सपा 328 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है:कांग्रेस को 75 सीटें देने की तैयारी; इनमें भी कई सीटों पर कैंडिडेट सपा का होगा

विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी 328 सीटों पर कैंडिडेट उतार सकती है। कांग्रेस को 75 सीटें देने की तैयारी है। हालांकि, कांग्रेस का दावा 200 सीटों पर चुनाव लड़ने का है। ऐसे में बीच का रास्ता क्या होगा? इस पर दोनों पार्टियां खामोश हैं। सपा के सोर्स मान रहे हैं कि कांग्रेस को 75 सीटें देने पर विचार चल रहा है। लेकिन, इनमें भी कई सीटों पर सिंबल कांग्रेस का हो सकता है और कैंडिडेट सपा का। अखिलेश यादव इसका संकेत देते हुए कह चुके हैं- यह कहने की वजह भी है। अभी भी यूपी में कांग्रेस के पास जमीन पर संगठन उतना मजबूत नहीं है। जबकि, सपा की राजनीति का केंद्र यूपी रहा है। हाल में SIR के दौरान संगठन की मजबूती दिखा चुकी है। लोकसभा में राहुल केंद्र में थे, विधानसभा में अखिलेश धुरी होंगे लोकसभा चुनाव 2024 में समन्वय समिति में सपा की तरफ से रामगोपाल यादव लीड कर रहे थे। उनके साथ उदयवीर भी अहम भूमिका में थे। विधानसभा चुनाव में कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा? इस पर उदयवीर कहते हैं- यूपी में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी? यह हाईकमान तय करेगा। बड़े लीडर सदन और पार्टी की बैठकों में मिलते रहते हैं। लोकसभा में जो सीन था, वो विधानसभा से बिल्कुल अलग था। लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को केंद्र में रखा गया था। 2027 का चुनाव अखिलेश यादव को केंद्र में रखकर होगा। 2017 विधानसभा में कांग्रेस को 106 सीटें देने पर उदयवीर कहते हैं- वो इतिहास है, परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। कांग्रेस पार्टी के सह प्रभारी श्याम कुमार दौलत कहते हैं- यूपी में गठबंधन तय है, आखिरी फैसला अखिलेश और राहुल गांधी को लेना है। सपा और हमें केंद्रीय नेतृत्व पर भरोसा रखना चाहिए। तो फिर 75 सीटों का गणित कैसे बना, यह समझिए सपा संगठन के पदाधिकारी कहते हैं- लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 17 सीटें दी गई थीं। एक लोकसभा क्षेत्र में 5 विधानसभा सीटें होती हैं। इस फॉर्मूले से कांग्रेस को 85 सीटें मिल सकती हैं। सीधे गणित के हिसाब से हर जिले में 1 विधानसभा सीट दी जा सकती है। लेकिन यहां एक पेच फंस रहा है। कई जिले ऐसे हैं, जहां कांग्रेस का कोई जनाधार ही नहीं है। जैसे मैनपुरी, एटा, इटावा, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद, आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, रामपुर, मुरादाबाद। ऐसे में उसे इन जिलों में सीट किस आधार पर दी जाएगी? ऐसे में कुछ जिलों में कांग्रेस को एक से ज्यादा सीट देकर मैनेज किया जा सकता है। सपा के फॉर्मूले के हिसाब से कांग्रेस के हिस्से में जाने वाली संभावित कुछ सीटें इस तरह हो सकती हैं- कांग्रेस के हिस्से में वो सीटें भी आ सकती हैं, जहां सपा खास कामयाब न रही हो। इनमें पश्चिमी यूपी में नोएडा, हापुड़, गाजियाबाद, बुलंदशहर, मथुरा, आगरा जैसी सीटें हो सकती हैं। इन पर लंबे समय से भाजपा का कब्जा है। साथ ही, प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के