अखिलेश ने सास-बहू वाली बोलकर स्मृति को दिया मौका:अमेठी हारने के बाद साइडलाइन थीं; क्या टीवी की तुलसी कमबैक करेंगी?

अखिलेश यादव ने जैसे ही संसद में कहा- वो ‘सास-बहू वाली’ तो हार गई, सदन में ठहाके गूंज उठे। निशाने पर थीं स्मृति ईरानी। अमेठी से लोकसभा चुनाव हारने के बाद स्मृति भले ही सक्रिय राजनीति में कम दिखीं, लेकिन टीवी की दुनिया में उन्होंने फिर वापसी की। उनका शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ नए सीजन के साथ फिर चर्चा में है। कभी राहुल गांधी को हराने वाली स्मृति अब अमेठी में नजर नहीं आतीं। ऐसे में सवाल उठता है- क्या टीवी की ‘तुलसी’ फिर से कमबैक करेंगी? क्या अमेठी की हार उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बन चुकी है? अखिलेश ने संसद में उनका नाम क्यों लिया? संडे बिग स्टोरी में स्मृति ईरानी को जानिए… पॉलिटिकल बैकग्राउंड वाली फैमिली पापा कांग्रेस में सदस्य, मां BJP में
स्मृति दिल्ली की मिडिल क्लास फैमिली में पैदा हुईं। पिता अजय कुमार मल्होत्रा पंजाबी और महाराष्ट्रियन बैकग्राउंड से थे। उनकी मां शिबानी बागची बंगाल के परिवार से थीं। यही वजह है कि स्मृति की बचपन से पंजाबी, मराठी और बांग्ला भाषा पर पकड़ मजबूत हो गई। पिता कांग्रेस के मेंबर थे, लेकिन मां BJP में एक्टिव थीं। नाना भी संघ के स्वयंसेवक रहे थे। स्मृति पर उनकी मां और नाना का ज्यादा प्रभाव रहा। टीवी सीरियल में एक्टिव संस्कारी बहू की पहचान से फायदा
स्कूलिंग पूरी करने के बाद स्मृति टीवी की दुनिया में एक्टिव हुईं। साल- 2000 में ‘आतिश’ और ‘हम हैं कल आज और कल’ सीरियल में दिखीं। लेकिन, उन्हें पहचान ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ सीरियल से मिली। 2002 तक ये सीरियल घर-घर देखा जाने लगा। ये वो वक्त था, जब स्मृति को उनके असली नाम से नहीं, सीरियल के किरदार ‘तुलसी’ के नाम से पहचाना जाने लगा था। पॉलिटिक्स में एंट्री दिल्ली से पहला चुनाव लड़ा
स्मृति पूरे देश में पॉपुलर हो चुकी थीं। यही वो वक्त था, जब उन्होंने पॉलिटिक्स में कदम रखा। 2003 में उन्होंने BJP की सदस्यता ली। पार्टी में उनका प्रभाव इतनी तेज बढ़ा कि 2004 में उन्हें महाराष्ट्र भाजपा युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष बना दिया गया। चूंकि स्मृति दिल्ली की रहने वाली थीं, इसलिए उन्होंने अपना पहला चुनाव चांदनी चौक सीट से 2004 में लड़ा। उन्हें कांग्रेस के कपिल सिब्बल के हाथों हार का सामना करना पड़ा। सीरियल से फेमस हुईं महिला मोर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं
साल 2004 से 2010 तक BJP की केंद्र में सत्ता नहीं थी, लेकिन स्मृति पार्टी का प्रचार करती रहीं। 2008 में सीरियल ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थीं’ बंद हो गया। लेकिन, स्मृति की पहचान संस्कारी बहू के रूप में घर-घर तक पहुंच चुकी थी। अब वे गुजरात और महाराष्ट्र में ज्यादा एक्टिव हो गईं। इसका फायदा उन्हें 2010 में मिला। उन्हें BJP महिला मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। 2011 में पार्टी ने उन्हें गुजरात से राज्यसभा भेज दिया। इसके बाद स्मृति ईरानी अलग तेवर में नजर आने लगीं। कांग्रेस पर लगातार हमलावर रहीं। खासकर, राहुल गांधी को लेकर बयान देती नजर आईं। राजनीति में कद बढ़ा राहुल गांधी से हारीं, फिर भी केंद्रीय मंत्री बनीं
