गलत इलाज से मरीज की मौत हो जाती है… अस्पताल में रेप और मर्डर भी हो जाते हैं। स्वास्थ्य विभाग के अफसर इनको सील कर देते हैं। लेकिन, कुछ दिनों बाद पैसे लेकर ये ‘दागदार’ अस्पताल नए नाम से फिर शुरू हो जाते हैं। ऐसा करके स्वास्थ्य विभाग के अफसर मरीजों की जिंदगी का सौदा कर रहे हैं। दैनिक भास्कर की टीम ने इस खेल को एक्सपोज करने के लिए उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर और उन्नाव में इनवेस्टिगेशन किया। हमारे रिपोर्टर अस्पताल मालिक बनकर अफसरों तक पहुंचे। जिम्मेदार अफसर और क्लर्क ने रिश्वत लेकर बंद अस्पतालों को दोबारा खोलने की डील की। उन्होंने सील अस्पतालों को क्लीनचिट देने का रास्ता भी बताया… भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम को उन्नाव के उत्तम हॉस्पिटल का इनपुट मिला। हॉस्पिटल के संचालक देवकांत उत्तम पर 22 साल की छात्रा के अपहरण, गर्भपात और हत्या का आरोप था। जुलाई, 2026 में जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने उनके हॉस्पिटल को सील कर दिया था। सील हॉस्पिटल को नाम बदलकर दोबारा चलाने की डील के लिए भास्कर का अंडरकवर रिपोर्टर अस्पताल के डॉक्यूमेंट लेकर एडिशनल चीफ मेडिकल ऑफिसर (ACMO) डॉ. नरेंद्र से मिला। हॉस्पिटल संचालक बनकर पहुंचे रिपोर्टर ने क्लर्क से लेकर ACMO तक ने डील की। रिपोर्टर: एक हॉस्पिटल सील है, उसको चलाना चाहते हैं।
डॉ. नरेंद्र: क्या नाम है हॉस्पिटल का?
रिपोर्टर: उत्तम हॉस्पिटल…लीज के लिए बात हो गई है?
डॉ. नरेंद्र: किस नाम से चलाएंगे?
रिपोर्टर: नाम बदलकर चलाएंगे, आप जैसा बताएं।
डॉ. नरेंद्र: ठीक है, कागज पर लिखो कि क्या दोगे?
रिपोर्टर: कितना लिखें इस पर? रिपोर्टर: (कागज पर ढाई लाख रुपए लिखते हुए) सर…इतना ही यहां बताया गया था।
डॉ. नरेंद्र: नाम क्या रखोगे? रिपोर्टर: कुछ नाम सोचे हैं…ढाई लाख में हो जाएगा न…?
डॉ. नरेंद्र: देखते हैं…CMO से बात करते हैं। रिपोर्टर: सर, ढाई लाख से ज्यादा तो नहीं करना होगा?
डॉ. नरेंद्र: मैं बात कर लूंगा। थोड़ा बढ़ाना होगा। रिपोर्टर: कितना बढ़ाना पड़ेगा?
डॉ. नरेंद्र: कम से कम एक तो करना ही पड़ेगा। रिपोर्टर: यानी साढ़े तीन लाख रुपए में हो जाएगा?
डॉ. नरेंद्र: जी, नाम लिखकर दीजिए। रिपोर्टर: शगुन या RPM सोचा है।
डॉ. नरेंद्र: CMO साहब बॉम्बे गए हैं। फोन पर ये सब बात नहीं होगी। आएंगे, तो काम हो जाएगा। वैसे आप हॉस्पिटल संचालक के क्या लगते हैं? रिपोर्टर: मैं उनका कुछ नहीं लगता। किराए पर सामान समेत पूरा हॉस्पिटल ले रहा हूं। सर, देखिएगा कि सब ठीक से हो जाए। दोबारा हॉस्पिटल सील न हो।
डॉ. नरेंद्र: जितना बता रहे हैं, बस उतना कीजिए। आप मैनेज कीजिएगा, तो सब सही होगा। उन्नाव के ACMO डॉ. नरेंद्र ने बातचीत में कहा कि लोकल लोगों को मैनेज करना होगा, जिससे कोई इस मामले में दखल न दे। पुराने रजिस्ट्रेशन पर अस्पताल चलाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि नया रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा। उन्होंने शिकायत करने वालों को पैसे देकर शांत कराने का तरीका भी बताया। इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमें