क्या पति को भी मिल सकता है गुजारा भत्ता?:यूपी की PCS अफसर ज्योति मौर्या केस में पति ने किया दावा, यह कितना मजबूत?

यूपी की PCS अफसर ज्योति मौर्या के सफाईकर्मी पति आलोक मौर्या ने गुजारा भत्ता मांगा है। आलोक ने इसके लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका पर हाईकोर्ट ने ज्योति मौर्या को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई 8 अगस्त को होगी। भारतीय समाज में पत्नी को गुजारा भत्ता मिलने की बात चलन में है। लेकिन, आलोक मौर्या की अपील ने नई बहस छेड़ दी है। क्या पुरुष को भी पत्नी से गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार है? कौन-कौन से एक्ट में इसका प्रावधान है? नियम और कानून क्या कहते हैं ? सारे सवालों के जवाब भास्कर एक्सप्लेनर में पढ़िए… सवाल-1: PCS अफसर ज्योति मौर्या से गुजारा भत्ता मांगने का मामला क्या है? जवाब: 12 जुलाई को PCS अफसर ज्योति मौर्या के सफाईकर्मी पति आलोक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कहा- मेरी पत्नी PCS अफसर है। मुझसे कहीं अधिक कमाती है, जबकि मेरी आमदनी बेहद कम है। मुझे आजीविका चलाने में दिक्कत हो रही है। इसलिए वैवाहिक विवाद का केस जब तक चलता है, तब तक मुझे अफसर पत्नी से गुजारा भत्ता दिलाया जाए। इस याचिका पर हाईकोर्ट जस्टिस अरिंदम सिन्हा और डॉ. वाईके श्रीवास्तव की बेंच ने ज्योति मौर्या को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई 8 अगस्त को होगी। आलोक मौर्य ने इससे पहले गुजारा भत्ते की मांग को लेकर पारिवारिक अदालत में अर्जी दाखिल की थी। वहां से खारिज होने पर उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया। सवाल-2: क्या हिंदू विवाह अधिनियम में पति को भरण-पोषण पाने का जिक्र है? जवाब: हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार, पति को पत्नी से भरण-पोषण की मांग करने का कानूनी अधिकार है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा- 24 के अनुसार, अगर कोई पति अपना खर्च चलाने में असमर्थ है। वह पत्नी से कानूनी लड़ाई की फीस भी नहीं दे पा रहा है, तो उसे दोनों का भुगतान किया जा सकता है। धारा- 25 के तहत भी पति को गुजारा भत्ता और भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार है। अगर पत्नी कमाई में सक्षम है तो। यहां ‘भरण-पोषण’ शब्द पत्नी या पति की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया है। इसमें खाना-पीना, रहने की व्यवस्था, कपड़े, बीमारी आदि पर खर्च होने वाली रकम शामिल है। सवाल-3: गुजारा भत्ता तय करने का आधार क्या है? जवाब: दिल्ली हाईकोर्ट के एडवोकेट मनीष भदौरिया बताते हैं- देश में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पति या पत्नी गुजारा भत्ता मांग सकते हैं। जब कोर्ट में कोई तलाक का या अलग रहने का केस चल रहा होता है, ऐसी स्थिति में पति या पत्नी कोई भी गुजारा भत्ता मांग सकता है। इसमें लायबिलिटी देखी जाती है कि दोनों में से कौन अक्षम है? यानी पालन-पोषण करने लायक नहीं है। रजनीश बनाम नेहा के केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि पति-पत्नी दोनों की संपत्ति और दायित्व का हलफनामा लेकर गुजारा भत्ता तय किया जाता है। सवाल-4: रजनीश बनाम नेहा केस क्या है? जवाब: रजनीश बनाम नेहा 2021 का फेमस केस है। दरअसल, रजनीश और नेहा का मामला भारत में मेंटेनेंस के कानून को लेकर बहुत खास है। इस केस में पत्नी नेहा ने पति रजनीश से अपने और बच्चे के लिए खर्चे की मांग की थी। यह केस पहले फैमिली कोर्ट, फिर हाईकोर्ट और आखिर में सुप्रीम कोर्ट तक गया। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों से शपथपत्र दाखिल करने को कहा। इस केस पर 4 नवंबर, 2020 को फैसला सुनाया। लेकिन, इसके नियम और गाइडलाइन 2021 में लागू हुए। इसलिए इसे 2021 का रेफरेंस मिलता है। इस केस में कोर्ट ने कहा था कि मेंटेनेंस का हक सिर्फ पत्नी का नहीं, जरूरत पड़े तो पति भी मांग सकता है। सवाल-5: क्या देश में पहले कभी किसी पुरुष को गुजारा भत्ता मिला है? जवाब: हां, मध्यप्रदेश के इंदौर में फैमिली कोर्ट ने फरवरी, 2024 में पति के हक में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि पत्नी अपने बेरोजगार पति को