यूपी में सपा सिफारिश नहीं, सर्वे से चुनेगी जिताऊ कैंडिडेट:रिटायर्ड IAS कमान संभाल रहे; कांग्रेस को सिर्फ 70-75 सीटें देने का सुझाव

यूपी में समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संभावित कैंडिडेट्स का सर्वे करवा रही है। टिकट के दावेदार जमीन पर कितने मजबूत हैं, इसको 2 तरह से जांचा जा रहा है। सर्वे की मॉनिटरिंग खुद अखिलेश यादव कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों का दावा है कि इस बार टिकट वितरण में सर्वे और फीडबैक को प्राथमिकता दी जाएगी। सिफारिशें नहीं चलेंगी। सपा उन्हीं चेहरों को मैदान में उतारेगी, जिनका अपने क्षेत्र में मजबूत जनाधार होगा। छवि बेदाग होगी और वो जिताऊ कैंडिडेट होंगे। सर्वे टीम की कमान रिटायर्ड आईएएस आलोक रंजन संभाल रहे हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस को 70 से 75 सीटें देने का सुझाव दिया है। रिटायर्ड IAS कर रहे सपा की मदद
यूपी की 403 विधानसभा सीटों पर सपा अपने संभावित दावेदारों पर काम शुरू कर चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, यूपी सरकार के रिटायर्ड IAS अफसर आलोक रंजन इसकी कमान संभाल रहे हैं। उनकी अगुआई में लखनऊ के गोमतीनगर में एक ऑफिस भी बनाया गया है। यहां लखनऊ की एक यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग के एक प्रोफेसर, 2 रिसर्च स्कॉलर, कई सपोर्ट स्टाफ संभावित चेहरों पर काम तकरीबन पूरा कर चुके हैं। इस टीम ने उम्मीदवारों के सिलेक्शन से जुड़ी एक रिपोर्ट तैयार कर ली है। इसमें सपा के सीटवार संभावित प्रत्याशियों के नाम हैं। इस रिपोर्ट में इस तरह के सवालों का जिक्र है। जैसे- इस रिपोर्ट को सपा संगठन की कोर कमेटी के सामने रखा जाएगा। इसके बाद ही तय होगा कि किस सीट पर कौन सपा का कैंडिडेट होगा। गठबंधन होने पर सपा 70-75 सीटें कांग्रेस को दे सकती है
रिटायर्ड IAS अफसर की टीम ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि सपा का 2022 के विधानसभा चुनाव में यूपी की करीब 71 सीटों पर प्रदर्शन कमजोर रहा था। अगर सपा का कांग्रेस से गठबंधन होता है, तो कांग्रेस 100 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का दबाव बना सकती है। जबकि सपा की कोशिश होनी चाहिए कि वह 70 से 75 सीटें ही दे। हालांकि, मुस्लिम बहुल सीटों पर खींचतान हो सकती है। जैसे कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर में कांग्रेस पार्टी जीत गई थी, अमरोहा में कांग्रेस पार्टी का प्रत्याशी नंबर 2 पर रहा था। ऐसे में कांग्रेस इन सीटों की डिमांड कर सकती है। 2022 और 2024 के चुनावों में टिकट वितरण को लेकर हुए विवादों के कारण ही सपा ने इस बार प्राइवेट एजेंसी से सर्वे कराने का फैसला लिया है। यूपी में हुए 2 चुनावों को जानिए… 2022 विधानसभा चुनाव: कैंडिडेट के सिलेक्शन में गुटबाजी हावी रही
2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद सपा के नेताओं ने माना कि टिकट वितरण में चूक हुई। भाजपा या अन्य दलों से आए नेताओं को तुरंत टिकट दिए जाने से पार्टी के पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी देखी गई थी। आरोप लगे कि टिकट बांटने में जमीनी हकीकत या सर्वे के बजाय स्थानीय जिलाअध्यक्षों और बड़े नेताओं की व्यक्तिगत ‘पैरवी’ को तरजीह दी गई। कई जगहों पर गुटबाजी के आधार पर जिताऊ कैंडिडेट की अनदेखी की गई। पार्टी की आंतरिक समीक्षा में सामने आया कि कई सीटों पर बहुत मामूली अंतर से हार हुई। क्योंकि उम्मीदवार स्थानीय स्तर पर उतने लोकप्रिय नहीं थे। उनका बूथ मैनेजमेंट कमजोर था। 2024 लोकसभा चुनाव: पार्टी बार-बार टिकट बदलती रही
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सपा का टिकट वितरण सबसे ज्यादा सुर्खियों और विवादों में रहा। मेरठ, मुरादाबाद, बदायूं और गौतमबुद्धनगर जैसी कई महत्वपूर्ण सीटों पर सपा ने दो से तीन बार अपने उम्मीदवार बदले। मुरादाबाद में मौजूदा सांसद एसटी हसन का टिकट काटकर आखिरी वक्त पर रुचिवीरा को दे दिया, जिससे स्थानीय स्तर पर उथल-पुथल मच गई थी। बदायूं में पहले धर्मेंद्र यादव को टिकट दिया गया, फिर उनका टिकट काटकर शिवपाल सिंह यादव को दिया गया और आखिर में शिवपाल के बेटे आदित्य यादव वहां से चुनाव लड़े। टिकटों की इस अदला-बदली के कारण सपा के भीतर की गुटबाजी खुलकर सामने आ गई थी। कांग्रेस और ‘अपना दल (कमेरावादी)’ की पल्लवी पटेल जैसे सहयोगियों के साथ भी सीटों के बंटवारे और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सार्वजनिक रूप से विवाद सामने आए। सर्वे के बाद सपा को कैंडिडेट चुनना आसान होगा
वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस के मुताबिक, भाजपा-कांग्रेस 15-16 साल से ऐसे सर्वे करा रही हैं। अब सपा भी ऐसी एक्सरसाइज करा रही है। सपा-बसपा पहले पारंपरिक तरीकों से प्रत्याशियों का सिलेक्शन करती थी, जिसमें जिले के स्थानीय नेताओं से फीडबैक लेना होता था। 2022 के चुनाव में सपा ने इस स्ट्रेटजी पर काम किया था, लेकिन ज्यादातर जगह सफलता नहीं मिली। दरअसल, कई बार जिलों से नेताओं का जो फीडबैक आता है, वह पूर्वाग्रह पर आधारित होता है। सर्वे रिपोर्ट से स्थिति स्पष्ट होगी, कैंडिडेट चुनना आसान हो जाएगा। सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं- अखिलेश यादव के लिए सीट नहीं जीत महत्वपूर्ण है। उनके लिए कैंडिडेट की जीत अहम होगी। यानी जिसके चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा होगी, टिकट उसे ही मिलेगा। इसके लिए वह अपने करीबी या कद्दावर नेता का भी टिकट काट सकते हैं। ———————
सपा की ये खबर भी पढ़ें – अखिलेश का ऑफर- विधायकी लड़नी है तो पहले पद छोड़ो:अब तक 4 नेताओं का इस्तीफा; लोकसभा चुनाव के वक्त भी यही दांव खेला था सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पिछले दिनों पार्टी की बड़ी बैठक की। इसमें उन्होंने कहा- पार्टी के जो नेता या संगठन पदाधिकारी 2027 विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं, वो पद से इस्तीफा दें। अपना नाम हाईकमान के आगे रखें। आखिरी निर्णय पार्टी संगठन का होगा। पूरी खबर पढें…