क्या ‘शाह के मित्र’ केशव की बढ़ेगी ताकत:4 दिन में 3 सियासी मुलाकात, प्रदेश और राष्ट्रीय अध्यक्ष के दावेदार हैं मौर्य

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य इन दिनों काफी सक्रिय हैं। उन्होंने 8 से 11 जुलाई के बीच गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात कर सियासी गलियारों में सरगर्मी पैदा कर दी है। चर्चा शुरू हो गई है कि केशव का कद बढ़ने जा रहा है। केशव को प्रदेश या केंद्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। वह भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय अध्यक्ष के दावेदार भी माने जा रहे हैं। हालांकि, केशव के करीबी इन्हें सामान्य मुलाकात बता रहे हैं। लेकिन, राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राजनेता और राजनीति में कुछ भी सामान्य नहीं होता। हर मुलाकात के पीछे निहितार्थ होते हैं। केशव की इन मुलाकातों के मायने क्या हैं? क्या केशव प्रदेश अध्यक्ष या राष्ट्रीय अध्यक्ष के दावेदार हैं? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… 15 जून को शाह ने कहा था- मेरे मित्र केशव…
गृहमंत्री अमित शाह ने 15 जून को सिपाहियों के नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम में डिप्टी सीएम को ‘मेरे मित्र केशव प्रसाद मौर्य’ कहकर संबोधित किया था। हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं था। शाह पहले भी केशव को ‘मित्र’ कहकर संबोधित कर चुके हैं। लेकिन, लोकसभा चुनाव के बाद से प्रदेश सरकार और केशव प्रसाद के बीच तकरार रही है। केशव संगठन को सरकार से बड़ा बताते रहे हैं। आउटसोर्सिंग भर्ती में आरक्षण का मुद्दा भी उठा चुके हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव के बाद सार्वजनिक मंच से केशव को ‘मित्र’ कहकर गृहमंत्री ने सरकार और संगठन को साफ संदेश दे दिया कि केशव की अहमियत कम नहीं है। चार दिन में तीन मुलाकात, संदेश क्या? 8 जुलाई को शाह से दिल्ली में मिले केशव
केशव प्रसाद मौर्य ने 8 जुलाई को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। केशव ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर मुलाकात की फोटो शेयर करते हुए लिखा- अमित शाह से मुलाकात कर 2027 में यूपी में 2017 दोहराने और तीसरी बार भाजपा की सरकार बनाने सहित विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा कर मार्गदर्शन प्राप्त किया। मुलाकात के मायने क्या?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं- 2017 विधानसभा चुनाव के दौरान केशव प्रसाद मौर्य ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे। विधानसभा चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे पर केशव की अगुवाई में ही लड़ा गया था। भाजपा को रिकॉर्ड 309 सीटों पर जीत मिली थी। हालांकि केशव ने 2022 में मिली जीत का जिक्र नहीं किया है। 2022 विधानसभा चुनाव सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लड़ा गया था। इससे सियासी मायने निकाले जा रहे हैं कि पार्टी केशव को संगठन में प्रदेश अध्यक्ष या राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने जा रही है। इसीलिए केशव ने 2027 में 2017 दोहराने की बात की है। 9 जुलाई को राजनाथ को शुभकामनाएं देने पहुंचे
केशव मौर्य ने गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के अगले ही दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से दिल्ली में मुलाकात की थी। केशव ने मुलाकात की तस्वीर ‘एक्स’ पर शेयर करते हुए जन्मदिन की पूर्व संध्या पर शुभकामनाएं देने की बात कही थी। मुलाकात के मायने क्या?
राजनीतिक क्षेत्र में चर्चा है कि यूपी में केशव के मुद्दे पर कोई भी निर्णय लेने से पहले पार्टी नेतृत्व राजनाथ सिंह की भी सैद्धांतिक सहमति अवश्य लेगा। केशव ने राजनाथ सिंह से शिष्टाचार मुलाकात के जरिए अपना पक्ष मजबूत किया है। 11 जुलाई को राज्यपाल का लिया था मार्गदर्शन
रक्षामंत्री से मुलाकात के बाद केशव मौर्य ने 11 जुलाई को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात की थी। मुलाकात के मायने क्या?
