लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस पर बस एक्सीडेंट में 5 साल के अनुराग की दर्दनाक मौत ने सबको हिलाकर रख दिया। एक्सीडेंट के बाद उसका धड़ तो मां के पैरों के करीब मिला, मगर सिर कहीं नहीं मिला। सबके जेहन में एक ही सवाल है, आखिर सिर कहां गया? इसका जवाब तलाशते हुए दैनिक भास्कर ने नए सिरे से अनुराग के पिता अनुज से बात की। पहले अनुराग का पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने क्या कहा, ये जानिए– बच्चे का बायां हाथ और दोनों पैर की हड्डियों में फ्रैक्चर था। 6 पसलियां टूटी मिलीं। शरीर में सिर के नाम पर कुछ भी नहीं था। पीठ और पेट पर 8 से 10 चोट के निशान थे। कानपुर पोस्टमॉर्टम हाउस पर हमारी मुलाकात अनुज, उनके पिता शौकी चौधरी और भाई संजय से हुई। हमने उनसे 2 सवाल पूछे? 1. हादसे के वक्त आप और आपके परिवार के लोग कहां लेटे हुए थे? 2. हादसे से 20 मिनट पहले तक क्या हुआ था? पलटने से पहले बस 2 बार लहराई, यात्री जाग गए
अनुज ने 18 नवंबर की सुबह हुए हादसे की कहानी सुनानी शुरू की। उन्होंने कहा- बस में ड्राइवर के बाद 5 सीट छोड़कर हमें स्लीपर बर्थ मिली थी। खिड़की की तरफ पत्नी गुड्डी लेटी थी। उसके पैर पर सिर रखकर बेटा अनुज लेटा हुआ था। मैं बाहर की तरफ लेटा था। मेरे हाथ पर सिर रखकर 3 साल की बेटी हिमांशु लेटी थी, जबकि डेढ़ साल की बेटी तनिष्का मेरे सीने पर सो रही थी। आगरा बस अड्डे से निकलने के बाद करीब 2.30 घंटे तक बस हाईवे पर दौड़ती रही। यही कोई सुबह के 3.30 बज रहे होंगे। बस बहुत तेजी से लहराई, हमें लगा कि बस के आगे कोई जानवर आ गया। लेकिन 5 मिनट के अंदर बस फिर से लहराई। अब बस में लेटी तकरीबन सभी सवारियां जाग गईं थीं। धड़ाम की आवाज आई, चीख-पुकार मच गई बस एक तरफ गिरने लगी। हमारे कुछ भी समझने से पहले धड़ाम से आवाज आई। बस पलट चुकी थी। इसके बाद अंधेरा छा गया। बस के अंदर रोशनी नहीं थी। मैं जब संभला, तो देखा कि लोग एक-दूसरे के ऊपर पड़े हुए थे। सभी के शरीर से खून बह रहा था। कोई मदद के लिए चीख रहा था, तो कोई रो रहा था। तभी मुझे अपनी बेटियों के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। लेकिन मैं उन्हें ढूंढ नहीं पा रहा था। पत्नी शायद बेसुध हो गई थी। बेटे की आवाज भी सुनाई नहीं पड़ रही थी। मैं इधर-उधर हाथ मारकर बेटियों को ढूंढने की कोशिश करने लगा। करीब 20 मिनट बाद थाने की फोर्स पहुंची तब हमें मदद मिली। बस के हिस्सों को काटकर लोगों को बाहर निकाला जाने लगा। मुझे और मेरी बेटियों को पुलिस ने बाहर निकाला। पैर खिड़की से बाहर निकला, इससे घाव हुए
यह सब होने तक उजाला हो चुका था, जिस खिड़की के पास पत्नी लेटी हुई थी। उसका शीशा टूट गया था, पत्नी का पैर खिड़की से बाहर निकल गया था, इसलिए शीशे की धार से उसमें गहरे घाव हो गए थे। बाद में मेरी पत्नी का पैर काटना पड़ा। बेटा अनुज पत्नी के पैरों पर सिर रखकर लेटा था। उसकी बॉडी वहीं मिली। दरअसल, हादसे के बाद बस जिस तरफ पलटी, उधर की खिड़की के शीशे भारी चीज से टकराकर पहले ही टूट गए थे। हमें ऐसा लग रहा है कि अनुज का सिर उस खिड़की से बाहर की तरफ निकल गया था। बस पलटने से उसका सिर बस के ही भारी पैनल के नीचे आ गया। पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने बताया कि अनुज का सिर पूरी तरह से कुचल गया था। यहां सिर्फ बॉडी ही आ सकी थी। गर्दन की खाल को देखकर ऐसा नहीं लगा कि किसी चीज से कटा हो, बल्कि ये तो उखड़ ही गया था। दादा का दर्द- मेरे घर का चिराग बुझ गया
