यूपी में चुनाव के ठीक पहले अतीक फिर ‘जिंदा’:धुरंधर पार्ट 2’ से नया एंगल मिला; क्या 2027 में फिर बनेगा ‘माफिया फैक्टर’?

यूपी विधानसभा 2027 के चुनाव को अब 1 साल से भी कम का समय बाकी है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, सियासी मुद्दे भी तेजी से उभरने लगे हैं। इसी बीच करीब 3 साल बाद एक बार फिर अतीक अहमद ‘जिंदा’ हो गया है। यूपी की दो प्रमुख पार्टियों के राजनेताओं के बयानों में उसका नाम लगातार आने से वह अचानक फिर सुर्खियों में लौट आया है। चुनावी जानकारों का मानना है कि चुनाव को देखते हुए अतीक अहमद को लेकर यह चर्चा जानबूझकर तेज की जा रही है, ताकि “माफिया बनाम कानून” का नैरेटिव ही नहीं सेट किया जा सके। बल्कि ध्रुवीकरण भी कराया जा सके। अतीक अहमद का राजनीतिक प्रभाव
अतीक अहमद सिर्फ एक माफिया नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक चेहरा भी रहा। वह प्रयागराज में पांच बार विधायक और एक बार सांसद चुना गया। चुनावी जानकार बताते हैं कि प्रयागराज ही नहीं, बल्कि आसपास के कई जिलों की विधानसभा सीटों पर भी उसका प्रभाव माना जाता था। खासतौर पर फूलपुर,फाफामऊ,सोरांव,शहर पश्चिमी,शहर दक्षिणी,शहर उत्तरी। इन सीटों पर उसके प्रभाव की चर्चा आम रही। शहर दक्षिणी सीट को लेकर यह भी कहा जाता रहा कि एक वरिष्ठ भगवाधारी नेता के चुनाव में अतीक की “कन्विंसिंग” भूमिका रहती थी। चुनाव से पहले कब और किसने किया अतीक अहमद का जिक्र
चुनाव से पहले अलग-अलग नेताओं के बयान इस मुद्दे को और हवा दे रहे हैं। 1- डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने 22 मार्च 2026 को एक पॉडकास्ट में दावा किया कि कार्यकर्ता के सम्मान में उन्होंने आमने-सामने होने पर अतीक अहमद पर राइफल तान दी थी। 2- सपा की बागी विधायक पूजा पाल ने 26 मार्च 2026 को अतीक को समाजवादी पार्टी का “सबसे बड़ा फाइनेंसर” बताया। साथ ही कहा कि अगर अखिलेश यादव मुख्यमंत्री होते, तो उनके पति राजू पाल की तरह उनकी भी हत्या हो सकती थी। 3- बीजेपी के पूर्व विधायक उदयभान करवरिया ने 12 मार्च को कहा था कि अतीक की कभी इतनी हैसियत नहीं रही कि वह उनके परिवार से टकरा सके। 4- राज्यसभा सांसद और पूर्व डीजीपी बृजलाल ने एक इंटरव्यू में अतीक के बहाने मुलायम सिंह यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने वह दौर देखा है जब मुलायम सिंह यादव अतीक के घर गए और उसके कुत्ते से हाथ मिलाया। 5- सपा नेता रामगोपाल यादव ने 21 मार्च को कहा था कि हमारी सरकार बनने पर अतीक हत्याकांड की जांच कराई जाएगी। बॉलीवुड में एंट्री: ‘धुरंधर पार्ट 2’ से नया एंगल
हाल ही में रिलीज फिल्म धुरंधर पार्ट 2 में भी अतीक अहमद जैसा किरदार दिखाया गया है। फिल्म में दावा किया गया है कि अतीक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़ा था। देश को कमजोर करने की साजिश में शामिल था। यूपी चुनाव को प्रभावित करने के लिए 60,000 करोड़ रुपये की नकली करेंसी पाकिस्तान से नेपाल के रास्ते भारत लाने की प्लानिंग की थी। हालांकि, ये दावे फिल्मी हैं, लेकिन चुनावी जानकार मानते हैं कि ऐसे नैरेटिव का असर जनमानस पर पड़ता है। बीजेपी के लिए क्यों मुफीद मुद्दा?
चुनावी जानकारों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए अतीक अहमद एक बेहद मुफीद चुनावी मुद्दा है। अतीक के बहाने बीजेपी के पास यह अवसर है कि वह लोगों को याद दिलाए कि किस तरह से माफिया का अंत कर प्रदेश को डर और दहशत के माहौल से मुक्त कराया गया। दरअसल यह सच है कि योगी आदित्यनाथ सरकार के दौरान गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई बढ़ी। हजारों करोड़ की संपत्ति कुर्क की गई। बुलडोजर एक्शन के जरिए सख्त संदेश दिया गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया था। चुनावी जानकारों के अनुसार, भले ही उस समय माफिया पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे, लेकिन कार्रवाई ने “जीरो टॉलरेंस” की छवि को मजबूत किया। क्या 2027 में फिर बनेगा ‘माफिया फैक्टर’?
