प्रधानों को प्रशासक बनाने पर योगी सरकार से जवाब मांगा:हाईकोर्ट में याचिका, दावा- कार्यकाल खत्म होने पर अधिकार नहीं मिल सकते

यूपी में प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया है। लखनऊ बेंच ने मंगलवार को योगी सरकार से जवाब तलब किया है। 3 जून को फिर मामले की सुनवाई होगी। जज शेखर बी सराफ और अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह आदेश ओमप्रकाश प्रजापति की जनहित याचिका पर शुरुआती सुनवाई के बाद दिया। याचिकाकर्ता ने सरकार के आदेश को कानून की मंशा के खिलाफ कहकर चुनौती दी है। ओमप्रकाश के वकील अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने बताया, अदालत ने इस मामले में पेश हुए सरकारी वकील को राज्य सरकार से निर्देश (जानकारी) लेकर बुधवार को अपना पक्ष पेश करने का निर्देश दिया है। प्रधानों को प्रशासक बनाना कानून के खिलाफ
याचिकाकर्ता ओमप्रकाश का तर्क है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3) (क) के अनुसार, ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तिथि से अधिकतम पांच वर्ष का ही हो सकता है। ऐसे में समय पर पंचायत चुनाव न कराकर मौजूदा प्रधानों को ही प्रशासक बनाए रखना उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने के समान है, जो कानून की मंशा के विपरीत है। अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था
ओमप्रकाश ने कहा कि पहले जब पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे, तो ग्राम पंचायतों के संचालन के लिए एडीओ पंचायत या अन्य सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। इस बार भी किसी सक्षम सरकारी अधिकारी को प्रशासक नियुक्त किया जाना चाहिए, न कि उन ग्राम प्रधानों को जिनका वैधानिक कार्यकाल समाप्त हो चुका है। 25 मई को प्रधान बनाए गए थे प्रशासक यूपी की सभी 57 हजार 694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को खत्म हो गया। इससे एक दिन पहले 25 मई को योगी सरकार ने यूपी में पंचायत चुनाव होने या अगले 6 महीने तक ग्राम प्रधानों को प्रशासक बना दिया।

आदेश में कहा गया था कि प्रशासक यानी ग्राम प्रधान अपने स्तर पर कोई बड़ा या नीति से जुड़ा फैसला नहीं ले सकेगा। अगर किसी जरूरी या विशेष स्थिति में ऐसा फैसला लेना जरूरी हो, तो उसका प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के जरिए जिलाधिकारी को भेजा जाएगा। जिलाधिकारी की मंजूरी मिलने के बाद ही उस पर फैसला लिया जाएगा। अब तक ADO को प्रशासक बनाने की रही है परंपरा क्यों बनी प्रशासनिक समिति? 1. पंचायत चुनाव की वोटर लिस्ट का अंतिम प्रकाशन अभी तक नहीं हुआ है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई तक था, जबकि लिस्ट का अंतिम प्रकाशन 10 जून को होगा। 2. पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए ओबीसी आयोग बनाने का प्रस्ताव कैबिनेट से मंजूर हो चुका है। आयोग बनने के 3 से 6 महीने के अंदर रिपोर्ट पेश करेगा। इसके बाद चुनाव के लिए आरक्षण का निर्धारण होगा। इसमें 6 महीने का समय लग सकता है। 3. सरकार पंचायत चुनाव, विधानसभा चुनाव के बाद कराने पर विचार कर रही है। राजनीतिक दल भी सैद्धांतिक रूप से सहमत हैं। सरकार ने क्यों प्रधानों को बनाया प्रशासक? विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों की विधानसभा सीटों के लिए ग्राम प्रधान किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण कड़ी है। चुनाव जीतने, वोट प्रतिशत बढ़ाने, बूथ प्रबंधन करने, चुनाव प्रचार करने, रैलियों में भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी भी उनके हाथ ही होती है। यदि किसी कर्मचारी को प्रशासक नियुक्ति किया जाता तो निवर्तमान ग्राम प्रधान उतने प्रभावी नहीं होते। वह सत्तारूढ़ दल के लिए उतने मददगार भी साबित नहीं होते। वहीं, चुनाव से पहले गांव में विकास कार्य, सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन का काम भी प्रभावित होता। इसलिए सरकार ने सोच विचार कर ग्राम प्रधान को ही प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया। प्रधान संघ ने भी ‘प्रशासनिक समिति’ बनानी की मांग की थी राष्ट्रीय पंचायतीराज ग्राम प्रधान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश सिंह से इस विषय पर दैनिक भास्कर ने बात की थी। उन्होंने कहा था कि संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने 20 अप्रैल को सीएम योगी से मुलाकात करके प्रशासनिक समिति बनाने की मांग की थी। 16 मई को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी से मुलाकात कर उनके सामने भी यही मांग रखी थी। संगठन के उपाध्यक्ष ललित कुमार शर्मा ने बताया था कि पंचायत चुनाव समय पर न होने पर राज्य सरकार या जिलाधिकारी प्रशासक या प्रशासनिक समिति बना सकते हैं। ऐसा पंचायतीराज एक्ट 1947 की धारा- 12 की उपधारा 3A के तहत किया जाता है। प्रशासनिक समिति में ग्राम प्रधान या सरकार की ओर से निर्धारित अध्यक्ष होते हैं। वहीं, ग्राम प्रधान समेत पंचायत के वार्ड सदस्य, ग्राम पंचायत सहायक को सदस्य बनाया जाता है। प्रशासक नियुक्त होने से आती हैं मुश्किलें प्रधान संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने बताया था कि ग्राम पंचायतों में सरकारी कर्मचारी को प्रशासक नियुक्त करने से ग्रामीणों के सामने कई तरह की समस्याएं आती हैं। सरकारी अधिकारी के प्रशासक नियुक्त होने से वित्तीय अनियमितता की आशंका बढ़ती है। 2021 में प्रशासकों ने 4 हजार करोड़ रुपए खर्च किए, लेकिन उसका हिसाब-किताब नहीं मिला। प्रशासक उस ग्राम पंचायत का निवासी नहीं होता। इसलिए बाहरी व्यक्ति को क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने का पता नहीं होता। अगर किसी की बेटी की शादी है, तो ग्राम प्रधान 50 हजार रुपए दे सकते हैं। लेकिन, प्रशासक यह काम नहीं करते। चुनाव के दौरान भी ग्राम प्रधान आपसी समन्वय से शांति व्यवस्था बनाने, मतदान बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं, लेकिन प्रशासक का लोगों से उतना गहरा संबंध नहीं होता है।
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