यूपी में विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे पंचायत चुनाव:हाईकोर्ट का आदेश रुकवाने SC जाएगी सरकार, ये 5 कारण बताएगी

यूपी में पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद होंगे, जो जनवरी से मार्च के बीच होने हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 3 महीने में पंचायत चुनाव कराने का आदेश दिया है। लेकिन, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह संभव नहीं लग रहा। पंचायत चुनाव में राज्य की पूरी प्रशासनिक मशीनरी, पुलिस फोर्स और संसाधन व्यस्त हो जाएंगे। इसका असर विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर पड़ेगा। हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे के लिए ग्राम प्रधान संगठन, ओबीसी आयोग और राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, ऐसा नहीं है कि सिर्फ सत्ताधारी भाजपा पंचायत चुनाव नहीं कराने के पक्ष में है। सपा, बसपा और कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल भी यही चाहते हैं। भाजपा सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील रखेगी। पहले पंचायत चुनाव होने से विपक्ष को क्या नुकसान है? इस रिपोर्ट में पढ़िए.. दशहरे के बाद हाई-लेवल मीटिंग करेगी सरकार शासन के सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर पंचायती राज विभाग, कानून विभाग और सीनियर वकीलों की टीम ने हाईकोर्ट के फैसले का अध्ययन शुरू कर दिया है। दशहरा बीतते ही सीएम योगी मंत्रियों और संबंधित विभागों के अफसरों के साथ एक हाई-लेवल बैठक करेंगे। इसमें तय होगा कि सुप्रीम कोर्ट में अर्जी कैसे दाखिल की जाए? संसदीय कार्य विभाग के अफसरों के अनुसार, योगी सरकार 2.0 का शपथ ग्रहण 25 मार्च, 2022 को हुआ था। 18वीं विधानसभा की पहली बैठक 23 मई, 2022 को बुलाई गई थी। संवैधानिक नियमों के तहत 19वीं विधानसभा का गठन हर हाल में 23 मई, 2027 से पहले होना चाहिए। अगर पंचायत चुनाव की वजह से विधानसभा चुनाव के तय कार्यक्रम में जरा भी हेर-फेर होता है, तो सरकार और चुनाव आयोग के पास पूरी प्रक्रिया को निपटाने के लिए केवल 2 महीने का वक्त बचेगा। ऐसे में न तो सरकार और न ही चुनाव आयोग किसी तरह का संवैधानिक संकट मोल लेना चाहता है। ग्राम प्रधान संगठन भी सुप्रीम कोर्ट जाएगा इलाहाबाद हाईकोर्ट के 3 महीने वाले आदेश के खिलाफ ग्राम प्रधान संगठन भी सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करेगा। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अखिलेश सिंह का कहना है कि ओबीसी आरक्षण, वोटर लिस्ट की गड़बड़ियों को ठीक करने और बाकी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं को निपटाने में समय लगेगा। सरकार ने ग्रामीणों से चुने गए ग्राम प्रधानों को ही पंचायतों में प्रशासक की जिम्मेदारी दी है। इसलिए चुनाव जल्दबाजी में न कराए जाएं। ओबीसी आयोग बोला- रिपोर्ट आने में समय लगेगा राज्य का ओबीसी आयोग भी अपनी रिपोर्ट तैयार करने में जुटा है। आयोग पता लगा रहा है कि पिछले पंचायत चुनावों में ओबीसी वर्ग के कितने लोग प्रधान, बीडीसी और जिला पंचायत सदस्य चुने गए थे? यह भी देखा जा रहा है कि किन इलाकों में ओबीसी वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम मिला। ग्राम पंचायत स्तर पर ओबीसी जातियों की आबादी, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के डेटा जुटाया जा रहा है। इस काम में जिलों के डीएम और पंचायती राज विभाग की मदद ली जा रही है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस रामअवतार सिंह से जब इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा- हम अपनी रिपोर्ट कब सौंपेंगे और आगे क्या