खाकी वर्दी में आज बात ऐसे अफसर की, जो काम के प्रति जुनून का सबसे बड़ा उदाहरण है। हम बात कर रहे हैं विजिलेंस में तैनात डीआईजी डॉ. अरविंद चतुर्वेदी की। अरविंद उस घराने से ताल्लुक रखते हैं जिनके बाबा (दादा) ने साहित्य की दुनिया में कामयाबी के झंडे गाड़े। पद्म विभूषण से सम्मानित हुए। उनके पिता गोरखपुर यूनिवर्सिटी के पहले टीचर के रूप में चयनित हुए। अरविंद चतुर्वेदी ने भी कई माइल स्टोन कायम किए। इनमें 4 राज्यों से जुड़ा प्रतीक दीवान अपहरण कांड, दुबई से आई इंजीनियर की नातिन का अपहरण, महोबा में 15 दिन में पहाड़ काटने का अभियान शुरू कराना और 3600 करोड़ के घोटाले का पर्दाफाश करना प्रमुख है। दैनिक भास्कर की स्पेशल सीरीज ‘खाकी वर्दी’ में आज विजिलेंस के DIG डॉ. अरविंद चतुर्वेदी की कहानी 6 चैप्टर में पढ़ेंगे… डॉ. अरविंद चतुर्वेदी का जन्म 12 मई, 1965 को गोंडा के जिला अस्पताल में हुआ था। पिता शैलनाथ चतुर्वेदी गोरखपुर यूनिवर्सिटी के पहले टीचर थे। अरविंद का पुश्तैनी घर लखनऊ में खुर्शेदबाग में है। लेकिन पिता की वजह से वह गोरखपुर में ही पढ़े-लिखे और बड़े हुए। 5वीं तक सरस्वती विद्यामंदिर, गोरखपुर में पढ़ाई करने के बाद अरविंद का एडमिशन राजकीय जुबली कॉलेज, गोरखपुर में हुआ। उन्होंने कक्षा-7 में रहते हुए आल इंडिया साइंस एक्जीबिशन में हिस्सा लिया। घरों में लगने वाली पानी की टंकी के ओवरफ्लो का अलार्म सिस्टम बनाया। इस पर उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। यह बात 70 के दशक की है। कॉलेज से निकलने के बाद अरविंद गोरखपुर विश्वविद्यालय पहुंचे। यहां से उन्होंने ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और अर्थशास्त्र में पीएचडी की। ग्रेजुएशन करने के दौरान 4 ब्लाइंड स्टूडेंट के राइटर रहे। अरविंद नेशनल ब्लाइंड एसोसिएशन के लाइफटाइम मेंबर भी हैं। अरविंद बताते हैं कि वे अपने पिता के साथ गोरखपुर में सरकारी आवास में रहते थे। पिता को बागवानी का शौक था। वे ठंड के दिनों में सीजनल फूल लगाते थे। मार्च-अप्रैल में जब फूल सूख जाते, तो उसके बीज एक चादर पर इकट्ठा करते। छुटि्टयों में जब लखनऊ आते, तो उन बीजों को साथ लेकर चलते। पिता अरविंद से बोलते, जहां नमी दिखे वहां एक मुट्ठी बीज डाल देना। उनका मानना था कि यह बीज हमारे घर में रहेगा, तो सड़ जाएगा। यहां दोबारा पेड़ बनकर फूल खिल जाएंगे, लोगों के काम आएंगे। अरविंद चतुर्वेदी का पहला ख्वाब सरकारी नौकरी थी। उन्होंने गोरखपुर में ही रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। इसी दौरान पहली बार नेशनल इंफोर्मेटिक सेंटर का गठन हो रहा था, जिसमें उनका चयन हो गया। दिल्ली में जिला कोआर्डिनेटर के पद पर जॉइन किया। वहां वर्किंग आवर 16 से 18 घंटे तक था। इसकी वजह से अरविंद सिविल सर्विसेज की तैयारी नहीं कर पा रहे थे। इसके बाद वह फैजाबाद (अब अयोध्या) आ गए और सिविल सर्विसेज की तैयारी के साथ अवध कॉलेज में पढ़ाने का काम भी शुरू किया। इस दौरान वह समाजसेवी सुब्बा राव के कैंप में भी रहे। वहां नेशनल यूथ प्रोजेक्ट में काम किया। उस समय उनका वेतन 6300 रुपए था। वहीं, सिविल सर्विसेज में उनकी मेहनत रंग लाई। पीसीएस एग्जाम उन्होंने क्लियर कर लिया। 