लखनऊ से लगभग 22 किमी दूर हरदोई हाईवे पर काकोरी कस्बा है। यहीं पर है ग्राम पंचायत ‘दशहरी’। गांव के लोगों का दावा है कि यहां दुनिया का सबसे पुराना दशहरी आम का पेड़ है, जो करीब 300 साल पुराना है। गांव के लोग कहते हैं कि अफगानिस्तान से आए एक फकीर काकोरी के इस पेड़ की गुठली को लेकर मलिहाबाद पहुंचे और वहां दशहरी आम का पहला पेड़ लगाया। आज आम की खेती बढ़ते-बढ़ते 46 हजार बीघा में फैल चुकी है। दैनिक भास्कर की टीम जब इस ऐतिहासिक धरोहर का हाल जानने ग्राउंड जीरो पर पहुंची, तो कई दिलचस्प कहानियां सामने आईं। पढ़िए रिपोर्ट… फकीर ने पहले खुद खाया, पसंद आने पर मलिहाबाद में पेड़ लगवाए
आज से करीब 200 साल पहले अफगानिस्तान के कंधार क्षेत्र से पलायन करके फकीर मोहम्मद खान उर्फ गोया राजस्थान के टोंक पहुंचा। उनके साथ अफरीदी पठानों का एक समुदाय था। गोया की कदकाठी और हथियार चलाने के ढंग को देख टोंक के नवाब ने उन्हें अपनी सेना में शामिल कर लिया। एक दिन फैजाबाद के नवाब शुजाउद्दौला टोंक आए। वहां पर उन्होंने गोया की तलवारबाजी और घुड़सवारी देखी। इससे खुश होकर उन्होंने टोंक के नवाब से कहा, ‘ये पठान हमें दे दो।’ शुजाउद्दौला, गोया से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपनी सेना का कमांडर-इन-चीफ बना दिया। यही नहीं उन्होंने मलिहाबाद और मोहान जैसे कस्बों की हिफाजत का जिम्मा गोया के नाम कर दिया। इसके बाद पठानों ने मलिहाबाद में बसना शुरू किया। यहां मकान बनाए। ये वो दौर था, जब मलिहाबाद में आम के बाग नहीं हुआ करते थे। गोया ने इन कस्बों में रहते हुए यहां का मूलभूत विकास भी करवाया। एक दिन वह लखनऊ के रास्ते काकोरी होकर मलिहाबाद जा रहे थे। रास्ते में थकान मिटाने के लिए वह काकोरी में एक विशाल आम के पेड़ के नीचे बैठ गए। इस पेड़ पर दशहरी आम लदे हुए थे। उन्हें देख उस पेड़ का मालिक पुरुषोत्तम भी वहां पहुंचा। उसने गोया को आम तोड़कर खिलाए। फल खाकर गोया इतना खुश हुए कि उन्होंने मलिहाबाद में भी ऐसे ही पेड़ लगवाने का इरादा बना लिया। यही वो काकोरी का दशहरी आम का पेड़ था, जिसे आज लोग दशहरी का ‘मदर ट्री’ बोलते हैं। गोया ने नवाब से यहां दशहरी आम के बगीचे लगाने की इजाजत मांगी। शुजाउद्दौला ने हां कह दिया। इसके बाद मलिहाबाद में आम की खेती शुरू हुई और फकीर मोहम्मद उर्फ गोया मलिहाबादी आम उगाने वाले पहले व्यक्ति बने। आज 2 हजार स्क्वॉयर फीट में फैला है ये पेड़
सबसे पुराना दशहरी आम का पेड़ 2 मायनों में खास दिखता है। 1. कम ऊंचाई, पर फैलाव ज्यादा. इसकी डालियां करीब 2,000 स्क्वॉयर फीट के दायरे में फैली हैं। इसका तना इतना चौड़ा है कि तीन लोग भी हाथ फैलाकर इसे पूरी तरह घेर नहीं सकते। जमीन से 5 फीट ऊपर उठते ही इसकी 10 विशाल टहनियां चारों तरफ फैल जाती हैं। 2. इस पेड़ के दायरे में दूसरा बड़ा पेड़ नहीं. जिस बाग में ये पेड़ लगा हुआ था। इसके आसपास कोई दूसरा आम का पेड़ इतना विशाल नहीं था। पेड़ का मालिक पूरा गांव, सब देखभाल करते हैं…