लखनऊ के चिनहट स्थित IPS हॉस्पिटल का इनपुट मिला। मई, 2026 में 22 साल की महिला की गलत इलाज से मौत के बाद CMO ने हॉस्पिटल सील कर दिया था। सील हॉस्पिटल के डॉक्यूमेंट लेकर भास्कर रिपोर्टर लखनऊ स्थित CMO कार्यालय पहुंचे। वहां प्राइवेट अस्पतालों का जिम्मा संभाल रहे ACMO डॉ. अखंड प्रताप सिंह मिले। उन्होंने बिल्डिंग का नाम बदलकर हॉस्पिटल दोबारा खोलने की डील की। रिपोर्टर: एक हॉस्पिटल सील है, उसी को खोलना है।
डॉ. एपी सिंह: नया? रिपोर्टर: हां, उसी में कुछ नया जोड़कर चलाएंगे।
डॉ. एपी सिंह: आप क्या करते हैं? रिपोर्टर: मेरा दवा और प्रॉपर्टी का कारोबार है।
डॉ. एपी सिंह: अस्पताल का क्या नाम है? रिपोर्टर: IPS हॉस्पिटल।
डॉ. एपी सिंह: अरे यार…चिनहट वाला न? रिपोर्टर: हां…उसका नाम बदलकर ले रहे हैं।
डॉ. एपी सिंह: अरे…जगह तो वही रहेगी न? रिपोर्टर: कोई दिक्कत नहीं, आप रजिस्ट्रेशन करवा दीजिए।
डॉ. एपी सिंह: अरे यार, दिक्कत तो होगी न? देखिए…सील है, थोड़ी परेशानी तो है। रिपोर्टर: नाम पूरी तरह बदल देंगे।
डॉ. एपी सिंह: ठीक है….आप संजीव बाबू से मिल लीजिए। जाइए, मैं बोल रहा हूं। क्लर्क बोला- जिसकी पत्नी की मौत हुई, उससे समझौता कर लीजिए लखनऊ के ACMO डॉ. एपी सिंह ने बातचीत के बाद क्लर्क संजीव के पास भेज दिया। उन्होंने संजीव को फोन कर मामले की जानकारी भी दी। इन्वेस्टिगेशन टीम जब CMO कार्यालय के कमरा नंबर- 13 में पहुंची, तो वहां संजीव से मुलाकात हुई। संजीव ने सील हॉस्पिटल की बिल्डिंग में नए नाम से हॉस्पिटल खोलने की पूरी डील की। रिपोर्टर: डॉ. एपी सिंह सर ने फोन किया होगा आपको अभी।
संजीव: हां…बताइए, क्या काम है? रिपोर्टर: एक सील हॉस्पिटल है, उसका नाम बदलकर खोलना चाहते हैं।
संजीव: कौन-सा हॉस्पिटल है? रिपोर्टर: आईपीएस हॉस्पिटल।
संजीव: आईपीएस तो बंद है। रिपोर्टर: हां, उसके बगल में एक और बंद था, जो नाम बदलकर चल रहा है। रिपोर्टर: हम वो सब मैनेज कर लेंगे।
संजीव: तुरंत मत खोलिए। उसका वकील पीछे लगा है। अभी एक लेटर और आया हुआ है। रिपोर्टर: मैं वकील को मैनेज कर लूं, तो हो जाएगा?
संजीव: आप शिकायतकर्ता संजय यादव से समझौता कर लीजिए। रिपोर्टर: मैं कर लूंगा… उसकी चिंता आप छोड़ दीजिए।
संजीव: पहले आप मैनेज करिए, तब इसको करिए। रिपोर्टर: मैं लीज पर ले रहा हूं।
संजीव: आप सारे पेपर बनवा लीजिए, सब कुछ मैनेज कर लीजिए। आपका काम हो जाएगा। रिपोर्टर: 50 परसेंट पेपर बन गया है, बस आप यहां का मैनेज कर लीजिए।
संजीव: हां, आप मैनेज कर लीजिए, नहीं तो पेपर में निकालना शुरू कर देगा न…। एसीएमओ बोले- लीज का एग्रीमेंट बनवाइए क्लर्क संजीव से बातचीत के बाद रिपोर्टर फिर एसीएमओ डॉ. एपी सिंह के पास पहुंचा। डॉ. एपी सिंह ने लीज का एग्रीमेंट बनवाने को कहा। उन्होंने बताया कि सारा काम नए सिरे से होगा और नाम भी बदल जाएगा। आप अपने नाम से चलवाओ, उसका नाम नहीं आना चाहिए। जब रिपोर्टर ने खर्च के बारे में पूछा, तो डॉ. एपी सिंह ने कहा- रिपोर्टर: सर, बात हो गई। उन्होंने बताया है कि कम में ही करा देंगे।
डॉ. एपी सिंह: ठीक है, आप देख लीजिए। रिपोर्टर: तो मैं उन्हीं से डील कर लूं?
