यूपी में दक्षिणांचल और पूर्वांचल बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण की आड़ में 40 हजार करोड़ का वारा-न्यारा करने की तैयारी है। ऐसा हम नहीं, ऊर्जा विभाग का आरएफटी (रिक्वेस्ट फॉर टेंडर) डॉक्यूमेंट से साबित हो रहा है। बिजली वितरण संभाल रही दोनों कंपनियों का उपभोक्ताओं पर 66 हजार करोड़ रुपए बकाया है। इस बकाया राशि से सिर्फ 26 हजार करोड़ ही उपभोक्ताओं से वसूल कर निजी कंपनियों को देना होगा। मतलब साफ है, बाकी 40 हजार करोड़ बकाए की रकम उनकी जेब में जाएगी। आखिर क्यों कैग से दोनों कंपनियों का फेयर ई-वैल्यूएशन की मांग हो रही? दोनों कंपनियों के रेवेन्यू पोटेंशियल के अनुसार रिजर्व बेस प्राइस क्यों नहीं तय किया गया? इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की कौन-सी धारा का उल्लंघन किया जा रहा है? इसका क्या असर पड़ेगा? पढ़िए ये रिपोर्ट… पहले जानिए कैसे कंपनियों को भारी घाटे में दिखाया जाता है
ऊर्जा विभाग की ओर से दावा किया जाता है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल बिजली वितरण कंपनियां भारी घाटे में हैं। इसमें सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी की रकम को भी जोड़ लेते हैं। जबकि सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी उसकी घोषणाओं के एवज में देनी पड़ती है। सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को 3 रुपए प्रति यूनिट बिजली देने की चुनावी घोषणा की थी। इसी तरह बुनकरों और किसानों को मुफ्त बिजली देने की बात भी शामिल है। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम में कुल 6327 करोड़ रूपए की सब्सिडी दी जाती है। सरकार इस रकम को भी कैश गैप में जोड़कर घाटा बताती है। जबकि, ये रकम लुभावने और चुनावी वादे पूरे करने के एवज में देनी पड़ती है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने पूर्वांचल बिजली वितरण कंपनी साल 2024-25 के परफॉर्मेंस का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे मुनाफे वाली कंपनी को घाटे में दर्शाया जा रहा है? उस वित्तीय वर्ष में कंपनी ने उपभोक्ताओं से 13297 करोड़ रुपए राजस्व वसूल किए। इसके अलावा सरकारी विभागों पर 4182 करोड़ का राजस्व बकाया है, जो सरकारी विभागों ने नहीं दिया। ये रकम दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है। इस रकम को जोड़ दें, तो कुल राजस्व 17479 करोड़ रुपए हो जाते हैं। अब इसमें सब्सिडी की 6327 करोड रुपए भी जोड़ लें तो कुल आय 23,806 करोड़ रुपए हो जाती है। जबकि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम ने विद्युत नियामक आयोग को बताया है कि 2024-25 का उसका कुल खर्च लगभग 20,564 करोड़ है। मतलब साफ है, कंपनी को इस वित्तीय वर्ष में 3242 करोड़ का मुनाफा हुआ है। निजीकरण की आड़ में भ्रष्टाचार का खेल शैलेंद्र दुबे के मुताबिक दक्षिणांचल-पूर्वांचल बिजली वितरण कंपनियों का रेवेन्यू पोटेंशियल कम से कम 50 हजार करोड़ का है। दोनों कंपनियों का उपभोक्ताओं पर 66 हजार करोड़ रुपए का राजस्व बकाया है। ऐसे में सिर्फ उनका रिजर्व बेस प्राइस 6500 करोड़ रुपए रखना कहां तक उचित है? निजी घरानों की नजर इसी बकाए राशि पर है। निजीकरण के लिए ऊर्जा विभाग ने आरएफटी (रिक्वेस्ट फॉर टेंडर) डॉक्यूमेंट पर लिखा है कि इस 66 हजार करोड़ के बकाए का 40 फीसदी ही निजी कंपनियां वसूल कर बिजली विभाग को देंगी। मतलब, बिजली विभाग को सिर्फ 26 हजार करोड़ रुपए ही मिलेंगे। बाकी 40 हजार करोड़ रुपए की बंदरबांट होगी। निजी कंपनियां 