प्रयागराज में महाकुंभ का 26 फरवरी को समापन हो गया था। 2 महीने बीत गए, लेकिन आज भी कुंभ मेला क्षेत्र से समान समेटना बंद नहीं हुआ है। 4500 टन लोहे से तैयार टेंपरेरी स्टील ब्रिज आज भी खोला जा रहा है। पानी की जो लाइन बिछाई गई थी, वह निकाली जा रही है। सड़क तैयार करने के लिए जो गिट्टी लगाई गई थी, उसे भी निकाला जा रहा। बिजली के पोल का इस्तेमाल शहर के खराब हो चुके पोल की जगह पर हो रहा है। इन सबके बीच आज भी संगम तट पर बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। इनमें बहुत सारे वो लोग हैं, जो कुंभ के दौरान नहीं आ पाए थे। दैनिक भास्कर की टीम कुंभ के 2 महीने बीतने के बाद की स्थिति जानने मेला क्षेत्र पहुंची। जो कुछ दिखा आइए एक तरफ से जानते हैं… स्टील ब्रिज खोलने में अभी 2 महीने और लगेंगे
प्रयागराज के मलाका में 980 करोड़ की लागत से 26 नवंबर, 2020 से 10 किलोमीटर लंबा ब्रिज बनना शुरू हुआ। सिक्स लेन का यह ब्रिज देश का दूसरा सबसे बड़ा ब्रिज था। इसमें 4 किलोमीटर पुल गंगा नदी पर बनाया जाना था। महाकुंभ के लिए यह पुल जरूरी था, क्योंकि गंगा पर पहले से मौजूद पुल 50 साल पुराना और जर्जर है। मेला क्षेत्र तक इस अकेले पुल के जरिए पहुंचना संभव नहीं था। फरवरी, 2024 तक पुल को बनना था, लेकिन नहीं बन पाया। फिर जुलाई, 2024 में तय हुआ कि इसके स्थान पर एक स्टील ब्रिज बनाया जाए। जिससे आने वाली भीड़ को इस रास्ते से मेला क्षेत्र तक पहुंचाया जा सके। 5-6 महीने की कड़ी मशक्कत के बाद यह पुल तैयार हो गया। इसमें 4500 टन लोहा लगा। 60 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसके आगे-पीछे करीब 5 किलोमीटर अस्थायी सड़क बनी, जिसमें हजारों टन गिट्टी लगी। इस पुल के बनने से मेला प्रशासन को गंगा के कछार में करीब 1 लाख गाड़ियों की पार्किंग मिल गई। मेले के दौरान लाखों गाड़ियों को इधर ही पार्क करवाई गईं। 26 फरवरी को जब मेले का समापन हुआ, तभी इस पुल को भी बंद कर दिया गया। डेढ़ महीने में सिर्फ 25% निकाला जा सका
बंद हो चुके रास्तों से हम स्टील ब्रिज तक पहुंचे। रास्ता बंद होने के चलते अब पूरी सड़क धूल से भर गई है। स्टील ब्रिज पर एक जेसीबी के जरिए खोले गए सामान को व्यवस्थित तरीके से रखा जा रहा था। यहां हमारी मुलाकात बच्चू लाल पटेल से हुई। उनके साथ सुनील पटेल भी मिले। वह बताते हैं कि पिछले डेढ़ महीने से हम लोग इसे खोल रहे हैं, अब तक आधा भी नहीं खोल पाए हैं। हमने पूछा कि यहां से जो चीजें खोली जा रही हैं, वो कहां जा रहीं? सुनील कहते हैं- हमारा काम यहां इसे खोलना है। यहां से यह सारे सामान अलग-अलग साइट पर जा रहे हैं। जहां जैसी जरूरत है, वहां वैसे-वैसे इसे पहुंचाया जा रहा है। अभी इसे पूरा खोलने में 2 महीने से ज्यादा वक्त लगेगा। यह स्टील ब्रिज कुल 427 मीटर लंबा है। एक जगह करीब 360 मीटर लंबा है, बाकी दो जगहों पर छोटे-छोटे हिस्से में तैयार हुआ है। सड़कों से गिट्टी निकाली जा रही
