भदोही की एमपी/एमएलए कोर्ट ने 15 मई को बाहुबली विजय मिश्रा के पूरे परिवार को सजा सुना दी। पत्नी रामकली और बहू रूपा मिश्रा को ज्ञानपुर जेल भेजा गया। विजय मिश्रा आगरा और उसका बेटा विष्णु लखीमपुर जेल में पहले से बंद है। एक वक्त पर इस जिले की पहचान विजय मिश्रा वाले भदोही से होती थी। बाहुबली विजय मिश्रा का रसूख ऐसा था कि 20 साल तक विधायक बनता रहा। मायावती ने बसपा जॉइन करने के लिए कहा, तो इनकार कर दिया। मायावती ने पुलिस भेजी, तो मुलायम सिंह यादव विजय को लेकर हेलीकॉप्टर से उड़ गए। पुलिस देखती रह गई। विजय भदोही-मिर्जापुर की सियासत में उस मुकाम पर था कि अपनी सीट जीतने के साथ दूसरी सीटों पर पार्टी को जिताने का वादा भी मुख्यमंत्री से कर लेता था। फिर जो वादा किया, उसको करके भी दिखाता था। इस दबदबे के पीछे अगर कुछ था, तो वह था उसका आपराधिक चेहरा। यहां भी विजय का रसूख चला। केस तो एक-एक करके 65 दर्ज हुए, लेकिन पुलिस सजा नहीं दिला पा रही थी। फिर उसका बुरा दौर भी आया, जो 2018-19 से शुरू हुआ और अब तक चल रहा है। अब परिवार का कोई भी सदस्य जेल के बाहर नहीं है। जिस विजय मिश्रा का पूर्वांचल की सियासत में एक समय दबदबा था, वो अब बिखर गया। आज उसी विजय मिश्रा की कहानी पढ़िए… पहले जानिए विजय राजनीति में कैसे आया दमदार ब्राह्मण नेता चाहिए था, मुख्यमंत्री राजनीति में लेकर आए बात साल-1980 की है। भदोही जिला नहीं बना था। यह जगह वाराणसी जिले में आती थी। यहां रहने वाले कमलापति त्रिपाठी 1971 से 1973 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे। वह कांग्रेस पार्टी से थे। ब्राह्मण वर्ग में उनका बहुत सम्मान था, लेकिन दबदबा नहीं था। लोग उनकी सियासी हैसियत को स्वीकार करें, इसके लिए वह विजय मिश्रा से मिले। विजय उस वक्त ट्रक और पेट्रोल पंप का कारोबार कर रहा था। पहले तो उसने अपने कारोबार के चलते मना कर दिया। लेकिन, कमलापति के कहने पर राजनीति में आने को तैयार हो गया। उस वक्त डीघ में ब्लॉक प्रमुख का चुनाव हो रहा था। इस चुनाव में बाहुबली उदयभान सिंह उर्फ डॉक्टर के खास अभय राज सिंह चुनाव मैदान में थे। यह चुनाव अभय राज 2 वोट से जीत गए। इसके बाद जश्न हुआ। इसमें ब्राह्मणों को टारगेट करते हुए खूब अपशब्द बोले गए थे। उस वक्त डॉक्टर सिंह का दबदबा था, कोई विरोध में कुछ नहीं बोला। चूंकि विजय भी राजनीति में आ चुका था, इसलिए ब्राह्मणों को लगने लगा कि अभय का मुकाबला विजय मिश्रा ही कर सकता है। मुलायम सिंह के करीब पहुंचा सियासत में उतरा तो 3 दशक तक राज किया
90 के दशक में विजय मिश्रा पहली बार ब्लॉक प्रमुख के लिए चुनाव में उतरा। खूब पैसा खर्च किया। सारे बीडीसी प्रत्याशियों को उठवा लिया और एकतरफा चुनाव जीत गया। इस चुनाव ने उसका कॉन्फिडेंस बढ़ा दिया। उसने तय किया कि अब जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेंगे। चूंकि 1994 में भदोही जिला बन गया था। तब शिवकरण यादव उर्फ काके जिला पंचायत अध्यक्ष था। वह मुलायम सिंह यादव को अक्सर उल्टा-सीधा बोलता था। मुलायम सिंह ने विजय मिश्रा पर बड़ा दांव खेलते हुए उसके मुताबिक जिला पंचायत