26 हजार करोड़ रुपए उपभोक्ताओं से वसूल कर देंगी, ये भी तय नहीं है। शैलेंद्र दुबे ने आगरा जिले में बिजली वितरण व्यवस्था संभाल रही टोरेंट कंपनी का उदाहरण दिया। बताया कि जब आगरा का निजीकरण हो रहा था, तब वहां के उपभोक्ताओं पर 2200 करोड़ रुपए बकाया थे। एग्रीमेंट में तय हुआ था कि 10 फीसदी सरचार्ज जोड़कर बकाया रकम टोरेंट कंपनी उपभोक्ताओं वसूल करेगी। सरचार्ज की रकम खुद रखकर 2200 करोड़ रुपए बिजली कंपनी के खजाने में जमा करेगी। लेकिन, एक पैसा टोरेंट कंपनी ने नहीं जमा किया। इसी टोरेंट कंपनी को भिवंडी में इसी तरह 3000 करोड़ रुपए उपभोक्ताओं से बकाया के वसूलने थे। लेकिन, उसने तीन पैसे वसूल कर वहां की बिजली कंपनी को नहीं दिए। अब इसी तरह का खेल यहां भी करने की तैयारी है। विद्युत अधिनियम की धारा का भी नहीं किया जा रहा पालन
विद्युत अधिनियम में बताया गया है कि कैसे किसी कंपनी का निजीकरण हो सकता है? विद्युत अधिनियम 2003 का सेक्शन 131 कहता है- जब भी किसी सरकारी कंपनी को निजी क्षेत्र को बेची जाएगी, तो दो बातें अनिवार्य हैं। पहली- जिस एसेट को बेच रहे हैं, उसका ‘फेयर ई-वैल्यूएशन’ होना चाहिए। मतलब, सही मूल्यांकन हो। इसके लिए कोई काम नहीं किया गया। संघर्ष समिति मांग कर रही है कि दोनों कंपनियों का मूल्यांकन सीएजी (कैग) से कराया जाए। दूसरी- बेची जा रही कंपनी का रेवेन्यू पोटेंशियल क्या है? संघर्ष समिति का दावा है कि आज के दिन में दक्षिणांचल-पूर्वांचल बिजली वितरण कंपनियों का रेवेन्यू पोटेंशियल कम से कम 50 हजार करोड़ का है। इसके अलावा दोनों कंपनियों का उपभोक्ताओं पर 66 हजार करोड़ रुपए के राजस्व भी बकाया है। देश में निजीकरण का प्रयोग विफल हो चुका है
उत्तर प्रदेश बिजली एम्पलाई यूनियन संबद्ध सीआईटी-2 के कार्यवाहक प्रदेश उपाध्यक्ष प्रेमनाथ राय के मुताबिक, बिजली क्षेत्र में निजीकरण का प्रयोग विफल हो चुका है। ओडिशा, यूपी में आगरा और कानपुर इसके उदाहरण हैं। आज आगरा में टोरेंट कंपनी उपभोक्ताओं को महंगी बिजली दे रही है। हम उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली दे रहे हैं। जाहिर सी बात है कि सस्ती बिजली देंगे तो घाटा होगा। घाटा क्यों हो रहा है, उस पर प्रबंधन को बड़े पैमाने पर चर्चा करने की जरूरत है। बिजली विभाग के अंदर बड़ा भ्रष्टाचार है। इसका उदाहरण मीटर बदलने के खेल से लगा सकते हैं। इस मीटर बदलने में करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार है। उस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बात नहीं हो रही। सिर्फ घाटे का नाम लेकर सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली वितरण व्यवस्था को निजी क्षेत्र में देने की बात हो रही है। ये घाटा नहीं है। ये घाटा जनता को बताकर, दिखाकर, निजी क्षेत्र को ज्यादा मुनाफा देने का खेल चल रहा है। बिजली वितरण क्षेत्र की दोनों कंपनियां पूर्वांचल और दक्षिणांचल का निजीकरण करना है तो, सबसे पहले उसका एसेट कितना है, ये पता करना चाहिए। इन कंपनियों का वैल्यू कितना है? इन कंपनियों का रेवन्यू पोटेंशियल निकालना होगा। पूर्वांचल और दक्षिणांचल वितरण कंपनी का कोई वैल्यू नहीं निकाली गई कि कितने खंबे हैं? कितने किमी के तार है? कितनी जमीनें हैं? कितने मकान हैं? कितनी कॉलोनियां हैं? आप सभी को पता है कि निजी क्षेत्र की कंपनियां सेवा भाव से नहीं आती हैं। वे बिजनेस के भाव से मुनाफा कमाने बिजली के क्षेत्र में आ रही हैं। और मुनाफा बिजली के रेट को बढ़ाकर कमाएंगी। ओडिशा की तरह संकट में करार तोड़ दिया, तब क्या होगा?