डॉ. एपी सिंह: हां, कर लीजिए। कोई दिक्कत नहीं। रिपोर्टर: लेकिन सर, मैं दो लाख रुपए से ज्यादा नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि उसका किराया भी ज्यादा है।
डॉ. एपी सिंह: कितना है? रिपोर्टर: डेढ़ लाख रुपए।
डॉ. एपी सिंह: लेकिन दिक्कत यही है कि वो सील है। रिपोर्टर: अरे सर, आप करा दीजिए, मैं देख लूंगा।
डॉ. एपी सिंह: ठीक है। रिपोर्टर: अपना नंबर दे दीजिए, वाट्सएप पर बात करेंगे।
डॉ. एपी सिंह: लिखिए, 941545XXXX। इस पर बात हो जाएगी।
रिपोर्टर: ठीक है सर, वाट्सएप कॉल करेंगे। क्लर्क ने पैसों की डील की एसीएमओ डॉ. एपी सिंह से बातचीत के बाद संजीव फिर रिपोर्टर से मिला। रिपोर्टर ने बताया कि इसी काम के लिए पहले एक एजेंट ने 4 लाख रुपए मांगे थे। इस पर संजीव ने कहा कि वह इससे काफी कम में काम करा देगा। उसने रिपोर्टर से लीज के पेपर बनवाने को कहा। रिपोर्टर: मैं बाहर का काम खुद देख लूंगा, आप यहां का बताइए।
संजीव: अब आप किसी से बात मत करिए। डॉक्यूमेंट्स लेकर आइए, तब मैं बताता हूं। रिपोर्टर: थोड़ा आप बता देते, तो माइंड सेट कर लेते।
संजीव: हम आपके साथ रहेंगे, ज्यादा मामला नहीं फंसेगा।
संजीव: कॉल मत करिएगा बॉस…. समय बहुत खराब है। रिपोर्टर: हां, ठीक है। मिलकर बात कर लेंगे।
रिपोर्टर: हम लीज के पेपर तैयार कर ले रहे हैं।
संजीव: 4 लाख बोला था, उससे 50% कम में करा देंगे। वाट्सएप कॉल पर ACMO ने पैसे के लिए ऑफिस बुलाया एक दिन बाद रिपोर्टर ने ACMO डॉ. एपी सिंह को वाट्सऐप कॉल कर कहा- सर, संजीव बाबू को पैसे देने हैं। मेरी उनसे पूरी बात हो गई है। आपके कहने पर वह 2 लाख रुपए में तैयार हो गए हैं। इस पर ACMO डॉ. एपी सिंह ने कहा कि पैसे संजीव को देने के बजाय रिपोर्टर ऑफिस आकर उनसे मिले। कानपुर में चंद्रा हॉस्पिटल, अब वेदा के नाम से चल रहा कानपुर के शिवली रोड पर पहले चंद्रा हॉस्पिटल चलता था। इसे अब वेदा हॉस्पिटल के नाम से संचालित किया जा रहा है। इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमें 31 जनवरी, 2024 को जारी CMO कानपुर का एक नोटिस मिला, जिसमें हॉस्पिटल को सील करने के निर्देश दिए गए थे। इनवेस्टिगेशन में सामने आया कि सील होने के बावजूद हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था। 10 जून, 2025 को रसूलाबाद के रहने वाले रामदास ने हॉस्पिटल और उसके संचालकों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया कि सील हॉस्पिटल में गलत इलाज के कारण उनके बेटे की मौत हो गई। आरोप यह भी था कि बिना स्वास्थ्य विभाग की अनुमति के ICU और OT चलाए जा रहे थे। इस मामले में SC/ST एक्ट और BNS की धाराओं 351(3), 352, 115(2) और 106(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। डॉक्टर मोहित, शिवम और मुकेश को आरोपी बनाया गया। मामला सामने आने के बाद हॉस्पिटल एक बार फिर बंद हो गया। हालांकि, इसके करीब एक महीने बाद उसी बिल्डिंग में चंद्रा हॉस्पिटल की जगह वेदा हॉस्पिटल शुरू हो गया। मुकेश तक पहुंचने के लिए रिपोर्टर पथरी के ऑपरेशन का एस्टीमेट लेने के बहाने हॉस्पिटल पहुंचा। रिपोर्टर: आप ही देखेंगे या कोई और देखेगा?
मुकेश: नहीं, हम नहीं देखेंगे। यूरो के डॉक्टर देखेंगे। ये हमारा हॉस्पिटल है। रिपोर्टर: पहले तो यह चंद्रा के नाम से था?
मुकेश: हां, पहले चंद्रा के नाम से था, लेकिन हमारी आयुष्मान की फाइल तीन बार रिजेक्ट हो गई। तब दोबारा नए नाम से अप्लाई करना पड़ता है। इसी वजह से नाम बदल दिया गया है। रिपोर्टर: डिलीवरी का चार्ज क्या है?