पोस्टमॉर्टम के बाद अनुराग का शव सफेद कपड़े में लिपटा हुआ बाहर निकला, तो बाबा शौकी चौधरी का सब्र टूट गया। उसकी बॉडी टीनशेड के नीचे रखी गई थी। पोते की लाश को एक टक निहारते हुए उनकी आंखों से आंसू छलक रहे थे। परिवार के लोगों ने उन्हें ढांढस बंधाया, तो वह बिलख-बिलखकर रोने लगे। चिल्ला कर बोले- मेरा सब कुछ लुट गया। घर का चिराग ही बुझ गया। जो बच्चा मेरी गोद में खेलकर बड़ा हुआ, आज उसकी अर्थी उठानी पड़ रही। मेरी बहू भी मौत से लड़ाई लड़ रही है। बेटे संजय ने उन्हें हिम्मत बंधवाकर एक कोने में बैठा दिया। संजय ने उन्हें बताया कि ICU में गुड्डी को होश आ गया है। वह अपने बेटे के बारे में पूछ रही है। उसे यही बताया गया कि अनुराग घायल है, उसका इलाज चल रहा है। पिता बोले- जिसे मेरा अंतिम संस्कार करना था, वही चला गया अनुराग की बॉडी को अंतिम संस्कार के लिए परिजन नजीराबाद के हिंदू कब्रिस्तान लेकर जाने लगे तो पिता अनुज चौधरी का कलेजा मानो फट सा गया। उन्होंने बेटे के पैर पकड़कर उसे रोकने का प्रयास किया, फिर बोले- मैं भी अपने बेटे को आखिरी विदाई देने जाऊंगा। परिवार के लोग उन्हें हॉस्पिटल जाने के लिए कहते रहे। लेकिन वह शव वाहन में बैठ गए। बड़े भाई संजय अपने सीने में उमड़ रहे गम को छिपाकर उन्हें समझाने लगे, तो अनुज बोले- इसकी जिम्मेदारी तो मेरा अंतिम संस्कार करने की थी, ये कैसे जा सकता है? इसके बाद घर वालों ने उसे किसी तरह शव वाहन से उतारा। अनुज की बदहवास हालत को देख एक पारिवारिक सदस्य उसके साथ वहीं पर रुक गए। पिता का आरोप- आगरा में ड्राइवर बदला, वो नशे में था
अनुज ने बताया कि हादसे की रात आगरा के एक होटल में बस रोकी गई थी। यहां बस का ड्राइवर बदल गया था, दूसरा ड्राइवर बस को चला रहा था। वो हम लोगों को नशे में लग रहा था। उस होटल में बैठकर वो शराब पी रहा था। इस दौरान पोस्टमॉर्टम हाउस में मौजूद बिल्हौर थाने के दरोगा वीरेश कुमार से उन्होंने कई बार पूछा कि वो ड्राइवर गिरफ्तार हुआ क्या, जिसकी वजह से यह हादसा हुआ? दरोगा ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। अब हादसे में जान गंवाने वाले 2 और लोगों की कहानी… सउदी में जॉब करने जाने वाला था शशि, इकलौता बेटा था इस एक्सीडेंट में मारे गए सीवान के मीरपुर (बिहार) के रहने वाले शशि कुमार (26) ने भी जान गंवा दी। उनके चचेरे भाई अंकुर गिरी और कानपुर मे रहने वाले रिश्तेदार आलोक गोस्वामी पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे। उन्होंने बताया कि शशि पूरे परिवार का इकलौता बेटा था। पिता धर्मेंद्र सिंह की कई सालों पहले मौत हो चुकी है। परिवार में मां ऊषा देवी व तीन बहने हैं। शशि गुवाहटी में पेपर मिल में सुपरवाइजर था। वह सऊदी अरब में नौकरी के लिए जाने वाला था, मेडिकल कराने के लिए करीब 10 दिन पहले वो दिल्ली गया था। दिल्ली से वह बिहार अपने घर जाने के लिए निकला था, तभी यह हादसा हो गया। इकलौते बेटे की मौत की खबर से मां सदमे में चली गई है। बेटे की मौत के बाद कानपुर आने की हिम्मत नहीं जुटा सके पिता
