चंद्रशेखर से बदला लेने, राजनीति में उतरेंगी रोहिणी घावरी:लिखा- स्विट्जरलैंड-टू-सत्ता; वाल्मीकि समाज को एकजुट करने में जुटीं

कहते हैं- इश्क और जंग में सब जायज है। कुछ ऐसा ही आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद और उनकी पूर्व प्रेमिका रोहिणी घावरी के बीच चल रहा है। जिस चंद्रशेखर को कभी राजनीति में स्थापित करने के लिए रोहिणी ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था। आज वही घावरी चंद्रशेखर से बदला लेने के लिए खुद राजनीति में उतरने जा रही हैं। स्विट्जरलैंड-टू-सत्ता का रोडमैप बना चुकी रोहिणी अपने वाल्मीकि समाज को एकजुट करने में जुटी हैं। उनकी पहली परीक्षा यूपी विधानसभा- 2027 के चुनाव में होगी। तब रोहिणी सपा के साथ कदमताल करते हुए दिख सकती हैं। क्या है चंद्रशेखर से अदावत की वजह? रोहिणी ने राजनीति में कदम रखने के लिए क्या रोडमैप तैयार किया है? सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ उनकी क्या बात हुई? पढ़िए संडे बिग स्टोरी में… रोहिणी राजनीतिक रोडमैप का खाका पहले ही खींच चुकी… इंदौर की एक सफाईकर्मी की बेटी रोहिणी घावरी राज्य सरकार की स्कॉलरशिप से 6 साल पहले स्विट्जरलैंड पढ़ाई के लिए गई थीं। स्विट्जरलैंड में पीएचडी पूरी करने के साथ जनपावर फाउंडेशन भी चला रही थीं। 11 सितंबर को रोहिणी स्विट्जरलैंड छोड़ भारत लौट आईं। सबसे पहले पचकुईयां मंदिर मार्ग स्थित भगवान वाल्मीकि आश्रम पहुंची। वहां आशीर्वाद लिया। मतलब उन्होंने साफ संकेत दिया है कि वे अपने वाल्मीकि समाज काे एकजुट करने पूरे देश में अभियान चलाएंगी। इसकी शुरुआत देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश से होगी। रोहिणी ने अपने राजनीतिक लक्ष्य को साफ कर दिया है। उनका लक्ष्य अगले 5 साल में देश में वाल्मीकि समाज के पहले मुख्यमंत्री को बनाना है। उनका कहना है कि जिस समाज को वर्षों तक केवल साफ-सफाई के काम तक सीमित समझा गया, उसके व्यक्ति को सत्ता के शीर्ष पद पर बैठाना ही वास्तविक स्वतंत्रता होगी। रोहिणी ने कहा कि देश में सभी वर्ग के लोगों को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला, तो वाल्मीकि समाज को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? उन्होंने कहा कि वह अपने समाज के लोगों के भीतर राजनीतिक नेतृत्व और आत्मविश्वास पैदा करना चाहती हैं। रोहिणी के मुताबिक, उनका अगला लक्ष्य 5 साल के अंदर देश के किसी एक राज्य में वाल्मीकि समाज का सीएम बनाना है। रोहिणी के इस दावे पर वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम कहते हैं- सीएम बना पाएं या ना बना पाएं, लेकिन इसके जरिए रोहिणी घावरी ने वाल्मीकि समाज के अंदर राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगाने का प्रयास जरूर किया है। किसी समाज को राजनीतिक रूप से सक्रिय करने के लिए ये जरूरी भी है कि उसे बड़ा सपना दिखाया जाए। रोहिणी भी इसी दिशा में आगे बढ़ती दिख रही हैं। दिल्ली समेत 4 राज्यों में सक्रियता दिखाने की तैयारी में रोहिणी रोहिणी के लौटने पर दिल्ली में बड़े स्तर पर स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया गया। स्वागत कार्यक्रम में करणी सेना के अध्यक्ष सूरजपाल सिंह ‘अम्मू’ के साथ-साथ हिंदू नेता दक्ष चौधरी और अक्कू पंडित भी मौजूद थे। इसके बाद वे वाल्मीकि समाज के लोगों के साथ एक बैठक में शामिल हुईं। 