यूपी विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने में सिर्फ 8 महीने शेष हैं। सभी पार्टियां चुनाव की तैयारी में जुट गईं हैं। दैनिक भास्कर के सबसे बड़े सर्वे के नतीजों में सामने आया कि यूपी में भाजपा लोगों की पहली पसंद है, लेकिन 2027 चुनाव जीतने के लिए विधायकों के चेहरे बदलने होंगे। लोग मंत्रियों और विधायकों से नाराज दिखे। सर्वे में सपा की सीटें भी बढ़ती दिख रहीं हैं। ज्यादा नुकसान भाजपा की सहयोगी पार्टी सुभासपा और निषाद पार्टी को हो रहा है। इसका फायदा भाजपा को होता हुआ दिख रहा है। सर्वे की आखिरी कड़ी में पढ़िए पूरा एनालिसिस… 1. पब्लिक से दूरी बनाने वाले ज्यादातर विधायकों से नाराजगी भाजपा के 257 विधायक हैं। सर्वे में 222 विधायकों से लोग नाराज दिखे। उनके काम नहीं करने और व्यवहार ठीक नहीं होने को लोगों ने इसकी वजह बताया। वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी भी कहते हैं, ’विधायक जनता के हमदर्द नहीं बन पाए। जो विधायक लोगों की समस्याओं को समझने के लिए लग्जरी गाड़ियों से उतरे ही नहीं, ऐसे विधायकों के खिलाफ नाराजगी स्वाभाविक है।’ वह कहते हैं, ‘मौजूदा सरकार के पिछले 4 साल के कार्यकाल को देखें तो विपक्ष भी जनहित के मुद्दे पर कोई बड़ा आंदोलन नहीं कर पाया। जबकि यूपी की तहसीलों, थानों और ब्लॉकों में लोग अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर चक्कर काटने को मजबूर रहे।’ सपा के 105 विधायकों में से 91 से लोग नाराज दिखे। जब-जब टिकट कटे, चुनाव में फायदा हुआ 2. हिन्दुत्व, विकास की छवि अब भी असरकारी सर्वें रिजल्ट में सामने आया कि भले ही पक्ष-विपक्ष के 88% विधायकों से लोगों की नाराजगी दिख रही हो, लेकिन पार्टी के तौर पर अभी भी लोगों की पहली पसंद भाजपा है। वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं, ‘अब चुनाव बड़े नेताओं के नाम पर होने लगे हैं। प्रत्याशी के चेहरे पीछे हो गए हैं। जैसे यूपी भाजपा में सीएम योगी आदित्यनाथ और सपा में अखिलेश यादव का बड़ा चेहरा है। जब से बड़े चेहरे और पार्टी के आधार पर लोग वोट देने लगे, तब से विधायक विकास कार्यों को लेकर लापरवाह हो गए हैं।’ वह आगे कहती हैं, ‘एक विधायक को अपने क्षेत्र में जितना काम कराना चाहिए और जिस तरीके से सक्रिय रहना चाहिए, वो दिखते नहीं हैं। पीएम मोदी और यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ हिन्दुत्व और विकास की छवि के चलते यूपी में अब भी भाजपा लोगों की पहली पसंद बनी हुई है। 3. सपा की सीटें बढ़ीं, लेकिन पश्चिमी में नुकसान सर्वे में सपा की सीटें बढ़ती हुई दिख रही हैं। सपा विधायक 105 से 135 तक पहुंच रहे हैं। सपा को ये फायदा पूर्वांचल, अवध, ब्रज, कानपुर-बुंदेलखंड में हुआ। सपा को पश्चिमी यूपी में अपने समीकरण दुरुस्त करने होंगे, यहां पार्टी को नुकसान हो रहा है। इसकी वजह पश्चिमी यूपी का सामाजिक समीकरण है। पश्चिमी यूपी में जाट, मुस्लिम, गुर्जर और दलितों की बड़ी आबादी है। मुस्लिम को छोड़ दें तो सपा के पास यहां खुद का कोई बड़ा वोटबैंक नहीं है। पिछली बार आरएलडी से जो गठबंधन हुआ था, वह टूट चुका है। अब सपा जाट व गुर्जरों में पैठ बढ़ाने के लिए नए सिरे से जुटी है। सुनीता ऐरन कहती हैं, ‘पश्चिमी यूपी में कई जिले मुस्लिम बहुल हैं। वहां धुव्रीकरण भी एक फैक्टर बनता है। दूसरा पश्चिमी यूपी में ही ओवैसी और चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) का भी प्रभाव है। भाजपा ने पिछले दिनों पश्चिमी यूपी में काफी काम किया है।’ 4. सहयोगी दलों का जनाधार भाजपा में शिफ्ट होता दिख रहा सर्वे रिजल्ट में भाजपा के सहयोगी दलों को लेकर नया फैक्टर सामने आया। जाति की सियासत करने वाले अपना दल (एस), सुभासपा, निषाद पार्टी और आरएलडी का जनाधार खिसकता दिख रहा है। इन दलों के 33 विधायक हैं। सर्वे रिजल्ट में सिर्फ 3 से जनता खुश दिखी। 30 विधायकों से लोग नाराज थे, हालांकि 8 सीटों पर सहयोगी दल लोगों की पहली पसंद बने। इसका असर ऐसे समझ सकते हैं कि भाजपा के 3 सहयोगी दलों में निषाद पार्टी, सुभासपा और अपना दल (एस) का बड़ा जनाधार पूर्वांचल में है। इनके कमजोर होने से भाजपा को पूर्वांचल में फायदा होता दिख रहा है। सर्वे में ये सीटें भाजपा में शिफ्ट हो रही हैं। सुनीता ऐरन बताती हैं, ‘अब जनता नेशनल पार्टी या बड़ी क्षेत्रीय पार्टी की ओर लामबंद हो रही है। सहयोगी दल में जो भी हैं, वो एक जाति विशेष को लेकर राजनीति कर रहे हैं।’ वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी इसे दूसरे तरीके से समझाते हैं, ‘सहयोगी दल सत्ता में साथ रहकर कई बार दबाव बनाने की राजनीति भी करते रहते हैं। इस कारण उनकी विश्वसनीयता पर सवाल तो खड़ा हो ही जाता है।’ 5. मंत्रियों से ज्यादा उम्मीदें, इसलिए उनके प्रति ज्यादा नाराजगी सर्वे के नतीजों में विधायकों के साथ मंत्रियों से भी नाराजगी सामने आई। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि किसी विधायक के मंत्री बनने पर उस क्षेत्र की जनता की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। लोगों को लगता है कि उनके क्षेत्र में ज्यादा विकास होगा। कार्यकर्ताओं की भी उम्मीदें ज्यादा रहती हैं। वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं, ‘भाजपा यूपी में पिछले 9 साल से सत्ता में है। कई चेहरे ऐसे हैं, जो दूसरी बार मंत्री बने। किसी भी सरकार के एक दशक पूरा कर लेने पर कार्यकर्ताओं की उम्मीदें ज्यादा बढ़ जाती हैं। बड़े मुद्दों पर हिन्दुत्व और विकास की राजनीति तो ठीक लगती है, लेकिन जब कार्यकर्ताओं की छोटी-छोटी शिकायतें भी नहीं सुनी जाती हैं, तो उनकी नाराजगी बढ़ जाती है। ऊपर से मंत्रियों का व्यवहार रूखा हो तो नाराजगी का लेवल हाई हो जाता है।’ वह कहते हैं, ‘ऐसा सरकार, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय की कमी को दिखाता है। यूपी चुनाव में अभी 8 महीने का वक्त है। समय रहते भाजपा ने ये कमी दूर नहीं की, तो मंत्रियों को चुनाव में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।’ यूपी में जाति बड़ा फैक्टर, लेकिन लोगों ने सर्वे में जताया नहीं
भास्कर सर्वे में लोगों ने जाति को बड़ा फैक्टर नहीं माना। विधायकों के पसंद-नापसंद करने की वजह में जाति का विकल्प लोगों ने सबसे कम इस्तेमाल किया। ये बताता है कि अब लोग सिर्फ जाति के फैक्टर को देखकर प्रत्याशी का चयन नहीं करते। जाति ही बड़ा फैक्टर होता तो भाजपा के सहयोगी दल सिमटते हुए नहीं दिखते। संदेश साफ है कि यूपी में कोई दल सिर्फ जाति के सहारे चुनाव नहीं जीत सकता। सर्वे की खबरें पढ़िए- 13 मंत्रियों की सीटों पर नए चेहरे बने पहली पसंद यूपी के 18 चर्चित चेहरों में कौन पसंद-कौन नापसंद गुर्जर-राजभर विधायकों को जनता की ‘न’:यूपी के जो 39 विधायक पसंद ————————— ये खबरें भी पढ़ें – यूपी-403 में से 256 सीटों पर भाजपा पहली पसंद, सपा को 135 सीटें; NDA के सहयोगी दलों को सबसे ज्यादा नुकसान यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दैनिक भास्कर एप के सबसे बड़े सर्वे में फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं। यूपी की 403 सीटों में 256 पर भाजपा पहली पसंद बनी। 135 सीटों पर सपा मजबूत दिख रही है। सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा की सहयोगी पार्टियों को होता दिख रहा है। ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा अपनी सभी 6 सीटों पर पिछड़ती दिख रही है। पढ़िए पूरी खबर…
भास्कर सर्वे में लोगों ने जाति को बड़ा फैक्टर नहीं माना। विधायकों के पसंद-नापसंद करने की वजह में जाति का विकल्प लोगों ने सबसे कम इस्तेमाल किया। ये बताता है कि अब लोग सिर्फ जाति के फैक्टर को देखकर प्रत्याशी का चयन नहीं करते। जाति ही बड़ा फैक्टर होता तो भाजपा के सहयोगी दल सिमटते हुए नहीं दिखते। संदेश साफ है कि यूपी में कोई दल सिर्फ जाति के सहारे चुनाव नहीं जीत सकता। सर्वे की खबरें पढ़िए- 13 मंत्रियों की सीटों पर नए चेहरे बने पहली पसंद यूपी के 18 चर्चित चेहरों में कौन पसंद-कौन नापसंद गुर्जर-राजभर विधायकों को जनता की ‘न’:यूपी के जो 39 विधायक पसंद ————————— ये खबरें भी पढ़ें – यूपी-403 में से 256 सीटों पर भाजपा पहली पसंद, सपा को 135 सीटें; NDA के सहयोगी दलों को सबसे ज्यादा नुकसान यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दैनिक भास्कर एप के सबसे बड़े सर्वे में फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं। यूपी की 403 सीटों में 256 पर भाजपा पहली पसंद बनी। 135 सीटों पर सपा मजबूत दिख रही है। सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा की सहयोगी पार्टियों को होता दिख रहा है। ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा अपनी सभी 6 सीटों पर पिछड़ती दिख रही है। पढ़िए पूरी खबर…