पूर्वी चंपारण के डुमरिया घाट, दंगलपुर गांव में रहने वाले नसीम (26) की भी इस एक्सीडेंट में मौत हो गई। वो बीटेक छात्र था। मौत की जानकारी उसके पिता सोहेल अहमद को दी गई। लेकिन वह कानपुर आने की हिम्मत नहीं जुटा सके। बड़ा भाई वसीम, मामा असजद अली, फूफा जाने आलम पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे थे। कंधे पर छोटे भाई के जनाजे का बोझ वसीम से उठाया नहीं जा रहा था। भाई का क्षत-विक्षत शव देख वह टूट चुके थे। उन्होंने बताया कि नसीम गलगोटिया इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर रहा था। यह उसका पहला समेस्टर था। कुछ दिन पहले कॉलेज में छुट्टियां शुरू हो गई थीं, साथ ही नसीम के दोस्त की बहन की शादी भी थी। जिसमें शामिल होने के लिए वह घर आ रहा था। घर आने से पहले उससे फोन पर बात हुई थी, जिस पर उसने बताया कि था कि शादी में जाने के लिए उसने नई जैकेट ली है। क्या पता था कि नई जैकेट वह पहन ही नहीं सकेगा। अब जान गंवाने वाले 3 लोगों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट जानिए… अनुराग – अनुराग का बायां हाथ और दोनों पैर टूटे हुए मिले, शरीर में सिर के नाम पर कुछ भी नहीं था। 6 पसलियां टूट हुई मिली, इसके साथ ही पीठ में 8 से 10 चोट के निशान थे। नसीम – सिर और चेहरे की हड्डियां टूटी हुई थीं। 3 से 4 पसलियां टूटी मिली, दोनों पैरों व पीठ में चोट के निशान मिले। ज्यादा खून बहने से मौत हो गई। शशि -सीने में चोट के निशान थे, बाया हाथ टूटा हुआ था, पेट के निचले हिस्से की हड्डियां टूटी हुई थीं, शरीर में 8 से 9 चोट थीं। …………………………. ये भी पढ़ें – कानपुर में NIA की 12 ठिकानों पर रेड:हरियाणा नंबर की कार मिली, ATS ने प्रयागराज समेत 7 जिलों के मदरसों की रिपोर्ट मांगी दिल्ली ब्लास्ट के बाद लेडी टेररिस्ट डॉ. शाहीन सईद के मददगारों की जांच में सुरक्षा एजेंसियां जुट गई हैं। कानपुर में ATS और NIA की टीमों ने 12 से अधिक जगहों पर छापेमारी की है। इस दौरान हितकारी नगर से हरियाणा नंबर की एक कार भी बरामद की। इसके अलावा, ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को लेटर लिखकर सभी मदरसों से विस्तृत जानकारी मांगी है। कानपुर मेडिकल कॉलेज (जीएसवीएम) छोड़कर बिना बताए गायब होने वाले 7 डॉक्टरों से भी पूछताछ की गई। डॉक्टरों ने मेडिकल कॉलेज छोड़ने का कारण कम सैलरी और ज्यादा खर्च बताया। पढ़िए पूरी खबर….
अनुज ने 18 नवंबर की सुबह हुए हादसे की कहानी सुनानी शुरू की। उन्होंने कहा- बस में ड्राइवर के बाद 5 सीट छोड़कर हमें स्लीपर बर्थ मिली थी। खिड़की की तरफ पत्नी गुड्डी लेटी थी। उसके पैर पर सिर रखकर बेटा अनुज लेटा हुआ था। मैं बाहर की तरफ लेटा था। मेरे हाथ पर सिर रखकर 3 साल की बेटी हिमांशु लेटी थी, जबकि डेढ़ साल की बेटी तनिष्का मेरे सीने पर सो रही थी। आगरा बस अड्डे से निकलने के बाद करीब 2.30 घंटे तक बस हाईवे पर दौड़ती रही। यही कोई सुबह के 3.30 बज रहे होंगे। बस बहुत तेजी से लहराई, हमें लगा कि बस के आगे कोई जानवर आ गया। लेकिन 5 मिनट के अंदर बस फिर से लहराई। अब बस में लेटी तकरीबन सभी सवारियां जाग गईं थीं। धड़ाम की आवाज आई, चीख-पुकार मच गई बस एक तरफ गिरने लगी। हमारे कुछ भी समझने से पहले धड़ाम से आवाज आई। बस पलट चुकी थी। इसके बाद अंधेरा छा गया। बस के अंदर रोशनी नहीं थी। मैं जब संभला, तो देखा कि लोग एक-दूसरे के ऊपर पड़े हुए थे। सभी के शरीर से खून बह रहा था। कोई मदद के लिए चीख रहा था, तो कोई रो रहा था। तभी मुझे अपनी बेटियों के रोने की आवाज सुनाई पड़ी। लेकिन मैं उन्हें ढूंढ नहीं पा रहा था। पत्नी शायद बेसुध हो गई थी। बेटे की आवाज भी सुनाई नहीं पड़ रही थी। मैं इधर-उधर हाथ मारकर बेटियों को ढूंढने की कोशिश करने लगा। करीब 20 मिनट बाद थाने की फोर्स पहुंची तब हमें मदद मिली। बस के हिस्सों को काटकर लोगों को बाहर निकाला जाने लगा। मुझे और मेरी बेटियों को पुलिस ने बाहर निकाला। पैर खिड़की से बाहर निकला, इससे घाव हुए