पेड़ देखकर हम गांव की तरफ चले। यहां हमारी मुलाकात 55 साल के भगवानदीन से हुई। वे बताते हैं, ‘इस पेड़ का कोई मालिक नहीं है, इसकी देखभाल पूरा गांव करता है। कोई पानी, कोई खाद तो कोई इस पेड़ पर दवा वगैरह डाल देता है, ताकि कीड़े न लगें। इस देखभाल का नतीजा है कि ये पेड़ 300 साल से अब तक जिंदा है। सूखा नहीं। पास ही ट्यूबवेल है, जिससे इसकी सिंचाई होती है।’ भगवानदीन आगे कहते हैं, ‘जब से होश संभाला, इस पेड़ को ऐसे ही खड़े देखा है। इससे पुराना आम का पेड़ यहां कोई नहीं। हालांकि, इस बार पेड़ पर आम कम आए हैं।’ गांव के लोग बोले, ‘दूर-दूर से लोग सिर्फ पेड़ देखने आते हैं’ गांव के विनय कुमार कहते हैं, ‘हमारी छोड़िए, हमारे बाप-दादा भी नहीं जानते कि ये पेड़ कितना पुराना है। लोग कहते हैं कि 300 साल पुराना है, लेकिन मुझे लगता है 500 साल से ज्यादा पुराना होगा। इसी पेड़ की गुठलियां ले जाकर लोगों ने मलिहाबाद और देश-दुनिया में दशहरी के पेड़ लगाए। यही वजह है कि अब इस पेड़ को ‘मदर ट्री’ कहते हैं।’ वहीं, गांव के करन बताते हैं, ‘पिछले साल उन्होंने पहली बार इस पेड़ का आम चखा था। स्वाद लाजवाब और एकदम अनूठा था। आज भी इस पेड़ को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। हम इस गांव के रहने वाले हैं, ये सब देखकर अच्छा लगता है।’ जब लगा कि पेड़ नहीं बचेगा 4 साल पहले सूख गया था, काफी मुश्किल से फिर हरा हुआ दशहरी का ये पेड़ आज तक जिंदा है। इसके पीछे एक परिवार की तीन पीढ़ियों की लगन और मेहनत है। इसकी देखरेख करने वाले विकास यादव बताते हैं, ‘मैं पेड़ की देखभाल करता हूं, मुझसे पहले पापा और उनसे पहले बाबा देखभाल करते आए हैं। वैसे तो पूरा गांव ही इस काम में मदद करता है।’ विकास कहते हैं, ‘चार साल पहले एक वक्त ऐसा आया कि पेड़ की सारी पत्तियां सूखकर गिर गईं। तब लगा कि अब ये पेड़ नहीं बचेगा, लेकिन हम लोगों ने हार नहीं मानी, जड़ों में पानी दिया, गोबर की खाद डाली गई, खूब देखरेख की। कुछ ही दिन बाद पेड़ फिर से हरा-भरा हो गया। हालांकि, काफी पुराना पेड़ होने की वजह से अब इसके आम बहुत बड़े नहीं होते, पर मिठास आज भी बेमिसाल है।’ पेड़ की वजह से डंपिंग एरिया बनने से बचा गांव अखिलेश सरकार में ‘धरोहर’ मानकर गांव को प्रोजेक्ट मिले
हमने विकास से पूछा, क्या इस पेड़ के चलते गांव को कभी कोई फायदा मिला है? वे बताते हैं, ‘साल 2012 की बात है। जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तब इस धरोहर के सम्मान में गांव के लिए 14 करोड़ रुपए की योजनाएं मिलीं। उन पैसों से बहुत काम हुआ। हालांकि, पूरा पैसा खर्च नहीं हो पाया, इसलिए कई चीजें अधूरी रह गईं।’ विकास कहते हैं, ‘इस गांव को कूड़ा डंपिंग जोन बनाने का प्लान था। इसे लेकर लोग परेशान हो गए। यहां कूड़ा डंप होने लगता, तो गांव में रहना मुश्किल हो जाता। गांववालों ने इसका विरोध किया, लेकिन प्रशासन पर कोई असर ही नहीं पड़ा। तब दशहरी के इस पेड़ को आगे किया गया। कहा कि दशहरी का सबसे पुराना पेड़ खत्म हो जाएगा। तब जाकर कूड़ा डंपिंग प्रोजेक्ट यहां से हटाकर 10 किलोमीटर दूर पानखेड़ा में शिफ्ट किया गया।’ आम कितना फायदेमंद है, ये 3 स्लाइड में जानिए ——————————- ये खबर भी पढ़ें… मलिहाबादी आम आंधी-बारिश से 60% कम हुआ:इस बार ₹60 वाला ₹100-120 में मिलेगा; किसान बोले- देश के बाहर नहीं भेज पाएंगे यूपी में मलिहाबाद के दशहरी आम की पैदावार पर आंधी-बारिश का असर पड़ा है। सिर्फ 40% पेड़ों पर ही आम आए हैं। इस साल पैदावार कम हुई, इसलिए बाजार में आम कुछ महंगा बिकेगा। किसान मानते हैं कि 50-60 रुपए किलो के भाव पर बिकने वाला आम इस सीजन 100-120 रुपए किलो तक मिलेगा। पूरी खबर पढें…
