दिल्ली संसद से लेकर यूपी चुनाव तक, अखिलेश यादव लाल गमछा और सिर पर लाल टोपी पहने नजर आते रहे हैं। यह कुर्ते-पजामे के साथ सपा नेताओं के ड्रेस कोड की तरह है, जो पार्टी के झंडे-सिंबल की तरह पदाधिकारियों को एक पहचान देती है। लेकिन, 31 अगस्त, 2026 को लखनऊ में हुई जिलाध्यक्षों की बैठक में अखिलेश के गले में नीला गमछा दिखा। इसके ठीक 6 दिन बाद सपा की छात्र विंग ‘समाजवादी छात्रसभा’ के कार्यकर्ताओं के पास एक मैसेज पहुंचा, अब वह नीले रंग की टी-शर्ट और जींस पहनेंगे। अब तक वो मैरून रंग की शर्ट और सफेद पैंट पहनते आए हैं। सपा संगठन ने छात्र नेताओं के पास नीले रंग की टी-शर्ट भेज भी दी है, जिन पर समाजवादी छात्रसभा का लोगो बना है। यही वो विंग है, जो यूपी के यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में छात्रों के बीच सक्रिय रहती है। चुनाव से पहले सपा इन बदलावों के जरिए क्या दलित वोटर को साध रही है या जेन-जी। पढ़िए रिपोर्ट… सबसे पहले सपा के इस बदलाव को समझते हैं… 31 अगस्त- जिलाध्यक्षों की बैठक- लखनऊ के समाजवादी कार्यालय में 75 जिलों के जिलाध्यक्षों और महानगर अध्यक्षों की बैठक हुई। मुद्दा चुनाव की तैयारियों का था। सबके गले में लाल रंग के गमछे थे। मंच पर जब अखिलेश यादव पहुंचे, तो शिवपाल साथ थे। दोनों के गले में आज लाल गमछा नहीं था। वह नीले रंग का गमछा पहने थे। ये बिना कहे, पार्टी के पदाधिकारियों को संदेश था। हालांकि, जब उनसे नीले गमछे पर सवाल पूछा गया, तब उन्होंने सधे हुए लहजे में कहा- ये तो बुनकर भाइयों ने हमें बनाकर दिया है। जिससे हम कुछ अलग दिखे। फिर वह हंसने लगे। 6 सितंबर- छात्रसभा कार्यकर्ताओं के पास मैसेज- समाजवादी छात्रसभा सपा की छात्र विंग है। इसका भी एक ड्रेस कोड है। सदस्य मैरून शर्ट और सफेद पैंट पहनते हैं। इसमें 6 सितंबर को बदलाव किया गया। अब छात्र कार्यकर्ताओं को नीले रंग की टी-शर्ट और जींस भेजी गई है। इस पर छात्रसभा का लोगो और साइकिल बनी है। हालांकि, सपा की तरफ से इसकी ऑफिशियल लॉन्चिंग 8 सितंबर को होनी है। नीले रंग से क्या साधने की तैयारी में हैं अखिलेश अखिलेश यादव नीले गमछे में पहले भी नजर आए हैं, खासकर भीमराव आंबेडकर जयंती हो या दलित बहुल इलाके में जनसभा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सपा इस तरह से 2 बड़े लक्ष्यों को साध रही है- 1. दलित वोट बैंक – यूपी में 21.1% दलित वोटर हैं। गले में नीला गमछा डालना यह संदेश देने की कोशिश है कि सपा अब दलित अधिकारों की राजनीति में सीधी दावेदार है। यूपी में बसपा के लगातार कमजोर पड़ते राजनीतिक आधार के बीच, सपा उस जगह को पूरी तरह हथियाना चाहती है। राजनीतिक इतिहास में नीला रंग हमेशा से आंबेडकरवादी विचारधारा और बहुजन राजनीति का प्रतीक रहा है। इस तरह से सपा अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को केवल भाषणों तक सीमित न रखकर विजुअल पहचान देना चाहती है। 2. जेन-जी और युवा वोटर – यूपी में 80 यूनिवर्सिटी और 8 हजार से ज्यादा कॉलेजों में समाजवादी छात्रसभा की इकाइयां हैं। अब तक इसके सदस्य मैरून शर्ट और सफेद पैंट में नजर आते थे। पार्टी मान रही है कि नीली जींस और टीशर्ट में यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में छात्रों के बीच कनेक्ट करना आसान होगा। नीले रंग से दलितों को संदेश, क्या इससे फायदा होगा? 