यह सब होने तक उजाला हो चुका था, जिस खिड़की के पास पत्नी लेटी हुई थी। उसका शीशा टूट गया था, पत्नी का पैर खिड़की से बाहर निकल गया था, इसलिए शीशे की धार से उसमें गहरे घाव हो गए थे। बाद में मेरी पत्नी का पैर काटना पड़ा। बेटा अनुज पत्नी के पैरों पर सिर रखकर लेटा था। उसकी बॉडी वहीं मिली। दरअसल, हादसे के बाद बस जिस तरफ पलटी, उधर की खिड़की के शीशे भारी चीज से टकराकर पहले ही टूट गए थे। हमें ऐसा लग रहा है कि अनुज का सिर उस खिड़की से बाहर की तरफ निकल गया था। बस पलटने से उसका सिर बस के ही भारी पैनल के नीचे आ गया। पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने बताया कि अनुज का सिर पूरी तरह से कुचल गया था। यहां सिर्फ बॉडी ही आ सकी थी। गर्दन की खाल को देखकर ऐसा नहीं लगा कि किसी चीज से कटा हो, बल्कि ये तो उखड़ ही गया था। दादा का दर्द- मेरे घर का चिराग बुझ गया
पोस्टमॉर्टम के बाद अनुराग का शव सफेद कपड़े में लिपटा हुआ बाहर निकला, तो बाबा शौकी चौधरी का सब्र टूट गया। उसकी बॉडी टीनशेड के नीचे रखी गई थी। पोते की लाश को एक टक निहारते हुए उनकी आंखों से आंसू छलक रहे थे। परिवार के लोगों ने उन्हें ढांढस बंधाया, तो वह बिलख-बिलखकर रोने लगे। चिल्ला कर बोले- मेरा सब कुछ लुट गया। घर का चिराग ही बुझ गया। जो बच्चा मेरी गोद में खेलकर बड़ा हुआ, आज उसकी अर्थी उठानी पड़ रही। मेरी बहू भी मौत से लड़ाई लड़ रही है। बेटे संजय ने उन्हें हिम्मत बंधवाकर एक कोने में बैठा दिया। संजय ने उन्हें बताया कि ICU में गुड्डी को होश आ गया है। वह अपने बेटे के बारे में पूछ रही है। उसे यही बताया गया कि अनुराग घायल है, उसका इलाज चल रहा है। पिता बोले- जिसे मेरा अंतिम संस्कार करना था, वही चला गया अनुराग की बॉडी को अंतिम संस्कार के लिए परिजन नजीराबाद के हिंदू कब्रिस्तान लेकर जाने लगे तो पिता अनुज चौधरी का कलेजा मानो फट सा गया। उन्होंने बेटे के पैर पकड़कर उसे रोकने का प्रयास किया, फिर बोले- मैं भी अपने बेटे को आखिरी विदाई देने जाऊंगा। परिवार के लोग उन्हें हॉस्पिटल जाने के लिए कहते रहे। लेकिन वह शव वाहन में बैठ गए। बड़े भाई संजय अपने सीने में उमड़ रहे गम को छिपाकर उन्हें समझाने लगे, तो अनुज बोले- इसकी जिम्मेदारी तो मेरा अंतिम संस्कार करने की थी, ये कैसे जा सकता है? इसके बाद घर वालों ने उसे किसी तरह शव वाहन से उतारा। अनुज की बदहवास हालत को देख एक पारिवारिक सदस्य उसके साथ वहीं पर रुक गए। पिता का आरोप- आगरा में ड्राइवर बदला, वो नशे में था