मुकेश: अगर हमारे यहां कराते हैं, तो बहुत ही नॉर्मल चार्ज है। हमारे यहां सीजेरियन सिर्फ 14 हजार रुपए में हो जाता है। बाकी नॉर्मल डिलीवरी तो 8 हजार रुपए में ही हो जाती है। रिपोर्टर: आप भी डॉक्टर हैं क्या?
मुकेश: हम भी डॉक्टर हैं, लेकिन हम प्लेन MBBS हैं। अस्पताल पर 2025 में FIR हुई थी यहां मुकेश के डॉक्टर होने के दावे पर सवाल उठता है। 2024 में अस्पताल को जारी नोटिस में आरोप लगाया गया था कि वहां योग्य डॉक्टर नहीं हैं। वहीं, 2025 में FIR में 3 आरोपियों के नाम थे, लेकिन डॉक्टर की उपाधि सिर्फ मोहित के नाम के आगे लिखी गई थी। शिवम और मुकेश के नाम के आगे डॉक्टर नहीं लिखा था। FIR केवल एक साल पुरानी है। मॉडर्न लाइफ हॉस्पिटल दो साल में तीन बार सील, 4 बार बदला नाम हमें इनपुट मिला कि कानपुर के कल्याणपुर में एक ऐसा हॉस्पिटल है, जिसे दो साल के अंदर तीन बार सील किया गया। चार बार नाम बदला गया। CMO कार्यालय से पता चला कि 2024 में इसी बिल्डिंग में न्यू लाइफ हॉस्पिटल चलता था। इसके संचालक नीरज और राजू राठौर थे। रजिस्ट्रेशन नहीं होने की वजह से हॉस्पिटल सील कर दिया गया। इसके बाद नाम बदलकर ग्रेस हॉस्पिटल कर दिया गया, जबकि संचालक राजू राठौर ही रहे। कुछ महीने चलने के बाद ग्रेस हॉस्पिटल भी सील हुआ, तो इसका नाम बदलकर KPS हॉस्पिटल कर दिया गया। इसके संचालक इम्तियाज अहमद और प्रिंस द्विवेदी थे। इम्तियाज अहमद पर इसी हॉस्पिटल की एक नर्स से रेप का आरोप लगा था। इसके बाद हॉस्पिटल सील हो गया था। अब इसका नाम बदलकर मॉडर्न लाइफ हॉस्पिटल कर दिया गया है। इस इनपुट के बाद भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम मॉडर्न लाइफ हॉस्पिटल पहुंची। यहां एपेंडिक्स के ऑपरेशन का एस्टीमेट जानने के लिए टीम ने खुद को डॉक्टर बताने वाले प्रदीप से बात की। रिपोर्टर: KPS हॉस्पिटल यही है?
रिसेप्शनिस्ट: (संचालक की तरफ देखते हुए) सर…
संचालक: किस संबंध में बात करनी है? रिपोर्टर: असल में, एक भैया ने पहले यहां पथरी का ऑपरेशन कराया था। अब अपेंडिक्स का ऑपरेशन कराना है। उन्होंने बताया था कि आसपास में यही हॉस्पिटल है। प्रिंस नाम के कोई भैया यहां मिले थे।
संचालक: अब हम चला रहे हैं। रिपोर्टर: अच्छा, प्रिंस भैया नहीं हैं अब यहां?
संचालक: प्रिंस हैं, लेकिन कभी-कभार आते हैं। यहां हम ही हैं, लेकिन प्रिंस आते रहते हैं। रिपोर्टर: ऑपरेशन का एस्टीमेट मिल जाएगा?
संचालक: हां…। इसके बाद संचालक हमें अंदर ले गया। संचालक: जिन्होंने भेजा है, वो कौन हैं?