प्रेमनाथ राय ओडिशा का उदाहरण देते हुए सवाल करते हैं कि जब ओडिशा में भारी चक्रवात आया था। तब बड़े पैमाने पर बिजली के खंबे उखड़ गए थे। बिजली की लाइनें टूट गई थीं। तब वहां की वितरण व्यवस्था संभाल रहीं दोनों निजी क्षेत्र की कंपनियां करार को रद्द कर भाग गई थीं। उनका कहना था कि ये चक्रवात में हुए बिजली व्यवस्था की मरम्मत का काम वे नहीं करेंगे। ये हमारी जिम्मेदारी नहीं सरकार की जिम्मेदारी है। बाद में ओडिशा सरकार को मजबूर होकर निजी क्षेत्र से बिजली के डिस्ट्रीब्यूशन को फिर से सरकारी क्षेत्र में लाना पड़ा। अब सरकारी क्षेत्र में व्यवस्था पटरी पर आई, तो फिर से ओडिशा सरकार बिजली के निजीकरण की बात कर रही है। यदि इसी तरह का संकट यूपी में आया तो क्या निजी क्षेत्र की कंपनियां करार बरकरार रख पाएंगी? निजी को सब्सिडी देंगे, सार्वजनिक कंपनी को नहीं
जूनियर इंजीनियर डीके मिश्रा के मुताबिक, हम किसानों, ग्रामीणों और शहरी लोगों को जिस दर पर बिजली दे रहे हैं। निजीकरण के बाद ये महंगी हो जाएंगी। अभी निजीकरण की प्रक्रिया चल ही रही है। इससे पहले ही बिजली की दरों को 45% तक बढ़ाने की तैयारी कर ली गई है। जब निजी क्षेत्र की कंपनियां आएंगी, तो लाजिमी है, वो भी इसे बढ़ाएंगी। इसका भार आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। उत्तर प्रदेश बिजली कर्मचारी संघ के मुख्य महामंत्री महेंद्र राय कहते हैं- दोनों कंपनियों का निजीकरण गलत तरीके से हो रहा है। ऊर्जा विभाग के अधिकारियों के सारे बयान चाहे कर्मचारी के संबंध में हो या आम जनता के बारे में, भ्रमित करने वाले हैं। अधिकारी कहते हैं कि निजीकरण में आगरा की टोरेंट कंपनी को छोड़ देंगे। मतलब, प्राइवेट को छोड़ देंगे और सार्वजनिक क्षेत्र का प्राइवेटाइजेशन करेंगे। इनकी निजी कंपनियों से डील हुई है। नियामक आयोग ने इसकी प्रक्रिया पर आपत्ति लगाकर जवाब मांगा तो नियामक आयोग में मुख्य सचिव मनोज सिंह 40 अधिकारियों का अमला लेकर एक संवैधानिक संस्था पर दबाव बनाने पहुंच जा रहे हैं। इस सरकार में बैठे कुछ लोग कोई भी मनमानी करेंगे। इनके लिए कर्मचारी या आम जनता का हित कोई मायने नहीं है। इससे मजबूर होकर हम आंदोलन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण की कब-कब हुई कोशिश 1993: NPCL को ग्रेटर नोएडा में बिजली वितरण की जिम्मेदारी दी गई। हालांकि तब यह केवल एक डिवीजन था। विरोध तब भी किया गया था, लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंचा। 2006: लेसा के ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली देने की जिम्मेदारी एक फ्रेंचाइजी को देने का फैसला कैबिनेट से हुआ था। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने नियामक आयोग में इसके खिलाफ याचिका दायर की। इसके बाद फैसले पर रोक लगा दी गई। 2010: टोरंट को आगरा शहर की जिम्मेदारी दे दी गई। इस फैसले का भी विरोध हुआ, आंदोलन हुआ लेकिन सरकार अपने फैसले पर कायम रही। 