सत्र 2026-27 में विधि की पढ़ाई करने की तैयारी कर रहे आगरा के छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। आगरा कॉलेज और डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में एलएलबी और बीए-एलएलबी की 700 से अधिक सीटों पर प्रवेश प्रक्रिया अटक गई है। दोनों संस्थानों को अब तक बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से मंजूरी नहीं मिली है। वहीं, आगरा मंडल के 20 निजी लॉ कॉलेजों को बीसीआई की अनुमति मिल चुकी है। सरकारी संस्थानों में कम फीस में पढ़ाई का विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद मंजूरी में देरी से छात्रों के सामने निजी कॉलेजों में प्रवेश लेने की मजबूरी बन रही है। आगरा कॉलेज में 600 सीटें, फीस भी काफी कम आगरा कॉलेज का विधि संकाय यूनिवर्सिटी कैंपस से अलग संचालित होता है। यहां एलएलबी की 300 और बीए-एलएलबी की 300 सीटें हैं। यानी कुल 600 सीटों पर नए सत्र में प्रवेश होना है। आगरा कॉलेज में पढ़ाई की फीस निजी संस्थानों की तुलना में काफी कम है। एलएलबी की सालाना फीस करीब 4,300 रुपए है। तीन साल की पूरी पढ़ाई करीब 12 से 13 हजार रुपए में पूरी हो जाती है। वहीं, बीए-एलएलबी की फीस करीब 16,500 रुपए सालाना है। विधि संकाय प्रभारी डीसी मिश्रा ने बताया कि बीसीआई की मंजूरी के लिए जुलाई में आवेदन किया गया था। अभी तक अनुमोदन नहीं मिला है। बिना बीसीआई की अनुमति के नए सत्र में प्रवेश प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। यूनिवर्सिटी कैंपस में तैयार नई बिल्डिंग, 120 सीटों पर प्रवेश की तैयारी डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय कैंपस में लॉ कॉलेज की नई बिल्डिंग भी बनकर तैयार है। विश्वविद्यालय इसी सत्र से एलएलबी और बीए-एलएलबी में 120 सीटों पर प्रवेश शुरू करना चाहता है। प्रभारी डॉ. राजीव वर्मा ने बताया कि कॉलेज की ओर से तैयारियां पूरी हैं, लेकिन प्रवेश शुरू करने के लिए बीसीआई की अनुमति का इंतजार किया जा रहा है। 20 निजी कॉलेजों को मिली मंजूरी, फीस 2 से 4 लाख तक आगरा मंडल में आगरा के 7, मथुरा के 8, मैनपुरी के 3 और फिरोजाबाद के 2 निजी लॉ कॉलेजों को बीसीआई से मंजूरी मिल चुकी है। इन कॉलेजों में एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने में करीब 2 लाख रुपए तक खर्च आता है। वहीं, बीए-एलएलबी की फीस और अन्य खर्च मिलाकर 3 से 4 लाख रुपए तक पहुंच सकते हैं। गरीब-मध्यम वर्ग के छात्रों की बढ़ी चिंता सरकारी संस्थानों में कम फीस और बेहतर विकल्प होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र आगरा कॉलेज और विश्वविद्यालय में प्रवेश का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बीसीआई की मंजूरी में देरी के चलते छात्रों के सामने निजी कॉलेजों में प्रवेश लेने का दबाव बढ़ रहा है। छात्रों का कहना है कि सरकारी संस्थानों में प्रवेश नहीं खुला तो आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों के लिए महंगे निजी कॉलेजों में कानून की पढ़ाई करना मुश्किल होगा।