जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का मंगलवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उन्होंने दोपहर 1.12 बजे अंतिम सांस ली। सत्यपाल मलिक यूपी के बागपत के रहने वाले थे। इसके साथ ही उनकी राजनीति का सफर भी यूपी से शुरू हुआ था। सत्यपाल मलिक पहली बार साल-1970 में मेरठ से छात्रसंघ का चुनाव लड़े और जीते। वह मेरठ यूनिवर्सिटी में 2 बार छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। सत्यपाल मलिक के निधन के बाद दैनिक भास्कर की टीम उनके पैतृक गांव हिसावदा पहुंची। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… गांव में बनी है सत्यपाल मलिक की हवेली
हिसावदा गांव में सत्यपाल मलिक की बड़ी-सी पैतृक हवेली बनी है। उस पर नक्काशी की गई है। हवेली पर लाल रंग से पुताई भी की गई है। ये हवेली 250 साल पुरानी बताई जाती है। इसमें मलिक के रिश्तेदार रहते हैं। हवेली में 2 कमरे सत्यपाल मलिक के हिस्से के हैं। उन्हीं 2 कमरों में उनके रिश्तेदार रहते हैं। बाकी के सारे कमरे बंद हैं। गांव में उनके रिश्ते के भतीजे और दूसरे रिश्तेदार रहते हैं। सत्यपाल मलिक की मौत के बाद ये सभी लोग उनकी हवेली पर पहुंचे। हवेली पर शोकसभा की गई। हमने सत्यपाल मलिक को लेकर ग्रामीणों से बात की। हालांकि, इस समय गांव में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं बचा है, जो सत्यपाल मलिक से मिला हो। जो लोग हैं, वो भी थोड़ा-बहुत ही सत्यपाल मलिक के बारे में जानते हैं। लोगों का कहना है, वो 2-3 बार ही गांव आए हैं। तब भी बस जरा देर की मुलाकात ही हुई। वो बहुत देर गांव में नहीं रुकते थे। अपनी हवेली पर जरूर जाते थे। चचेरे भाई बोले- उन्होंने गांव में काफी विकास कार्य किए थे
सत्यपाल मलिक के चचेरे भाई सतवीर मलिक ने बताया- उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में ही होगा। सत्यपाल का स्वभाव बहुत अच्छा था। वह गांव को लेकर काफी अच्छी सोच रखते थे। गांव के युवाओं को पढ़ाई के लिए जागरूक करते थे। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक किसानों की लड़ाई लड़ी। गांव में काफी विकास कार्य किए थे। वह किसानों के लिए हमेशा खड़े रहते थे। बुधवार को हम लोग हवेली पर शोकसभा करेंगे। भतीजे बोले- चाचा ने मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया
सत्यपाल मलिक के भतीजे मानवेंद्र मलिक ने बताया- चाचा के निधन से समाज और परिवार को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है। गांव को लेकर उनका बहुत लगाव था। वह कभी भी किसी से नहीं डरे, केंद्र सरकार से भी नहीं डरे। गांव की हवेली में उन्होंने जन्म लिया। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय से हासिल की। मलिक ने सिंघावली अहीर थाना क्षेत्र के सारी कस्बे में 8वीं तक की पढ़ाई की थी। उसके बाद ढिकौली गांव से उन्होंने कक्षा-12 तक की पढ़ाई की। फिर मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उन्होंने साल 1974 में बागपत से विधानसभा का चुनाव जीता था। चुनाव जीतने के बाद चाचा ने गांव छोड़ दिया था
भतीजे मनीष मलिक ने बताया- सत्यपाल मलिक मेरे चाचा लगते थे। साल- 1974 में चुनाव जीतने के बाद उन्होंने गांव छोड़ दिया था। दिल्ली जाकर रहने लगे थे। वह साल- 1986 में राज्यसभा सांसद बने। फिर 1989 में अलीगढ़ से लोकसभा सांसद बने। इनकी हवेली गांव में बनी है, वह 250 साल पुरानी बताई जाती है। लेकिन, आज तक हवेली में कोई समस्या नहीं आई है। —————————– यह खबर भी पढ़ें- राजकुमार सुसाइड मामले में रिवाल्वर किसकी?, पुलिस को अब तक नहीं पता, परिजन बोले- सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग पर शक लखनऊ में चकबंदी मिनिस्टीरियल संघ के अध्यक्ष राजकुमार सिंह की सुसाइड मामले में पुलिस अब तक यह नहीं पता कर सकी है कि मौके से मिली रिवाल्वर किसकी है। कलेक्ट्रेट के शस्त्र विभाग ने कंप्यूटर रिकॉर्ड खंगाले, लेकिन रिवाल्वर नंबर किसी लाइसेंस से नहीं मिला। यहां पढ़ें पूरी खबर