रिपोर्टर: स्वरूपनगर में रहते हैं।
संचालक: अच्छा, उन्होंने यहां इलाज कराया है या वो कोई डॉक्टर हैं? रिपोर्टर: उन्होंने यहां इलाज कराया है। बताया था कि इसी बिल्डिंग में पहले आते रहते थे। उन्होंने बताया था कि यहां इलाज से ठीक हो जाते हैं।
संचालक: मरीज कितने साल के हैं? रिपोर्टर: 46 के आसपास हैं।
संचालक: ठीक है, पहले जांच हो जाएगी। मोटा-मोटा 20-22 हजार रुपए में हो जाएगी। ‘मौत की दुकानों’ पर ताला, सिर्फ कागजी दिखावा दैनिक भास्कर की पड़ताल में पता चला कि स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के लिए मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं है। मर्डर, रेप और मौतों के बाद सील हुई ‘मौत की दुकानों’ पर ताला लगाना केवल कागजी दिखावा बनकर रह गया है। जब रक्षक ही भक्षक बनकर सौदा करने लगें, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है। देखना होगा कि इस खुलासे के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या जांच का रटा-रटाया खेल आगे भी जारी रहेगा। —————————— यह खबर भी पढ़ें- पढ़ाई-खर्च के लिए छात्र अपना खून बेच रहे, यूपी में नीट का छात्र बोला- खून तो बनता रहेगा पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए छात्रों को अपना खून बेचना पड़ रहा है। गरीब परिवारों के इन बच्चों को नीट-एसएससी की महंगी कोचिंग, हॉस्टल-मेस की फीस भरनी होती है। दैनिक भास्कर के हिडन कैमरे पर ऐसे छात्रों ने अपनी बेबसी सुनाई। पढ़िए पूरी इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट…
डॉ. नरेंद्र: क्या नाम है हॉस्पिटल का?
रिपोर्टर: उत्तम हॉस्पिटल…लीज के लिए बात हो गई है?
डॉ. नरेंद्र: किस नाम से चलाएंगे?
रिपोर्टर: नाम बदलकर चलाएंगे, आप जैसा बताएं।
डॉ. नरेंद्र: ठीक है, कागज पर लिखो कि क्या दोगे?
रिपोर्टर: कितना लिखें इस पर? रिपोर्टर: (कागज पर ढाई लाख रुपए लिखते हुए) सर…इतना ही यहां बताया गया था।
डॉ. नरेंद्र: नाम क्या रखोगे? रिपोर्टर: कुछ नाम सोचे हैं…ढाई लाख में हो जाएगा न…?
डॉ. नरेंद्र: देखते हैं…CMO से बात करते हैं। रिपोर्टर: सर, ढाई लाख से ज्यादा तो नहीं करना होगा?
डॉ. नरेंद्र: मैं बात कर लूंगा। थोड़ा बढ़ाना होगा। रिपोर्टर: कितना बढ़ाना पड़ेगा?
डॉ. नरेंद्र: कम से कम एक तो करना ही पड़ेगा। रिपोर्टर: यानी साढ़े तीन लाख रुपए में हो जाएगा?
डॉ. नरेंद्र: जी, नाम लिखकर दीजिए। रिपोर्टर: शगुन या RPM सोचा है।
डॉ. नरेंद्र: CMO साहब बॉम्बे गए हैं। फोन पर ये सब बात नहीं होगी। आएंगे, तो काम हो जाएगा। वैसे आप हॉस्पिटल संचालक के क्या लगते हैं? रिपोर्टर: मैं उनका कुछ नहीं लगता। किराए पर सामान समेत पूरा हॉस्पिटल ले रहा हूं। सर, देखिएगा कि सब ठीक से हो जाए। दोबारा हॉस्पिटल सील न हो।