सदस्यों के 3 टिकट बांट दिए। विजय ने भी नेताजी को निराश नहीं किया। न सिर्फ वो तीनों सीटें सपा की झोली में डाल दीं, बल्कि पूरा समीकरण ऐसा घुमाया कि सपा का ‘जिला पंचायत अध्यक्ष’ भी बनवा दिया। जब विजय के आगे मुलायम ने शर्त रख दी 2002 में मुलायम सिंह ने विजय को बुलाया। विजय ने उनसे कहा कि मैं विधायक का चुनाव लड़ूंगा। मुलायम सिंह ने कहा कि अपनी सीट के साथ अगर हंडिया से महेश नारायण सिंह और मिर्जापुर से कैलाश चौरसिया को भी जीत दिलवाने का वादा करोगे, तभी टिकट देंगे। विजय ने वादा कर लिया। चुनाव हुआ तो विजय ने ज्ञानपुर की सीट से भाजपा के गोरखनाथ पांडेय को 7,652 वोटों से हरा दिया। उधर, हंडिया से महेश और मिर्जापुर से कैलाश भी बड़े अंतर से चुनाव जीत गए थे। भाजपा प्रत्याशी के भाई की हत्या में नाम आया यहां एक और टर्निंग पॉइंट हुआ। जिस दिन वोटिंग हुई थी, उसी दिन एक बूथ पर भाजपा प्रत्याशी गोरखनाथ पांडेय के भाई रामेश्वर पांडेय की हत्या कर दी गई। हत्यारे गोरखनाथ पांडेय को मारने आए थे। उनकी ही गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग की गई थी। लेकिन उस दिन गाड़ी में रामेश्वर पांडेय थे, गोरखनाथ पीछे वाली गाड़ी में बैठे थे। इस हत्या का आरोप विजय मिश्रा पर लगा। लेकिन, सबूत नहीं मिलने पर कोर्ट ने विजय को बाइज्जत बरी कर दिया था। गोरखनाथ ने बहुत संघर्ष किया। मानवाधिकार आयोग ने दोबारा फाइल खोल दी, जिसकी जांच अभी भी चल रही है। विजय का सियासी रसूख बढ़ता गया मंच पर माला नहीं, सोने की चेन पहनाता था
विजय का घर चंदौली जिले के धानापुर में है। उसका बचपन गरीबी में बीता था। बुद्धि तेज थी, लेकिन आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थीकि पढ़कर आगे बढ़ सके। इसलिए विजय का भरोसा मांगने से ज्यादा छीनने पर हो गया। सियासत का साथ मिला, तो साम्राज्य बढ़ता चला गया। इसकी झलक विजय की चुनावी रैलियों में दिखती थी। विजय मंच पर नेता को फूलों की माला नहीं पहनाता था। वह उन्हें सोने की चेन पहनाता था। चेन का वजन नेता की हैसियत के हिसाब से तय होता था। की-पैड फोन में नंबर सेव नहीं करता, सारे नंबर याद रखता
विजय की-पैड वाला फोन चलाता था। वह बहुत कम लोगों के नंबर सेव करता था। इसकी वजह यह है कि उसे ज्यादातर के नंबर याद रहते थे। विजय के लोग दावा करते थे कि उसको 1500 से ज्यादा लोगों के नंबर याद थे। विजय पत्रकारों का बहुत ख्याल रखता था। इसी वजह से लोकल अखबारों में उसके खिलाफ खबरें कम छपती थीं। कहते हैं कि वो पत्रकारों के लिए 30 से 40 हजार रुपए किलो वाली गुच्छी की सब्जी बनवाता था। इसे वह खुद या फिर उसकी पत्नी रामलली बनाती थी। विजय के इस प्रोग्राम में जो शख्स नहीं जाता था, उसे फोन करके कहता- आओगे नहीं तो डांड़ (जुर्माना) लगेगी। 2007 तक विजय स्थापित ब्राह्मण नेता बना यज्ञ में 40 हजार लोग आहुति देने आते