करेंगे, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। आयोग अपना काम ईमानदारी से कर रहा है। सही समय आने पर रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी जाएगी। पंचायत चुनाव टालने के पीछे 5 कारण हैं 1- यूपी में पंचायत चुनाव कराने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जरूरत पड़ती है। अगर पूरा सरकारी तंत्र पंचायत चुनाव में लग जाता है, तो विधानसभा चुनाव की तैयारियां प्रभावित हो सकती हैं। मतदाता सूची सुधारने, बूथ तैयार करने, सुरक्षा बलों की तैनाती और ईवीएम के इंतजाम में भी देरी हो सकती है। 2- ग्राम प्रधान और बीडीसी के चुनाव पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े जाते। लेकिन ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष के पदों के लिए पार्टियां अपने उम्मीदवार उतारती हैं। ऐसे में टिकट नहीं मिलने या चुनाव हारने से कार्यकर्ता नाराज हो सकते हैं। कुछ कार्यकर्ता बगावत भी कर सकते हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ऐसी नाराजगी पार्टियों के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। 3- पंचायत चुनाव के नतीजों से गांवों में राजनीतिक माहौल पता चलता है। अगर किसी पार्टी के खिलाफ माहौल बनता है, तो हार या जीत के बाद इसे विधानसभा चुनाव से जोड़ा जाएगा। ऐसे में कोई भी पार्टी नहीं चाहेगी कि अभी पंचायत चुनाव हो। 4- पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करनी है। इसके लिए जरूरी सर्वे और आंकड़ों की जांच की जा रही है। इसके अलावा मतदाता सूची में भी सुधार किया जाना है। अगर इन प्रक्रियाओं को पूरा किए बिना चुनाव कराए जाते हैं, तो आरक्षण या मतदाता सूची को लेकर विवाद हो सकता है। मामला अदालत तक पहुंचने पर चुनाव की प्रक्रिया में देरी भी हो सकती है। 5- पंचायत चुनाव गांव के स्तर पर लड़े जाते हैं। इनमें कई बार व्यक्तिगत दुश्मनी और गुटबाजी भी सामने आती है। चुनाव के दौरान विवाद और हिंसा की आशंका रहती है। ऐसे में पंचायत चुनाव के तुरंत बाद विधानसभा चुनाव कराने से कानून-व्यवस्था की चुनौती बढ़ सकती है। पंचायत चुनाव पहले हुए तो विपक्ष को फायदा या नुकसान पंचायत चुनाव में कमजोर प्रदर्शन होने पर विपक्षी दलों का उत्साह कमजोर होगा। टिकट न मिलने या स्थानीय स्तर पर हार-जीत को लेकर नेताओं-कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ जाएगी। इसका असर विधानसभा चुनाव में भी दिख सकता है। पंचायत चुनाव में व्यस्तता के कारण विपक्ष को बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने में कम समय मिलेगा। पंचायत चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने पर सत्ताधारी दल इसे अपने पक्ष में माहौल बताकर पेश करेगा। इससे विपक्ष पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। वहीं, ग्रामीण इलाकों में सरकार के खिलाफ नाराजगी हुई, तो विपक्ष को इसका फायदा मिल सकता है। पंचायत चुनाव से पार्टियों को गांवों में अपनी पकड़ और बूथ स्तर की ताकत परखने का मौका भी मिलेगा। ————————– यह खबर भी पढ़ें- सपा के थप्पड़ कांड से भाजपा में टेंशन, निषाद-ठाकुर आमने-सामने, पूर्वांचल में भाजपा के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किलें? गोरखपुर में सपा के दो नेताओं के बीच थप्पड़ कांड ने भाजपा की टेंशन बढ़ा दी है। क्योंकि थप्पड़ मारने वाले नेता ठाकुर बिरादरी से हैं, जबकि मार खाने वाले निषाद हैं। पूर्वांचल में निषाद बनाम ठाकुर की गोलबंदी शुरू हो चुकी है। ये दोनों ही समाज भाजपा के लिए खास हैं। 2027 के चुनाव से पहले भाजपा इन दोनों बिरादरी में किसी को भी नाराज करने का रिस्क नहीं लेना चाहती है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…