराजा सुहेलदेव स्मारक समिति के अध्यक्ष यशुवेंद्र विक्रम सिंह बताते हैं- पहले 3 दिन का विजयोत्सव कार्यक्रम होता था। स्मारक के पास प्राचीन मंदिर में भागवत कथा या अन्य धार्मिक आयोजन होते थे। समापन पर प्रदेश सरकार के किसी अतिथि को बुलाकर महाराजा सुहेलदेव के शौर्य पर चर्चा की जाती थी। यशुवेंद्र बताते हैं कि 1950-51 में उनके बाबा राजा वीरेंद्र विक्रम सिंह ने ट्रस्ट की स्थापना की थी। स्मारक के लिए 84 बीघा जमीन दान में दी गई थी। ट्रस्ट के नाम पर करीब 500 बीघा जमीन है। इसमें चित्तौरा झील भी शामिल है। अब स्मारक स्थल पर प्रतिमा के अलावा एक नया मंदिर बनाया गया है। 200 बेड की डॉरमेट्री, 250 लोगों की क्षमता वाला मल्टीपर्पज हॉल और ओपन स्टेज भी है। सीएम ने कहा था कि मसूद के नाम पर मेला न हो
यशुवेंद्र विक्रम सिंह कहते हैं- सीएम योगी ने 5 अप्रैल को गोरखपुर में सालार मसूद को “उस समय का माफिया” बताया था। सीएम ने कहा था कि आज के माफिया की सोच और कार्यशैली उसी जैसी है। सालार मसूद के नाम पर मेला नहीं होना चाहिए। राष्ट्रनायकों का सम्मान होना चाहिए। वह कहते हैं- महाराजा सुहेलदेव ने सालार मसूद को हराकर लोगों को गुलामी से मुक्ति दिलाई थी। युद्ध के दौरान सुहेलदेव ने गुरिल्ला रणनीति अपनाकर मसूद की बड़ी सेना को हराया था। महाराजा ने सालार मसूद को इस्लाम में सबसे बुरी मौत दी थी। उसे गर्म लोहे के तवे पर बांधकर जला दिया था। यह सजा इस्लाम के अनुसार उसे जहन्नुम (नरक) भेजने की गारंटी देती है। अब 2 सबसे बड़े सवाल… सवाल 1. क्या इस बार गाजी मियां का मेला लगेगा?
जवाब. मेला लगाने के लिए प्रशासन, फायर विभाग और पुलिस की एनओसी जरूरी होती है। दरगाह शरीफ प्रबंध समिति ने अभी तक इसके लिए प्रशासन से परमिशन नहीं मांगी है। समिति के अध्यक्ष बकाउल्ला इस पर कुछ भी कहने से इनकार करते हैं। समिति के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मेला आमतौर पर 21 मई के आसपास शुरू होता है। इसमें अभी समय है। फिलहाल, दरगाह पर मेले को लेकर स्थिति साफ नहीं है। मेले में इंतजाम के लिए ठेका भी उठाया जाता है। लेकिन, इस बार मेले का ठेका नहीं दिया गया है। इससे संकेत मिलते हैं कि इस बार भी मेला लगना मुश्किल हो सकता है। दरगाह पर हर साल जनवरी में 5 दिन तक उर्स मेला भी लगता है। हालांकि, इस बार प्रशासन ने सिर्फ 2 दिन की परमिशन दी थी, लेकिन बाहरी दुकानों की परमिशन नहीं थी। इससे साफ है कि इस बार भी मेले की परमिशन मिलना मुश्किल नजर आ रहा है। सवाल 2. क्या सुहेलदेव स्मारक पर भी हाईकोर्ट का आदेश लागू होगा‌?
जवाब. पिछले साल मेले की इजाजत न मिलने पर दरगाह शरीफ प्रबंध समिति ने हाईकोर्ट का रुख किया था। तब हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी मेले की अनुमति नहीं दी थी। हालांकि, पूजा-पाठ पर पर रोक नहीं थी। लोग बिना जत्था बनाए सामान्य तरीके से पूजा करने जा सकते हैं। हाईकोर्ट का ये आदेश अब भी लागू है और इस पर कोई स्टे नहीं लिया गया है। प्रशासन भी इसी का हवाला दे रहा है। अब सवाल यह है कि जब हाईकोर्ट ने दरगाह मेले की इजाजत नहीं दी, तो सुहेलदेव स्मारक पर मेले की इजाजत कैसे मिलेगी? इस पर सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर कहते हैं कि सुहेलदेव स्मारक पर किसी तरह की रोक नहीं है। अनुमति प्रशासन को देनी है। स्मारक शहर से 8 किमी दूर है, इसलिए मेले में आने वाले लोगों से शहर के यातायात पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ————————- ये खबर भी पढ़ें… श्रृंगवेरपुर में निषादराज का किला, फिर मजार कैसे, निषाद पार्टी आंदोलन कर रही; मुस्लिम बोले- उनकी सरकार, जो चाहे बनवा लें प्रयागराज के श्रृंगवेरपुर में यूपी सरकार ने 40 बीघे में निषादराज पार्क बनवाया। इसमें करीब 37 करोड़ रुपए खर्च हुए। पीएम मोदी ने उद्धाटन किया, लोग पार्क में आने लगे। इसी पार्क की बाउंड्री से लगकर एक मजार और मस्जिद है। अब उसे लेकर विवाद हो रहा है। पूरी खबर पढ़ें…