2022 तक दलितों का एक बड़ा हिस्सा (विशेषकर गैर-जाटव) और गैर-यादव पिछड़ा वर्ग भाजपा का मजबूत स्तंभ बना रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में ट्रेंड बदला। ‘संविधान खतरे में है’ के नैरेटिव और अखिलेश यादव के PDA दांव के कारण बसपा का पारंपरिक दलित वोट और भाजपा से छिटका गैर-जाटव दलित/OBC वोटर सपा और कांग्रेस गठबंधन की ओर तेजी से शिफ्ट हुआ। इसी वजह से यूपी में भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई और सपा 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। अखिलेश ठीक चुनाव से पहले एक बार फिर यही नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। जिससे विधानसभा चुनाव में दलित वोटर का सपोर्ट हासिल कर सकें। छात्रसभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बोले- ये देश में फैले पूरे संगठन पर लागू होगा छात्रसभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. इमरान कहते हैं- नीला रंग समानता और बराबरी की निशानी माना जाता है। डॉ. राम मनोहर लोहिया और डॉ. भीमराव अंबेडकर की सोच की निशानी के तौर पर भी इस रंग को देखा जा सकता है। ये संगठन छात्रों का है, इसलिए यूथ की भागीदारी बढ़ाने के लिए जरूरी बदलाव किए जा रहे हैं। हम सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं, दिल्ली और मध्य प्रदेश में भी अच्छा काम कर रहे हैं। ये नया ड्रेस कोड देशभर में फैले पूरे छात्रसभा संगठन के लिए होगी। एक्सपर्ट बोले- सपा, बसपा में गठबंधन से ये माहौल बना वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- 2019 लोकसभा के चुनाव के बाद से सपा में बसपा का रंग कुछ ज्यादा ही घुल मिल गया। ये वो दौर था, जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच लोकसभा चुनाव के लिए समझौता हुआ था। चुनाव के बाद गठबंधन टूट गया। इसके बाद बहुजन समाज पार्टी के कई बड़े नेताओं ने सपा का दामन थाम लिया। इसमें कई बड़े दलित चेहरे इंद्रजीत सरोज, आरके चौधरी, त्रिभुवन दत्त जैसे बड़े चेहरे सपा का हिस्सा बन गए। इसके बाद सपा में भी डॉ. भीमराव अंबेडकर और कांशीराम के साथ दलित महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि मनाई जाने लगी। देखते ही देखते समाजवादी पार्टी ऑफिस का बैकड्रॉप (मंच का बैकग्राउंड) बदल गया। बैकड्रॉप पर लगी साइकिल की जगह पर तमाम समाजवादी नेताओं की तस्वीरों ने ले ली। साथ में हरे और लाल रंग के साथ नीले रंग को भी जोड़ दिया गया। इसके बाद मौके-दर-मौके अखिलेश यादव भी नीले गमछे में नजर आ जाते रहे हैं। प्रवक्ता बोले- युवा क्या सोचता है, पार्टी उस दिशा में काम कर रही… इस मामले में सपा प्रवक्ता मनोज काका कहते हैं- हर रंग के अपने मायने हैं। जितने भी बहुजन लोग हैं, वो नीले रंग को मानते हैं। जहां तक ड्रेस कोड की बात है, तो समय-समय पर हर चीज में बदलाव होते रहते हैं। इसमें भी बदलाव किया जा रहा है। इसे किसी वोटबैंक की राजनीति से जोड़ना जल्दबाजी हो सकती है। आज का युवा और छात्र क्या सोचता है, हमारी पार्टी उस सोच के हिसाब से काम करती है। ————————— यह खबर भी पढ़ें- मायावती ने आकाश को तीसरी बार पद से क्यों हटाया, क्या पॉलिटिकल करियर खत्म?, बसपा को फायदा या नुकसान 2 अगस्त, 2026 को मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निकाल बाहर किया। मायावती ने ‘X’ पर लिखा- बार-बार चेतावनी के बावजूद अशोक सिद्धार्थ के रवैये में कोई सुधार नहीं आया। इस वजह से उनसे सभी जिम्मेदारियां छीन ली गई थीं। इसके ठीक 32वें दिन मायावती ने उनके दामाद और अपने भतीजे आकाश आनंद से राष्ट्रीय समन्वयक का पद छीन लिया। पढ़िए पूरी खबर..