आज से करीब 200 साल पहले अफगानिस्तान के कंधार क्षेत्र से पलायन करके फकीर मोहम्मद खान उर्फ गोया राजस्थान के टोंक पहुंचा। उनके साथ अफरीदी पठानों का एक समुदाय था। गोया की कदकाठी और हथियार चलाने के ढंग को देख टोंक के नवाब ने उन्हें अपनी सेना में शामिल कर लिया। एक दिन फैजाबाद के नवाब शुजाउद्दौला टोंक आए। वहां पर उन्होंने गोया की तलवारबाजी और घुड़सवारी देखी। इससे खुश होकर उन्होंने टोंक के नवाब से कहा, ‘ये पठान हमें दे दो।’ शुजाउद्दौला, गोया से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपनी सेना का कमांडर-इन-चीफ बना दिया। यही नहीं उन्होंने मलिहाबाद और मोहान जैसे कस्बों की हिफाजत का जिम्मा गोया के नाम कर दिया। इसके बाद पठानों ने मलिहाबाद में बसना शुरू किया। यहां मकान बनाए। ये वो दौर था, जब मलिहाबाद में आम के बाग नहीं हुआ करते थे। गोया ने इन कस्बों में रहते हुए यहां का मूलभूत विकास भी करवाया। एक दिन वह लखनऊ के रास्ते काकोरी होकर मलिहाबाद जा रहे थे। रास्ते में थकान मिटाने के लिए वह काकोरी में एक विशाल आम के पेड़ के नीचे बैठ गए। इस पेड़ पर दशहरी आम लदे हुए थे। उन्हें देख उस पेड़ का मालिक पुरुषोत्तम भी वहां पहुंचा। उसने गोया को आम तोड़कर खिलाए। फल खाकर गोया इतना खुश हुए कि उन्होंने मलिहाबाद में भी ऐसे ही पेड़ लगवाने का इरादा बना लिया। यही वो काकोरी का दशहरी आम का पेड़ था, जिसे आज लोग दशहरी का ‘मदर ट्री’ बोलते हैं। गोया ने नवाब से यहां दशहरी आम के बगीचे लगाने की इजाजत मांगी। शुजाउद्दौला ने हां कह दिया। इसके बाद मलिहाबाद में आम की खेती शुरू हुई और फकीर मोहम्मद उर्फ गोया मलिहाबादी आम उगाने वाले पहले व्यक्ति बने। आज 2 हजार स्क्वॉयर फीट में फैला है ये पेड़
सबसे पुराना दशहरी आम का पेड़ 2 मायनों में खास दिखता है। 1. कम ऊंचाई, पर फैलाव ज्यादा. इसकी डालियां करीब 2,000 स्क्वॉयर फीट के दायरे में फैली हैं। इसका तना इतना चौड़ा है कि तीन लोग भी हाथ फैलाकर इसे पूरी तरह घेर नहीं सकते। जमीन से 5 फीट ऊपर उठते ही इसकी 10 विशाल टहनियां चारों तरफ फैल जाती हैं। 2. इस पेड़ के दायरे में दूसरा बड़ा पेड़ नहीं. जिस बाग में ये पेड़ लगा हुआ था। इसके आसपास कोई दूसरा आम का पेड़ इतना विशाल नहीं था। पेड़ का मालिक पूरा गांव, सब देखभाल करते हैं…
पेड़ देखकर हम गांव की तरफ चले। यहां हमारी मुलाकात 55 साल के भगवानदीन से हुई। वे बताते हैं, ‘इस पेड़ का कोई मालिक नहीं है, इसकी देखभाल पूरा गांव करता है। कोई पानी, कोई खाद तो कोई इस पेड़ पर दवा वगैरह डाल देता है, ताकि कीड़े न लगें। इस देखभाल का नतीजा है कि ये पेड़ 300 साल से अब तक जिंदा है। सूखा नहीं। पास ही ट्यूबवेल है, जिससे इसकी सिंचाई होती है।’ भगवानदीन आगे कहते हैं, ‘जब से होश संभाला, इस पेड़ को ऐसे ही खड़े देखा है। इससे पुराना आम का पेड़ यहां कोई नहीं। हालांकि, इस बार पेड़ पर आम कम आए हैं।’ गांव के लोग बोले, ‘दूर-दूर से लोग सिर्फ पेड़ देखने आते हैं’ गांव के विनय कुमार कहते हैं, ‘हमारी छोड़िए, हमारे बाप-दादा भी नहीं जानते कि ये पेड़ कितना पुराना है। लोग कहते हैं कि 300 साल पुराना है, लेकिन मुझे लगता है 500 साल से ज्यादा पुराना होगा। इसी पेड़ की गुठलियां ले जाकर लोगों ने मलिहाबाद और देश-दुनिया में दशहरी के पेड़ लगाए। यही वजह है कि अब इस पेड़ को ‘मदर ट्री’ कहते हैं।’ वहीं, गांव के करन बताते हैं, ‘पिछले साल उन्होंने पहली बार इस पेड़ का आम चखा था। स्वाद लाजवाब और एकदम अनूठा था। आज भी इस पेड़ को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। हम इस गांव के रहने वाले हैं, ये सब देखकर अच्छा लगता है।’ जब लगा कि पेड़ नहीं बचेगा 4 साल पहले सूख गया था, काफी मुश्किल से फिर हरा हुआ दशहरी का ये पेड़ आज तक जिंदा है। इसके पीछे एक परिवार की तीन पीढ़ियों की लगन और मेहनत है। इसकी देखरेख करने वाले विकास यादव बताते हैं, ‘मैं पेड़ की देखभाल करता हूं, मुझसे पहले पापा और उनसे पहले बाबा देखभाल करते आए हैं। वैसे तो पूरा गांव ही इस काम में मदद करता है।’ विकास कहते हैं, ‘चार साल पहले एक वक्त ऐसा आया कि पेड़ की सारी पत्तियां सूखकर गिर गईं। तब लगा कि अब ये पेड़ नहीं बचेगा, लेकिन हम लोगों ने हार नहीं मानी, जड़ों में पानी दिया, गोबर की खाद डाली गई, खूब देखरेख की। कुछ ही दिन बाद पेड़ फिर से हरा-भरा हो गया। हालांकि, काफी पुराना पेड़ होने की वजह से अब इसके आम बहुत बड़े नहीं होते, पर मिठास आज भी बेमिसाल है।’ पेड़ की वजह से डंपिंग एरिया बनने से बचा गांव अखिलेश सरकार में ‘धरोहर’ मानकर गांव को प्रोजेक्ट मिले
हमने विकास से पूछा, क्या इस पेड़ के चलते गांव को कभी कोई फायदा मिला है? वे बताते हैं, ‘साल 2012 की बात है। जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तब इस धरोहर के सम्मान में गांव के लिए 14 करोड़ रुपए की योजनाएं मिलीं। उन पैसों से बहुत काम हुआ। हालांकि, पूरा पैसा खर्च नहीं हो पाया, इसलिए कई चीजें अधूरी रह गईं।’ विकास कहते हैं, ‘इस गांव को कूड़ा डंपिंग जोन बनाने का प्लान था। इसे लेकर लोग परेशान हो गए। यहां कूड़ा डंप होने लगता, तो गांव में रहना मुश्किल हो जाता। गांववालों ने इसका विरोध किया, लेकिन प्रशासन पर कोई असर ही नहीं पड़ा। तब दशहरी के इस पेड़ को आगे किया गया। कहा कि दशहरी का सबसे पुराना पेड़ खत्म हो जाएगा। तब जाकर कूड़ा डंपिंग प्रोजेक्ट यहां से हटाकर 10 किलोमीटर दूर पानखेड़ा में शिफ्ट किया गया।’ आम कितना फायदेमंद है, ये 3 स्लाइड में जानिए ——————————- ये खबर भी पढ़ें… मलिहाबादी आम आंधी-बारिश से 60% कम हुआ:इस बार ₹60 वाला ₹100-120 में मिलेगा; किसान बोले- देश के बाहर नहीं भेज पाएंगे यूपी में मलिहाबाद के दशहरी आम की पैदावार पर आंधी-बारिश का असर पड़ा है। सिर्फ 40% पेड़ों पर ही आम आए हैं। इस साल पैदावार कम हुई, इसलिए बाजार में आम कुछ महंगा बिकेगा। किसान मानते हैं कि 50-60 रुपए किलो के भाव पर बिकने वाला आम इस सीजन 100-120 रुपए किलो तक मिलेगा। पूरी खबर पढें…