1991 में वे पीपीएस बनकर यूपी पुलिस की सेवा में आ गए। हालांकि, उस समय पुलिस में वेतन अवध कॉलेज के मुकाबले 1500 रुपए कम था। अरविंद की ट्रेनिंग पूरी हुई, तो बह रायबरेली भेजे गए। इसी दौरान घरवालों ने उनके लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी। आगरा के मशहूर साहित्यकार सतीश चंद्र चतुर्वेदी की बेटी रागिनी से 1996 में उनकी शादी हो गई। अरविंद और रागिनी के एक बेटा और एक बेटी है। बेटे हेमांग ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली है। वह 2 साल जॉब करने के बाद हायर स्टडी की तैयारी कर रहे हैं। बेटी राधिका दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी से एमबीए कर रही हैं। अरविंद बताते हैं कि 1997 में महोबा में जिस जगह पर उनका दफ्तर था, उसके ठीक सामने पहाड़ी थी। पहाड़ी दो हिस्सों में बंटी हुई थी। एक ओर सरकारी दफ्तर, अस्पताल और रेलवे स्टेशन, तो दूसरी ओर बस्ती थी। दोनों को जोड़ने का कोई सीधा रास्ता नहीं था। लोग घंटों चक्कर काटकर एक ओर से दूसरी ओर जाते। अरविंद ने सोचा क्यों न इस पहाड़ी को काटकर रास्ता बनाया जाए? इस विचार को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने सुब्बा राव से संपर्क किया। सुझाव दिया कि एक नेशनल कैंप लगाया जाए, जिसमें देशभर के युवा मिलकर इस काम को अंजाम दें। प्लान बन गया। प्री-कैंप हुआ, देश के 22 राज्यों से 750 युवक-युवतियां महोबा पहुंचे। शहर में जनजागरण शुरू हुआ। कॉलेजों के बच्चे भी उत्साह से इस मुहिम में शामिल हो गए। कैंप शुरू हुआ। रात में पहाड़ी में ब्लास्ट होते, दिन में कैंपर्स मलबा हटाने में जुट जाते। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रशांत त्रिवेदी ने इस काम में काफी दिलचस्पी दिखाई। उन्होंने सूडा और डूडा जैसी संस्थाओं को जरूरी सहयोग देने का आदेश दिया। 14 दिन तक कैंपर्स ने दिन-रात मेहनत की। पसीने और हौसले से पहाड़ी को काटकर रास्ता तैयार हो गया। बाद में उस पर पक्की सड़क भी बन गई। यह महोबा के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। जो सफर पहले एक घंटे या उससे अधिक समय में तय होता था, वह अब सिर्फ 10 मिनट का रह गया। यह सड़क शहरवासियों के लिए एक अनमोल तोहफा बन गई, जिसने न सिर्फ दूरी घटाई, बल्कि लोगों के दिलों को भी जोड़ दिया। इसी सुब्बाराव कैंप के जरिए लखनऊ में स्वर्ण जयंती पार्क (आशियाना) में प्लांटेशन किया। अरविंद बताते हैं कि लखनऊ के इंदिरानगर में सिविल इंजीनियर रिजवी साहब का घर था। उनकी 3 साल की नातिन शिफा अपनी मां के साथ दुबई से छुट्टियां मनाने आई थी। एक दिन अचानक वह गायब हो गई। उस शाम शिफा नौकर के साथ टहलने निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। रिजवी साहब का परिवार सदमे में था। पुलिस ने शक के आधार पर केस दर्ज किया और फिरौती की कॉल का इंतजार शुरू हुआ। 