UP में 21 फीसदी दलित कितने बड़े गेमचेंजर?:सपा फिर संविधान को मुद्दा बनाएगी; कांग्रेस बाबू जगजीवन राम के सहारे साधेगी

‘मायावती ने दलितों का सिर्फ इस्तेमाल किया। फायदा उठाकर उसे छोड़ दिया। आज भी दलित और कमजोर तबका समाज के किनारे पड़ा है।’ – अजय राय, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस, डेट- 2 अप्रैल ‘अंबेडकर जयंती को हम गांव के स्तर पर मनाएंगे। संविधान पर जिस तरीके का संकट है, उस पर चर्चा करेंगे।’ – अखिलेश यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सपा, डेट- 3 अप्रैल इन दो बयानों से साफ है कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में 21% दलित वोटर कितने बड़े गेमचेंजर होंगे। पहले कांशीराम जयंती, अब जगजीवन राम और अम्बेडकर जयंती मनाकर कांग्रेस-सपा दलितों को साधने की तैयारी कर रही है। क्या कांग्रेस और सपा बसपा के वोट बैंक में सेंधमारी में कामयाब रहेगी? ये रिपोर्ट में पढ़िए… जगजीवन के सहारे कांग्रेस ने दलितों पर असर बनाया
बाबू जगजीवन राम देश के पहले दलित उप प्रधानमंत्री थे। जब वो रक्षा मंत्री थे, तब 1971 में भारत पाकिस्तान के युद्ध के बाद नए देश के तौर पर बांग्लादेश बना था। कृषि मंत्री रहते हुए हरित क्रांति लाई। उन्होंने आजादी के बाद सत्ता के शीर्ष तक पहुंचकर यह संदेश दिया कि दलित समाज भी मुख्यधारा की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। पड़ोसी राज्य बिहार से ताल्लुक रखने वाले जगजीवन राम का यूपी में भले ही प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं रहा, लेकिन कांग्रेस ने उनके नाम का इस्तेमाल कर कई दशक तक दलित वोटर्स पर एकाधिकार बनाकर रखा था। जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार के जरिए दलितों को संदेश
कांग्रेस कांशीराम जयंती के बाद अब 4 अप्रैल को जगजीवन राम की जयंती की पूर्व संध्या पर एक संगोष्ठी लखनऊ के पार्टी कार्यालय में करने जा रही है। इसमें उसने जगजीवन राम की बेटी और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को बुलाया है। साथ ही, दलित चिंतक और डीयू के प्रोफेसर रतनलाल को मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया है। कांग्रेस इन दोनों के जरिए दलितों को ये संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस के साथ ही दलितों का भला होगा। सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने दलित नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी है। उनके संवैधानिक हित कांग्रेस के साथ ही सुरक्षित रह सकते हैं। खुद यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने अपने कार्यकर्ताओं को ये संदेश भी दिया है कि वे दलित बस्तियों में ज्यादा से ज्यादा समय दें। उनके बीच जाकर लगातार काम करें और उनके हर मुद्दे पर साथ खड़े रहें। 120 सीटों पर 1 लाख से ज्यादा दलित वोट
वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं, यूपी में दलितों की लगभग 20 से 21% आबादी है। दलितों के लिए 84 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। 120 लगभग ऐसी सीटें हैं, जहां दलित वोटर्स 1 लाख से अधिक हैं। अब अंदाजा लगा सकते हैं कि दलित किसी भी राजनीतिक दल के लिए क्यों जरूरी हैं। 2012 के बाद जबसे मायावती कमजोर पड़ीं, दलितों के लिए कोई इतना बड़ा चेहरा नहीं रहा, जिसके साथ वो एकजुट रहें। 2014 में नरेंद्र मोदी की हवा में दलितों का एक बड़ा वोटबैंक भाजपा के साथ खड़ा हुआ। इसी का परिणाम रहा कि यूपी सहित कई राज्यों में भाजपा को बड़ी सफलता मिली। पिछले चुनाव के ट्रेंड कहते हैं कि दलित वोटर्स किसी भी राजनीतिक दल के साथ 10 साल तक बने रहते हैं, फिर और ज्यादा अपेक्षा के साथ किसी नए विकल्प की तलाश करने लगते हैं। बसपा रैली के बाद दलित मायावती की तरफ