हम कुंभ मेला क्षेत्र में आगे बढ़े। बेली कछार इलाके में गाड़ियों को पार्क करने की व्यवस्था थी। इसलिए यहां अस्थायी सड़क बनाई गई थी। अब सड़क पर बिछी गिट्टी को निकाला जा रहा है। सड़क और ब्रिज को सिंगला एंड कंपनी बना रही थी। अब वही इस गिट्टी को दूसरे काम में इस्तेमाल करने के लिए यहां से निकाल रही है। सड़कों के बगल जो पोल लगाए गए थे, उन्हें निकाला जा रहा है। इन पोल को शहर के अंदर जो पोल खराब हो चुके हैं, उनकी जगह पर लगाया जा रहा है। हम यहां से मेला क्षेत्र के लिए निकले। जिन चौराहों पर कुंभ मेले के दौरान भीड़ और जाम होता था, वहां अब ट्रैफिक सामान्य है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बालसन चौराहे से आगे बढ़ते हुए हम मेला क्षेत्र के सेक्टर-1 यानी परेड ग्राउंड पहुंचे। यहां मेला प्राधिकरण, पुलिस मुख्यालय से लेकर सारे प्रमुख विभागों के ऑफिस बनाए गए थे। अब टीन की बनाई दीवारों को छोड़कर सब कुछ खाली नजर आता है। 92 लाख वाली दुकान की बिक्री अब कम
परेड ग्राउंड में ही मौजूद महाराज कचौड़ी इस बार मेले में सबसे महंगी दुकान थी। इसकी बोली 92 लाख रुपए में लगी थी। लड्डू बना रहे दुकान मालिक प्रभा शंकर मिश्र कहते हैं- इस वक्त नॉर्मल स्थिति है। गांव में शादी-विवाह, कटाई-मड़ाई चल रही है, इसलिए लोग कम आ रहे हैं। प्रभा शंकर कहते हैं- मेले के दौरान दुकान पर 50 कारीगर थे, अब 10 हो गए हैं। दुकान महंगी थी, इसलिए हमने प्रशासन से थोड़ी राहत मांगी। दो महीने का एक्स्ट्रा वक्त मिल गया है। अब 12 महीने की जगह 14 महीने के बाद नीलामी होगी। मेला प्रशासन ने यह छूट उन दुकानों को ही दी है, जो परेड ग्राउंड में हैं। जिनका टेंडर सालाना है। महाराज कचौड़ी के आसपास करीब 10 और दुकानें हैं, जिनकी बोली महंगी लगी थी। हालांकि ये सभी दुकानदार यह मानते हैं कि महाकुंभ के दौरान इनकी बिक्री बहुत बढ़िया रही। मेला क्षेत्र में अभी भी 100 से ज्यादा दुकानें
परेड के आगे हम मेला क्षेत्र में पहुंचे। यहां से लगभग चीजें समेट ली गई हैं। ज्यादातर पांटून पुलों को भी खोल लिया गया है। मिट्टी के नीचे दबाई गई पाइपलाइन को अब निकाला जा रहा है। संगम के आस-पास बिजली के पोल नहीं निकाले गए हैं। यहां कुंभ से पहले जितनी दुकानें लगती थी, उससे कहीं अधिक दुकानें अब लगने लगी हैं। ये ज्यादातर प्रसाद और चूड़ी जैसी चीजों की हैं। ऐसी दुकानों की संख्या 100 से ज्यादा है। यहीं हमारी मुलाकात फूल-माला बेचने वाली ऊषा से हुई। वह कहती हैं- जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो हादसा हुआ, उसके बाद यहां भी आने वाले लोगों की संख्या कम हो गई। हमले का असर सभी धामों पर पड़ा है। इन्हीं के बगल बैठी एक और महिला दुकानदार भी उनकी बात पर हां में सिर हिलाती हैं। भीड़ के चलते कुंभ में नहीं आ पाए, इसलिए अब आए
संगम क्षेत्र में इस वक्त 30 से 50 हजार लोग रोज आ रहे हैं। इसमें बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो कुंभ के दौरान नहीं आ पाए थे। आमतौर पर कुंभ से पहले ये संख्या 10 से 15 हजार ही थी। बस्ती जिले से आई शांति देवी से हमारी मुलाकात हुई। वह कहती हैं- हमारे पैर में दर्द था। इतनी भीड़ थी कि आ ही नहीं पाते। इसलिए नहीं आए, अब आए हैं। शांति की बेटी सरिता दुबे कहती हैं- उस वक्त इतनी भीड़ के बारे में सुनकर डर गए थे, इसलिए नहीं आए। आज