12 सितंबर को रोहिणी हरियाणा के गुरुग्राम पहुंचीं। यहां भी वाल्मीकि समाज के लोगों के साथ संवाद किया। 13 सितंबर (आज) को वह देश के सबसे बड़े सूबे यूपी के मेरठ पहुंचेंगी। मेरठ उसी पश्चिमी यूपी का हिस्सा है, जहां उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चंद्रशेखर आजाद अपनी राजनीतिक जमीन को और मजबूत करने में जुटे हैं। 14 और 15 सितंबर को वह लखनऊ में रुकेंगी। इस दौरान वाल्मीकि समाज के लोगों के साथ भी उनका संवाद होगा। 16 सितंबर को वह इंदौर जाएंगी। मतलब, रोहिणी राजधानी दिल्ली, हरियाणा, यूपी और एमपी में अपने समाज के लोगों को संगठित करके आगे बढ़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रही हैं। राेहिणी का क्या है यूपी प्लान रोहिणी इन बैठकों में दलित समाज के अंदर हिस्सेदारी और सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाने की बात कह रही हैं। उनका खास फोकस वाल्मीकि समाज पर है। वह जाटव और वाल्मीकि समाज के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों को लेकर भी सवाल उठा रही हैं। उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21% है, जिसमें वाल्मीकि समाज की आबादी लगभग 3.19% है। लेकिन, सरकारी नौकरियों और राजनीति में वाल्मीकि समाज कहां खड़ा है? वाल्मीकि समाज को आज भी सिर्फ सफाईकर्मी के नजरिए से ही देखा जाता है। प्रदेश की करीब 21 विधानसभा सीटों पर वाल्मीकि मतदाता चुनावी समीकरणों में प्रभावी भूमिका निभाते हैं। इनमें आगरा कैंट, एत्मादपुर, जसराना, फिरोजाबाद, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, गाजियाबाद, लोनी, लखनऊ मध्य, लखनऊ उत्तर, लखनऊ पश्चिम, सीसामऊ, आर्यनगर, किदवई नगर, अलीगढ़, कोल और खैर समेत अन्य सीटों का उल्लेख किया गया है। रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज के प्रभाव वाली इन सीटों पर अधिक सक्रिय होंगी। इन 21 सीटों में अधिकतर पश्चिमी यूपी की है। यहां वह चंद्रशेखर के प्रभाव वाली सीटों पर भी सभा करने जाएंगी। वहां जाटव समाज के सामने चंद्रशेखर की असलियत खोलेंगी। अपने साथ हुए धोखे की कहानी साझा करेंगी। सपा के साथ दिख सकती हैं रोहिणी आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर के साथ लड़ाई में उन्हें सिर्फ अखिलेश यादव से मदद मिली। रोहिणी के मुताबिक, अखिलेश यादव ने उनका दर्द सुना और उनकी लड़ाई में सहयोग की बात कही। रोहिणी लखनऊ प्रवास के दौरान अखिलेश से मिलेंगी। इस दौरान उनकी राजनीतिक रोडमैप को लेकर भी चर्चा होने की बात कही जा रही है। क्या रोहिणी सपा में शामिल होंगी? इस पर रोहिणी ने तस्वीर साफ कर दी है। उन्होंने बताया कि उनका मकसद सफाई कर्मचारियों के हक की लड़ाई और वाल्मीकि समाज को उनकी राजनीतिक पहचान दिलाना है। इसके लिए जो भी करना पड़ेगा, वो करेंगी। कयास तो ये भी लगाए जा रहे हैं कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव को लगा तो वे रोहिणी को किसी सीट से चेहरा भी बना सकते हैं। वाल्मीकि समाज के साथ सवर्ण समाज को भी जोड़ने का प्लान रोहिणी का अभियान केवल वाल्मीकि समाज को जोड़ने तक सीमित नहीं दिख रहा। उन्होंने जाटव समाज को भी खुली चुनौती दी है। कहा कि अब वह देखेंगी कि कितने जाटव