जातीय रैलियों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त:राज्य सरकार से पूछा- 12 साल पुराने आदेश का पालन कैसे करा रहे, 10 साल का विवरण मांगा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने जातीय रैलियों के मुद्दे पर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि जाति आधारित रैलियों को रोकने के लिए 11 जुलाई 2013 के आदेश का पालन कैसे किया जा रहा है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने यह सवाल अधिवक्ता मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान उठाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पिछले 10 सालों में हुई जातीय रैलियों का विवरण मांगा है। कोई भी दल अब तक सुनवाई में नहीं पहुंचा इस मामले में कोर्ट पहले ही भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा को नोटिस जारी कर चुका है। लेकिन कोई भी दल अब तक सुनवाई में उपस्थित नहीं हुआ है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने को कहा है। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने 11 जुलाई 2013 को जाति आधारित रैलियों पर अंतरिम रोक लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि जातीय व्यवस्था समाज को बांटती है और भेदभाव पैदा करती है। जाति आधारित रैलियों की अनुमति देना संविधान की भावना और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में होगी।