आकर यहां स्नान किया, तो अच्छा लगा। अभी 2 दिन यहां रुकेंगे, स्नान करेंगे फिर वापस जाएंगे। प्रयागराज के स्थानीय निवासी सतीश चंद्र केशरवानी कहते हैं- जब भी गंगा मैया के दर्शन और स्नान का मन करता है, चले आते हैं। बाकी यहां तो हमेशा भीड़ रहती है। लोग देश-विदेश से आते हैं। गंगा मैया सबकी मनोकामना पूरी करती हैं। लोग यहां आकर लेटे हुए हनुमान जी और अक्षयवट के दर्शन करते हैं। बाकी जहां तक कुंभ की बात है, उस वक्त थोड़ी बहुत दिक्कत हुई। लेकिन, समझना भी तो हम लोगों को था इसलिए हम लोगों ने सहयोग किया। अभी भी चल रहा भंडारा
हम संगम से वापस हनुमान मंदिर की तरफ बढ़े। रास्ते में सीता रसोई का जो भंडारा कुंभ के दौरान हर दिन 50 हजार से ज्यादा लोगों के लिए भोजन तैयार कर रहा था, वह अब भी चल रहा है। हम यहां स्वरूपराम दास जी से मिले। भंडारे को लेकर वह कहते हैं- मणिराम दास की छावनी अयोध्या से श्री नृत्य गोपाल दास जी महाराज के सानिध्य में यह भंडारा चल रहा है। 21 नवंबर, 2024 से हमने इसकी शुरुआत की थी। गंगा दशहरा तक ऐसे ही लगातार चलाने की इच्छा है। फिलहाल मेले से जुड़े जो भी अधिकारी थे, वो अब अपने जिलों में वापस चले गए हैं। तमाम अफसरों को अलग-अलग जिम्मेदारी मिली है। अब यहां की देख-रेख की जिम्मेदारी मेला प्राधिकरण के स्थायी कर्मचारी कर रहे हैं। ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी के टॉपर्स की दिल को छूने वाली कहानी, किसी के पिता मजदूर तो किसी के पेंटर; गरीबी से लड़कर पाया मुकाम मेहनत-लगन से हर मंजिल आसान होती है। यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के रिजल्ट में भी यही देखने को मिला। कठिन परिस्थितियां भी टॉपर्स को रोक नहीं पाईं। 12वीं में प्रयागराज की जिस महक जायसवाल ने प्रदेशभर में टॉप किया है, उनके पिता परचून की दुकान चलाते हैं। इसी तरह बुलंदशहर में पेंटर-गार्ड का काम करने वाले के बेटे ने हाईस्कूल में जिला टॉप किया है। पढ़ें पूरी खबर
प्रयागराज के मलाका में 980 करोड़ की लागत से 26 नवंबर, 2020 से 10 किलोमीटर लंबा ब्रिज बनना शुरू हुआ। सिक्स लेन का यह ब्रिज देश का दूसरा सबसे बड़ा ब्रिज था। इसमें 4 किलोमीटर पुल गंगा नदी पर बनाया जाना था। महाकुंभ के लिए यह पुल जरूरी था, क्योंकि गंगा पर पहले से मौजूद पुल 50 साल पुराना और जर्जर है। मेला क्षेत्र तक इस अकेले पुल के जरिए पहुंचना संभव नहीं था। फरवरी, 2024 तक पुल को बनना था, लेकिन नहीं बन पाया। फिर जुलाई, 2024 में तय हुआ कि इसके स्थान पर एक स्टील ब्रिज बनाया जाए। जिससे आने वाली भीड़ को इस रास्ते से मेला क्षेत्र तक पहुंचाया जा सके। 5-6 महीने की कड़ी मशक्कत के बाद यह पुल तैयार हो गया। इसमें 4500 टन लोहा लगा। 60 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसके आगे-पीछे करीब 5 किलोमीटर अस्थायी सड़क बनी, जिसमें हजारों टन गिट्टी लगी। इस पुल के बनने से मेला प्रशासन को गंगा के कछार में करीब 1 लाख गाड़ियों की पार्किंग मिल गई। मेले के दौरान लाखों गाड़ियों को इधर ही पार्क करवाई गईं। 26 फरवरी को जब मेले का समापन हुआ, तभी इस पुल को भी बंद कर दिया गया। डेढ़ महीने में सिर्फ 25% निकाला जा सका
