यूपी में बिजली संकट कितना बड़ा मुद्दा:गर्मियों में ‘अघोषित कटौती’ बन जाती है मजबूरी; चुनाव से पहले भाजपा विधायक क्यों डरे

यूपी में एक तरफ पारा रोज नए रिकॉर्ड छू रहा है, वहीं शहर से लेकर गांव तक ‘पावर कट’ से जनता में हाहाकार है। यूपी पावर कॉरपोरेशन (UPPCL) ने 30 हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली सप्लाई करके रिकॉर्ड बनाया। लेकिन, लोगों की जरूरत भर की बिजली नहीं दे पा रहा है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के डर से भाजपा के अपने विधायक भी इस कदर सहमे हुए हैं कि वे ऊर्जा मंत्री को सीधे चिट्ठियां लिख रहे हैं। 23 मई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के 2 अभियंताओं को सस्पेंड कर दिया। इनमें गाजियाबाद के अधिशासी अभियंता राहुल कुमार और मेरठ के अधिशासी अभियंता योगेश कुमार शामिल हैं। 2 अन्य अभियंताओं को प्रतिकूल प्रविष्टि और चेतावनी दी गई है। आखिर क्यों हर साल मई-जून आते ही यूपी में पावर कट बढ़ जाता है? क्या यह खराब मैनेजमेंट है या सिस्टम की लाचारी? इस स्पेशल स्टोरी में समझिए… यूपी में बिजली की मांग और आपूर्ति में बड़ा गैप प्रदेश में पिछले 3 सालों में मई महीने में बिजली की मांग में 4 से 5 हजार मेगावाट बढ़ चुकी है। ऊर्जा मंत्री एके शर्मा की ओर से जारी आंकड़ों से इसे समझ सकते हैं। इस बार ये मांग 20 मई को 30,458 मेगावाट पहुंच गई। मतलब, 2024 की तुलना में करीब 4 हजार मेगावाट की मांग बढ़ गई। इसकी वजह से रोज 850 मेगावाट से एक हजार मेगावाट बिजली मांग की तुलना में कम सप्लाई हो पा रही है। इस गैप की वजह से ही गांव से लेकर शहर में अलग-अलग समय पर कटौती करनी पड़ रही है। कटौती की दूसरी वजह प्रदेश की ट्रांसमिशन क्षमता और 3.73 करोड़ उपभोक्ताओं के यहां लगे कनेक्शन के कुल भार में दो करोड़ किलोवाट का अंतर है। इनके घरों में लगे कनेक्शन का स्वीकृत भार 8.57 करोड़ किलोवाट है। जबकि कॉरपोरेशन के 132 केवी सब स्टेशनों की क्षमता 6.25 करोड़ किलोवाट है। गर्मी के चलते लोग अपने घर में लगे कनेक्शन के स्वीकृत भार का पूरा उपयोग कर रहे हैं। यही वजह है कि एक साथ सभी घरों को बिजली सप्लाई करने में मुश्किल आ रही है। रात में ही क्यों सबसे ज्यादा कटौती, भड़क रहा आक्रोश एक सवाल लोगों के जेहन में होगा कि रात में ही क्यों सबसे ज्यादा कटौती हो रही? इसकी भी वजह है। दिन में सोलर की बिजली भी उपलब्ध रहती है। इस कारण दिन में बिजली की उपलब्धता में कमी नहीं होती। रात में सिर्फ जल, थर्मल (कोयला) और परमाणु ऊर्जा से बनी बिजली उपलब्ध होती है। यही वजह है कि यूपी में दोपहर 2 से 3.30 बजे के बीच में सबसे ज्यादा मांग होने के बावजूद विभाग पूरी कर देता है। लेकिन, रात में इससे कम बिजली की मांग होने के बाद भी विभाग पूरा नहीं कर पाता। प्रदेश में बिजली खपत का पीक टाइम रात 8 से 12 बजे के बीच का है। मतलब, इन 4 घंटे में सबसे अधिक बिजली खपत होती है। तब हमारे पास बिजली की उपलब्धता कम होती है। खपत ज्यादा और उपलब्धता कम होने की वजह से बिजली कटौती करनी मजबूरी बन जाती है। पावर कट पर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता इस गर्मी में जब लोग चैन से सोना चाहते हैं, तो पावर कट के चलते ऐसा हो नहीं पाता। शिकायत के लिए सब-स्टेशन पर कॉल करते हैं, तो कहा जाता है कि हेल्पलाइन नंबर 1912 पर कॉल करें। वहां कॉल करने पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। कभी सॉफ्टवेयर अपडेट का बहाना, तो कभी पावर कट की वजह फॉल्ट बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में लोगों का गुस्सा आक्रोश के तौर पर सब-स्टेशन के घेराव या सड़क पर हंगामे के तौर पर फूट रहा है। ओवरलोड की वजह से फुंक रहे ट्रांसफॉर्मर, जल रहे केबल केंद्र सरकार ने RDSS के तहत 44 हजार करोड़ रुपए जारी किए थे। इस रकम से प्रदेश में बिजली का नेटवर्क मजबूत करना था। जैसे जर्जर केबल बदलने, ट्रांसफॉर्मर की क्षमता बढ़ाने, नए 33/11 और 132 केवी के नए सब-स्टेशन आदि बनाने थे। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि उसने इस दिशा में पिछले 10 सालों में काम भी किए। लेकिन, यूपी की जरूरत की तुलना में ये प्रयास कम साबित हो रहे हैं। अब भी कई जगह कम क्षमता के ट्रांसफॉर्मर लगे हैं। अक्सर लोड बढ़ने पर ये खराब हो जाते हैं या फुंक जाते हैं। यूपीपीसीएल के आंकड़े बताते हैं कि यूपी में अब भी रोज औसतन 44 से ज्यादा ट्रांसफॉर्मर फुंक रहे हैं। शहर में भले ही ट्रांसफॉर्मर एक टाइम लिमिट में बदल दिए जाते हैं, लेकिन गांव में एक सप्ताह या कई बार महीने-महीने भर बाद ही ट्रांसफॉर्मर बदले जा रहे हैं। तब तक वहां के लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हो जाते हैं। गांव और शहरों में आर्म्ड केबल लगाए गए हैं। ये भी अलग-अलग क्षमता के केबल होते हैं। इनमें भी एल्युमिनियम और तांबा केबल शामिल हैं। लेकिन, प्रदेश में सबसे अधिक एल्युमिनियम आधारित आर्म्ड केबल लगे हैं। ये 4 से 50 स्क्वायर एमएम की मोटाई के होते हैं। ये आर्म्ड केबल 15 से 55 किलोवाट की बिजली प्रवाह क्षमता के होते हैं। इससे अधिक भार पड़ने पर ये जल जाते हैं। अभी बिजली की ज्यादा मांग के बीच केबल भी ज्यादा लोड संभाल नहीं पा रहे हैं। शहरों में वर्टिकल, सब-स्टेशन पर ‘एक गैंग’ की व्यवस्था फेल यूपी में 15 हजार से अधिक संविदाकर्मियों को बर्खास्त किया जा चुका है। बड़ी संख्या में सहायक अभियंताओं (एई) को निलंबित कर कार्यालयों में संबद्ध कर दिया गया है। इसकी वजह से दो तरह की परेशानी हो रही है। यूपी के बिजली सिस्टम में मई से जुलाई का तीन महीना सबसे मुश्किल भरा साबित हो रहा है। इन तीन महीनों में सबसे अधिक बिजली की मांग पहुंचती है। गर्मी, आंधी-तूफान के चलते सबसे अधिक फॉल्ट और नुकसान होते हैं। इन्हें ठीक करने के लिए पर्याप्त संख्या में लाइनमैन ही नहीं हैं। बिजली विभाग ने एक सब-स्टेशन पर तीन गैंग बना रखी हैं। हर गैंग में एक लाइनमैन, दो हेल्पर होते हैं। एक गैंग की 8 घंटे की ड्यूटी लगती है। एक सब-स्टेशन का एरिया शहर में तीन से चार किमी और गांव में 12 से 15 किमी का होता है। किसी भी फॉल्ट या तकनीकी खराबी की सूचना में एक गैंग को इतने बड़े एरिया में मूवमेंट करना पड़ता है। एक ही समय में दो से तीन फॉल्ट और तकनीकी खराबी होने पर उसे अटेंड