बहुजन समाज पार्टी अपनी स्थापना के 37 साल बाद चारों सदनों में ‘शून्य’ हो जाएगी। यूपी विधानसभा में उसके इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का 5 अगस्त को निधन हो गया। यूपी विधान परिषद में राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की तरह बसपा का भी कोई सदस्य नहीं बचा है। 2024 में पार्टी के एकमात्र विधान परिषद सदस्य (MLC) भीमराव अंबेडकर का कार्यकाल पूरा होने के बाद बसपा उच्च सदन में वापसी नहीं कर सकी। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। अब राज्यसभा में एकमात्र सांसद रामजी गौतम हैं। 25 नवंबर, 2026 को उनका भी कार्यकाल खत्म हो रहा है। मतलब इसके बाद बसपा का चारों सदनों में कोई सदस्य नहीं बचेगा। पहले जानिए, विधानसभा में बसपा कैसे खत्म हुई कांशीराम ने 14 अप्रैल, 1984 को बसपा की स्थापना की थी। 1984 के लोकसभा चुनाव में बसपा को चुनाव चिह्न नहीं मिला था। ऐसे में उसके प्रत्याशी निर्दलीय लड़े। कैराना से मायावती तीसरे नंबर पर रहकर 44 हजार से ज्यादा वोट पाई थीं। एक भी प्रत्याशी नहीं जीता था। 1987 में बसपा को हाथी चुनाव चिह्न आवंटित हुआ था। 1989 में पहली बार बसपा के 13 विधायक जीते। 2007 में पार्टी अपने चरम पर रही, जब 206 सीटों के साथ यूपी में अकेले सत्ता में पहुंची। 2022 का चुनाव बसपा के लिए सबसे बुरा साबित हुआ। सिर्फ एक विधायक ही जीत सका। अभी बसपा के देश भर में 2 विधायक हैं। बिहार में रामगढ़ सीट से जीते सतीश कुमार यादव और पंजाब में नवांशहर से डॉ. नछत्तर पाल विधायक हैं। अब लोकसभा में बसपा के चढ़ते-उतरते सफर को जानिए 1989 में लोकसभा में भी यूपी से 3, तो पंजाब से 1 सांसद जीतकर पहुंचा। इसी तरह 2009 में उसके सबसे ज्यादा 21 सांसद जीतकर लोकसभा पहुंचे। इसमें 20 यूपी और 1 मध्यप्रदेश से जीता था। यह बसपा का सबसे अच्छा प्रदर्शन था। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में बसपा शून्य पर आ गई। 2019 में बसपा और सपा गठबंधन में चुनाव लड़े, फायदा बसपा को मिला। उनके 10 सांसद लोकसभा पहुंचे। लेकि, 2024 में अकेले चुनाव मैदान में उतरी बसपा का स्कोर फिर से शून्य पर पहुंच गया। राज्यसभा में क्या स्थिति, यह भी जानिए बसपा का राज्यसभा में सबसे शानदार दौर 2010 से 2012 के बीच रहा। 2007 में यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद 2010 में हुए चुनावों के जरिए बसपा के सांसदों की संख्या 18 तक पहुंच गई थी। यह पार्टी के इतिहास में उच्च सदन में उसका अब तक का सर्वोच्च स्तर था। पार्टी के एकमात्र राज्यसभा सांसद रामजी गौतम को बसपा से गठबंधन के चलते सपा ने अपने कोटे से भेजा था। अभी यूपी विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं है। जबकि, एक राज्यसभा प्रत्याशी के लिए प्रस्तावक और समर्थक के लिए कम से कम 10 विधायक चाहिए। बसपा के कमजोर होने की 3 वजहें- BSP से बड़े चेहरों ने दूरी बनाई मौजूदा समय में बसपा सबसे बुरे दौर में है। उसके सारे प्रमुख चेहरे एक-एक करके पार्टी से किनारे हो चुके हैं। कुछ दिन पहले ही मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ और नेशनल कोऑर्डिनेटर रणधीर सिंह बेनीवाल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाकर निष्कासित कर दिया। मायावती ने हाल में ब्राह्मण चेहरों में शुमार अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को पार्टी से निष्कासित कर दिया। बसपा से इससे पहले अति पिछड़ों के तौर पर पार्टी में अहम चेहरे रहे दद्दू प्रसाद, आरके चौधरी, राज बहादुर, मसूद अहमद, बरखूराम वर्मा, सोनेलाल पटेल, दीनानाथ भास्कर, बाबू सिंह कुशवाहा, सुखदेव राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, रामअचल राजभर, ओमप्रकाश राजभर, लालजी वर्मा, रामप्रसाद चौधरी भी किनारा कर चुके हैं। वहीं, अल्पसंख्यक और ब्राह्मण चेहरों में शामिल जयवीर सिंह, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, रामवीर उपाध्याय, ब्रजेश पाठक भी पार्टी से दूर जा चुके हैं। इन चेहरों के किनारा करने की वजह से बसपा का वोटबैंक कमजोर होता चला गया। अब राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर भी संकट बसपा के सामने अब सबसे बड़ा संकट राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को बचाना है। बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 2.04% वोट ही पा सकी थी। पूरे देश में कोई सांसद नहीं जीता, लेकिन देश में 2 विधायक हैं। बिहार में रामगढ़ सीट से सतीश कुमार यादव और पंजाब में नवांशहर से डॉ. नछत्तर पाल बसपा के विधायक हैं। हालांकि 4 या उससे ज्यादा राज्यों में क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता वाला मानक भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है। 2027 में होने वाले यूपी, पंजाब, उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव बसपा के लिए एक अवसर है। अगर इन राज्यों में उसका प्रदर्शन सुधरता है, तो वह राष्ट्रीय पार्टी का ओहदा बचा लेगी। ————————- यह खबर भी पढ़ें – आकाश बोले- अखिलेश-राहुल 50 साल के बूढ़े, इन्हें अंकल कहूंगा, भाजपा 110 रुपए में गन्ने का रस बेच रही बसपा सुप्रीमो मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने सोमवार को हाथरस में चुनावी रैली की। उन्होंने अखिलेश और राहुल गांधी को अंकल कहकर बुलाया। कहा- मैं 30 साल का हूं और अखिलेश जी 50 के। मैं 50 साल के वृद्ध को अंकल नहीं तो और क्या कहूंगा। हालांकि, अखिलेश 53 और राहुल 56 साल के हैं। पढ़िए पूरी खबर…