बंद हो चुके रास्तों से हम स्टील ब्रिज तक पहुंचे। रास्ता बंद होने के चलते अब पूरी सड़क धूल से भर गई है। स्टील ब्रिज पर एक जेसीबी के जरिए खोले गए सामान को व्यवस्थित तरीके से रखा जा रहा था। यहां हमारी मुलाकात बच्चू लाल पटेल से हुई। उनके साथ सुनील पटेल भी मिले। वह बताते हैं कि पिछले डेढ़ महीने से हम लोग इसे खोल रहे हैं, अब तक आधा भी नहीं खोल पाए हैं। हमने पूछा कि यहां से जो चीजें खोली जा रही हैं, वो कहां जा रहीं? सुनील कहते हैं- हमारा काम यहां इसे खोलना है। यहां से यह सारे सामान अलग-अलग साइट पर जा रहे हैं। जहां जैसी जरूरत है, वहां वैसे-वैसे इसे पहुंचाया जा रहा है। अभी इसे पूरा खोलने में 2 महीने से ज्यादा वक्त लगेगा। यह स्टील ब्रिज कुल 427 मीटर लंबा है। एक जगह करीब 360 मीटर लंबा है, बाकी दो जगहों पर छोटे-छोटे हिस्से में तैयार हुआ है। सड़कों से गिट्टी निकाली जा रही
हम कुंभ मेला क्षेत्र में आगे बढ़े। बेली कछार इलाके में गाड़ियों को पार्क करने की व्यवस्था थी। इसलिए यहां अस्थायी सड़क बनाई गई थी। अब सड़क पर बिछी गिट्टी को निकाला जा रहा है। सड़क और ब्रिज को सिंगला एंड कंपनी बना रही थी। अब वही इस गिट्टी को दूसरे काम में इस्तेमाल करने के लिए यहां से निकाल रही है। सड़कों के बगल जो पोल लगाए गए थे, उन्हें निकाला जा रहा है। इन पोल को शहर के अंदर जो पोल खराब हो चुके हैं, उनकी जगह पर लगाया जा रहा है। हम यहां से मेला क्षेत्र के लिए निकले। जिन चौराहों पर कुंभ मेले के दौरान भीड़ और जाम होता था, वहां अब ट्रैफिक सामान्य है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बालसन चौराहे से आगे बढ़ते हुए हम मेला क्षेत्र के सेक्टर-1 यानी परेड ग्राउंड पहुंचे। यहां मेला प्राधिकरण, पुलिस मुख्यालय से लेकर सारे प्रमुख विभागों के ऑफिस बनाए गए थे। अब टीन की बनाई दीवारों को छोड़कर सब कुछ खाली नजर आता है। 92 लाख वाली दुकान की बिक्री अब कम
परेड ग्राउंड में ही मौजूद महाराज कचौड़ी इस बार मेले में सबसे महंगी दुकान थी। इसकी बोली 92 लाख रुपए में लगी थी। लड्डू बना रहे दुकान मालिक प्रभा शंकर मिश्र कहते हैं- इस वक्त नॉर्मल स्थिति है। गांव में शादी-विवाह, कटाई-मड़ाई चल रही है, इसलिए लोग कम आ रहे हैं। प्रभा शंकर कहते हैं- मेले के दौरान दुकान पर 50 कारीगर थे, अब 10 हो गए हैं। दुकान महंगी थी, इसलिए हमने प्रशासन से थोड़ी राहत मांगी। दो महीने का एक्स्ट्रा वक्त मिल गया है। अब 12 महीने की जगह 14 महीने के बाद नीलामी होगी। मेला प्रशासन ने यह छूट उन दुकानों को ही दी है, जो परेड ग्राउंड में हैं। जिनका टेंडर सालाना है। महाराज कचौड़ी के आसपास करीब 10 और दुकानें हैं, जिनकी बोली महंगी लगी थी। हालांकि ये सभी दुकानदार यह मानते हैं कि महाकुंभ के दौरान इनकी बिक्री बहुत बढ़िया रही। मेला क्षेत्र में अभी भी 100 से ज्यादा दुकानें
