60 साल की महिलाएं कांवड़ लेकर 120 KM पैदल चलीं:पति-बच्चे भी साथ; महिला का हाथ टूटा, फिर भी कांवड़ उठाकर चल रही

प्रयागराज की ममता निषाद कांवड़ लेकर 120 किलोमीटर पैदल चलीं। सुल्तानगंज से देवघर गईं। इसे पूरा करने में 6 दिन लग गए। इसके बाद वाराणसी में काशी विश्वनाथ के दर्शन करने आईं। ‘दैनिक भास्कर’ के माइक पर अपनी यात्रा के बारे में बताया। भगवान भोलेनाथ से आपने क्या मांगा? इस सवाल के जवाब से ममता भावुक हो गईं। आंखों में आंसू भर गए। मुंह से शब्द नहीं निकला और हाथ जोड़ लिए। भगवान शिव से अथाह प्रेम के मामले में ममता अकेली नहीं हैं। सैकड़ों महिलाएं कांवड़ लेकर घर से निकली हैं। सबके मन में कोई न कोई मन्नत है। लेकिन जो एक चीज कॉमन है, वह ये कि हर कोई चाहता है कि उसके घर में शांति हो। पहले के मुकाबले महिला कांवड़ियों की संख्या भी बढ़ी है। पुरुष कांवड़िए अब अपनी पत्नियों को भी साथ लेकर कांवड़ यात्रा पर जा रहे। कई तो पूरे परिवार के साथ कांवड़ पर निकले हैं। दैनिक भास्कर की टीम को वाराणसी में ऐसे ही कई परिवार मिले। आइए उनके बारे में जानते हैं। पति के साथ 120 किलोमीटर पैदल चलने का संकल्प वाराणसी इस वक्त भगवा रंग में रंगा हुआ है। हर तरफ बोल-बम, हर-हर महादेव का उद्घोष करते भगवा वस्त्र पहने लोग दिखाई देते हैं। यह क्रम पूरे सावन तक चलना है। इस बार जो एक बदलाव नजर आया वह ये कि पुरुषों के साथ महिलाएं भी कदम-कदम मिलाकर कंधे पर कांवड़ रखकर पहुंच रही हैं। काशी में हमारी मुलाकात ऐसे ही एक ग्रुप से हुई। यह ग्रुप संत कबीरनगर जिले से आया है। इस ग्रुप में कुल 15 लोग हैं, इसमें 10 महिलाएं हैं, बाकी 5 पुरुष हैं। हमें पति के साथ तीसरी बार झारखंड के देवघर जल चढ़ाने जा रही शशिकला मिलीं। वह कहती हैं, हम तीसरी बार कांवड़ लेकर जा रहे हैं। सबसे पहले हम काशी आते हैं और यहां बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ाने के बाद बिहार के सुल्तानगंज जाते हैं। वहां से जल भरते हैं और फिर 140 किलोमीटर पैदल चलकर झारखंड के देवघर जाते हैं। इसके बाद हम वासुकीनाथ जाएंगे। इन सब में हमें 5-6 दिन लग जाएंगे। हमने शशिकला से पूछा कि क्या कोई मान्यता है? वह कहती हैं, ‘हमारे जीवन में बहुत दुख था। हमारा 5 साल का बेटा बीमार हुआ और फिर उसकी मौत हो गई। इसके बाद हमने सबकुछ अच्छा होने पर कांवड़ ले जाने की मन्नत मांगी। अब सही हो गया तो कांवड़ लेकर जा रही हूं।’ शशिकला के पति फूलचंद कहते हैं, धर्म यही कहता है कि जहां भी आप दर्शन करने जाओ, पत्नी को साथ लेकर जाओ। इसलिए हम पति-पत्नी साथ निकले हैं। 