अनुज ने बताया कि हादसे की रात आगरा के एक होटल में बस रोकी गई थी। यहां बस का ड्राइवर बदल गया था, दूसरा ड्राइवर बस को चला रहा था। वो हम लोगों को नशे में लग रहा था। उस होटल में बैठकर वो शराब पी रहा था। इस दौरान पोस्टमॉर्टम हाउस में मौजूद बिल्हौर थाने के दरोगा वीरेश कुमार से उन्होंने कई बार पूछा कि वो ड्राइवर गिरफ्तार हुआ क्या, जिसकी वजह से यह हादसा हुआ? दरोगा ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। अब हादसे में जान गंवाने वाले 2 और लोगों की कहानी… सउदी में जॉब करने जाने वाला था शशि, इकलौता बेटा था इस एक्सीडेंट में मारे गए सीवान के मीरपुर (बिहार) के रहने वाले शशि कुमार (26) ने भी जान गंवा दी। उनके चचेरे भाई अंकुर गिरी और कानपुर मे रहने वाले रिश्तेदार आलोक गोस्वामी पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे। उन्होंने बताया कि शशि पूरे परिवार का इकलौता बेटा था। पिता धर्मेंद्र सिंह की कई सालों पहले मौत हो चुकी है। परिवार में मां ऊषा देवी व तीन बहने हैं। शशि गुवाहटी में पेपर मिल में सुपरवाइजर था। वह सऊदी अरब में नौकरी के लिए जाने वाला था, मेडिकल कराने के लिए करीब 10 दिन पहले वो दिल्ली गया था। दिल्ली से वह बिहार अपने घर जाने के लिए निकला था, तभी यह हादसा हो गया। इकलौते बेटे की मौत की खबर से मां सदमे में चली गई है। बेटे की मौत के बाद कानपुर आने की हिम्मत नहीं जुटा सके पिता
पूर्वी चंपारण के डुमरिया घाट, दंगलपुर गांव में रहने वाले नसीम (26) की भी इस एक्सीडेंट में मौत हो गई। वो बीटेक छात्र था। मौत की जानकारी उसके पिता सोहेल अहमद को दी गई। लेकिन वह कानपुर आने की हिम्मत नहीं जुटा सके। बड़ा भाई वसीम, मामा असजद अली, फूफा जाने आलम पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचे थे। कंधे पर छोटे भाई के जनाजे का बोझ वसीम से उठाया नहीं जा रहा था। भाई का क्षत-विक्षत शव देख वह टूट चुके थे। उन्होंने बताया कि नसीम गलगोटिया इंस्टीट्यूट से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग कर रहा था। यह उसका पहला समेस्टर था। कुछ दिन पहले कॉलेज में छुट्टियां शुरू हो गई थीं, साथ ही नसीम के दोस्त की बहन की शादी भी थी। जिसमें शामिल होने के लिए वह घर आ रहा था। घर आने से पहले उससे फोन पर बात हुई थी, जिस पर उसने बताया कि था कि शादी में जाने के लिए उसने नई जैकेट ली है। क्या पता था कि नई जैकेट वह पहन ही नहीं सकेगा। अब जान गंवाने वाले 3 लोगों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट जानिए… अनुराग – अनुराग का बायां हाथ और दोनों पैर टूटे हुए मिले, शरीर में सिर के नाम पर कुछ भी नहीं था। 6 पसलियां टूट हुई मिली, इसके साथ ही पीठ में 8 से 10 चोट के निशान थे। नसीम – सिर और चेहरे की हड्डियां टूटी हुई थीं। 3 से 4 पसलियां टूटी मिली, दोनों पैरों व पीठ में चोट के निशान मिले। ज्यादा खून बहने से मौत हो गई। शशि -सीने में चोट के निशान थे, बाया हाथ टूटा हुआ था, पेट के निचले हिस्से की हड्डियां टूटी हुई थीं, शरीर में 8 से 9 चोट थीं। …………………………. ये भी पढ़ें – कानपुर में NIA की 12 ठिकानों पर रेड:हरियाणा नंबर की कार मिली, ATS ने प्रयागराज समेत 7 जिलों के मदरसों की रिपोर्ट मांगी दिल्ली ब्लास्ट के बाद लेडी टेररिस्ट डॉ. शाहीन सईद के मददगारों की जांच में सुरक्षा एजेंसियां जुट गई हैं। कानपुर में ATS और NIA की टीमों ने 12 से अधिक जगहों पर छापेमारी की है। इस दौरान हितकारी नगर से हरियाणा नंबर की एक कार भी बरामद की। इसके अलावा, ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को लेटर लिखकर सभी मदरसों से विस्तृत जानकारी मांगी है। कानपुर मेडिकल कॉलेज (जीएसवीएम) छोड़कर बिना बताए गायब होने वाले 7 डॉक्टरों से भी पूछताछ की गई। डॉक्टरों ने मेडिकल कॉलेज छोड़ने का कारण कम सैलरी और ज्यादा खर्च बताया। पढ़िए पूरी खबर….