उनकी इस मुहिम में साथ आते हैं। साथ ही उन्होंने सर्वसमाज को अपने साथ जोड़ने की बात कही है। रोहिणी ने कहा कि वाल्मीकि समाज किसी की आस्था या हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं करता। रोहिणी का दावा है कि उनका समाज हमेशा देश को जोड़ने की कोशिश करता रहा है। भारत लौटने के बाद रोहिणी का जिस तरीके से करणी सेना और वाल्मीकि समाज के लोगों ने स्वागत किया, उसे भी उनके संभावित राजनीतिक विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक तौर पर यह संकेत महत्वपूर्ण है कि रोहिणी खुद को सिर्फ दलित राजनीति तक सीमित रखने के बजाय वाल्मीकि समाज के साथ सर्वसमाज का समर्थन जुटाने की कोशिश करती दिख रही हैं। इसी क्रम में उनके आर्थिक आधार पर आरक्षण के समर्थन को भी देखा जा रहा है। इस तरह वह एससी-एसटी के दुरुपयोग पर भी खुलकर अपनी राय रख चुकी हैं। वह कहती हैं कि जातिवाद समाज को तोड़ता है और न्याय ही समाज को जोड़ता है। SC/ST एक्ट के साथ-साथ दलित समाज के भीतर जातिगत भेदभाव और अन्याय को लेकर भी अलग कानून की जरूरत की बात कही है। वहीं, आर्थिक आधार पर सवर्णों को भी आरक्षण की हिमायत कर चुकी हैं। चंद्रशेखर से क्या है रोहिणी घावरी की अदावत रोहिणी ने चंद्रशेखर पर आरोप लगाया कि शादीशुदा और एक बच्चे के पिता होने के बावजूद उन्होंने उनसे झूठ बोला और शादी का भरोसा दिया। उनका दावा है कि चंद्रशेखर ने उनका शारीरिक और मानसिक शोषण किया। रोहिणी के मुताबिक, उन्होंने चंद्रशेखर को राजनीति में स्थापित करने के लिए आर्थिक मदद भी की थी। दोनों ने दलित समाज को सम्मान दिलाने का सपना साथ देखा था। लेकिन, सांसद बनने के बाद उन्हें चंद्रशेखर की ‘असलियत’ का पता चला। रोहिणी का यह भी दावा है कि बाद में उन्हें पता चला कि उनकी तरह कई अन्य लड़कियों के साथ भी चंद्रशेखर ने इसी तरह व्यवहार किया। उन्होंने महिला आयोग और दिल्ली के रोहिणी थाने में शिकायत देने की बात कही है। उनका आरोप है कि इसके बावजूद FIR दर्ज नहीं हुई। रोहिणी ने अपने अभियान को जातिगत न्याय के सवाल से जोड़ दिया है। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा कि एक वाल्मीकि परिवार की लड़की के मामले में आरोपी के जाटव होने के कारण FIR दर्ज हुई। कांग्रेस, आप समेत कई नेता उसके साथ खड़े हुए, जबकि मेरे साथ कोई खड़ा नहीं हुआ। क्योंकि, पीड़िता वाल्मीकि समाज की बेटी थी और आरोपी जाटव समाज का बेटा चंद्रशेखर है। भारत लौटने से पहले ही रोहिणी ने सोशल मीडिया पर लिख चुकी हैं कि अगर उन पर कोई हमला होता है तो सीधे तौर पर चंद्रशेखर और भीम आर्मी जिम्मेदार होगी। मैं अलग-अलग राज्यों में जाकर सामाजिक बैठकें करूंगी। ——————————— ये यूपी एक्सप्लेनर पढ़ें – मुख्तार के रिश्तेदारों की संपत्ति हाईकोर्ट ने क्यों रिलीज की, क्या कमजोर है यूपी का गैंगस्टर एक्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट के तहत कुर्क मुख्तार अंसारी के रिश्तेदारों की संपत्तियां रिलीज कर दीं। एक अन्य मामले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट को ‘स्टिलबॉर्न’ (पैदा होते ही मर जाना) यानी ‘मरा हुआ कानून’ बताया। महाराष्ट्र के ‘मकोका’ और गुजरात के ‘गुजसीटॉक’ कानूनों से तुलना करते हुए गैंगस्टर एक्ट की कानूनी खामियों की ओर इशारा किया। पढ़िए पूरी खबर…