डॉ. नरेंद्र: जितना बता रहे हैं, बस उतना कीजिए। आप मैनेज कीजिएगा, तो सब सही होगा। उन्नाव के ACMO डॉ. नरेंद्र ने बातचीत में कहा कि लोकल लोगों को मैनेज करना होगा, जिससे कोई इस मामले में दखल न दे। पुराने रजिस्ट्रेशन पर अस्पताल चलाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि नया रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा। उन्होंने शिकायत करने वालों को पैसे देकर शांत कराने का तरीका भी बताया। इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमें लखनऊ के चिनहट स्थित IPS हॉस्पिटल का इनपुट मिला। मई, 2026 में 22 साल की महिला की गलत इलाज से मौत के बाद CMO ने हॉस्पिटल सील कर दिया था। सील हॉस्पिटल के डॉक्यूमेंट लेकर भास्कर रिपोर्टर लखनऊ स्थित CMO कार्यालय पहुंचे। वहां प्राइवेट अस्पतालों का जिम्मा संभाल रहे ACMO डॉ. अखंड प्रताप सिंह मिले। उन्होंने बिल्डिंग का नाम बदलकर हॉस्पिटल दोबारा खोलने की डील की। रिपोर्टर: एक हॉस्पिटल सील है, उसी को खोलना है।
डॉ. एपी सिंह: नया? रिपोर्टर: हां, उसी में कुछ नया जोड़कर चलाएंगे।
डॉ. एपी सिंह: आप क्या करते हैं? रिपोर्टर: मेरा दवा और प्रॉपर्टी का कारोबार है।
डॉ. एपी सिंह: अस्पताल का क्या नाम है? रिपोर्टर: IPS हॉस्पिटल।
डॉ. एपी सिंह: अरे यार…चिनहट वाला न? रिपोर्टर: हां…उसका नाम बदलकर ले रहे हैं।
डॉ. एपी सिंह: अरे…जगह तो वही रहेगी न? रिपोर्टर: कोई दिक्कत नहीं, आप रजिस्ट्रेशन करवा दीजिए।
डॉ. एपी सिंह: अरे यार, दिक्कत तो होगी न? देखिए…सील है, थोड़ी परेशानी तो है। रिपोर्टर: नाम पूरी तरह बदल देंगे।
डॉ. एपी सिंह: ठीक है….आप संजीव बाबू से मिल लीजिए। जाइए, मैं बोल रहा हूं। क्लर्क बोला- जिसकी पत्नी की मौत हुई, उससे समझौता कर लीजिए लखनऊ के ACMO डॉ. एपी सिंह ने बातचीत के बाद क्लर्क संजीव के पास भेज दिया। उन्होंने संजीव को फोन कर मामले की जानकारी भी दी। इन्वेस्टिगेशन टीम जब CMO कार्यालय के कमरा नंबर- 13 में पहुंची, तो वहां संजीव से मुलाकात हुई। संजीव ने सील हॉस्पिटल की बिल्डिंग में नए नाम से हॉस्पिटल खोलने की पूरी डील की। रिपोर्टर: डॉ. एपी सिंह सर ने फोन किया होगा आपको अभी।
संजीव: हां…बताइए, क्या काम है? रिपोर्टर: एक सील हॉस्पिटल है, उसका नाम बदलकर खोलना चाहते हैं।
संजीव: कौन-सा हॉस्पिटल है? रिपोर्टर: आईपीएस हॉस्पिटल।
संजीव: आईपीएस तो बंद है। रिपोर्टर: हां, उसके बगल में एक और बंद था, जो नाम बदलकर चल रहा है। रिपोर्टर: हम वो सब मैनेज कर लेंगे।
संजीव: तुरंत मत खोलिए। उसका वकील पीछे लगा है। अभी एक लेटर और आया हुआ है। रिपोर्टर: मैं वकील को मैनेज कर लूं, तो हो जाएगा?
संजीव: आप शिकायतकर्ता संजय यादव से समझौता कर लीजिए। रिपोर्टर: मैं कर लूंगा… उसकी चिंता आप छोड़ दीजिए।
संजीव: पहले आप मैनेज करिए, तब इसको करिए। रिपोर्टर: मैं लीज पर ले रहा हूं।
संजीव: आप सारे पेपर बनवा लीजिए, सब कुछ मैनेज कर लीजिए। आपका काम हो जाएगा। रिपोर्टर: 50 परसेंट पेपर बन गया है, बस आप यहां का मैनेज कर लीजिए।
संजीव: हां, आप मैनेज कर लीजिए, नहीं तो पेपर में निकालना शुरू कर देगा न…। एसीएमओ बोले- लीज का एग्रीमेंट बनवाइए क्लर्क संजीव से बातचीत के बाद रिपोर्टर फिर एसीएमओ डॉ. एपी सिंह के पास पहुंचा। डॉ. एपी सिंह ने लीज का एग्रीमेंट बनवाने को कहा। उन्होंने बताया कि सारा काम नए सिरे से होगा और नाम भी बदल जाएगा। आप अपने नाम से चलवाओ, उसका नाम नहीं आना चाहिए। जब रिपोर्टर ने खर्च के बारे में पूछा, तो डॉ. एपी सिंह ने कहा- रिपोर्टर: सर, बात हो गई। उन्होंने बताया है कि कम में ही करा देंगे।
डॉ. एपी सिंह: ठीक है, आप देख लीजिए। रिपोर्टर: तो मैं उन्हीं से डील कर लूं?
