समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने अखिलेश यादव के ‘PDA’ फॉर्मूले को फर्जी बताया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा- यूपी की राजनीति में जातिगत गठजोड़ की कोई जगह नहीं। पहले भी अजगर और मजगर जैसे फॉर्मूले प्रयोग हो चुके हैं। अब अखिलेश का ये PDA प्रयोग भी फ्लॉप होगा। असीम अरुण ने NEET पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर हुए जेन-जी आंदोलन का सपोर्ट किया। लेकिन, प्रदर्शन में हुई हिंसा पर चिंता जताई। उन्होंने पुलिस की कार्यशैली और सरकार के रुख को लेकर भी बेबाकी से अपनी राय रखी। पढ़िए पूरा इंटरव्यू… क्या 2027 के चुनाव में अखिलेश का PDA फॉर्मूला जातीय समीकरणों पर असर डालेगा? असीम- जो लोग आज PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का ढिंढोरा पीट रहे हैं, उन्हें इतिहास याद रखना चाहिए। उत्तर प्रदेश में इस तरह के जातीय जोड़-तोड़ पहले भी बहुत आजमाए जा चुके हैं। अगर सपा PDA के सहारे 2027 का चुनाव लड़ रही, तो भाजपा का फोकस किन वर्गों पर है? असीम- भाजपा किसी जातिगत जोड़-तोड़ की राजनीति नहीं करती। हमारी राजनीति केवल चार शब्दों पर टिकी है- ‘सबका साथ, सबका विकास’। बाबा साहेब के दिए हुए संविधान का भाव ये नहीं कि आप तीन जातियों को साधकर सरकार बना लें। संविधान का भाव ये है कि जनप्रतिनिधि हर मोहल्ले और हर समाज के पास वोट मांगने जाए। मैं जब चुनाव में उतरता हूं, तो मुझे पता होता है कि शायद हर घर से वोट न मिले। लेकिन, एक जनप्रतिनिधि होने के नाते मैं हर दरवाजे पर जाता हूं। भाजपा की इसी नीति का नतीजा है कि हमें कभी एक मोहल्ले से ज्यादा समर्थन मिलता है, तो कभी दोनों मोहल्लों से भरपूर प्यार मिलता है। जनता अब जातिगत बांटने वाली राजनीति को समझ चुकी है। मोदी और योगीजी के नेतृत्व में बिना किसी भेदभाव के हर गरीब को योजना का लाभ मिल रहा है। अखिलेश क्यों कह रहे कि भाजपा सरकार में दलितों-पिछड़ों का शोषण हो रहा? असीम- अखिलेश यादव जब 2012 में गलती से मुख्यमंत्री बने, तो महापुरुषों का घोर अपमान किया। उन्होंने बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर, संत रविदास जी, माता महामाया जी, ज्योतिबा फुले जी, छत्रपति शाहू जी महाराज और कांशीराम जी के नाम पर बने जिले, अस्पताल या संस्थान का नाम बदल दिया। ये समानतावादी नहीं, परिवारवादी लोग हैं। इन्हें सिर्फ अपने और अपने परिवार के लिए सत्ता चाहिए। इन्हें दलित और पिछड़ों की याद तभी आती है, जब चुनाव नजदीक हो। NEET मामले पर GenZ के गुस्से को आप किस तरह देखते हैं? असीम- टेक्नोलॉजी हर दौर में बदलती है। NEET परीक्षा में NTA का सिस्टम ठीक से काम नहीं कर पाया। इस बात को हमने स्वीकार किया। सरकार ने तुरंत कार्रवाई की। दोबारा परीक्षा कराई। गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ CBI जांच शुरू हुई। कई आरोपी जेल में हैं। प्रधानमंत्री ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए नंदन नीलेकणि को चुना है। उन्होंने आधार और UPI जैसे बड़े सिस्टम तैयार किए हैं। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में देश में ऐसा बेहतर परीक्षा सिस्टम बनेगा, जिस पर सवाल न उठें। यूपी की बात करें, तो हमने पेपर कराने के पैटर्न में बदलाव किया और पेपर लीक कराने वालों का इलाज भी किया। छात्रों की नाराजगी और पुलिस कार्रवाई के बीच संतुलन कैसे बने? असीम- छात्रों की नाराजगी से मैं 100% सहमत हूं, लेकिन विरोध के हिंसक तरीके से सहमत नहीं हूं। जंतर-मंतर से संसद बहुत करीब है। अगर संसद चल रही हो और प्रदर्शनकारी बैरियर तोड़ने, गाड़ियां तोड़ने या संसद में घुसने की कोशिश करें, तो कोई भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वॉटर कैनन, आंसू गैस के गोले और अन्य तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ता है। हिंसा की तस्वीर कभी अच्छी नहीं होती। आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे? असीम- किसी भी हालत में हिंसक नहीं होना है। अपनी बात मजबूती से रखिए, लेकिन कानून के दायरे में रहकर। मैं आज राजनीति में हूं। जब भी मुझे किसी बात का विरोध करना होता है, तो पहले अपने साथियों से साफ कहता हूं- ‘हम कोई भीड़ या झुंड नहीं हैं। हम एक सिस्टम का हिस्सा हैं, एक अनुशासित सेना हैं।’ ————————— यह खबर भी पढ़ें- संजय निषाद बोले- विधानसभा चुनाव में मुझे सीट नहीं चाहिए, सरकार चाहे तो मेरा मंत्रालय छीन ले; बस निषादों को SC आरक्षण दे संजय निषाद का दावा है कि केवट, मल्लाह, मांझी और मझवार जातियां पहले से SC सूची में दर्ज हैं। लेकिन, यूपी में उन्हें OBC में रखकर उनका हक मारा जा रहा है। उन्होंने कहा कि हमारी मांग नई नहीं है, बल्कि संविधान में दिए अधिकार को लागू कराने की लड़ाई है। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…