चुनावी जानकारों का मानना है कि 2027 में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाएगा। मुख्तार अंसारी जैसे अन्य माफिया चेहरों के साथ अतीक अहमद का जिक्र कर “पहले बनाम अब” की तुलना पेश की जाएगी। उधर विपक्ष के नेता अतीक के नाम का इस्तेमाल कर अपने कोर वोटरों को अपनी ओर मजबूती से जमाए रखने के लिए करेंगे। यही वजह है कि चुनाव से करीब एक साल पहले ही अतीक अहमद का नाम लगातार राजनीतिक बयानों में उछाला जा रहा है। क्या बोले राजनीतिक विशेषज्ञ
प्रयागराज के राजनीतिक विशेषज्ञ सुनील शुक्ला कहते हैं, ‘तीन साल पहले खत्म हो चुके अतीक अहमद का राजनेताओं के बयानों में जिक्र एक सोचा समझा पॉलिटिकल मूव है। अलग-अलग दलों के नेता इसके जरिए मतदाताओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा की बात करें तो उनके नेताओं की ओर से अतीक का बार-बार जिक्र न सिर्फ कानून व्यवस्था का दंभ भरकर इसका चुनाव में क्रेडिट लेना है बल्कि अपरोक्ष रूप से ध्रवीकरण की भी कोशिश है। यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि किस तरह से एक मुस्लिम माफिया को मिट्‌टी मिलाने का काम किया गया। इसी तरह सपा के नेताओं का अतीक का जिक्र करना यह दर्शाता है कि उनका कोर वोटर मुस्लिम कहीं खिसकने न पाए। दोनों पार्टियों के नेता जानते हैं कि अतीक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए आज भी बेहद मुफीद चुनावी मुद्दा है।’ कैसे डालता था माफ़िया विधानसभा चुनावों पर असर
माफिया अतीक अहमद का प्रभाव प्रयागराज की एक-दो सीटों तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे शहर और आसपास के इलाकों में फैला हुआ था। फिर भी कुछ विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां उसका असर ज्यादा साफ दिखाई देता था।
सबसे ज्यादा प्रभाव इलाहाबाद पश्चिम सीट पर था। यही उसका राजनीतिक गढ़ था और वह कई बार यहां से विधायक रहा। इस सीट पर चुनाव अक्सर उसके नाम, दबदबे और नेटवर्क के आसपास ही घूमता था।
इलाहाबाद दक्षिण में वह खुद चुनाव नहीं लड़ता था, लेकिन व्यापार, ठेकेदारी और जमीन के मामलों के जरिए उसका असर बना रहता था। यहां उसका प्रभाव सीधे राजनीति से ज्यादा आर्थिक और नेटवर्क आधारित था। फूलपुर, सोरांव और फाफामऊ सीटों में उसका असर सामुदायिक और वोट ट्रांसफर के रूप में देखा जाता था। खासकर मुस्लिम और कुछ पिछड़े वर्ग के वोटों पर उसकी पकड़ मानी जाती थी, लेकिन यह पूरी तरह धार्मिक नहीं बल्कि नेतृत्व और स्थानीय प्रभाव का मामला था। फाफामऊ, झूंसी और शहर के बाहरी इलाकों में उसका असर जमीन कब्जे और रियल एस्टेट के जरिए देखा जाता था। अगर कुल मिलाकर समझें तो अतीक अहमद का प्रभाव केवल जातीय या धार्मिक नहीं था। उसका असली असर डर, पैसा, आपराधिक नेटवर्क और राजनीतिक मैनेजमेंट के मेल से बना था। यही वजह थी कि वह सीधे चुनाव लड़े बिना भी कई सीटों के नतीजों को प्रभावित कर पाता था। ——————– ये खबर भी पढ़िए- एनकाउंटर में घायल बदमाश हैलट अस्पताल से भागा: पुलिस ने झाड़ी से पकड़ा, सुरक्षा में 4 पुलिसवाले लगे थे; हाईवे पर बाइक लूटी थी कानपुर में पुलिस की गिरफ्त से एक शातिर बदमाश शुक्रवार सुबह अस्पताल से भाग गया। बर्रा में मुठभेड़ के दौरान पैर में गोली लगने के बाद उसे माइनर ऑपरेशन थियेटर में एडमिट कराया गया था। उसे तीन दरोगा और एक सिपाही की सुरक्षा में लाया गया था। पढ़ें पूरी खबर…