60 साल की उम्र, 120 किमी चलने का जज्बा संत कबीरनगर जिले से आए इस ग्रुप के कुबेरचंद 15 साल से लगातार कांवड़ लेकर जा रहे हैं। वह कहते हैं, ऊपर वाले का आशीर्वाद है, इसलिए कभी थकावट नहीं लगती। पति-पत्नी साथ चले जाते हैं। हमारे ही जैसे लाखों लोग जा रहे हैं, उन्हें देखकर सबको ही साहस मिलता है। 60 साल की उमावती से हमने कहा कि आप तो बुजुर्ग हो गई हैं, चल पाएंगी? वह कहती हैं हम तो आराम से चले जाएंगे। पिछले साल भी गए थे। ग्रुप में करीब 60 साल की राजकला कहती हैं, हमारे पैर में थोड़ी-थोड़ी दिक्कत रहती है, लेकिन भोलेबाबा की कृपा से हम चले जाएंगे। पहले तो हम गाड़ी से जल चढ़ाने गए हैं, लेकिन अबकी बार पैदल जाना है और चले भी जाएंगे। एक हाथ खराब, दूसरे में बच्चा, फिर भी उठाई कांवड़ जौनपुर जिले से आशा अपने पति योगेंद्र और डेढ़ साल की बच्ची को लेकर जल लेने काशी पहुंचीं। आशा का पिछले सावन में एक्सीडेंट हो गया था। वह कहती हैं, बाइक से जा रहे थे, ट्रक ने टक्कर मारी, उस वक्त बहुत चोट लगी। हाथ तो पूरा खराब हो गया। उस वक्त ही कहा कि कुछ ठीक होगा तो कांवड़ लेकर जाएंगे। अब कांवड़ लेकर जा रही हूं। आशा के हाथ में डेढ़ साल की बच्ची अरुषि भी है। आशा कहती हैं, कभी हम उठा लेंगे तो कभी इनके पापा। बाकी कुछ दूर यह पैदल भी चल लेंगी। हमारी खुशी है, इसलिए हम कांवड़ लेकर बाबा को जल चढ़ाने जा रहे हैं। योगेंद्र कहते हैं, हम पहली बार आए हैं, ट्रक से एक्सीडेंट हुआ था तो बहुत बुरी स्थिति हो गई थी, तभी मन्नत मांग ली थी कि सही होने पर कांवड़ लेकर जाएंगे। परिवार में सबकुछ अच्छा रहे इसलिए कांवड़ यात्रा देवरिया से श्यामा वाराणसी पहुंची हैं। पहले यहां जल चढ़ाएंगी और फिर इसके बाद सुल्तानगंज से कांवड़ उठाकर देवघर जाएंगी। पति तारकेश्वर भी उनके साथ हैं। वह कहती हैं, पांचवी बार हम जा रहे हैं। सबकुछ बाबा की महिमा होती है। जो कुछ भगवान से कहना रहता है, उनके सामने कह देते हैं। जब भी मन्नत मांगी तो वह पूरा हो जाता है। परिवार में लड़की है, बहू है, वह लोग भी जो कुछ कहते हैं, वह सब अपने बाबा के सामने कह देते हैं। तारकेश्वर कहते हैं, पिछले 4 बार बच्चे और दामाद भी साथ गए थे। लेकिन इस बार वह लोग नहीं हैं, लेकिन हम पति-पत्नी जा रहे हैं। हम तो हनुमान जी के भक्त हैं, भगवान भोलेनाथ के भी, इसलिए अक्सर जाते रहते हैं। हम तो उनसे धन-दौलत नहीं मांगते, हमें नहीं चाहिए। हम तो कहते हैं कि जितना दिया है उसे ही सलामत रखना प्रभु। भोले बाबा सबको खुश रखें प्रयागराज के शंकरगढ़ से 55 साल की आशा और गीता भी अपने पति के साथ कांवड़ लेकर सुल्तानगंज (बिहार) से देवघर गई थीं। अब वापस काशी पहुंची हैं। गीता कहती हैं, हम पहली बार गए थे, बहुत थकान हो गई। हालांकि अच्छा लगा। इच्छा थी कि सबकुछ देखते जाएंगे, इसलिए