आज शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। रात 12 बजे कान्हा का जन्म उत्सव मनाया जाएगा। मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान पर नंदलाल के जन्म की सभी प्रक्रियाएं रात 12 बजे से कुछ मिनट पहले शुरू होंगी। 11 बजकर 55 मिनट पर 5 मिनट के लिए पट बंद कर दिए जाएंगे। इसके बाद पीतांबर वस्त्र और आभूषण पहनाए जाएंगे। उनका श्रृंगार होगा। यह प्रक्रिया गर्भगृह में पर्दे के पीछे होगी। आधी रात 12 बजे कान्हा का जन्म होगा। इसके बाद पर्दा खोला जाएगा। जन्म आरती की जाएगी। फिर भगवान की प्रतिमा को गर्भगृह से बाहर लाया जाएगा। भक्त दर्शन करेंगे। सोने से सजी चांदी की कामधेनु गाय के दूध से भगवान का अभिषेक किया जाएगा। इसके बाद भगवान को चांदी के कमल पर बिठाकर पंचामृत से स्नान कराया जाएगा। करीब 12.45 बजे प्रतिमा गर्भगृह में रखकर शयन आरती की जाएगी और कपाट बंद कर दिए जाएंगे। शनिवार सुबह करीब 5.30 कपाट फिर खुलेंगे। मथुरा जिला प्रशासन का अनुमान है कि जन्माष्टमी पर 10 लाख से ज्यादा श्रद्धालु आज पहुंचेंगे। जन्मस्थान के गर्भगृह को 200 किलो चांदी और फूल-पत्तियों से सजाया श्रीकृष्ण जन्मस्थान संस्थान के सचिव कपिल शर्मा और सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी ने बताया- कान्हा को समुद्र मंथन से प्राप्त रत्नों की भावना पर आधारित पंचरत्नी पोशाक पहनाई जाएगी। रत्न-जड़ित मुकुट और आभूषणों से उनका श्रृंगार किया जाएगा। गर्भगृह को करीब 200 किलो चांदी और आकर्षक फूल-पत्तियों से सजाया गया है। कान्हा के जन्म के समय मंगल ध्वनि और आनंद संकीर्तन के लिए उज्जैन से डमरू और मृदंग वादकों को बुलाया गया है। श्रद्धालुओं के लिए जन्म अभिषेक का सीधा प्रसारण बड़ी LED स्क्रीन और टीवी चैनलों के माध्यम से किया जाएगा। जन्मस्थान में गोविंद द्वार से प्रवेश, मेन गेट से निकासी श्रीकृष्ण जन्मस्थान में श्रद्धालुओं का प्रवेश गोविंद द्वार गेट नंबर-3 से होगा, जबकि निकासी मेन गेट नंबर-1 से होगी। मंदिर परिसर में मोबाइल, कैमरा, बैग, माचिस, हथियार, बीड़ी-सिगरेट, चाकू और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान नहीं ले जा सकेंगे। सामान और जूता रखने के लिए रूपम सिनेमा, श्री गोविंदम और राधापार्क में व्यवस्था की गई है। परिसर में पेयजल, बैरिकेडिंग, खोया-पाया केंद्र और मेडिकल की सुविधा भी रहेगी। श्रीकृष्ण के 5253वें जन्मोत्सव का संदेश ‘गौ रक्षा-राष्ट्र रक्षा’ मथुरा से लेकर वृंदावन तक भक्ति और उल्लास का माहौल है। मंदिरों और चौराहों को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया गया है। श्रीकृष्ण के 5253वें जन्मोत्सव का संदेश ‘गौ रक्षा-राष्ट्र रक्षा’ पर रहेगा। जन्माष्टमी को लेकर अयोध्या राम मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर से भी विशेष प्रसाद और सामान आए हैं। अयोध्या की राम रसोई से भगवान श्रीकृष्ण के लिए विशेष प्रसाद भेजा गया है। वहीं काशी से लड्डू गोपाल के लिए विशेष मेवा और श्रृंगार सामग्री आई है। ज्योतिषाचार्य कामेश्वर चतुर्वेदी ने बताया- धार्मिक मान्यता के अनुसार द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में मथुरा की जेल में वृषभ लग्न में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। वृंदावन में दिन में होगा अभिषेक वृंदावन के मंदिरों में भी जन्माष्टमी को लेकर विशेष तैयारियां की गई हैं। श्री राधारमण मंदिर में ठाकुर श्री राधारमण देवजू का जन्माष्टमी महोत्सव पारंपरिक वैष्णव विधि और भव्यता के साथ मनाया जाएगा। मंदिर में दिनभर धार्मिक अनुष्ठान होंगे। ठाकुरजी की विशेष सेवा-सज्जा की जाएगी और ब्रज की प्राचीन वैष्णव परंपराओं के अनुसार जन्मोत्सव विधिवत संपन्न होगा। कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त जानिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी इस बार 4 सितंबर (शुक्रवार) को मनाई जाएगी। गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय दोनों के लिए जन्माष्टमी का व्रत और जन्मोत्सव इसी दिन पड़ रहा है। इससे 4 और 5 सितंबर को लेकर बनी तारीख की असमंजस की स्थिति भी खत्म हो गई है। काशी के ज्योतिषाचार्य के अनुसार, जन्माष्टमी तय करने में सिर्फ अष्टमी तिथि देखना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि जन्म के माने जाने वाले मध्यरात्रि समय में अष्टमी तिथि का रहना जरूरी होता है। पंचांग गणना के मुताबिक, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर की भोर 2:25 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहेगी। यानी 4 सितंबर की मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि रहेगी। इसी वजह से जन्माष्टमी का व्रत और भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य उत्सव 4 सितंबर को ही मनाया जाएगा। जन्माष्टमी पर बन रहे हर्षण और वज्र योग 4 सितंबर को दिन की शुरुआत हर्षण योग में होगी, जो दोपहर 3 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। इसके बाद वज्र योग शुरू होगा। यह 5 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। नक्षत्र की बात करें, तो 4 सितंबर को रात 11 बजकर 4 मिनट तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा। इसके बाद मृगशिरा नक्षत्र लग जाएगा। यानी भगवान श्रीकृष्ण की जन्म पूजा के निर्धारित मध्यरात्रि समय में मृगशिरा नक्षत्र और वज्र योग का संयोग रहेगा। पूजा की शुरुआत गौरी-गणेश पूजन और कलश स्थापना से काशी के ज्योतिषाचार्य प्रोफेसर विनय पांडेय के अनुसार, जन्माष्टमी की पूजा केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भक्तिभाव का विशेष महत्व है। भगवान श्रीकृष्ण को बाल रूप में अपने घर के सदस्य और पुत्र के समान मानकर श्रद्धालु उनका प्राकट्य उत्सव मनाते हैं। पूजा की शुरुआत गौरी-गणेश पूजन और कलश स्थापना से की जाती है। गणेशजी का पूजन निर्विघ्नता के लिए किया जाता है, जबकि कलश में वरुण देव का आह्वान किया जाता है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य की प्रतीक्षा की जाती है। कहीं खीरे से, तो कहीं दीप जलाकर होता है कान्हा का प्राकट्य प्रोफेसर विनय पांडेय ने बताया- देश के अलग-अलग हिस्सों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को मनाने की अलग-अलग लोक परंपराएं हैं। कहीं भगवान के जन्म की भावना खीरे से उनका प्राकट्य कराकर की जाती है। वहीं, कहीं अंधेरे कमरे में मध्यरात्रि के समय अचानक प्रकाश करके भगवान के प्रकट होने का भाव व्यक्त किया जाता है। कई जगहों पर बाल गोपाल को दूध या पंचामृत से स्नान कराकर जन्मोत्सव मनाया जाता है। इन परंपराओं के पीछे भक्त की वह भावना होती है, जिसमें वह भगवान को अपने बालक के रूप में स्वीकार करता है। धार्मिक दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण को अजन्मा माना गया है। इसलिए उनका जन्म सामान्य जीव की तरह जन्म न होकर भगवान के प्राकट्य और अवतार की लीला माना जाता है। व्रत के साथ करें कृष्ण नाम का संकीर्तन BHU ज्योतिष विभाग से जुड़े सुभाष के मुताबिक, जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालुओं को यथासंभव व्रत रखकर भगवान श्रीकृष्ण का संकीर्तन करना चाहिए। भगवान के नामों का स्मरण और भजन-कीर्तन जन्माष्टमी की भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अवसर पर श्रद्धालु ‘श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा’ और ‘गोविंद दामोदर माधवे’ जैसे भगवान के नामों का जाप कर सकते हैं। भगवान को ऋतु के अनुसार उपलब्ध फल, सात्विक पकवान और अन्य सामग्री का भोग लगाया जा सकता है। अर्घ्य और मधुपर्क अर्पित कर भगवान का जन्मोत्सव मनाने की भी परंपरा है।