प्रभाव से वाराणसी के आसपास की सीटें भी कांग्रेस के हिस्से में जा सकती हैं। इनमें रोहनिया, वाराणसी उत्तर, दक्षिण, कैंट और सेवापुरी आती हैं। सीटों पर फाइनल बातचीत सितंबर में होनी है। इससे पहले इंडिया ब्लॉक की बैठक 8 जून को दिल्ली में हुई थी। उस समय हर दो महीने में एक बार बैठक का निर्णय लिया गया था। इसके हिसाब से अगस्त में ये बैठक होनी थी। लेकिन, अगस्त महीने में संसद सत्र और हंगामों के कारण ये बैठक नहीं हो सकी। सपा अभी तक 150 कैंडिडेट को फाइनल कर चुकी है। 2022 विधानसभा चुनाव में जीते हुए 100 नाम शामिल हैं। 45 नए चेहरे शामिल हैं। अभी आधिकारिक लिस्ट जारी होना बाकी है। कांग्रेस को कम सीटें देने की 3 वजह बताई जा रही हैं- 1- 2017 जैसी गलती नहीं दोहराना चाहती सपा 2017 के चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन था। कांग्रेस के हिस्से में 105 सीटें आई थीं। लेकिन 9 सीटें ऐसी थीं, जहां गठबंधन टूटने के कारण सपा और कांग्रेस दोनों के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ लड़े। इस तरह से कांग्रेस ने कुल 114 सीटों पर चुनाव लड़ा। वहीं, सपा 311 सीटों पर लड़ी। कांग्रेस सिर्फ 7 सीटों पर ही जीत सकी। 2- PDA फैक्टर में सपा खुद 100 सीटों पर दलित-आदिवासी कैंडिडेट चाह रही सपा PDA फैक्टर के साथ चुनाव में है। वह खुद करीब 100 सीटों पर दलित और आदिवासी उम्मीदवार उतारना चाहती है। ये रिजर्व सीटों से अलग होंगी। इसलिए भी सपा ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। 3- बिहार में लेटलतीफी से नुकसान बिहार में सीट बंटवारे में देरी और कांग्रेस की कमजोर पकड़ वाली सीटों पर लड़ने से महागठबंधन को बड़ा नुकसान हुआ था। सपा यूपी में इस गलती से बचते हुए समय रहते फैसला करना चाहती है। सपा, कांग्रेस को सिर्फ वही और उतनी ही सीटें देना चाहती है, जहां उसकी असली मजबूती हो। जिससे गठबंधन की जीत पक्की हो सके। सपा की शर्त मानने के लिए कांग्रेस मजबूर क्यों 2022 के विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने पर कांग्रेस को महज 2 सीटें मिली थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली 6 सीटें सपा के साथ के कारण ही संभव हुईं। कांग्रेस नेतृत्व अकेले लड़कर 2022 का हार वाला रिस्क नहीं लेगा, इसलिए उसे सपा की शर्तों पर मानना ही पड़ेगा। राज्य इकाई भले विरोध करे, लेकिन अंतिम निर्णय राहुल गांधी और अखिलेश यादव ही लेंगे। वहीं, सपा को भी मुस्लिम वोटर का बिखराव रोकने और सीधी लड़ाई से बचने के लिए कांग्रेस का साथ जरूरी है। ————————– यह खबर भी पढ़ें – अखिलेश के सहयोगी दल चवन्नी से रुपया बने या नहीं, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 1 से 6, बसपा 0 से 10 हुई; जयंत-राजभर भी मजबूत हुए कुछ गठबंधन ऐसे किए हम लोगों ने, जाने कहां-कहां से आ गए थे गठबंधन वाले। बताओ, हमने चवन्नी का रुपया बना दिया, तब भी हमें छोड़कर चले गए। – अखिलेश यादव, 16 अगस्त सपा प्रमुख का यह बयान राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी पर तंज था। अब जयंत के समर्थक विरोध कर रहे हैं। बसपा प्रमुख मायावती भी इस बयान पर भड़क गई हैं। उन्होंने अखिलेश को अहंकारी बताते हुए कहा- यह उनके अमर्यादित आचरण का सबूत है। पढ़िए पूरी खबर…