साल 2007-2008 तक विजय पूर्वांचल में ब्राह्मण समाज के बड़े नेता की तरह स्थापित हो चुका था। नवरात्रि में 9 दिन का व्रत रखता। उसक यहां 11 पंडित लगातार 9 दिन तक जाप करते थे। आखिरी दिन हवन होता और उसमें आहुति देने के लिए विजय इलाके के लोगों को बुलाता था। करीब 40 हजार लोग पहुंचते थे। जाप करने वाले ब्राह्मणों को पैसे-अनाज के साथ एक-एक गाय भी दी जाती थी। विजय को धर्म-कर्म पर इतना भरोसा था कि कई बार वह रास्ता बदल देता था। कहता था- देवी का इशारा है कि उधर जाने पर दुर्घटना हो सकती है। मायावती को नाराज किया मायावती ने पकड़ने के लिए पुलिस भेजी, मुलायम के साथ उड़ गया
2007 में यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी, लेकिन ज्ञानपुर में विजय मिश्रा ही जीता। 2009 में भदोही सीट पर उपचुनाव होना था। यह सीट बसपा किसी भी कीमत पर जीतना चाहती थी। इसलिए 30 मंत्रियों को लगा दिया था। मंत्री हर दिन इलाके में प्रचार करते थे। उस वक्त मंत्रियों ने मायावती को इनपुट दिया था कि इलाके में विजय मिश्रा की पकड़ मजबूत है। उसे अपने पाले में किया जाए, तो जीत हो सकती है। मायावती ने विजय के पास ऑफर भेज दिया, लेकिन उसने मुलायम सिंह का साथ छोड़ने से मना कर दिया। विजय का मना करना मायावती को अजीब लगा। उस वक्त तक विजय के खिलाफ करीब 40 मुकदमे दर्ज हो चुके थे। पुलिस पीछे लग गई। मुलायम सिंह जब प्रचार करने पहुंचे, तो विजय उनकी रैली में पहुंचा। वह हाथ जोड़कर बोला- आपको मेरी पत्नी रामलली के सिंदूर का वास्ता, मुझे बचा लीजिए। तब मुलायम सिंह ने कहा था- किसी माई के लाल में दम नहीं जो हमारे रहते विजय मिश्रा को गिरफ्तार कर सके। इसके बाद मुलायम ने विजय को हेलिकॉप्टर में बैठाया और उड़ गए थे। विजय के नाम की दहशत फैलती गई कोयला कारोबारी की हत्या, CBI कोर्ट से छूट गया
विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और बड़े कोयला कारोबारी नंद किशोर रुंगटा का वाराणसी से अपहरण हुआ। 2 करोड़ की फिरौती मांगी गई। फिरौती नहीं मिली, तो नंद किशोर को मारकर लाश प्रयागराज के झूंसी में फेंक दी गई। नाम आया विजय मिश्रा और मुख्तार अंसारी का। बाद में CBI कोर्ट ने दोनों के खिलाफ सबूत को पर्याप्त नहीं माना और छोड़ दिया। धीरे-धीरे खनन के ठेकों में विजय का एकछत्र राज हो गया। 1995 से 2010 तक तो 20 किमी के एरिया में खनन ठेका विजय के अलावा कोई छू तक नहीं पाया। विजय के ट्रक निकलते तो किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि टोल मांगा जाए। विजय ने कैबिनेट मंत्री पर बम फिंकवाया साधु का भेष बनाकर भागता रहा
12 जुलाई, 2010 को बसपा सरकार के कैबिनेट मंत्री रहे नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ मंदिर गए थे। मंदिर के बाहर स्कूटी में बम था। जैसे ही नंदी पहुंचे, रिमोट से बम धमाका किया गया। धुएं का गुबार छटा तो इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार विजय प्रताप सिंह, राकेश मालवीय और मंत्री के गनर की लाश पड़ी थी। नंदी का पेट फट गया, आंतें बाहर आ गईं। नंदी किसी तरह भागकर एक घर में घुसे। फिर दूसरा ड्राइवर आया और सीधे रास्ते के बजाय पूरा शहर घुमाते हुए हॉस्पिटल पहुंचा। 8 दिन तक नंदी को होश नहीं आया था। इस हमले के बाद विजय मिश्रा, ब्लॉक प्रमुख दिलीप मिश्रा और दो अन्य लोगों पर केस हुआ। दिलीप तो पकड़ गया, लेकिन विजय फरार हो गया। वह गेरुआ वस्त्र पहनकर कर्नाटक, कोलकाता, मुंबई घूमता रहा। दाढ़ी बढ़ा ली। पुलिस ने इनाम ढाई लाख कर दिया। 8 फरवरी, 2011 को एसटीएफ ने दिल्ली के हौजखास से गिरफ्तार कर लिया था। जेल से चुनाव लड़ा और जीत गया