2013: PPP मॉडल पर गाजियाबाद, वाराणसी, मेरठ और कानपुर में बिजली वितरण का फैसला लिया गया था। 2014 से यह व्यवस्था लागू होनी थी। विरोध में आंदोलन हुआ। उपभोक्ता परिषद ने नियामक आयोग में याचिका भी दायर की, जिसमें 2010 के आदेशों को न मानने का आरोप लगाया गया। मामला फंसता देख कॉरपोरेशन अध्यक्ष ने आयोग में जवाब दाखिल किया कि फिलहाल यह आंतरिक अध्ययन के अलावा कुछ नहीं है। 2020: पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम का निजीकरण करने के प्रयास हुए। इंजीनियरों ने काफी विरोध किया। आयोग में भी मामला पहुंचा। बाद में तत्कालीन ऊर्जा मंत्री और इंजीनियर संगठनों के बीच लिखित समझौता हुआ कि भविष्य में निजीकरण या फ्रेंचाइजी-करण का फैसला बिना उनकी सहमति के नहीं होगा। यूपी में ऐसे बदला बिजली का स्ट्रक्चर पूर्वांचल–दक्षिणांचल की बजाय 5 कंपनी बनाई जा रहीं ———————– ये खबर भी पढ़ें… छांगुर की PMO तक शिकायत, तब शुरू हुई कार्रवाई, जिगरी दोस्त से दुश्मन बना वसीउद्दीन, उजागर किए काले कारनामे बलरामपुर में गिरफ्तार किए गए धर्मांतरण के मास्टरमाइंड जलालुद्दीन शाह उर्फ छांगुर बाबा की प्रशासन में अच्छी पकड़ थी। इसलिए स्थानीय स्तर पर उसके खिलाफ शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं होती थी। लेकिन, जब उसका जिगरी दोस्त ठेकेदार वसीउद्दीन खान उर्फ बब्बू चौधरी ही दुश्मन बन गया तो एक-एक कर काले कारनामे उजागर होने लगे। पढ़िए पूरी खबर…
ऊर्जा विभाग की ओर से दावा किया जाता है कि पूर्वांचल और दक्षिणांचल बिजली वितरण कंपनियां भारी घाटे में हैं। इसमें सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी की रकम को भी जोड़ लेते हैं। जबकि सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी उसकी घोषणाओं के एवज में देनी पड़ती है। सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को 3 रुपए प्रति यूनिट बिजली देने की चुनावी घोषणा की थी। इसी तरह बुनकरों और किसानों को मुफ्त बिजली देने की बात भी शामिल है। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम में कुल 6327 करोड़ रूपए की सब्सिडी दी जाती है। सरकार इस रकम को भी कैश गैप में जोड़कर घाटा बताती है। जबकि, ये रकम लुभावने और चुनावी वादे पूरे करने के एवज में देनी पड़ती है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने पूर्वांचल बिजली वितरण कंपनी साल 2024-25 के परफॉर्मेंस का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे मुनाफे वाली कंपनी को घाटे में दर्शाया जा रहा है? उस वित्तीय वर्ष में कंपनी ने उपभोक्ताओं से 13297 करोड़ रुपए राजस्व वसूल किए। इसके अलावा सरकारी विभागों पर 4182 करोड़ का राजस्व बकाया है, जो सरकारी विभागों ने नहीं दिया। ये रकम दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है। इस रकम को जोड़ दें, तो कुल राजस्व 17479 करोड़ रुपए हो जाते हैं। अब इसमें सब्सिडी की 6327 करोड रुपए भी जोड़ लें तो कुल आय 23,806 करोड़ रुपए हो जाती