यही वजह है कि जब 2014 के लोकसभा चुनाव आए, तब स्मृति को कांग्रेस की पारंपरिक सीट अमेठी से चुनाव लड़ने भेजा गया। राहुल गांधी यहां से 2 बार सांसद चुने जा चुके थे। 2014 में BJP की केंद्र में सरकार बनी, लेकिन स्मृति राहुल गांधी के सामने हार गईं। हार के बाद भी स्मृति सुर्खियों में आ गई थीं। दरअसल, 2009 में राहुल 3.70 लाख मार्जिन से चुनाव जीते थे। वहीं, स्मृति के सामने ये अंतर 1.07 लाख रह गया। यही वजह थी कि चुनाव हारने के बावजूद स्मृति को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। राहुल गांधी से हारने के बाद भी स्मृति अमेठी में सक्रिय रहीं। बीच-बीच में वहीं रहने लगीं। कार्यकर्ताओं के घर जाकर उनसे मिलतीं, उनकी मदद करतीं। जब 2019 का लोकसभा चुनाव आया, तो स्मृति ने इतिहास पलट दिया। राहुल गांधी चुनाव हार गए। स्मृति ईरानी को 4 लाख 68 हजार वोट मिले। उन्होंने 55 हजार वोट से जीत हासिल कर ली। इस जीत ने स्मृति का कद बहुत बड़ा कर दिया। केंद्र सरकार में वे महिला और बाल विकास मंत्री बनाई गईं। 2024 में चुनाव हारीं अमेठी में सिर्फ 1 बार आईं
2024 के लोकसभा चुनाव में स्मृति ने फिर से अमेठी से दावेदारी की। इस बार कांग्रेस से राहुल गांधी नहीं, उनके सांसद प्रतिनिधि रहे किशोरी लाल शर्मा मैदान में उतरे। उन्होंने स्मृति ईरानी को 1.67 लाख वोट से हरा दिया। इस हार के बाद स्मृति ईरानी सिर्फ 1 बार अमेठी गईं। 26 मई, 2025 को अहिल्याबाई होल्कर जयंती पर वे अमेठी गई थीं। यहां कार्यकर्ताओं से मुलाकात की थी। इसके बाद से दोबारा वहां नहीं गईं। अमेठी में BJP के जिला उपाध्यक्ष प्रवीन कुमार सिंह बताते हैं- अमेठी में स्मृति दीदी की ही टीम काम कर रही है। वे लगातार सबके संपर्क में रहती हैं। क्या कुछ हो रहा है, उसकी जानकारी लेती रहती हैं। अमेठी से उनका लगाव कम नहीं हुआ है। वे अभी भी अलग-अलग राज्यों में BJP का प्रचार कर रही हैं। वे आगे अमेठी से ही चुनाव लड़ेंगी। टीवी में फिर एक्टिव हुईं सास भी कभी बहू थी, सीजन-2 से फेमस हुईं
स्मृति न तो अब सांसद हैं और न सरकार में। संगठन में भी उन्हें कोई पद नहीं दिया गया। स्मृति एक कार्यकर्ता की तरह लगातार पार्टी के लिए काम करती रहीं। पार्टी में उनकी सक्रियता पहले जैसी नहीं दिख रही थी। यही वक्त उनकी लाइफ का टर्निंग पॉइंट भी बना। स्मृति पॉलिटिक्स से टीवी की तरफ चल पड़ीं। 29 जुलाई, 2025 को स्मृति ‘तुलसी विरानी’ के मशहूर किरदार में एक बार फिर टीवी पर नजर आईं। ये ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ का दूसरा सीजन था। एक बार फिर वो संस्कार और चुनौतियों के खिलाफ खड़ी होने वाली महिला के किरदार में घर-घर देखी जाने लगीं। इस सीरियल की पॉपुलैरिटी इस तरह से समझी जा सकती है कि ये स्टार प्लस के टॉप-3 शोज में शामिल है। इसकी TRP 3.2 है और OTT जियो हॉटस्टार पर ‘मोस्ट वॉच्ड’ शो की लिस्ट में नंबर 1 पर ट्रेंड कर रहा है। भाजपा ने बंगाल चुनाव में स्टार प्रचारक बनाया
स्मृति को एक बार फिर टीवी पॉपुलैरिटी का फायदा मिला। भाजपा ने बंगाल विधानसभा चुनाव में उन्हें स्टार प्रचारक बनाया। वे BJP कैंडिडेट के लिए रैली और रोड शो कर रही हैं। वे बांग्ला में भाषण देकर जनता से सीधे कनेक्ट हो पा रही हैं। वे पब्लिक में खासकर महिलाओं के बीच फेमस हैं। इसके पहले बिहार में भी स्मृति को पार्टी ने स्टार प्रचारक बनाया था। हालांकि, महाराष्ट्र चुनाव में वे स्टार कैंपेनर की लिस्ट में नहीं थीं। स्मृति को क्यों कहना पड़ा… सीरियल से हटकर संसद पर ध्यान लगाएं
