जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों को ढहाना आसान नहीं है। दिल्ली के Gen-Z (जेन-जी) प्रदर्शन के बाद समीकरण बदले हैं। शिक्षा और छात्रों से जुड़ी यूनिवर्सिटी पर भी शासन का रुख नरम हुआ है। यही वजह है कि 27 जुलाई को मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आंजनेय कुमार सिंह ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। दूसरी ओर, किसी भी कानूनी झटके से बचने के लिए रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने कोर्ट में पहले ही कैविएट दाखिल कर रखी है। जिससे प्रशासन का पक्ष सुने बिना अदालत कोई भी एकतरफा आदेश न दे सके। वहीं, पिछले 10 दिनों से यूनिवर्सिटी के छात्र परिसर के बाहर धरने पर डटे हैं। अब सवाल उठता है कि विरोध के बावजूद क्या सरकार इन इमारतों को तोड़ देगी? 5 पॉइंट में समझते हैं- कारण 1. दिल्ली के जेन-जी आंदोलन का खौफ इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया छात्रों को पढ़ाने वाले प्रोफेसर एसके यादव कहते हैं- NEET परीक्षा लीक को लेकर देश में युवाओं ने बड़ा प्रदर्शन किया। आखिर में केंद्र सरकार बैकफुट पर चली गई। धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इस एक आंदोलन के बाद युवाओं के हौसले बुलंद हैं। अगर यूनिवर्सिटी के खिलाफ कोई एक्शन लिया जाता है, तो इस बात की संभावना ज्यादा है कि युवा एकजुट होकर इसे बचाने का प्रयास करें। ऐसी स्थिति में छात्र और प्रशासन के बीच टकराव हो सकता है। सरकार इस स्थिति से बचना चाहती है, वह भी तब जब 6-7 महीने बाद ही चुनाव होने हैं। कारण 2. लखनऊ से नहीं, रामपुर से हुए फैसले यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए सपा और कांग्रेस प्रदर्शन कर रहे हैं। इन सबके अलावा लोकल लोग भी नहीं चाहते कि यूनिवर्सिटी को गिराया जाए। इनमें बड़ी संख्या में वो लोग हैं, जो आजम खान की राजनीति और उनकी पार्टी से ताल्लुक नहीं रखते। लोकल भाजपा नेता भी इसके गिराए जाने का समर्थन नहीं करते। जब भी उनसे सवाल पूछा जाता है, वो नजरअंदाज कर देते हैं। राज्य स्तर पर भी कोई नेता यूनिवर्सिटी के गिराए जाने का समर्थन करते नजर नहीं आता। लखनऊ में सरकार के करीब रहने वाले एक अधिकारी कहते हैं- सीएम योगी या फिर सरकार की मंशा कभी भी यूनिवर्सिटी को गिराने की नहीं रही है। स्थानीय लेवल पर जो अधिकारी हैं, वह इस तरह का फैसला ले रहे हैं। हालांकि, आखिरी फैसला कोर्ट और लखनऊ से ही होगा। कारण 3. छात्रों को शिफ्ट करने के लिए इतना बड़ा कॉलेज नहीं यूनिवर्सिटी में अभी करीब 3 हजार छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी में 16 डिपार्टमेंट हैं। 14 फैकल्टी और इंस्टीट्यूट हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून और मैनेजमेंट से लेकर हर तरह के कोर्स की पढ़ाई होती है। यूनिवर्सिटी से जुड़े टीचर्स का दावा है कि आसपास ऐसे कॉलेज नहीं हैं, जहां सभी छात्रों को शिफ्ट किया जा सके। अगर ऐसा कर भी लेते हैं, तो अलग-अलग फैकल्टी के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाएंगे। कारण 4. यूनिवर्सिटी जब बनी, तब प्राधिकरण नहीं था यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि जौहर यूनिवर्सिटी का निर्माण 2006 में शुरू हुआ था। उस समय विकास प्राधिकरण नहीं था। इसके बावजूद यूनिवर्सिटी के 38 भवनों के ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया। यूनिवर्सिटी ने इस पक्ष के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट में 20 जुलाई को याचिका दाखिल की थी। 28 जुलाई को इसकी सुनवाई होनी है। 