980 करोड़ का पुल महाकुंभ से पहले बनना था:अब तक नहीं बना; कर्मचारी घटकर 25% हुए; अब जून में पूरा करने का वादा

26 नवंबर, 2020 को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और सीएम योगी ने प्रयागराज में गंगा नदी पर बहुप्रतिक्षित पुल का शिलान्यास किया। बजट 980 करोड़ रुपए था। लंबाई- करीब 10 किलोमीटर। देश का दूसरा सबसे लंबा सिक्स लेन एलिवेटेड पुल था। 16 फरवरी, 2021 से काम शुरू हुआ। ठीक 1095 दिन यानी फरवरी 2024 में बन जाना था, लेकिन नहीं बन पाया। डेट आगे बढ़ी, फिर बढ़ती चली गई। आज भी बढ़ती चली जा रही। अब तक पुल नहीं पूरा हो पाया। दैनिक भास्कर की टीम ने इस इस पुल को लेकर रिपोर्ट की। पुल की मौजूदा स्थिति को देखा। काम की प्रगति को देखा। काम कर रहे कर्मचारियों से बात की। कब तक शुरू होगा, इसे भी समझने की कोशिश की। सब कुछ एक तरफ से जानते हैं… फाफामऊ पुल पर हर समय लगता है जाम
प्रयागराज शहर एक तरह से टापू जैसा है। गंगा-यमुना नदी से घिरा है। शहर में दाखिल होने के लिए किसी न किसी पुल को पार करना होता है। चित्रकूट, मिर्जापुर, बांदा या फिर रीवा की तरफ से आने वाले नैनी ब्रिज से दाखिल होते हैं। वाराणसी-भदोही की तरफ से आने वाले झूंसी साइड से। ये दोनों ही रास्ते फोर लेन हैं। जो लोग लखनऊ, रायबरेली, प्रतापगढ़, अयोध्या या फिर पश्चिम यूपी से सड़क के रास्ते प्रयागराज पहुंचते हैं, वो आज भी फाफामऊ पुल से ही होकर शहर में दाखिल होते हैं। दो लेन का यह पुल करीब 40 साल पुराना है। अक्सर किसी गाड़ी के खराब होने से पूरा-पूरा दिन जाम की स्थिति रहती है। आप इस पुल की व्यस्तता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हर दिन छोटे-बड़े करीब 40 हजार वाहन इस पुल से गुजरते हैं। प्रयागराज की जनता की मांग पर सरकार ने नए पुल की घोषणा की। शिलान्यास भी कर दिया। काम भी शुरू हो गया। लेकिन, यहां चुनौतियां बहुत थीं। क्योंकि जिस रास्ते से पुल जाना था, उस रास्ते में करीब 4 किलोमीटर का हिस्सा गंगा नदी का है। अब तक गंगा नदी पर इतना बड़ा पुल कहीं नहीं बना। 980 करोड़ 77 लाख में एसपी सिंगला कंपनी को टेंडर मिल गया। भदरी से शुरुआत, बेली पर खत्म
9.9 किलोमीटर लंबा यह ब्रिज ईपीसी मोड (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) के तहत बनाया जा रहा है। इसकी शुरुआत भदरी गांव से होती है। निर्माणाधीन गंगा एक्सप्रेस-वे यहां से 4 किलोमीटर की दूरी पर खत्म होता है। भदरी से लेकर मलाका तक यह पुल पूरा हो गया है। गाड़ियां भी चल रही हैं। यहीं हमें पड़ोस के गांव सराय गोपाल के अशोक कुमार मिले। वह कहते हैं- अगर पुल बन जाता, तो बहुत अच्छा रहता। लोगों को जाम की समस्या से निजात मिल जाएगी। भदरी गांव से करीब 2 किलोमीटर आगे मलाका चौराहा पड़ता है। यह इस ब्रिज का मुख्य चौराहा है। प्रयागराज से आने वाली गाड़ियां यहीं से अलग-अलग रास्ता पकड़ती हैं। यहां का काम पूरा हो चुका है। यह पुल पूरी तरह से बन जाने के बाद लोगों के पास शहर के अंदर जाने का विकल्प होगा। अगर किसी को शांतिपुरम, फाफामऊ या फिर तेलियरगंज में काम नहीं होगा, तो वह इस पुल को पकड़ेगा और सीधे शहर में दाखिल होगा। पूरे ब्रिज पर सिर्फ एक टोल प्लाजा होगा
इस ब्रिज पर चढ़ने या फिर उतरने पर टोल प्लाजा नहीं होगा, बल्कि बीच में ही एक टोल प्लाजा बनाया जा रहा। अभी वहां मिट्टी का काम आखिरी चरण में है। इसके बाद सीमेंटेड सड़क बनाई जाएगी। इस पर चलने पर टोल कितना देना होगा, यह बन जाने के बाद तय होगा। इसी टोल प्लाजा के पास रेस्टोरेंट भी बनाए जाने का प्रस्ताव है। अफसर कहते हैं- इस चीज का भी ध्यान रखा जाएगा कि उचित पार्किंग की व्यवस्था हो। प्रस्तावित टोल प्लाजा के ठीक आगे से गंगा नदी शुरू हो जाएगी। इस ब्रिज का 3,840 मीटर हिस्सा इसी गंगा नदी पर होगा। इसके लिए 67 पिलर तैयार किए गए हैं। गंगा नदी में बाढ़ आने पर इन जगहों पर करीब 4 महीने तक पानी भरा रहता है। जिस जगह पर गंगा नदी हमेशा मौजूद रहती है, वहां कंपनी पुल बनाने में जर्मन टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल कर रही है। यहां केबल और बॉक्स के जरिए ब्रिज बनाया जा रहा। 2 महीने पहले ट्रक पलटा, इसलिए शूट की मनाही