हर महीने 5 हजार रुपए का गुजारा भत्ता देगी। दरअसल, पति ने पत्नी की वजह से पढ़ाई छूटने और बेरोजगार होने का हवाला देकर कोर्ट में केस दर्ज कराया था। मामला ये था कि साल- 2022 में लड़की ने लड़के को प्रपोज किया और शादी करने की इच्छा जताई। लड़का उस वक्त फर्स्ट ईयर में पढ़ रहा था। दोनों ने आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली। दोनों साथ रहने लगे। लेकिन, पति ने बताया कि शादी के एक महीने बाद से ही उसकी पत्नी लगातार उसे परेशान करने लगी। इसमें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना शामिल थी। उसने कई बार पत्नी को समझाया, लेकिन उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। परेशान होकर पति, पत्नी से परेशान होकर अपने माता-पिता के घर उज्जैन रहने लगा। इसके बाद पत्नी ने पति की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने उसे ढूंढ निकाला और पूछताछ की। इसमें पता चला कि पत्नी परेशान करती है, इसलिए वह उसके साथ नहीं रहना चाहता। मामला फैमिली कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने सारी दलीलों को सुनने के बाद पत्नी से कहा कि अब तुम्हें पति को भरण पोषण के लिए 5 हजार रुपए हर महीने देने होंगे। सवाल-6: कानून के जानकारों की नजर में आलोक का दावा कितना मजबूत? जवाब: इसे लेकर वकीलों की राय बंटी है। एडवोकेट मनीष भदौरिया बताते हैं- ज्योति मौर्या केस में पति का दावा बहुत हद तक खारिज होने के चांस हैं। क्योंकि, वो खुद नौकरी-पेशे वाला है। हालांकि इसमें लायबिलिटी देखी जाती कि किसके पास कितनी जिम्मेदारी है? उदाहरण के तौर पर समझें, तो ज्योति मौर्या एसडीएम हैं और पति आलोक सफाईकर्मी है। लेकिन, ज्योति के पास बच्चों की भी जिम्मेदारी है। आलोक के पास कोई जिम्मेदारी नहीं है। वो अपना भरण-पोषण करने लायक भी है। ऐसे में आलोक का केस हाईकोर्ट से भी खारिज हो सकता है। लखनऊ हाईकोर्ट के वकील नीरज श्रीवास्तव बताते हैं- भारत में गुजारा भत्ता (Maintenance) से संबंधित कानून पुरुषों और महिलाओं दोनों को कुछ स्थितियों में अधिकार देते हैं। लेकिन, आमतौर पर यह महिलाओं के पक्ष में लागू होता है। फिर भी, कुछ मामलों में पुरुष भी गुजारा भत्ता मांग सकते हैं। विशेष रूप से जब पति असहाय हो, बेरोजगार हो या आर्थिक रूप से निर्भर न हो और पत्नी कमाने वाली हो। हालांकि, अदालत केस-टू-केस आधार पर फैसला करती है कि पति को गुजारा भत्ता मिलना चाहिए या नहीं। आमतौर पर गुजारा भत्ता पति या पत्नी की मासिक आय का 25% तक हो सकता है। अगर भत्ता एक साथ दिया जा रहा हो तो कुल संपत्ति का एक तिहाई या एक 5वां हिस्सा हो सकता है। हालांकि, यह राशि केस-टू-केस बदल भी सकती है। आखिर में जानिए ज्योति और आलोक के बारे में
आलोक मौर्या आजमगढ़ जनपद का रहने वाला है। ज्योति वाराणसी की हैं। दोनों की शादी करीब 15 साल पहले 2010 में हुई थी। इसके पहले 2009 में आलोक का चयन पंचायती राज विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में हो गया था। आलोक का कहना है कि शादी के बाद उसने ज्योति को पढ़ाया-लिखाया। प्रयागराज में कोचिंग कराई। 2015 में ज्योति का चयन UP-PCS में हो गया। 2015 में ही जुड़वां बच्चियां हुईं। 2020 तक सब कुछ ठीक चला। पति का आरोप है कि 2020 में ज्योति की जान-पहचान जिला कमांडेंट होमगार्ड मनीष दुबे से हुई। उसके बाद से कलह शुरू हो गई। आलोक ने ज्योति पर गंभीर आरोप लगाए थे। —————————– ये खबर भी पढ़ें… यूपी में कुछ साल और नहीं होगी टीचर की भर्ती, 6 साल से वैकेंसी नहीं; हर साल 4.5 लाख बीएड-डीएलएड अभ्यर्थी पास यूपी में कक्षा- 8 तक के सरकारी स्कूलों के लिए 6 साल से सहायक अध्यापक की भर्ती नहीं निकली है। दूसरी ओर, सरकार 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को मर्ज कर रही है। सरकार का यह कदम शिक्षा के सुधार के लिए भले हो, लेकिन टीचर की नौकरी की चाह रखने वाले युवाओं के लिए सपना टूटने जैसा है। सरकार छात्र-शिक्षक औसत के अनुसार पर्याप्त शिक्षक होने के तर्क पर कायम रही, तो प्रदेश में आगामी कुछ और साल तक शिक्षकों की भर्ती नहीं होगी। सरकार की मर्जर नीति क्या है? इसके पीछे मकसद क्या है? सरकार का दावा क्या है? शिक्षक नेता क्या कहते हैं? पढ़िए पूरी खबर…