3 दिन बाद लैंडलाइन पर एक कॉल आई। अपहरणकर्ताओं ने 50 लाख रुपए की मांग की। तहकीकात से पता चला कि कॉल शाहजहांपुर से थी। रिजवी साहब का परिवार पैसे देने को तैयार था, लेकिन डर था कि कहीं पैसे देने के बाद भी शिफा वापस न आए। इसलिए पुलिस ने एक योजना बनाई। पैसे देते वक्त अपहरणकर्ताओं को दबोच लिया जाए। अरविंद और एक पुलिसवाला, रिजवी साहब का ड्राइवर बनकर कुर्ता-पायजामा पहनकर तय जगह पर पहुंचा। वहां बैग खोलकर रुपए दिखाए गए। अपहरणकर्ता आश्वस्त हुए और शिफा को लाए। जैसे ही बच्ची हमारे हवाले हुई, मैंने तुरंत कार्रवाई की। पैसे देने के ठीक बाद एक बदमाश के पैर में गोली मारी और उसे मौके पर गिरफ्तार कर लिया। बाकी 3 बदमाश अगले 24 घंटों में पकड़े गए। 18 दिन बाद शिफा सकुशल अपने परिवार के पास थी। अरविंद कहते हैं कि यह केस मेरे लिए बेहद खास था। जिस दिन शिफा का अपहरण हुआ, उसी दिन मेरी बेटी का जन्म हुआ था। लेकिन, इस केस की वजह से मैं लगातार बाहर रहा। अपनी बेटी से 18 दिन बाद ही मिल पाया। शायद इसलिए यह कहानी मेरे दिल में हमेशा जिंदा रहेगी। अरविंद बताते हैं कि जब वह लखनऊ में सीओ गोमतीनगर थे। कम समय में पैसा कमाने की एक स्कीम की लत अफसरों तक को पड़ गई थी। सेंचुरी वेंचर्स की स्कीम थी “ब्याज बदला”। यह स्कीम लेकर कोई अरविंद के पास भी पहुंच गया। उन्होंने इसी पर पूरी तहकीकात शुरू कर दी। पता चला कि ब्याज स्कीम में फारवर्ड ट्रेडिंग के नाम पर पैसा लगाने के बदले शैल कंपनियों में पैसा लगाया गया। इससे निवेशकों को भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने स्कीम चलाने वाले अरविंद जौहरी और आनंद जौहरी पर शिकंजा कसना शुरू किया, तो दोनों फरार हो गए। हाईकोर्ट ने दोनों को अरेस्ट स्टे दे दिया। जांच में पता चला कि 3600 करोड़ रुपए का घोटाला इस स्कीम के तहत किया गया है। बाद में यह विवेचना सीबीआई को ट्रांसफर हो गई। अरविंद बताते हैं कि 16 साल तक एसटीएफ में रहते हुए मैंने कई बड़े केस सुलझाए। लेकिन, 2003 का प्रतीक दीवान अपहरण कांड हमेशा यादगार रहेगा। देहरादून के मशहूर दून स्कूल का छात्र और सहारनपुर के दीवान हाउसिंग के मालिक का बेटा प्रतीक दीवान एक दिन अपने ड्राइवर के साथ दिल्ली एयरपोर्ट के लिए निकला। उसे कोलकाता जाना था, मगर वह एयरपोर्ट नहीं पहुंचा। कुछ दिन बाद मुजफ्फरनगर के खतौली में उसके ड्राइवर का शव मिला। यह खबर आग की तरह फैली। देहरादून पुलिस, यूपी एसटीएफ और दिल्ली स्पेशल सेल की टीमें इस केस को सुलझाने में जुट गईं। यह आपराधिक दुनिया का पहला ऐसा केस था, जिसमें फिरौती की मांग सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट याहू मैसेंजर के जरिए की गई थी। अपराधियों ने ‘रक्षक अंडर भक्षक’ नाम की आईडी से प्रतीक के चाचा को मैसेज कर फिरौती मांगी। यह केस उन्हें दिया गया। तहकीकात में पता चला कि याहू मैसेंजर का ओरिजिन मुंबई से था। अरविंद ने टीम के साथ मुंबई का रुख किया। वहां मुंबई पुलिस की मदद से 24 से ज्यादा साइबर कैफे चिह्नित किए और निगरानी शुरू की। तभी पता चला कि बदमाश चैटिंग कर पैसे जल्दी देने की मांग कर रहे हैं। अरविंद ने प्रतीक के चाचा से कहा कि उसे उलझाए रखो। इसी दौरान एक के बाद एक साइबर कैफे पहुंचकर चेक किया गया। वहां से लाइव चैट करते हुए बदमाशों को अरविंद ने पकड़ लिया। इस अपराधी का नाम संजीव महेश्वरी उर्फ जीवा और दूसरा उसका साथी आरपी सिंह था। पूछताछ में बदमाशों ने सारा सच उगल दिया। उनकी निशानदेही पर हमने मुजफ्फरनगर के एक गन्ने के खेत से प्रतीक दीवान को सकुशल बरामद कर लिया गया। यह जीत सिर्फ एक केस सुलझाने की नहीं थी, बल्कि तकनीक के नए युग में अपराध से लड़ने की एक मिसाल थी। बाद में लखनऊ में कचहरी में संजीव महेश्वरी उर्फ जीवा की हत्या कर दी गई थी। अरविंद चतुर्वेदी एसटीएफ के महारथियों में शुमार होते हैं। उन्होंने 16 साल तक एसटीएफ में काम किया और कई खुलासे किए। 2017 में जब पेट्रोल पंपों पर हो रही बड़ी धांधली पकड़ी गई, उसमें अरविंद के रोल को भुलाया नहीं जा सकता। एसटीएफ के एसएसपी अमित पाठक जब इस इनपुट पर काम कर रहे थे, तो उन्होंने पेट्रोल चोरी का पूरा गणित समझने के लिए अरविंद चतुर्वेदी को ही जिम्मेदारी दी। अरविंद को पता था कि अगर यूपी में या आसपास के राज्य में इस पर काम शुरू किया, तो मामला लीक हो सकता है। अरविंद भुवनेश्वर पहुंचे और वहां के एक्सपर्ट से पूरा मामला समझा। फिर वापस लखनऊ आए और एसटीएफ ने कई शहरों में एक साथ छापे मारकर बड़ी संख्या में पेट्रोल पंपों पर चोरी पकड़ी। बड़ी संख्या में पेट्रोल पंप सील किए गए। बाद में 17 राज्यों ने अपने यहां चेक किया, तो इसी तरह की चोरी पकड़ी गई। इसके बाद आयल कंपनियों ने अपनी मशीनों की सुरक्षा के लिए कई नए फीचर जोड़े। अपनी सर्विस में अरविंद ने दो गैलेंटरी मेडल भी जीते। पहला मेडल मुख्तार अंसारी के शूटर कृपाशंकर चौधरी के मुंबई में किए एनकाउंटर पर मिला। दूसरा मुंबई में ही किए गए फिरदौस के एनकाउंटर के लिए दिया गया। कहां-कहां रही तैनाती
बतौर सीओ रायबरेली, महोबा, लखनऊ और एसटीएफ में तैनात रहे। अपनी सर्विस का बड़ा हिस्सा उन्होंने यूपी एसटीएफ में बिताया। यहां सीओ से लेकर एडिशनल एसपी और फिर एसपी होने तक रहे। 22 अगस्त, 2018 को प्रांतीय पुलिस सेवा से प्रमोशन पाकर आईपीएस हो गए। उन्हें 2011 बैच मिला। उनकी पहली तैनाती जालौन में रही। इसके बाद गाजीपुर, बाराबंकी और सुल्तानपुर में काम करने का मौका मिला। कोविड काल में सुल्तानपुर में तैनाती के दौरान उन्होंने थानों पर मधुमक्खी पालन शुरू कराया। इससे सालाना आमदनी हर थाने की 2 लाख रुपए तक हो जाती थी। इन पैसों को थानों की जरूरत में ही खर्च किया जाता था। शहद का इस्तेमाल थाने के पुलिसकर्मी भी कर सकते थे। इसी तरह बाराबंकी में तैनाती के दौरान चैनपुरवा गांव, जो शराब बनाने के लिए मशहूर था, वहां उन्होंने जागरूकता अभियान चलाया। इस कारोबार में लगे लोगों को दूसरे काम से जोड़ा। देखते ही देखते यहां से अवैध शराब का धंधा बंद हो गया। शौक- बागवानी, डॉग कीपिंग, बैडमिंटन, साहित्य ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी के टॉपर्स की दिल को छूने वाली कहानी, किसी के पिता मजदूर तो किसी के पेंटर; गरीबी से लड़कर पाया मुकाम मेहनत-लगन से हर मंजिल आसान होती है। यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के रिजल्ट में भी यही देखने को मिला। कठिन परिस्थितियां भी टॉपर्स को रोक नहीं पाईं। 12वीं में प्रयागराज की जिस महक जायसवाल ने प्रदेशभर में टॉप किया है, उनके पिता परचून की दुकान चलाते हैं। इसी तरह बुलंदशहर में पेंटर-गार्ड का काम करने वाले के बेटे ने हाईस्कूल में जिला टॉप किया है। पढ़ें पूरी खबर
बतौर सीओ रायबरेली, महोबा, लखनऊ और एसटीएफ में तैनात रहे। अपनी सर्विस का बड़ा हिस्सा उन्होंने यूपी एसटीएफ में बिताया। यहां सीओ से लेकर एडिशनल एसपी और फिर एसपी होने तक रहे। 22 अगस्त, 2018 को प्रांतीय पुलिस सेवा से प्रमोशन पाकर आईपीएस हो गए। उन्हें 2011 बैच मिला। उनकी पहली तैनाती जालौन में रही। इसके बाद गाजीपुर, बाराबंकी और सुल्तानपुर में काम करने का मौका मिला। कोविड काल में सुल्तानपुर में तैनाती के दौरान उन्होंने थानों पर मधुमक्खी पालन शुरू कराया। इससे सालाना आमदनी हर थाने की 2 लाख रुपए तक हो जाती थी। इन पैसों को थानों की जरूरत में ही खर्च किया जाता था। शहद का इस्तेमाल थाने के पुलिसकर्मी भी कर सकते थे। इसी तरह बाराबंकी में तैनाती के दौरान चैनपुरवा गांव, जो शराब बनाने के लिए मशहूर था, वहां उन्होंने जागरूकता अभियान चलाया। इस कारोबार में लगे लोगों को दूसरे काम से जोड़ा। देखते ही देखते यहां से अवैध शराब का धंधा बंद हो गया। शौक- बागवानी, डॉग कीपिंग, बैडमिंटन, साहित्य ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी के टॉपर्स की दिल को छूने वाली कहानी, किसी के पिता मजदूर तो किसी के पेंटर; गरीबी से लड़कर पाया मुकाम मेहनत-लगन से हर मंजिल आसान होती है। यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के रिजल्ट में भी यही देखने को मिला। कठिन परिस्थितियां भी टॉपर्स को रोक नहीं पाईं। 12वीं में प्रयागराज की जिस महक जायसवाल ने प्रदेशभर में टॉप किया है, उनके पिता परचून की दुकान चलाते हैं। इसी तरह बुलंदशहर में पेंटर-गार्ड का काम करने वाले के बेटे ने हाईस्कूल में जिला टॉप किया है। पढ़ें पूरी खबर