ऐसा माना जाता है कि यूपी सरकार और संगठन के मुद्दे पर आनंदीबेन की राय केंद्रीय नेतृत्व के लिए बड़ी अहमियत रखती है। यही वजह है, 5 साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी वह लगातार राज्यपाल का पद संभाल रही हैं। अब जानिए केशव के नाम पर चर्चा तेज क्यों? चुनाव हारने के बाद भी डिप्टी सीएम बनाया
केशव मौर्य 2022 में सिराथू से विधानसभा चुनाव हार गए थे। इसके बाद भी पार्टी नेतृत्व ने उन्हें डिप्टी सीएम बनाया था। जानकार मानते हैं, केशव को डिप्टी सीएम बनाने के लिए ही पुष्कर सिंह धामी को भी चुनाव हारने के बावजूद फिर से उत्तराखंड में सीएम बनाया गया था। विधान परिषद में नेता सदन का पद भी दिया
सीएम योगी ने जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को विधान परिषद में नेता सदन बनाया था। लेकिन, कुछ दिन बाद ही केंद्रीय नेतृत्व ने दखल देकर केशव को परिषद में नेता सदन बनाया। इसके जरिए पार्टी नेतृत्व ने संदेश दिया था कि संगठन के लिए सीएम योगी और केशव समकक्ष हैं। विधानसभा में सीएम योगी नेता सदन रहेंगे, तो विधान परिषद में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य। वोट बैंक का गुणा-गणित मौर्य, कुर्मी, निषाद और राजभर छिटक गया
विधानसभा चुनाव- 2022 से लेकर लोकसभा चुनाव परिणाम के आकलन से साफ हुआ कि प्रदेश में मौर्य, कुर्मी, निषाद और राजभर वोट बैंक भाजपा से छिटककर कर सपा और कांग्रेस में गया है। 2022 में रायबरेली की मौर्य बहुल ऊंचाहार सीट पर भाजपा के प्रदेश महामंत्री अमरपाल मौर्य चुनाव हार गए। सीट पर मौर्य समाज का वोट बसपा की अंजलि मौर्य को मिला था। आंवला से सपा के नीरज मौर्य महज एक दिन की चुनावी तैयारी में सांसद चुन लिए गए। सुल्तानपुर में सपा के रामभुआल निषाद ने भाजपा की दिग्गज नेत्री मेनका गांधी को चुनाव हराया। संतकबीर नगर में सपा के लक्ष्मीकांत निषाद ने निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को चुनाव हराया था। सलेमपुर में सपा के उमाशंकर राजभर ने भाजपा के रवींद्र कुशवाहा को चुनाव हराया था। फतेहपुर में सपा के नरेश उत्तम पटेल ने भाजपा की साध्वी निरंजन ज्योति, अंबेडकर नगर में सपा के लालजी वर्मा ने भाजपा को रितेश पांडेय को हराया था। यही वजह है कि पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व अब मौर्य, राजभर, निषाद या कुर्मी समाज से ही प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर मंथन कर रहा है। मौर्य समाज को नेतृत्व देने से मौर्य, सैनी, शाक्य, कुशवाह समाज भी साधे जा सकते हैं। अब जानिए केशव की राह में बाधा क्या? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीएम योगी और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य भाजपा में ही एक दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। केशव शुरुआत से कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि पार्टी के अधिकांश विधायक, पदाधिकारी और कार्यकर्ता केशव से ही दुख-सुख साझा करते हैं। मौजूदा माहौल में जिस तरह अफसरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच तकरार चल रही है। ऐसे में केशव निश्चित तौर पर कार्यकर्ताओं का पक्ष लेंगे। इससे सरकार और संगठन के बीच तकरार बढ़ेगी। पंचायत और विधानसभा चुनाव- 2027 के मद्देनजर सरकार और संगठन के बीच बेहतर संवाद और समन्वय भी जरूरी है। लिहाजा, पार्टी नेतृत्व सरकार और संगठन में रोज-रोज के झगड़े से बचने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को संगठन की कमान सौंप सकता है, जो सरकार के आगे समर्पण किए बिना बेहतर तालमेल बना सके। भाजपा कसौटी पर निर्णय करेगी
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक आनंद राय का कहना है कि केशव यूपी के महत्वपूर्ण नेता हैं। ओबीसी के प्रमुख नेता हैं, जो अखिलेश यादव के पीडीए पर सीधे हमलावर रहते हैं। जहां तक मुलाकात का सिलसिला है, केशव और गृहमंत्री की मुलाकात होती रहती है। यह संगठन का अंदरूनी विषय है। कई बार माहौल जानने के लिए भी राजनीतिक शिगूफे छोड़े जाते हैं। भाजपा कसौटी पर फैसला करेगी। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्रनाथ भट्‌ट का कहना है- भाजपा ने मध्यप्रदेश के सीएम की सहमति से वहां प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। यही काम यूपी में क्यों नहीं हो रहा? सभी राज्यों में सीएम की सहमति से प्रदेश अध्यक्ष बन रहे हैं। तब यूपी में योगी की सहमति से प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनना सत्ता-संघर्ष का संकेत दे रहा है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति एक दूसरे से जुड़े हैं। हालांकि आने वाला समय ही बताएगा कि गृहमंत्री के मित्र केशव की सियासी ताकत कितनी बढ़ती है। ———————- ये खबर भी पढ़ें… यूपी में कुछ साल और नहीं होगी टीचर की भर्ती, 6 साल से वैकेंसी नहीं; हर साल 4.5 लाख बीएड-डीएलएड अभ्यर्थी पास यूपी में कक्षा- 8 तक के सरकारी स्कूलों के लिए 6 साल से सहायक अध्यापक की भर्ती नहीं निकली है। दूसरी ओर, सरकार 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को मर्ज कर रही है। सरकार का यह कदम शिक्षा के सुधार के लिए भले हो, लेकिन टीचर की नौकरी की चाह रखने वाले युवाओं के लिए सपना टूटने जैसा है। पढ़ें पूरी खबर