विजय को जेल भेज दिया गया। इसके बाद 2012 का चुनाव आया, मुलायम सिंह ने फिर से उसे टिकट दे दिया। इस बार विजय की पत्नी रामलली और बेटियों ने प्रचार किया। नतीजा आया तो विजय ने 37,604 वोट से जीत हासिल की। सपा की सरकार बनी और विजय जेल से बाहर आ गया। उस वक्त अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। उनसे सामंजस्य अच्छा नहीं बना, तो विजय ने अपनी छवि सुधारने का प्रयास किया। लेकिन, अखिलेश का खास नहीं बन पाया। जब विजय का बुरा दौर शुरू हुआ टिकट कटा तो अखिलेश से पूछे सवाल
2017 के चुनाव में अखिलेश ने विजय मिश्रा का टिकट काट दिया। उस वक्त विजय ने कहा था- नेताजी (मुलायम सिंह यादव) को जब तक विजय से काम था, तब तक मैं बाहुबली नहीं था। काम हो गया, तो हम बाहुबली हो गए। अगर बाहुबली ही थे तो 2012 में टिकट क्यों दिया? 2014 में मेरी बेटी को लोकसभा का टिकट क्यों दिया? 2016 में मेरी पत्नी को एमएलसी का टिकट क्यों दिया? हालांकि, विजय को इसका जवाब नहीं मिला। इसके बाद विजय निषाद पार्टी से चुनाव लड़ा। भाजपा के महेंद्र बिंद को 20,230 वोटों से हरा दिया। हालांकि कुछ दिन बाद निषाद पार्टी ने विजय को बाहर का रास्ता दिखा दिया। यहीं से विजय के बुरे दिन शुरू हो गए। आरोप लगे- रिश्तेदार की 1500 करोड़ की संपत्ति हड़प ली
कृष्ण मोहन तिवारी विजय मिश्रा के रिश्तेदार हैं। 4 अगस्त, 2020 को कृष्ण मोहन ने विजय मिश्रा के खिलाफ केस दर्ज करवाया। 50 बीघा जमीन, एक 6000 स्क्वॉयर फीट का मकान, एक बीघे में बैठक के लिए बना हॉल कब्जाने का आरोप लगाया। इन सबकी कीमत करीब 1500 करोड़ रुपए की बताई गई थी। पुलिस ने केस दर्ज किया। 14 अगस्त, 2020 को विजय को आगर जिले (मध्यप्रदेश) से गिरफ्तार कर लिया गया। उसे जेल भेजा गया और तबसे आज तक जेल से बाहर नहीं आया। 15 मई को प्रयागराज की एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को इस मामले में 10 साल की सजा सुनाई। पत्नी रामलली मिश्रा और बेटे विष्णु मिश्रा को भी 10 साल की सजा हुई। बहू रूपा मिश्रा को 4 साल की सजा सुनाई गई। इस सजा से 2 दिन पहले यानी 13 मई को विजय मिश्रा को 1980 के एक मर्डर केस में दोषी पाया गया। उस मामले में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई। 11 फरवरी, 1980 को कचहरी परिसर में प्रकाश नारायण पांडेय की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इसमें मुख्य आरोपी विजय ही था। उसके साथ जीत नारायण, संतराम और बलराम को भी सजा मिली। वाराणसी की एक लोक गायिका ने 2020 में विजय के खिलाफ रेप की एफआईआर करवाई थी। मामले की जांच चली, 4 नवंबर 2023 को भदोही एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को 15 साल कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में विजय के बेटे विष्णु और नाती विकास मिश्रा भी आरोपी थे। लेकिन बाद में उन्हें बरी कर दिया गया। विजय