है। जबकि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम ने विद्युत नियामक आयोग को बताया है कि 2024-25 का उसका कुल खर्च लगभग 20,564 करोड़ है। मतलब साफ है, कंपनी को इस वित्तीय वर्ष में 3242 करोड़ का मुनाफा हुआ है। निजीकरण की आड़ में भ्रष्टाचार का खेल शैलेंद्र दुबे के मुताबिक दक्षिणांचल-पूर्वांचल बिजली वितरण कंपनियों का रेवेन्यू पोटेंशियल कम से कम 50 हजार करोड़ का है। दोनों कंपनियों का उपभोक्ताओं पर 66 हजार करोड़ रुपए का राजस्व बकाया है। ऐसे में सिर्फ उनका रिजर्व बेस प्राइस 6500 करोड़ रुपए रखना कहां तक उचित है? निजी घरानों की नजर इसी बकाए राशि पर है। निजीकरण के लिए ऊर्जा विभाग ने आरएफटी (रिक्वेस्ट फॉर टेंडर) डॉक्यूमेंट पर लिखा है कि इस 66 हजार करोड़ के बकाए का 40 फीसदी ही निजी कंपनियां वसूल कर बिजली विभाग को देंगी। मतलब, बिजली विभाग को सिर्फ 26 हजार करोड़ रुपए ही मिलेंगे। बाकी 40 हजार करोड़ रुपए की बंदरबांट होगी। निजी कंपनियां 26 हजार करोड़ रुपए उपभोक्ताओं से वसूल कर देंगी, ये भी तय नहीं है। शैलेंद्र दुबे ने आगरा जिले में बिजली वितरण व्यवस्था संभाल रही टोरेंट कंपनी का उदाहरण दिया। बताया कि जब आगरा का निजीकरण हो रहा था, तब वहां के उपभोक्ताओं पर 2200 करोड़ रुपए बकाया थे। एग्रीमेंट में तय हुआ था कि 10 फीसदी सरचार्ज जोड़कर बकाया रकम टोरेंट कंपनी उपभोक्ताओं वसूल करेगी। सरचार्ज की रकम खुद रखकर 2200 करोड़ रुपए बिजली कंपनी के खजाने में जमा करेगी। लेकिन, एक पैसा टोरेंट कंपनी ने नहीं जमा किया। इसी टोरेंट कंपनी को भिवंडी में इसी तरह 3000 करोड़ रुपए उपभोक्ताओं से बकाया के वसूलने थे। लेकिन, उसने तीन पैसे वसूल कर वहां की बिजली कंपनी को नहीं दिए। अब इसी तरह का खेल यहां भी करने की तैयारी है। विद्युत अधिनियम की धारा का भी नहीं किया जा रहा पालन
विद्युत अधिनियम में बताया गया है कि कैसे किसी कंपनी का निजीकरण हो सकता है? विद्युत अधिनियम 2003 का सेक्शन 131 कहता है- जब भी किसी सरकारी कंपनी को निजी क्षेत्र को बेची जाएगी, तो दो बातें अनिवार्य हैं। पहली- जिस एसेट को बेच रहे हैं, उसका ‘फेयर ई-वैल्यूएशन’ होना चाहिए। मतलब, सही मूल्यांकन हो। इसके लिए कोई काम नहीं किया गया। संघर्ष समिति मांग कर रही है कि दोनों कंपनियों का मूल्यांकन सीएजी (कैग) से कराया जाए। दूसरी- बेची जा रही कंपनी का रेवेन्यू पोटेंशियल क्या है? संघर्ष समिति का दावा है कि आज के दिन में दक्षिणांचल-पूर्वांचल बिजली वितरण कंपनियों का रेवेन्यू पोटेंशियल कम से कम 50 हजार करोड़ का है। इसके अलावा दोनों कंपनियों का उपभोक्ताओं पर 66 हजार करोड़ रुपए के राजस्व भी बकाया है। देश में निजीकरण का प्रयोग विफल हो चुका है