परेड के आगे हम मेला क्षेत्र में पहुंचे। यहां से लगभग चीजें समेट ली गई हैं। ज्यादातर पांटून पुलों को भी खोल लिया गया है। मिट्टी के नीचे दबाई गई पाइपलाइन को अब निकाला जा रहा है। संगम के आस-पास बिजली के पोल नहीं निकाले गए हैं। यहां कुंभ से पहले जितनी दुकानें लगती थी, उससे कहीं अधिक दुकानें अब लगने लगी हैं। ये ज्यादातर प्रसाद और चूड़ी जैसी चीजों की हैं। ऐसी दुकानों की संख्या 100 से ज्यादा है। यहीं हमारी मुलाकात फूल-माला बेचने वाली ऊषा से हुई। वह कहती हैं- जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो हादसा हुआ, उसके बाद यहां भी आने वाले लोगों की संख्या कम हो गई। हमले का असर सभी धामों पर पड़ा है। इन्हीं के बगल बैठी एक और महिला दुकानदार भी उनकी बात पर हां में सिर हिलाती हैं। भीड़ के चलते कुंभ में नहीं आ पाए, इसलिए अब आए
संगम क्षेत्र में इस वक्त 30 से 50 हजार लोग रोज आ रहे हैं। इसमें बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो कुंभ के दौरान नहीं आ पाए थे। आमतौर पर कुंभ से पहले ये संख्या 10 से 15 हजार ही थी। बस्ती जिले से आई शांति देवी से हमारी मुलाकात हुई। वह कहती हैं- हमारे पैर में दर्द था। इतनी भीड़ थी कि आ ही नहीं पाते। इसलिए नहीं आए, अब आए हैं। शांति की बेटी सरिता दुबे कहती हैं- उस वक्त इतनी भीड़ के बारे में सुनकर डर गए थे, इसलिए नहीं आए। आज आकर यहां स्नान किया, तो अच्छा लगा। अभी 2 दिन यहां रुकेंगे, स्नान करेंगे फिर वापस जाएंगे। प्रयागराज के स्थानीय निवासी सतीश चंद्र केशरवानी कहते हैं- जब भी गंगा मैया के दर्शन और स्नान का मन करता है, चले आते हैं। बाकी यहां तो हमेशा भीड़ रहती है। लोग देश-विदेश से आते हैं। गंगा मैया सबकी मनोकामना पूरी करती हैं। लोग यहां आकर लेटे हुए हनुमान जी और अक्षयवट के दर्शन करते हैं। बाकी जहां तक कुंभ की बात है, उस वक्त थोड़ी बहुत दिक्कत हुई। लेकिन, समझना भी तो हम लोगों को था इसलिए हम लोगों ने सहयोग किया। अभी भी चल रहा भंडारा
हम संगम से वापस हनुमान मंदिर की तरफ बढ़े। रास्ते में सीता रसोई का जो भंडारा कुंभ के दौरान हर दिन 50 हजार से ज्यादा लोगों के लिए भोजन तैयार कर रहा था, वह अब भी चल रहा है। हम यहां स्वरूपराम दास जी से मिले। भंडारे को लेकर वह कहते हैं- मणिराम दास की छावनी अयोध्या से श्री नृत्य गोपाल दास जी महाराज के सानिध्य में यह भंडारा चल रहा है। 21 नवंबर, 2024 से हमने इसकी शुरुआत की थी। गंगा दशहरा तक ऐसे ही लगातार चलाने की इच्छा है। फिलहाल मेले से जुड़े जो भी अधिकारी थे, वो अब अपने जिलों में वापस चले गए हैं। तमाम अफसरों को अलग-अलग जिम्मेदारी मिली है। अब यहां की देख-रेख की जिम्मेदारी मेला प्राधिकरण के स्थायी कर्मचारी कर रहे हैं। ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी के टॉपर्स की दिल को छूने वाली कहानी, किसी के पिता मजदूर तो किसी के पेंटर; गरीबी से लड़कर पाया मुकाम मेहनत-लगन से हर मंजिल आसान होती है। यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के रिजल्ट में भी यही देखने को मिला। कठिन परिस्थितियां भी टॉपर्स को रोक नहीं पाईं। 12वीं में प्रयागराज की जिस महक जायसवाल ने प्रदेशभर में टॉप किया है, उनके पिता परचून की दुकान चलाते हैं। इसी तरह बुलंदशहर में पेंटर-गार्ड का काम करने वाले के बेटे ने हाईस्कूल में जिला टॉप किया है। पढ़ें पूरी खबर