को आर्म्स एक्ट में 2 बार सजा हो चुकी है। पहली बार- भदोही कोर्ट ने 17 अक्टूबर, 2022 को 2 साल की सजा सुनाई थी। दूसरी बार- प्रयागराज कोर्ट ने 18 मार्च को 5 साल की सजा सुनाई थी। दोनों ही बार 10-10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था। कुल मिलाकर विजय मिश्रा की सियासत, रसूख, दबदबा सब कुछ खत्म हो चुका है। प्रयागराज और भदोही में उसकी अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चल चुका है। जो केस पेंडिंग हैं, उन पर भी तेजी से सुनवाई हो रही है। एक के बाद एक फैसले आ रहे हैं। जिस विजय मिश्रा के पीछे आज से 15 साल पहले पार्टियां टिकट लेकर घूमती थीं, आज उसका नाम लेने तक से बचती हैं। ————————— यह खबर भी पढ़ें – कुश्ती संघ के मुख्य टूर्नामेंट गोंडा में ही क्यों?, 1 हजार पहलवानों के रहने की व्यवस्था; बृजभूषण अध्यक्ष नहीं लेकिन दबदबा बरकरार यूपी के गोंडा में सीनियर नेशनल रैंकिंग कुश्ती प्रतियोगिता चल रही है। 2018 से अबतक ये प्रतियोगिता सिर्फ 3 बार हुई है और तीनों ही बार गोंडा में हुई। अब सवाल उठता है कि भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) ये प्रतियोगिता गोंडा में ही क्यों करवाता है?दिल्ली या फिर लखनऊ में क्यों नहीं? पढ़िए पूरी खबर…
90 के दशक में विजय मिश्रा पहली बार ब्लॉक प्रमुख के लिए चुनाव में उतरा। खूब पैसा खर्च किया। सारे बीडीसी प्रत्याशियों को उठवा लिया और एकतरफा चुनाव जीत गया। इस चुनाव ने उसका कॉन्फिडेंस बढ़ा दिया। उसने तय किया कि अब जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेंगे। चूंकि 1994 में भदोही जिला बन गया था। तब शिवकरण यादव उर्फ काके जिला पंचायत अध्यक्ष था। वह मुलायम सिंह यादव को अक्सर उल्टा-सीधा बोलता था। मुलायम सिंह ने विजय मिश्रा पर बड़ा दांव खेलते हुए उसके मुताबिक जिला पंचायत सदस्यों के 3 टिकट बांट दिए। विजय ने भी नेताजी को निराश नहीं किया। न सिर्फ वो तीनों सीटें सपा की झोली में डाल दीं, बल्कि पूरा समीकरण ऐसा घुमाया कि सपा का ‘जिला पंचायत अध्यक्ष’ भी बनवा दिया। जब विजय के आगे मुलायम ने शर्त रख दी 2002 में मुलायम सिंह ने विजय को बुलाया। विजय ने उनसे कहा कि मैं विधायक का चुनाव लड़ूंगा। मुलायम सिंह ने कहा कि अपनी सीट के साथ अगर हंडिया से महेश नारायण सिंह और मिर्जापुर से कैलाश चौरसिया को भी जीत दिलवाने का वादा करोगे, तभी टिकट देंगे। विजय ने वादा कर लिया। चुनाव हुआ तो विजय ने ज्ञानपुर की सीट से भाजपा के गोरखनाथ पांडेय को 7,652 वोटों से हरा दिया। उधर, हंडिया से महेश और मिर्जापुर से कैलाश भी बड़े अंतर से चुनाव जीत गए थे। भाजपा प्रत्याशी के भाई की हत्या में नाम आया यहां एक और टर्निंग पॉइंट हुआ। जिस दिन वोटिंग हुई थी, उसी दिन एक बूथ पर भाजपा प्रत्याशी गोरखनाथ पांडेय के भाई रामेश्वर पांडेय की हत्या कर दी गई। हत्यारे गोरखनाथ पांडेय को मारने आए थे। उनकी ही गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग की गई थी। लेकिन उस दिन गाड़ी में रामेश्वर पांडेय थे, गोरखनाथ पीछे वाली गाड़ी में बैठे थे। इस हत्या का आरोप विजय मिश्रा पर लगा। लेकिन, सबूत नहीं मिलने पर कोर्ट ने विजय को बाइज्जत बरी कर दिया था। गोरखनाथ ने बहुत संघर्ष किया। मानवाधिकार आयोग ने दोबारा फाइल खोल दी, जिसकी जांच अभी भी चल रही है। विजय का सियासी रसूख बढ़ता गया मंच पर माला नहीं, सोने की चेन पहनाता था