उत्तर प्रदेश बिजली एम्पलाई यूनियन संबद्ध सीआईटी-2 के कार्यवाहक प्रदेश उपाध्यक्ष प्रेमनाथ राय के मुताबिक, बिजली क्षेत्र में निजीकरण का प्रयोग विफल हो चुका है। ओडिशा, यूपी में आगरा और कानपुर इसके उदाहरण हैं। आज आगरा में टोरेंट कंपनी उपभोक्ताओं को महंगी बिजली दे रही है। हम उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली दे रहे हैं। जाहिर सी बात है कि सस्ती बिजली देंगे तो घाटा होगा। घाटा क्यों हो रहा है, उस पर प्रबंधन को बड़े पैमाने पर चर्चा करने की जरूरत है। बिजली विभाग के अंदर बड़ा भ्रष्टाचार है। इसका उदाहरण मीटर बदलने के खेल से लगा सकते हैं। इस मीटर बदलने में करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार है। उस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बात नहीं हो रही। सिर्फ घाटे का नाम लेकर सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली वितरण व्यवस्था को निजी क्षेत्र में देने की बात हो रही है। ये घाटा नहीं है। ये घाटा जनता को बताकर, दिखाकर, निजी क्षेत्र को ज्यादा मुनाफा देने का खेल चल रहा है। बिजली वितरण क्षेत्र की दोनों कंपनियां पूर्वांचल और दक्षिणांचल का निजीकरण करना है तो, सबसे पहले उसका एसेट कितना है, ये पता करना चाहिए। इन कंपनियों का वैल्यू कितना है? इन कंपनियों का रेवन्यू पोटेंशियल निकालना होगा। पूर्वांचल और दक्षिणांचल वितरण कंपनी का कोई वैल्यू नहीं निकाली गई कि कितने खंबे हैं? कितने किमी के तार है? कितनी जमीनें हैं? कितने मकान हैं? कितनी कॉलोनियां हैं? आप सभी को पता है कि निजी क्षेत्र की कंपनियां सेवा भाव से नहीं आती हैं। वे बिजनेस के भाव से मुनाफा कमाने बिजली के क्षेत्र में आ रही हैं। और मुनाफा बिजली के रेट को बढ़ाकर कमाएंगी। ओडिशा की तरह संकट में करार तोड़ दिया, तब क्या होगा?
प्रेमनाथ राय ओडिशा का उदाहरण देते हुए सवाल करते हैं कि जब ओडिशा में भारी चक्रवात आया था। तब बड़े पैमाने पर बिजली के खंबे उखड़ गए थे। बिजली की लाइनें टूट गई थीं। तब वहां की वितरण व्यवस्था संभाल रहीं दोनों निजी क्षेत्र की कंपनियां करार को रद्द कर भाग गई थीं। उनका कहना था कि ये चक्रवात में हुए बिजली व्यवस्था की मरम्मत का काम वे नहीं करेंगे। ये हमारी जिम्मेदारी नहीं सरकार की जिम्मेदारी है। बाद में ओडिशा सरकार को मजबूर होकर निजी क्षेत्र से बिजली के डिस्ट्रीब्यूशन को फिर से सरकारी क्षेत्र में लाना पड़ा। अब सरकारी क्षेत्र में व्यवस्था पटरी पर आई, तो फिर से ओडिशा सरकार बिजली के निजीकरण की बात कर रही है। यदि इसी तरह का संकट यूपी में आया तो क्या निजी क्षेत्र की कंपनियां करार बरकरार रख पाएंगी? निजी को सब्सिडी देंगे, सार्वजनिक कंपनी को नहीं
जूनियर इंजीनियर डीके मिश्रा के मुताबिक, हम किसानों, ग्रामीणों और शहरी लोगों को जिस दर पर बिजली दे रहे हैं। निजीकरण के बाद ये महंगी हो जाएंगी। अभी निजीकरण की प्रक्रिया चल ही रही है। इससे पहले ही बिजली की दरों को 45% तक बढ़ाने की तैयारी कर ली गई है। जब निजी क्षेत्र की कंपनियां आएंगी, तो लाजिमी है, वो भी इसे बढ़ाएंगी। इसका भार आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। उत्तर प्रदेश बिजली कर्मचारी संघ के मुख्य महामंत्री महेंद्र राय कहते हैं- दोनों कंपनियों का निजीकरण