9 अक्टूबर, 2025 की रैली के बाद दलित वोटबैंक एक बार फिर मायावती की ओर लौटता दिख रहा था। ऐसी चर्चाएं भी शुरू हो गईं थीं। जैसे ही ये चीज सामने आई तो दलित वोटर को साधने के लिए सपा-कांग्रेस भी जुट गई है। उनकी कोशिश दलित वोटर्स को मायावती की ओर जाने से रोकने की है। इसमें उन्हें आंशिक सफलता 2024 में मिल भी चुकी है। तब इस गठबंधन को यूपी में लगभग 43% वोट मिला था। इसमें बड़ा योगदान दलित वोटर्स का था। अब यही फायदा वे 2027 के विधानसभा में भी उठाना चाहते हैं। रतन मणि लाल इसे 2022 विधानसभा और लोकसभा 2024 के रिजल्ट के उदाहरण से और क्लीयर करते हैं। वे कहते हैं कि 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 399 सीटों पर अकेले लड़ी थी। तब उसे दो सीटें और 2.33% ही वोट मिला था। पर 2024 के लोकसभा में कांग्रेस आश्चर्यजनक रूप से 6 सीटें जीत गई और उसका वोट शेयर भी बढ़कर 9.46% पर पहुंच गया। इसी तरह सपा का वोट प्रतिशत भी 2022 की तुलना में 2% बढ़ा था। मायावती में जगजीवन की छवि भी दलितों ने देखी
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं- जगजीवन राम अकेले ऐसे दलित नेता थे, जो उप प्रधानमंत्री की बड़ी कुर्सी तक पहुंचे थे। दलित समाज ने मायावती में वो अक्श देखा था, लेकिन 2012 के बाद जैसे-जैसे वो कमजोर पड़ती गईं, दलित वोटर्स में छटपटाहट बढ़ने लगी। वे एक नए विकल्प की तलाश में हैं। यही कारण रहा कि चंद्रशेखर जैसे नए चेहरों का उभार देखने को मिला। कांग्रेस दलितों का पुराना घर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में जिस अक्रामक तरीके से राहुल गांधी ने प्रचार की शुरूआत की और ‘संविधान खतरे में है’ का नैरेटिव सेट किया, उसका फायदा सपा को भी मिला। बड़ी संख्या में कांग्रेस की वजह से दलित वोटर्स महागठबंधन के पक्ष में लामबंद हुए। कांशीराम जयंती हो या अब जगजीवन राम की जयंती मनाने की बात हो, इसका लोगों के माइंड पर असर पड़ता ही पड़ता है। दलितों की यूपी में 66 उप जातियां, 6 प्रभावी
उत्तर प्रदेश में दलितों की कुल आबादी 20.7% (लगभग 4.14 करोड़) है। इसमें 66 उप-जातियां हैं। इसमें 6 प्रमुख उप-जातियां कुल दलित आबादी का 87% हिस्सा रखती हैं। बाकी 60 उप-जातियां बहुत छोटी और बिखरी हुई हैं। दलितों में जाटव सबसे प्रभावशाली और एकजुट हैं। बसपा के ये कोर वोटर माने जाते हैं। गैर-जाटव दलित (पासी, कोरी, धोबी, खटिक, बाल्मिकी आदि) में बंटवारा ज्यादा है। BJP ने 2017-2024 में गैर-जाटव को साधकर अपनी वोट बैंक बढ़ाया था। 2024 लोकसभा में गैर-जाटव कुछ हद तक इंडिया गठबंधन की ओर गए। इससे भाजपा को जहां नुकसान हुआ, वहां गठबंधन 43 सीटों के साथ नंबर एक पर रही। प्रमुख दलित उप-जातियों का प्रतिशत …………….. ये पढ़ें – योगी सरकार पुलिस में 81 हजार पदों पर भर्ती निकालेगी:CM बोले- ये साल युवाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण, सभी भर्ती टाइम पर होंगी यूपी पुलिस में 81 हजार से अधिक पदों पर भर्ती निकाली जाएगी। इसका ऐलान खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। वे गुरुवार देर रात पुलिस विभाग के कामकाज की समीक्षा कर रहे थे। सीएम ने कहा- उत्तर प्रदेश पुलिस में शामिल होने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए 2026-27 बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है। इस एक वर्ष में यूपी पुलिस में 81 हजार से अधिक पदों पर भर्ती की तैयारी की जा रही है। पढ़िए पूरी खबर…