नवरात्र में अगर आप भी मिर्जापुर स्थित विंध्याचल धाम में दर्शन का प्लान बना रहे हैं, तो ‘त्रिकोण यात्रा’ के बारे में जरूर जानना चाहिए। मान्यताओं के अनुसार, जब तक आप त्रिकोण परिक्रमा पूरी नहीं करते, तब तक यात्रा अधूरी मानी जाती है। इस यात्रा का पहला पड़ाव- मां विंध्यवासिनी मंदिर है। दूसरा पड़ाव- अष्टभुजी देवी मंदिर है। तीसरा पड़ाव- काली खोह मंदिर है। आप ट्रेन, बस या अपनी गाड़ी से विंध्याचल आ रहे हैं। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से बचते हुए आसानी से दर्शन करना चाहते हैं। तो यह आसान रूट मैप आपके बहुत काम आएगा। बस, कार या ट्रेन से ऐसे धाम पहुंचें ट्रेन से : विंध्याचल मंदिर आने के लिए मिर्जापुर रेलवे स्टेशन उतरना होगा। मिर्जापुर स्टेशन से विंध्याचल धाम की दूरी करीब 8 से 9 किलोमीटर है। यहां से ऑटो या ई-रिक्शा से पहुंचने में 20 से 30 मिनट लगते हैं। धाम के पास विंध्याचल रेलवे स्टेशन भी है, लेकिन यहां कुछ एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती हैं। बस या कार से : वाराणसी, प्रयागराज और आसपास के जिलों से विंध्याचल के लिए यूपी रोडवेज की बसें आसानी से मिल जाती हैं। विंध्याचल धाम चारों दिशाओं से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। अगर आप कार से आ रहे हैं तो इन रास्तों से आएं- हवाई मार्ग से : सबसे नजदीकी एयरपोर्ट लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, वाराणसी (बाबतपुर) है, जो विंध्याचल से लगभग 75-80 किमी दूर है। वहां से टैक्सी या बस से विंध्याचल पहुंचा जा सकता है। विंध्याचल धाम पहुंचने के बाद बस और कार पार्क करने के लिए अलग-अलग पार्किंग की व्यवस्था है। यहां गाड़ी खड़ी करके आप अपनी ‘त्रिकोण यात्रा’ शुरू कर सकते हैं। मंदिर के पास सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध घाट ‘पक्का घाट” है, जहां श्रद्धालु स्नान करते हैं। आप भी अपनी यात्रा की शुरुआत गंगा स्नान से करें। इसके बाद मां विंध्यवासिनी के दर्शन करें। हाल ही में बने भव्य विंध्य कॉरिडोर के कारण अब गंगा घाट से सीधे मंदिर तक पहुंचना बेहद आसान हो गया है। इस मंदिर को शक्तिपीठ नहीं, बल्कि ‘सिद्धपीठ’ माना जाता है। मान्यता है कि यहां देवी स्वयं विराजमान हैं। नवरात्र या आम दिनों में भीड़ के समय गर्भगृह में प्रवेश बंद रहता है। केवल झांकी से दर्शन होती है। मंदिर में दिन में 4 बार मां का अलग-अलग स्वरूपों में श्रृंगार और आरती होती है। मंदिर के पुजारी आशीष पांडे बताते हैं- सुबह की मंगला आरती के समय पहुंचना दर्शन के लिए सबसे सही रहता है। दोपहर की श्रृंगार आरती और रात की बड़ी आरती के दौरान लगभग 30-45 मिनट के लिए दर्शन के पट बंद रहते हैं। मां विंध्यवासिनी के दर्शन के तुरंत बाद मंदिर परिसर से बाहर निकलकर कोतवाली के पास स्थित काल भैरव मंदिर जाएं। मान्यताओं के अनुसार, विंध्यवासिनी मंदिर के बाद काल भैरव के दर्शन करना अनिवार्य है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां भैरव और भैरवी एक साथ विराजमान हैं। विंध्याचल मंदिर से करीब 3 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर स्थित अष्टभुजी देवी मंदिर पहुंचें। यह त्रिकोण यात्रा का दूसरा प्रमुख पड़ाव है। अष्टभुजी देवी को मां सरस्वती और योगमाया का स्वरूप माना जाता है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर तक दर्शन के लिए श्रद्धालु 108 सीढ़ियां चढ़कर जा सकते हैं। बुजुर्गों और असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए यहां रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, जब कंस ने देवकी और वसुदेव की 8वीं संतान समझकर यशोदा की नवजात बालिका को पत्थर पर पटकना चाहा, तो वह बालिका अचानक उसके हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई। उसने आकाशवाणी करते हुए कहा- ‘तुझे मारने वाला गोकुल में जन्म ले चुका है।’ इसके बाद योगमाया इसी अष्टभुजी पहाड़ी पर आकर अंतर्ध्यान हो गईं। नवरात्र के दौरान मंदिर 24 घंटे दर्शन के लिए खुला रहता है। रात में विशेष पूजा और सफाई के लिए कुछ समय के लिए पट बंद होते हैं। त्रिकोण यात्रा के दौरान अष्टभुजी मंदिर जाने के लिए सुबह 6 से 11 बजे के बीच या शाम 4:30 बजे के बाद का समय सबसे सही रहता है। अष्टभुजी देवी के दर्शन के बाद पास ही स्थित बटुक भैरव मंदिर का दर्शन करना भी शुभ माना जाता है। अष्टभुजी मंदिर से आगे बढ़कर काली खोह पहुंचें, जो त्रिकोण यात्रा का अंतिम और तीसरा मुख्य पड़ाव है। काली खोह मंदिर विंध्याचल मंदिर से करीब 3 किलोमीटर है। अष्टभुजी मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर पहाड़ियों में स्थित है। यहां मां के महाकाली स्वरूप की पूजा होती है। यह स्थान तांत्रिक साधना और महाकाली की विशेष उपासना के लिए विश्व प्रसिद्ध है। सात्विक पूजा करने वाले श्रद्धालु यहां मां को प्रसन्न करने के लिए नारियल के अलावा नींबू और जायफल की प्रतीकात्मक बलि चढ़ाते हैं। मां महाकाली के दर्शन करने के बाद मंदिर परिसर में स्थित आनंद भैरव (लाल भैरव) के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है। आनंद भैरव के दर्शन के साथ ही आपकी ये पावन ‘त्रिकोण यात्रा’ संपन्न हो जाती है। ————————- यह खबर भी पढ़ें- लखनऊ में बाढ़ पीड़ित नाव देख दौड़ पड़ते हैं, चोरी हो जाएगी, इसलिए घर नहीं छोड़ा; छत पर तिरपाल डालकर समय काट रहे लखनऊ का फैजुल्लागंज करीब 2 हफ्तों से बाढ़ के पानी से घिरा है। गोमती नदी का जलस्तर बढ़ने से स्थिति भयावह हो चुकी है। 50 हजार से ज्यादा घरों में 5 फीट तक पानी भरा है। एक मंजिला मकानों में रहने वाले लोग छतों पर तिरपाल डालकर दिन काट रहे हैं। बाढ़ प्रभावित लोगों ने क्या बताया और मौके पर क्या हालात दिखे? आइए, जानते हैं…