महिला आरक्षण लागू करने के लिए लोकसभा में संविधान संशोधन बिल पर चर्चा हो रही थी। 16 अप्रैल को अखिलेश यादव ने संसद में कहा- अगर सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी, तो महिलाओं में ही कंपटीशन बढ़ जाएगा। BJP सांसदों की तरफ से आवाज आई- वो तो होना ही चाहिए। अखिलेश ने हंसते हुए कहा- आपकी वो सास-बहू वाली तो हार गई…। यहां अखिलेश का ‘सास-बहू वाली’ से मतलब स्मृति ईरानी से था। इस टिप्पणी के 1.30 घंटे बाद स्मृति ने जवाब दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- “सुना है, आज अखिलेशजी ने संसद में मुझे याद किया…अच्छा है। जिनको राजनीति धरोहर में मिली, वे उनको भी याद करते हैं जो अपने दम पर आसमान में सुराख करते हैं। कामकाजी औरत पर वे टिप्पणी करते हैं, जिन्होंने जिंदगी में कभी कोई नौकरी नहीं की। सीरियल से हटाकर संसद पर ध्यान लगाएं। महिलाओं के संबल के लिए अहम बिल पास कराएं।” अगले दिन यानी 17 अप्रैल को अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर एक शायरी पोस्ट की। लिखा- “हर बात से अगर साजिश की बू आई न होती,
यकीं करते लोग अगर बात जुमलाई न होती,
दरअसल अगर अवाम से दोस्ती निभाई होती,
तो इतनी जल्दी विदाई की घड़ी आई न होती।” (अखिलेश की इस पोस्ट को भी स्मृति से जोड़कर देखा जा रहा है।) स्मृति बोलीं- उनका विपक्ष में रहना पक्का
17 अप्रैल को स्मृति ईरानी वाराणसी पहुंची। वहां उन्होंने कहा- मुझ जैसी कामकाजी महिला ने कांग्रेस के गढ़ अमेठी में जाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष को हराया। अगर आप इतना दम रखते हैं तो पैतृक सीट छोड़कर गोरखपुर से लड़कर दिखाएं। हम जैसी महिलाओं पर टिप्पणी करना आसान है, खासकर उनके लिए जिन्होंने कभी कोई नौकरी न की हो। हम लोग टैक्स भरते हैं, इसलिए नहीं कि लोकसभा के अंदर सास-बहू की बातें हों। संसद में जाकर अपने संसदीय काम पर ध्यान देना चाहिए। मुझे इसकी खुशी है कि उनका यूपी में विपक्ष में रहना सुनिश्चित है, क्योंकि यूपी की राजनीति करने वाले गांव-गांव घूमते-घूमते इतना वक्त बीता देते हैं कि एक गंभीर नेता को सीरियल देखने का टाइम नहीं मिलता है। अमेठी के लोग क्या कहते हैं… स्मृति की टीम एक्टिव, जनता उन्हें याद कर रही
स्मृति ईरानी की सक्रियता को लेकर हमने अमेठी में कई लोगों से बात की। सीनियर जर्नलिस्ट विंदेश्वरी मिश्रा कहते हैं- अमेठी की जनता स्मृति ईरानी को याद कर रही है। इसकी बड़ी वजह ये है कि 2024 में जनता ने जिस सोच के साथ किशोरी लाल शर्मा को जिताया था, वे उस पर खरे नहीं उतरे। जनता को 2019 से 2024 का कार्यकाल याद आ रहा है। स्मृति विकास के लिए यहां लगातार काम करती थीं। ————————- ये खबर भी पढ़ें… कानपुर में फिल्मी स्टाइल में होता था किडनी ट्रांसप्लांट, फ्लाइट से टीम आती; हॉस्पिटल स्टाफ की छुट्टी कर देते थे कानपुर में पुलिस ने अवैध किडनी ट्रांसप्लांट का खुलासा किया। सिंडीकेट से जुड़े लोग गरीब, जरूरतमंदों को लालच देकर किडनी बेचने के लिए तैयार करते थे। अहम बात यह थी कि ट्रांसप्लांट करने वाले स्पेशलाइज्ड सर्जन नहीं, ओटी टेक्निशियन थे। पूरी खबर पढ़ें…