26 जुलाई को डीएम रामपुर ने यूनिवर्सिटी कैंपस में टीम भेजकर बिल्डिंग के नक्शे मांगे थे। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने मेडिकल कॉलेज और अकादमी ब्लॉक के मैप दिए। बाकी बिल्डिंग के मैप दे नहीं सके। कारण 5. UGC का सपोर्ट यूनिवर्सिटी की तरफ एक्सपर्ट कहते हैं, UGC इस मामले में यूनिवर्सिटी का ही साथ देगा। क्योंकि, यूनिवर्सिटी के निर्माण के समय लागू नियम पर UGC ने मान्यताएं दी थीं। 2014 में UGC की एक्सपर्ट कमेटी ने यूनिवर्सिटी की जांच की थी। उस वक्त अपनी रिपोर्ट में बताया था कि यूनिवर्सिटी में तमाम कोर्सेस की फीस दूसरे प्राइवेट कॉलेज की फीस से काफी कम है। यह यूनिवर्सिटी व्यावसायिक फायदे के लिए नहीं चल रही। आजम ने जिस प्राधिकरण को बनवाया, अब वही मुसीबत बना 2005 में यूपी में जब सपा सरकार थी, तब आजम खान नगर विकास मंत्री थे। उसी दौरान 15 अप्रैल, 2005 को रामपुर विकास प्राधिकरण बनाया गया था। शुरुआत में प्राधिकरण के दायरे में रामपुर नगर पालिका के साथ 23 गांव शामिल किए गए थे। 18 सितंबर, 2006 को आजम खान ने सिंगनखेड़ा गांव में जौहर यूनिवर्सिटी की नींव रखी। उस समय सिंगनखेड़ा गांव प्राधिकरण के क्षेत्र में नहीं आता था। जुलाई, 2024 में प्राधिकरण ने अपनी सीमा बढ़ाई और शहर के आसपास के 39 गांव अपने दायरे में शामिल कर लिए। इनमें सिंगनखेड़ा गांव भी शामिल था। यहीं से पूरा विवाद शुरू हुआ। सपा की सरकार जाने पर प्राधिकरण ने यूनिवर्सिटी की इमारतों की जांच कराई। इसमें पता चला कि 40 इमारतों में सिर्फ मेडिकल कॉलेज और प्रशासनिक भवन का नक्शा मंजूर है। बाकी 38 इमारतों का नक्शा मंजूर नहीं कराया गया। इसी आधार पर यूनिवर्सिटी को नोटिस दिया गया। प्राधिकरण ने कहा कि 30 जुलाई तक इन 38 इमारतों को खुद गिरा दें, नहीं तो प्रशासन ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करेगा। हालांकि, अब यह मामला कोर्ट में है। जुर्माना लगाकर यूनिवर्सिटी को गिरने से रोका जा सकता है लीगल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हाईकोर्ट सिर्फ यह नहीं देखेगा कि जौहर यूनिवर्सिटी की इमारतें गिराई जाएं या नहीं। यह भी तय करेगा कि ध्वस्तीकरण के बजाय कोई दूसरा रास्ता अपनाया जा सकता है या नहीं। सबसे पहले जुर्माना और बाकी फीस लेकर मामला रेगुलराइज करने के विकल्प पर चर्चा हो सकती है। अभी रामपुर विकास प्राधिकरण 1510 रुपए प्रति वर्ग मीटर डेवलपमेंट चार्ज लेता है। इसके अलावा लेबर सेस भी लगता है, जो किसी भी प्रोजेक्ट की कुल लागत का 1% होता है। जौहर यूनिवर्सिटी की लागत करीब 1000 करोड़ रुपए बताई जाती है। इस हिसाब से सिर्फ लेबर सेस ही करीब 10 करोड़ रुपए बनता है। इसके अलावा सुपरविजन चार्ज, नक्शा पास कराने की फीस, कंपाउंडिंग फीस और दूसरे कई शुल्क भी देने पड़ सकते हैं। हालांकि, यूनिवर्सिटी को कुल कितना भुगतान करना होगा, इसका सही हिसाब ले-आउट प्लान और इमारतों का पूरा रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही लगाया जा सकेगा। ————————– यह खबर भी पढ़ें- जौहर यूनिवर्सिटी की इमारतें अवैध तो सपा विरोध में क्यों, क्या पूरी यूनिवर्सिटी गिरा दी जाएगी, इससे भाजपा को क्या फायदा जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतें ढहाने के आदेश से भाजपा और सपा के बीच राजनीति तेज है। भाजपा इसे ‘भूमाफिया’ पर कार्रवाई बता रही है। वहीं, सपा, भाजपा को ‘यूनिवर्सिटी तोड़ने वाला आक्रांता’ कह रही है। इसे कॉकरोच पार्टी के प्रोटेस्ट और NEET पेपर लीक से जोड़कर यूपी की भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। पढ़िए पूरी खबर…