विजय का घर चंदौली जिले के धानापुर में है। उसका बचपन गरीबी में बीता था। बुद्धि तेज थी, लेकिन आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थीकि पढ़कर आगे बढ़ सके। इसलिए विजय का भरोसा मांगने से ज्यादा छीनने पर हो गया। सियासत का साथ मिला, तो साम्राज्य बढ़ता चला गया। इसकी झलक विजय की चुनावी रैलियों में दिखती थी। विजय मंच पर नेता को फूलों की माला नहीं पहनाता था। वह उन्हें सोने की चेन पहनाता था। चेन का वजन नेता की हैसियत के हिसाब से तय होता था। की-पैड फोन में नंबर सेव नहीं करता, सारे नंबर याद रखता
विजय की-पैड वाला फोन चलाता था। वह बहुत कम लोगों के नंबर सेव करता था। इसकी वजह यह है कि उसे ज्यादातर के नंबर याद रहते थे। विजय के लोग दावा करते थे कि उसको 1500 से ज्यादा लोगों के नंबर याद थे। विजय पत्रकारों का बहुत ख्याल रखता था। इसी वजह से लोकल अखबारों में उसके खिलाफ खबरें कम छपती थीं। कहते हैं कि वो पत्रकारों के लिए 30 से 40 हजार रुपए किलो वाली गुच्छी की सब्जी बनवाता था। इसे वह खुद या फिर उसकी पत्नी रामलली बनाती थी। विजय के इस प्रोग्राम में जो शख्स नहीं जाता था, उसे फोन करके कहता- आओगे नहीं तो डांड़ (जुर्माना) लगेगी। 2007 तक विजय स्थापित ब्राह्मण नेता बना यज्ञ में 40 हजार लोग आहुति देने आते
साल 2007-2008 तक विजय पूर्वांचल में ब्राह्मण समाज के बड़े नेता की तरह स्थापित हो चुका था। नवरात्रि में 9 दिन का व्रत रखता। उसक यहां 11 पंडित लगातार 9 दिन तक जाप करते थे। आखिरी दिन हवन होता और उसमें आहुति देने के लिए विजय इलाके के लोगों को बुलाता था। करीब 40 हजार लोग पहुंचते थे। जाप करने वाले ब्राह्मणों को पैसे-अनाज के साथ एक-एक गाय भी दी जाती थी। विजय को धर्म-कर्म पर इतना भरोसा था कि कई बार वह रास्ता बदल देता था। कहता था- देवी का इशारा है कि उधर जाने पर दुर्घटना हो सकती है। मायावती को नाराज किया मायावती ने पकड़ने के लिए पुलिस भेजी, मुलायम के साथ उड़ गया
2007 में यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत से सरकार बनी, लेकिन ज्ञानपुर में विजय मिश्रा ही जीता। 2009 में भदोही सीट पर उपचुनाव होना था। यह सीट बसपा किसी भी कीमत पर जीतना चाहती थी। इसलिए 30 मंत्रियों को लगा दिया था। मंत्री हर दिन इलाके में प्रचार करते थे। उस वक्त मंत्रियों ने मायावती को इनपुट दिया था कि इलाके में विजय मिश्रा की पकड़ मजबूत है। उसे अपने पाले में किया जाए, तो जीत हो सकती है। मायावती ने विजय के पास ऑफर भेज दिया, लेकिन उसने मुलायम सिंह का साथ छोड़ने से मना कर दिया। विजय का मना करना मायावती को अजीब लगा। उस वक्त तक विजय के खिलाफ करीब 40 मुकदमे दर्ज हो चुके थे। पुलिस पीछे लग गई। मुलायम सिंह जब प्रचार करने पहुंचे, तो विजय उनकी रैली में पहुंचा। वह हाथ जोड़कर बोला- आपको मेरी पत्नी रामलली के सिंदूर का वास्ता, मुझे बचा लीजिए। तब मुलायम सिंह ने कहा था- किसी माई के लाल में दम नहीं जो हमारे रहते विजय मिश्रा को गिरफ्तार कर सके। इसके बाद मुलायम ने विजय को हेलिकॉप्टर में बैठाया और उड़ गए थे। विजय के नाम की दहशत फैलती गई कोयला कारोबारी की हत्या, CBI कोर्ट से छूट गया
विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और बड़े कोयला कारोबारी नंद किशोर रुंगटा का वाराणसी से अपहरण हुआ। 2 करोड़ की फिरौती मांगी गई। फिरौती नहीं मिली, तो नंद किशोर को मारकर लाश प्रयागराज के झूंसी में फेंक दी गई। नाम आया विजय मिश्रा और मुख्तार अंसारी का। बाद में CBI कोर्ट ने दोनों के खिलाफ सबूत को पर्याप्त नहीं माना और छोड़ दिया। धीरे-धीरे खनन के ठेकों में विजय का एकछत्र राज हो गया। 1995 से 2010 तक तो 20 किमी के एरिया में खनन ठेका विजय के अलावा कोई छू तक नहीं पाया। विजय के ट्रक निकलते तो किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि टोल मांगा जाए। विजय ने कैबिनेट मंत्री पर बम फिंकवाया साधु का भेष बनाकर भागता रहा
12 जुलाई, 2010 को बसपा सरकार के कैबिनेट मंत्री रहे नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ मंदिर गए थे। मंदिर के बाहर स्कूटी में बम था। जैसे ही नंदी पहुंचे, रिमोट से बम धमाका किया गया। धुएं का गुबार छटा तो इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार विजय प्रताप सिंह, राकेश मालवीय और मंत्री के गनर की लाश पड़ी थी। नंदी का पेट फट गया, आंतें बाहर आ गईं। नंदी किसी तरह भागकर एक घर में घुसे। फिर दूसरा ड्राइवर आया और सीधे रास्ते के बजाय पूरा शहर घुमाते हुए हॉस्पिटल पहुंचा। 8 दिन तक नंदी को होश नहीं आया था। इस हमले के बाद विजय मिश्रा, ब्लॉक प्रमुख दिलीप मिश्रा और दो अन्य लोगों पर केस हुआ। दिलीप तो पकड़ गया, लेकिन विजय फरार हो गया। वह गेरुआ वस्त्र पहनकर कर्नाटक, कोलकाता, मुंबई घूमता रहा। दाढ़ी बढ़ा ली। पुलिस ने इनाम ढाई लाख कर दिया। 8 फरवरी, 2011 को एसटीएफ ने दिल्ली के हौजखास से गिरफ्तार कर लिया था। जेल से चुनाव लड़ा और जीत गया
विजय को जेल भेज दिया गया। इसके बाद 2012 का चुनाव आया, मुलायम सिंह ने फिर से उसे टिकट दे दिया। इस बार विजय की पत्नी रामलली और बेटियों ने प्रचार किया। नतीजा आया तो विजय ने 37,604 वोट से जीत हासिल की। सपा की सरकार बनी और विजय जेल से बाहर आ गया। उस वक्त अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। उनसे सामंजस्य अच्छा नहीं बना, तो विजय ने अपनी छवि सुधारने का प्रयास किया। लेकिन, अखिलेश का खास नहीं बन पाया। जब विजय का बुरा दौर शुरू हुआ टिकट कटा तो अखिलेश से पूछे सवाल
2017 के चुनाव में अखिलेश ने विजय मिश्रा का टिकट काट दिया। उस वक्त विजय ने कहा था- नेताजी (मुलायम सिंह यादव) को जब तक विजय से काम था, तब तक मैं बाहुबली नहीं था। काम हो गया, तो हम बाहुबली हो गए। अगर बाहुबली ही थे तो 2012 में टिकट क्यों दिया? 2014 में मेरी बेटी को लोकसभा का टिकट क्यों दिया? 2016 में मेरी पत्नी को एमएलसी का टिकट क्यों दिया? हालांकि, विजय को इसका जवाब नहीं मिला। इसके बाद विजय निषाद पार्टी से चुनाव लड़ा। भाजपा के महेंद्र बिंद को 20,230 वोटों से हरा दिया। हालांकि कुछ दिन बाद निषाद पार्टी ने विजय को बाहर का रास्ता दिखा दिया। यहीं से विजय के बुरे दिन शुरू हो गए। आरोप लगे- रिश्तेदार की 1500 करोड़ की संपत्ति हड़प ली