करने में ही तीन से चार घंटे लग जाते हैं। तब तक के लिए लोगों को पावर कट का सामना करना पड़ता है। यूपी में बिजली कटौती के लिए कौन दोषी (लोकल सर्किल संस्था के इस सर्वे में लोगों को 7 विकल्प दिए थे। लोगों ने एक से ज्यादा विकल्प चुने।) बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए क्या करना होगा उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने सुझाव दिए। जिनकी मदद से यूपी की बिजली व्यवस्था में सुधार हो सकता है- संविदा कर्मियों की बहाली: हटाए गए संविदा कर्मचारियों को वापस लिया जाए, जिससे फॉल्ट दुरुस्त करने की क्षमता बढ़े। सस्पेंड इंजीनियरों की वापसी: लंबे समय से सस्पेंड सहायक अभियंताओं (AE) को बहाल कर फील्ड ड्यूटी पर लगाया जाए। मैनपावर का संकट दूर करना: स्टाफ की भारी कमी को देखते हुए सभी बिजली कंपनियों में अतिरिक्त तकनीकी कर्मियों की भर्ती हो। रिस्पॉन्स सिस्टम मजबूत करना: ब्रेकडाउन और फॉल्ट को जल्द ठीक करने के लिए तकनीकी टीमें और गैंग्स की संख्या बढ़ाई जाए। वर्टिकल व्यवस्था को खत्म करना: मौजूदा शिकायत निवारण प्रणाली को बदलकर पारदर्शी और तेज बनाया जाए, जिससे शिकायतें पेंडिंग न रहें। प्रबंधन की जवाबदेही तय हो: करीब 44,094 करोड़ रुपए के भारी निवेश के बाद भी खराब प्रदर्शन के लिए मैनेजमेंट की जिम्मेदारी तय हो। बिजली संकट पर भाजपा विधायकों का डर जनता का गुस्सा और आगामी चुनाव: यूपी में भीषण गर्मी और लगातार पावर कट से जनता सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए विपक्षी दल (सपा, बसपा, कांग्रेस) तो हमलावर हैं। साथ ही जनता के इस भारी आक्रोश से भाजपा के अपने विधायक भी डरे हुए हैं। भाजपा विधायकों और मंत्रियों की नाराजगी: चुनाव में नुकसान के डर से भाजपा विधायक राजेश्वर सिंह, डॉ. नीरज बोरा और मंत्री मनोज पांडेय ने खुद अपनी ही सरकार के ऊर्जा मंत्री को चिट्ठी लिखकर बिजली व्यवस्था सुधारने की मांग की है। वहीं, सलोन से भाजपा विधायक अशोक कुमार ने गंभीर आरोप लगाया कि अधिकारी उनकी भी नहीं सुनते। चेकिंग के नाम पर वसूली करते हैं और बिना बताए बिजली काट देते हैं। मायावती की चेतावनी: बसपा प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया पर सरकार को चेताते हुए कहा है कि इस भीषण गर्मी में जनता को राहत देना सरकार की जिम्मेदारी है। अखिलेश यादव बनाम ऊर्जा मंत्री बिजली के मुद्दे पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और ऊर्जा मंत्री एके शर्मा के बीच सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ी हुई है। अखिलेश यादव का आरोप- भाजपा की गलत नीतियों के कारण यह संकट है। सरकार ने न तो नए पावर प्लांट लगाए, न ट्रांसमिशन सिस्टम सुधारा। स्मार्ट मीटर में भी भ्रष्टाचार किया। उन्होंने जनता से अपील की कि वे अपना गुस्सा छोटे कर्मचारियों या लाइनमैनों पर न निकालें। ऊर्जा मंत्री का पलटवार- एके शर्मा ने जवाब दिया कि सपा सरकार (2012-17) की तुलना में आज बिजली व्यवस्था में बहुत बड़ा सुधार हुआ है। यूपी में 2012 से कैसे बढ़ती गई बिजली की डिमांड ————————-
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