हिसावदा गांव में सत्यपाल मलिक की बड़ी-सी पैतृक हवेली बनी है। उस पर नक्काशी की गई है। हवेली पर लाल रंग से पुताई भी की गई है। ये हवेली 250 साल पुरानी बताई जाती है। इसमें मलिक के रिश्तेदार रहते हैं। हवेली में 2 कमरे सत्यपाल मलिक के हिस्से के हैं। उन्हीं 2 कमरों में उनके रिश्तेदार रहते हैं। बाकी के सारे कमरे बंद हैं। गांव में उनके रिश्ते के भतीजे और दूसरे रिश्तेदार रहते हैं। सत्यपाल मलिक की मौत के बाद ये सभी लोग उनकी हवेली पर पहुंचे। हवेली पर शोकसभा की गई। हमने सत्यपाल मलिक को लेकर ग्रामीणों से बात की। हालांकि, इस समय गांव में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं बचा है, जो सत्यपाल मलिक से मिला हो। जो लोग हैं, वो भी थोड़ा-बहुत ही सत्यपाल मलिक के बारे में जानते हैं। लोगों का कहना है, वो 2-3 बार ही गांव आए हैं। तब भी बस जरा देर की मुलाकात ही हुई। वो बहुत देर गांव में नहीं रुकते थे। अपनी हवेली पर जरूर जाते थे। चचेरे भाई बोले- उन्होंने गांव में काफी विकास कार्य किए थे
सत्यपाल मलिक के चचेरे भाई सतवीर मलिक ने बताया- उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में ही होगा। सत्यपाल का स्वभाव बहुत अच्छा था। वह गांव को लेकर काफी अच्छी सोच रखते थे। गांव के युवाओं को पढ़ाई के लिए जागरूक करते थे। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक किसानों की लड़ाई लड़ी। गांव में काफी विकास कार्य किए थे। वह किसानों के लिए हमेशा खड़े रहते थे। बुधवार को हम लोग हवेली पर शोकसभा करेंगे। भतीजे बोले- चाचा ने मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया
सत्यपाल मलिक के भतीजे मानवेंद्र मलिक ने बताया- चाचा के निधन से समाज और परिवार को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है। गांव को लेकर उनका बहुत लगाव था। वह कभी भी किसी से नहीं डरे, केंद्र सरकार से भी नहीं डरे। गांव की हवेली में उन्होंने जन्म लिया। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय से हासिल की। मलिक ने सिंघावली अहीर थाना क्षेत्र के सारी कस्बे में 8वीं तक की पढ़ाई की थी। उसके बाद ढिकौली गांव से उन्होंने कक्षा-12 तक की पढ़ाई की। फिर मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उन्होंने साल 1974 में बागपत से विधानसभा का चुनाव जीता था। चुनाव जीतने के बाद चाचा ने गांव छोड़ दिया था
भतीजे मनीष मलिक ने बताया- सत्यपाल मलिक मेरे चाचा लगते थे। साल- 1974 में चुनाव जीतने के बाद उन्होंने गांव छोड़ दिया था। दिल्ली जाकर रहने लगे थे। वह साल- 1986 में राज्यसभा सांसद बने। फिर 1989 में अलीगढ़ से लोकसभा सांसद बने। इनकी हवेली गांव में बनी है, वह 250 साल पुरानी बताई जाती है। लेकिन, आज तक हवेली में कोई समस्या नहीं आई है। —————————– यह खबर भी पढ़ें- राजकुमार सुसाइड मामले में रिवाल्वर किसकी?, पुलिस को अब तक नहीं पता, परिजन बोले- सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग पर शक लखनऊ में चकबंदी मिनिस्टीरियल संघ के अध्यक्ष राजकुमार सिंह की सुसाइड मामले में पुलिस अब तक यह नहीं पता कर सकी है कि मौके से मिली रिवाल्वर किसकी है। कलेक्ट्रेट के शस्त्र विभाग ने कंप्यूटर रिकॉर्ड खंगाले, लेकिन रिवाल्वर नंबर किसी लाइसेंस से नहीं मिला। यहां पढ़ें पूरी खबर