कृष्ण मोहन तिवारी विजय मिश्रा के रिश्तेदार हैं। 4 अगस्त, 2020 को कृष्ण मोहन ने विजय मिश्रा के खिलाफ केस दर्ज करवाया। 50 बीघा जमीन, एक 6000 स्क्वॉयर फीट का मकान, एक बीघे में बैठक के लिए बना हॉल कब्जाने का आरोप लगाया। इन सबकी कीमत करीब 1500 करोड़ रुपए की बताई गई थी। पुलिस ने केस दर्ज किया। 14 अगस्त, 2020 को विजय को आगर जिले (मध्यप्रदेश) से गिरफ्तार कर लिया गया। उसे जेल भेजा गया और तबसे आज तक जेल से बाहर नहीं आया। 15 मई को प्रयागराज की एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को इस मामले में 10 साल की सजा सुनाई। पत्नी रामलली मिश्रा और बेटे विष्णु मिश्रा को भी 10 साल की सजा हुई। बहू रूपा मिश्रा को 4 साल की सजा सुनाई गई। इस सजा से 2 दिन पहले यानी 13 मई को विजय मिश्रा को 1980 के एक मर्डर केस में दोषी पाया गया। उस मामले में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई। 11 फरवरी, 1980 को कचहरी परिसर में प्रकाश नारायण पांडेय की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इसमें मुख्य आरोपी विजय ही था। उसके साथ जीत नारायण, संतराम और बलराम को भी सजा मिली। वाराणसी की एक लोक गायिका ने 2020 में विजय के खिलाफ रेप की एफआईआर करवाई थी। मामले की जांच चली, 4 नवंबर 2023 को भदोही एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को 15 साल कारावास की सजा सुनाई। इस मामले में विजय के बेटे विष्णु और नाती विकास मिश्रा भी आरोपी थे। लेकिन बाद में उन्हें बरी कर दिया गया। विजय को आर्म्स एक्ट में 2 बार सजा हो चुकी है। पहली बार- भदोही कोर्ट ने 17 अक्टूबर, 2022 को 2 साल की सजा सुनाई थी। दूसरी बार- प्रयागराज कोर्ट ने 18 मार्च को 5 साल की सजा सुनाई थी। दोनों ही बार 10-10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था। कुल मिलाकर विजय मिश्रा की सियासत, रसूख, दबदबा सब कुछ खत्म हो चुका है। प्रयागराज और भदोही में उसकी अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चल चुका है। जो केस पेंडिंग हैं, उन पर भी तेजी से सुनवाई हो रही है। एक के बाद एक फैसले आ रहे हैं। जिस विजय मिश्रा के पीछे आज से 15 साल पहले पार्टियां टिकट लेकर घूमती थीं, आज उसका नाम लेने तक से बचती हैं। ————————— यह खबर भी पढ़ें – कुश्ती संघ के मुख्य टूर्नामेंट गोंडा में ही क्यों?, 1 हजार पहलवानों के रहने की व्यवस्था; बृजभूषण अध्यक्ष नहीं लेकिन दबदबा बरकरार यूपी के गोंडा में सीनियर नेशनल रैंकिंग कुश्ती प्रतियोगिता चल रही है। 2018 से अबतक ये प्रतियोगिता सिर्फ 3 बार हुई है और तीनों ही बार गोंडा में हुई। अब सवाल उठता है कि भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) ये प्रतियोगिता गोंडा में ही क्यों करवाता है?दिल्ली या फिर लखनऊ में क्यों नहीं? पढ़िए पूरी खबर…