गलत तरीके से हो रहा है। ऊर्जा विभाग के अधिकारियों के सारे बयान चाहे कर्मचारी के संबंध में हो या आम जनता के बारे में, भ्रमित करने वाले हैं। अधिकारी कहते हैं कि निजीकरण में आगरा की टोरेंट कंपनी को छोड़ देंगे। मतलब, प्राइवेट को छोड़ देंगे और सार्वजनिक क्षेत्र का प्राइवेटाइजेशन करेंगे। इनकी निजी कंपनियों से डील हुई है। नियामक आयोग ने इसकी प्रक्रिया पर आपत्ति लगाकर जवाब मांगा तो नियामक आयोग में मुख्य सचिव मनोज सिंह 40 अधिकारियों का अमला लेकर एक संवैधानिक संस्था पर दबाव बनाने पहुंच जा रहे हैं। इस सरकार में बैठे कुछ लोग कोई भी मनमानी करेंगे। इनके लिए कर्मचारी या आम जनता का हित कोई मायने नहीं है। इससे मजबूर होकर हम आंदोलन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बिजली निजीकरण की कब-कब हुई कोशिश 1993: NPCL को ग्रेटर नोएडा में बिजली वितरण की जिम्मेदारी दी गई। हालांकि तब यह केवल एक डिवीजन था। विरोध तब भी किया गया था, लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंचा। 2006: लेसा के ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली देने की जिम्मेदारी एक फ्रेंचाइजी को देने का फैसला कैबिनेट से हुआ था। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने नियामक आयोग में इसके खिलाफ याचिका दायर की। इसके बाद फैसले पर रोक लगा दी गई। 2010: टोरंट को आगरा शहर की जिम्मेदारी दे दी गई। इस फैसले का भी विरोध हुआ, आंदोलन हुआ लेकिन सरकार अपने फैसले पर कायम रही। 2013: PPP मॉडल पर गाजियाबाद, वाराणसी, मेरठ और कानपुर में बिजली वितरण का फैसला लिया गया था। 2014 से यह व्यवस्था लागू होनी थी। विरोध में आंदोलन हुआ। उपभोक्ता परिषद ने नियामक आयोग में याचिका भी दायर की, जिसमें 2010 के आदेशों को न मानने का आरोप लगाया गया। मामला फंसता देख कॉरपोरेशन अध्यक्ष ने आयोग में जवाब दाखिल किया कि फिलहाल यह आंतरिक अध्ययन के अलावा कुछ नहीं है। 2020: पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम का निजीकरण करने के प्रयास हुए। इंजीनियरों ने काफी विरोध किया। आयोग में भी मामला पहुंचा। बाद में तत्कालीन ऊर्जा मंत्री और इंजीनियर संगठनों के बीच लिखित समझौता हुआ कि भविष्य में निजीकरण या फ्रेंचाइजी-करण का फैसला बिना उनकी सहमति के नहीं होगा। यूपी में ऐसे बदला बिजली का स्ट्रक्चर पूर्वांचल–दक्षिणांचल की बजाय 5 कंपनी बनाई जा रहीं ———————– ये खबर भी पढ़ें… छांगुर की PMO तक शिकायत, तब शुरू हुई कार्रवाई, जिगरी दोस्त से दुश्मन बना वसीउद्दीन, उजागर किए काले कारनामे बलरामपुर में गिरफ्तार किए गए धर्मांतरण के मास्टरमाइंड जलालुद्दीन शाह उर्फ छांगुर बाबा की प्रशासन में अच्छी पकड़ थी। इसलिए स्थानीय स्तर पर उसके खिलाफ शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं होती थी। लेकिन, जब उसका जिगरी दोस्त ठेकेदार वसीउद्दीन खान उर्फ बब्बू चौधरी ही दुश्मन बन गया तो एक-एक कर काले कारनामे उजागर होने लगे। पढ़िए पूरी खबर…