जिस जगह पर केबल ब्रिज बनाया जा रहा, वहां 25 अगस्त को एक ट्रक कंक्रीट स्ट्रक्चर लेकर जा रहा था। तभी संतुलन बिगड़ गया और भारी-भरकम कंक्रीट स्ट्रक्चर नदी में गिर गया। ट्रक भी पलट गया। वहां मौजूद कर्मचारी ने जैसे-तैसे भागकर खुद को बचाया। इस घटना का वीडियो भी सामने आया। इससे सिंगला कंपनी की काफी किरकिरी हुई। इसके बाद निर्माणाधीन स्थलों पर उन्होंने वीडियो शूट रोक लगा दी। जिस जगह पर जर्मन टेक्नोलॉजी के जरिए पुल बनाया जा रहा, उसी जगह हमारी मुलाकात कुछ स्थानीय लोगों से हुई। उन्होंने बताया कि इस पुल के बन जाने से आम आदमी को काफी राहत मिल जाएगी। स्थानीय किसान राजेंद्र कहते हैं- पहले जिसे शहर जाना होता था, वह भी जाम में फंसा रहता था। फाफामऊ के पुल पर अगर कोई गाड़ी खराब हो जाती थी, तो पूरा का पूरा दिन जाम लगा रहता था। अब उसी जाम से राहत के लिए ये पुल बना है। हम लोगों को भी अब आराम हो जाएगा। पूर्व डिप्टी मैनेजर बोले- कंपनी ने कर्मचारी कम कर दिए
इस ब्रिज को 1095 दिन में पूरा हो जाना था, यानी फरवरी 2024 में। लेकिन नहीं हो पाया, फिर डेट बढ़ी। पहले जून 2024 हुई फिर अगस्त 2024, लेकिन पुल पूरा नहीं हो पाया। इसके बाद कंपनी और सरकार ने बीच का रास्ता निकाला। महाकुंभ के लिए एक अस्थायी ब्रिज बनाया। ये करीब 470 मीटर लंबा था। इसमें 4500 टन लोहा लगा था। लागत करीब 60 करोड़ आई। कुंभ खत्म होने के बाद इस पुल को फिर से खोल लिया गया। कंपनी के पूर्व डिप्टी मैनेजर शैलेंद्र सिंह से हमने बात की। वह काम को लेकर कहते हैं- कंपनी ने अब कर्मचारियों की संख्या 60% तक घटा दी है। इसके चलते भी काम धीमा हो गया। पहले एक साल लेट हुआ, अब कहा जा रहा कि 2026 के शुरुआत में दे देंगे। लेकिन अभी की स्थिति देखकर लगता है कि उस वक्त तक भी नहीं बन पाएगा। क्योंकि जहां केबल का काम होना है, वह जगह बेहद चुनौतीपूर्ण है। कंपनी इस पूरे प्रोजेक्ट में उलझ गई है। सितंबर 2026 में हम इसे शुरू कर देंगे
हमने पुल निर्माण के पूरा होने को लेकर इसमें मैनेजर वरुण वार्ष्णेय से बात की। उनका कहना है कि निर्माण का काम लगातार चल रहा है। अब जो काम हो रहा हो रहा, उसमें बारीकी ज्यादा है। हम धीरे धीरे बढ़ रहे हैं। जहां गंगा नदी की धारा हमेशा रहती है, वहां केबल (एक्स्ट्रा डोज) के जरिए पुल बनाया जा रहा। इस वक्त डे और नाइट की शिफ्ट में 400 से 500 कर्मचारी काम कर रहे हैं। जहां तक बात इसके शुरू करने की है, हम जून 2026 में इसके निर्माण को पूरा कर लेंगे और सितंबर 2026 में इसे शुरू कर देंगे। ————————– ये खबर भी पढ़ें… मेरठ के बिगुल की कहानी, जिसे GI टैग मिला, 140 साल पहले बनना शुरू हुआ उत्तर प्रदेश में मेरठ जिले के बिगुल को GI (जीओ ग्राफिकल इंडिकेटर) टैग मिला है। बिगुल एक वाद्ययंत्र है, जो किसी भी आंदोलन/कार्यक्रम की शुरुआत के लिए बजाया (फूंका) जाता है। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध का बिगुल फूंकना हो या RSS के पहले स्थापना दिवस पर बिगुल बजाना। मेरठ का बिगुल ही हर जगह इस्तेमाल हुआ। देश की ज्यादातर आर्म्ड फोर्सेज के बैंड में आज मेरठ का बिगुल शामिल है। GI टैग मिलने के बाद इसे बनाने वालों को अब क्या संभावनाएं नजर आती हैं? बिगुल का इतिहास क्या है? ये समझने के लिए दैनिक भास्कर मेरठ की जली कोठी में पहुंचा। यहां से दुनियाभर के लिए वाद्य यंत्र बनाए और सप्लाई किए जाते हैं। पढ़िए पूरी खबर…