डॉ. एपी सिंह: हां, कर लीजिए। कोई दिक्कत नहीं। रिपोर्टर: लेकिन सर, मैं दो लाख रुपए से ज्यादा नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि उसका किराया भी ज्यादा है।
डॉ. एपी सिंह: कितना है? रिपोर्टर: डेढ़ लाख रुपए।
डॉ. एपी सिंह: लेकिन दिक्कत यही है कि वो सील है। रिपोर्टर: अरे सर, आप करा दीजिए, मैं देख लूंगा।
डॉ. एपी सिंह: ठीक है। रिपोर्टर: अपना नंबर दे दीजिए, वाट्सएप पर बात करेंगे।
डॉ. एपी सिंह: लिखिए, 941545XXXX। इस पर बात हो जाएगी।
रिपोर्टर: ठीक है सर, वाट्सएप कॉल करेंगे। क्लर्क ने पैसों की डील की एसीएमओ डॉ. एपी सिंह से बातचीत के बाद संजीव फिर रिपोर्टर से मिला। रिपोर्टर ने बताया कि इसी काम के लिए पहले एक एजेंट ने 4 लाख रुपए मांगे थे। इस पर संजीव ने कहा कि वह इससे काफी कम में काम करा देगा। उसने रिपोर्टर से लीज के पेपर बनवाने को कहा। रिपोर्टर: मैं बाहर का काम खुद देख लूंगा, आप यहां का बताइए।
संजीव: अब आप किसी से बात मत करिए। डॉक्यूमेंट्स लेकर आइए, तब मैं बताता हूं। रिपोर्टर: थोड़ा आप बता देते, तो माइंड सेट कर लेते।
संजीव: हम आपके साथ रहेंगे, ज्यादा मामला नहीं फंसेगा।
संजीव: कॉल मत करिएगा बॉस…. समय बहुत खराब है। रिपोर्टर: हां, ठीक है। मिलकर बात कर लेंगे।
रिपोर्टर: हम लीज के पेपर तैयार कर ले रहे हैं।
संजीव: 4 लाख बोला था, उससे 50% कम में करा देंगे। वाट्सएप कॉल पर ACMO ने पैसे के लिए ऑफिस बुलाया एक दिन बाद रिपोर्टर ने ACMO डॉ. एपी सिंह को वाट्सऐप कॉल कर कहा- सर, संजीव बाबू को पैसे देने हैं। मेरी उनसे पूरी बात हो गई है। आपके कहने पर वह 2 लाख रुपए में तैयार हो गए हैं। इस पर ACMO डॉ. एपी सिंह ने कहा कि पैसे संजीव को देने के बजाय रिपोर्टर ऑफिस आकर उनसे मिले। कानपुर में चंद्रा हॉस्पिटल, अब वेदा के नाम से चल रहा कानपुर के शिवली रोड पर पहले चंद्रा हॉस्पिटल चलता था। इसे अब वेदा हॉस्पिटल के नाम से संचालित किया जा रहा है। इन्वेस्टिगेशन के दौरान हमें 31 जनवरी, 2024 को जारी CMO कानपुर का एक नोटिस मिला, जिसमें हॉस्पिटल को सील करने के निर्देश दिए गए थे। इनवेस्टिगेशन में सामने आया कि सील होने के बावजूद हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था। 10 जून, 2025 को रसूलाबाद के रहने वाले रामदास ने हॉस्पिटल और उसके संचालकों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया कि सील हॉस्पिटल में गलत इलाज के कारण उनके बेटे की मौत हो गई। आरोप यह भी था कि बिना स्वास्थ्य विभाग की अनुमति के ICU और OT चलाए जा रहे थे। इस मामले में SC/ST एक्ट और BNS की धाराओं 351(3), 352, 115(2) और 106(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। डॉक्टर मोहित, शिवम और मुकेश को आरोपी बनाया गया। मामला सामने आने के बाद हॉस्पिटल एक बार फिर बंद हो गया। हालांकि, इसके करीब एक महीने बाद उसी बिल्डिंग में चंद्रा हॉस्पिटल की जगह वेदा हॉस्पिटल शुरू हो गया। मुकेश तक पहुंचने के लिए रिपोर्टर पथरी के ऑपरेशन का एस्टीमेट लेने के बहाने हॉस्पिटल पहुंचा। रिपोर्टर: आप ही देखेंगे या कोई और देखेगा?
मुकेश: नहीं, हम नहीं देखेंगे। यूरो के डॉक्टर देखेंगे। ये हमारा हॉस्पिटल है। रिपोर्टर: पहले तो यह चंद्रा के नाम से था?
मुकेश: हां, पहले चंद्रा के नाम से था, लेकिन हमारी आयुष्मान की फाइल तीन बार रिजेक्ट हो गई। तब दोबारा नए नाम से अप्लाई करना पड़ता है। इसी वजह से नाम बदल दिया गया है। रिपोर्टर: डिलीवरी का चार्ज क्या है?
मुकेश: अगर हमारे यहां कराते हैं, तो बहुत ही नॉर्मल चार्ज है। हमारे यहां सीजेरियन सिर्फ 14 हजार रुपए में हो जाता है। बाकी नॉर्मल डिलीवरी तो 8 हजार रुपए में ही हो जाती है। रिपोर्टर: आप भी डॉक्टर हैं क्या?