कांवड़ उठा लिया। मन में है कि भगवान भोलेनाथ सब कामना पूरी करें। लड़के-बच्चे खुश रहें। बाकी बाबा मन की बात जानते हैं। अब अगली बार अगर बुलाएंगे तो आएंगे। आशा कहती हैं, इतना लंबा पैदल चलने में दिक्कत तो होगी ही। बाबा के दर्शन हो जाएं, बस इसीलिए आते हैं। बाकी हम भगवान से यही चाहते हैं कि परिवार में सबको खुश रखें। सबका कल्याण करें। यही बात कौशांबी जिले से अपने पति हंसराज पटेल के साथ आई अन्नू पटेल भी कहती हैं। बोलीं- काशी विश्वनाथ में जल चढ़ाकर बढ़िया लगा। भगवान सबकुछ जानते हैं, वह हमें खुश रखें, सबकुछ अच्छे से रहे, बाकी लोग भी खुश रहें, बस यही भगवान से कहा है। काशी में जल चढ़ाकर यात्रा पूरी करते हैं काशी में तीन तरह के कांवड़िए आ रहे हैं। पहला वो जो अलग-अलग जगहों से जल भरकर काशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक कर रहे हैं। दूसरे वो जो यहां आकर पहले काशी विश्वनाथ में जल चढ़ा रहे और इसके बाद कांवड़ लेकर अपने नजदीक के शिवालयों में जल चढ़ा रहे हैं। तीसरे वह लोग जो सुल्तानगंज से देवघर के लिए कांवड़ लेकर जाने वाले हैं या फिर वहां से वापस चले आए हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी में जल चढ़ाने के बाद उनकी यात्रा पूरी मानी जाती है। काशी में पंडित भरत दुबे से हमने पूछा कि महिलाओं की संख्या पहले के मुकाबले बढ़ी है, वह कहते हैं, लोगों में आस्था बढ़ती जा रही है, पहले परिवार के एक लोग जाते थे, लेकिन अब बदलाव हुआ है और पति अपनी पत्नियों को साथ लेकर कांवड़ यात्रा पर निकल रहे हैं। पहले महिलाएं घर पर ही पूजा-पाठ करती थीं, लेकिन अब वह बाहर निकल रही हैं। यह सनातन धर्म के लिए अच्छी बात है। ………… ये खबर भी पढ़ें… सांप ने 3 दिन में परिवार के 3 को काटा:मथुरा में अफवाह उड़ गई सांप बदला ले रहा है, कहां से शुरू हुई यह कहानी यूपी के मथुरा में सांप ने 3 दिन में एक परिवार के 3 लोगों को काट लिया। इसमें एक युवक की मौत हो गई, जबकि 2 लोग हॉस्पिटल में एडमिट हैं। 10 दिन से पूरा परिवार दहशत में है। पूरी रात बैठे-बैठे गुजर रही है। लोग दिन में घर से निकलते हैं। अंधेरा होने से पहले वापस आ जाते हैं। गांव के लोग भी इस अंधविश्वास में आ गए और सांप से बचने के लिए पूजा-पाठ कराने लगे। सांप बदला लेता है, ये बात लंबे समय से लोग कहते आए हैं। ऐसी कई खबरें आ चुकी हैं, जिनमें ये कहा गया है कि एक ही सांप ने 5 या 7 बार डसा है। क्या सांप सच में इंसानों की तरह बदला ले सकते हैं? सांप के बदले की कहानियां कहां से शुरू हुईं? कौन से ग्रंथ सांप या नागों के बदले का प्रमाण देते हैं? यूपी में कितने प्रकार के जहरीले सांप पाए जाते हैं? पढ़िए पूरी खबर…