लखनऊ के ताजिया की डिमांड यूरोपीय देशों तक रहती है। यहां चांदी और मोम के ताजिया खासतौर पर बनाए जाते हैं। साथ ही बड़ा इमामबाड़ा की नक्काशी वाले ताजिया मुहर्रम के महीने को खास बना देते हैं। यहां के ताजिया की कीमत 1 हजार रुपए से शुरू होकर ढाई लाख रुपए तक है। लखनऊ में ताजिया की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। यहां कागज, मोम, लकड़ी और चांदी के ताजिया जुलूस में निकाले जाते हैं। सबसे अधिक लोकप्रिय शाही मोम की जरी है, जिसे खास कारीगर तैयार करते हैं। इस वर्ष शाही मोम की जरी में बड़ा इमामबाड़ा का अक्स नजर आएगा। मोहर्रम की पहली तारीख को शाही जरी का जुलूस बड़ा इमामबाड़ा से छोटा इमामबाड़ा तक निकाला जाएगा। शाही जरी के जुलूस में ऊंट, घोड़े, हाथी के साथ सैकड़ों की संख्या में लोग पैदल शामिल होते हैं। शाही जरी ताजिया की 2 तस्वीरें… 3 महीने पहले से ही शुरू होती है तैयारी शाही जरी को बहराइच के कारीगर नसीम अली और उनका परिवार तैयार कर रहा है। उन्होंने बताया- मोहर्रम के 3 महीने पहले से ही इसकी तैयारी शुरू कर दी जाती है। परिवार के 12 सदस्य मिल कर शाही जरी तैयार करते हैं। इसमें समय और मेहनत काफी लगती है। नसीम अली ने बताया- इस बार की शाही जरी 22 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी है। इसे 2.5 क्विंटल मोम से तैयार किया गया है। इसमें बांस, कागज और अन्य सामान भी इस्तेमाल किया गया है। नसीम अली ने बताया- इसे तैयार करने के लिए 2 लाख 65 रुपए मिलेंगे। ये बहुत कम है। इतनी तो लागत ही लग जाती है। नाराजगी जताते हुए कहा- कई सालों से रकम नहीं बढ़ाई गई। महंगाई बढ़ती जा रही है। मोम पिछले साल 160 रुपए किलो थी। इस वर्ष 200 रुपए प्रति किलो हो गई है। हिंदू कारीगर ने तैयार किया चांदी का ताजिया सर्राफा बाजार में भी मोहर्रम में खास ताजिया तैयार की गई हैं। विनोद माहेश्वरी ने बताया कि ग्राहकों की डिमांड पर चांदी से बना विशेष ताजिया, पंजा, अलम और मश्क तैयार किया गया है। उन्होंने बताया कि लखनऊ गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है। ताजिया और अन्य चीजें हिंदू कारीगर यार कर रहे हैं। चांदी से तैयार किया गया ताजिया ग्राहकों को बहुत ही आकर्षित कर रहा है। इसकी कीमत चांदी के वजन और डिजाइन के अनुसार तय होती है। लकड़ी के ताजिया की डिमांड विदेश में घंटाघर के सामने जफर अली ने लकड़ी से खास नक्काशी वाले ताजिया तैयार किया है। उन्होंने बताया कि यह उनका पुश्तैनी काम है जो 3 पीढ़ियों से करते चले आ रहे हैं। उनके यहां ताजिया 1 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपए तक ताजिया उपलब्ध है। उन्होंने बताया- इसकी तैयारी 5 महीने पहले शुरू कर देते हैं। लखनऊ के अलावा देश के विभिन्न कोनों में लकड़ी के बने हुए नक्काशी वाले ताज़िया की डिमांड हैं। नक्काशी वाले ताजिये यूरोप तक जाते हैं। कागज से बने ताजिया की लोकल में डिमांड आमतौर से लखनऊ समेत अन्य जगह पर कागज से बने ताजिया जुलूस में निकाले जाते हैं। ताजिया कारीगर अकबर अली ने बताया कि कागज से बने ताजिया की डिमांड लोकल आम लोगों में ज्यादा होती है। इसका मुख्य कारण है कि इनकी कीमत अन्य ताजिया के मुकाबले में कम मतलब लगभग 2000 रुपए से शुरू होती है। यह काफी बड़े आकार में होते हैं। इनका वजन भी नहीं होता है। जुलूस में लेकर चलने में आसानी होती है। ताजिया की रिवायत 350 साल पुरानी है लखनऊ में ताजिया की रिवायत लगभग 350 साल पुरानी है। नवाब मसूद अब्दुल्लाह ने बताया कि हजरत इमाम हुसैन के मजार का नक्शा होता है। जिसे विभिन्न सामग्री से तैयार किया जाता है। जो लोग इराक कर्बला नहीं जा पाते हैं वो इसे अपने घर मे रखकर इमाम हुसैन को याद करते हैं। उन्होंने बताया कि लखनऊ में 1675 में उन्मतुज्जोहरा बानो उर्फ “बहू बेगम” जो नवाब शुजा-उद-दौला की पत्नी थीं। उनके द्वारा ताजिया रखने की परंपरा शुरुआत की गई। “बहू बेगम” इराक स्थित कर्बला जियारत के लिए जाना चाहती थीं मगर किसी कारण नहीं जा पाईं तो उन्होंने ताजिया रखकर उसकी जियारत शुरू की। ———————— ये खबर भी पढ़िए… लखनऊ में शाही जरी का जुलूस निकाला : ड्रोन से निगरानी हुई, अकीदतमंदों ने इमाम हुसैन की याद में मातम किया-मर्सिया पढ़ा लखनऊ में मोहर्रम का चांद नजर आने के बाद शुक्रवार रात को शाही जरी का जुलूस निकाला गया। मातमी धुनों पर अकीदतमंद बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े की ओर नंगे पांव चले। हाथों में काले झंडे और जुबान पर या हुसैन की सदा से माहौल गमगीन रहा। प्रशासन ने जुलूस की सुरक्षा को देखते हुए 2 डीसीपी, 18 एडीसीपी, 54 एसीपी, 114 इंस्पेक्टर, 868 दरोगा, 87 महिला दरोगा, 2273 सिपाही और 654 महिला सिपाही तैनात किए थे। ड्रोन से निगरानी की गई। (पूरी खबर पढ़िए)