मुकेश: हम भी डॉक्टर हैं, लेकिन हम प्लेन MBBS हैं। अस्पताल पर 2025 में FIR हुई थी यहां मुकेश के डॉक्टर होने के दावे पर सवाल उठता है। 2024 में अस्पताल को जारी नोटिस में आरोप लगाया गया था कि वहां योग्य डॉक्टर नहीं हैं। वहीं, 2025 में FIR में 3 आरोपियों के नाम थे, लेकिन डॉक्टर की उपाधि सिर्फ मोहित के नाम के आगे लिखी गई थी। शिवम और मुकेश के नाम के आगे डॉक्टर नहीं लिखा था। FIR केवल एक साल पुरानी है। मॉडर्न लाइफ हॉस्पिटल दो साल में तीन बार सील, 4 बार बदला नाम हमें इनपुट मिला कि कानपुर के कल्याणपुर में एक ऐसा हॉस्पिटल है, जिसे दो साल के अंदर तीन बार सील किया गया। चार बार नाम बदला गया। CMO कार्यालय से पता चला कि 2024 में इसी बिल्डिंग में न्यू लाइफ हॉस्पिटल चलता था। इसके संचालक नीरज और राजू राठौर थे। रजिस्ट्रेशन नहीं होने की वजह से हॉस्पिटल सील कर दिया गया। इसके बाद नाम बदलकर ग्रेस हॉस्पिटल कर दिया गया, जबकि संचालक राजू राठौर ही रहे। कुछ महीने चलने के बाद ग्रेस हॉस्पिटल भी सील हुआ, तो इसका नाम बदलकर KPS हॉस्पिटल कर दिया गया। इसके संचालक इम्तियाज अहमद और प्रिंस द्विवेदी थे। इम्तियाज अहमद पर इसी हॉस्पिटल की एक नर्स से रेप का आरोप लगा था। इसके बाद हॉस्पिटल सील हो गया था। अब इसका नाम बदलकर मॉडर्न लाइफ हॉस्पिटल कर दिया गया है। इस इनपुट के बाद भास्कर की इन्वेस्टिगेशन टीम मॉडर्न लाइफ हॉस्पिटल पहुंची। यहां एपेंडिक्स के ऑपरेशन का एस्टीमेट जानने के लिए टीम ने खुद को डॉक्टर बताने वाले प्रदीप से बात की। रिपोर्टर: KPS हॉस्पिटल यही है?
रिसेप्शनिस्ट: (संचालक की तरफ देखते हुए) सर…
संचालक: किस संबंध में बात करनी है? रिपोर्टर: असल में, एक भैया ने पहले यहां पथरी का ऑपरेशन कराया था। अब अपेंडिक्स का ऑपरेशन कराना है। उन्होंने बताया था कि आसपास में यही हॉस्पिटल है। प्रिंस नाम के कोई भैया यहां मिले थे।
संचालक: अब हम चला रहे हैं। रिपोर्टर: अच्छा, प्रिंस भैया नहीं हैं अब यहां?
संचालक: प्रिंस हैं, लेकिन कभी-कभार आते हैं। यहां हम ही हैं, लेकिन प्रिंस आते रहते हैं। रिपोर्टर: ऑपरेशन का एस्टीमेट मिल जाएगा?
संचालक: हां…। इसके बाद संचालक हमें अंदर ले गया। संचालक: जिन्होंने भेजा है, वो कौन हैं?
रिपोर्टर: स्वरूपनगर में रहते हैं।
संचालक: अच्छा, उन्होंने यहां इलाज कराया है या वो कोई डॉक्टर हैं? रिपोर्टर: उन्होंने यहां इलाज कराया है। बताया था कि इसी बिल्डिंग में पहले आते रहते थे। उन्होंने बताया था कि यहां इलाज से ठीक हो जाते हैं।
संचालक: मरीज कितने साल के हैं? रिपोर्टर: 46 के आसपास हैं।
संचालक: ठीक है, पहले जांच हो जाएगी। मोटा-मोटा 20-22 हजार रुपए में हो जाएगी। ‘मौत की दुकानों’ पर ताला, सिर्फ कागजी दिखावा दैनिक भास्कर की पड़ताल में पता चला कि स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के लिए मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं है। मर्डर, रेप और मौतों के बाद सील हुई ‘मौत की दुकानों’ पर ताला लगाना केवल कागजी दिखावा बनकर रह गया है। जब रक्षक ही भक्षक बनकर सौदा करने लगें, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है। देखना होगा कि इस खुलासे के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या जांच का रटा-रटाया खेल आगे भी जारी रहेगा। —————————— यह खबर भी पढ़ें- पढ़ाई-खर्च के लिए छात्र अपना खून बेच रहे, यूपी में नीट का छात्र बोला- खून तो बनता रहेगा पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए छात्रों को अपना खून बेचना पड़ रहा है। गरीब परिवारों के इन बच्चों को नीट-एसएससी की महंगी कोचिंग, हॉस्टल-मेस की फीस भरनी होती है। दैनिक भास्कर के हिडन कैमरे पर ऐसे छात्रों ने अपनी बेबसी सुनाई। पढ़िए पूरी इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट…