यूपी में रंगों की राजनीति का चुनाव पर कितना असर?:क्या जाति-धर्म भी प्रभावित होते हैं; पार्टियों ने खुद को रंगों से क्यों जोड़ा

अखिलेश यादव लाल की जगह नीले गमछे में नजर आए। इसे दलितों को साधने की रणनीति की तरह देखा गया। सपा ने अपनी छात्र विंग का रंग भी मेहरून से बदलकर नीला कर दिया। यूपी में पार्टियों ने रंगों का इस्तेमाल अपनी विचारधारा को वोटर्स तक पहुंचाने के लिए किया। भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति को केसरिया (भगवा) रंग अलग पहचान देता रहा है। बसपा की दलित राजनीति को हमेशा नीले रंग से फायदा पहुंचा। सुभासपा पीला और अपना दल (एस) नारंगी-नीले रंगों से अपने वोटर को संदेश देने में हमेशा कामयाब रहे हैं। आखिर रंगों का यह खेल जाति-धर्म के समीकरणों को कैसे प्रभावित करता है? जानेंगे यूपी एक्सप्लेनर में… सवाल-1: यूपी में रंगों की राजनीति कब-कब बदलती रही है? जवाब: आजादी के बाद यूपी की सियासत लंबे समय तक कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही। इसकी पहचान तिरंगे और सफेद खादी से जुड़ी थी। यह पार्टी की गांधीवादी विचारधारा का प्रतीक था। हालांकि, समय के साथ यूपी में अन्य पार्टियों का उदय हुआ। इसके साथ ही रंगों की सियासत भी बदलती गई। इसे ऐसे समझ सकते हैं… नीला रंग- आंबेडकर से कांशीराम तक का सफर दलित राजनीति की शुरुआत से ही नीला रंग उसके साथ जुड़ा हुआ है। डॉ. आंबेडकर ने 1942 में जब ‘शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया पार्टी’ बनाई, तब पार्टी का झंडा नीला था। 1956 में बनी रिपब्लिकन पार्टी का झंडा भी नीला था। बसपा के संस्थापक सदस्य ऋषिकर भारती बताते हैं कि नीला झंडा और हाथी निशान दोनों रिपब्लिकन पार्टी के कॉन्सेप्ट थे। इसी वजह से 1984 में कांशीराम जी ने बसपा की गठन करने समय इसे प्रतीक के तौर पर घोषित किया। तब से नीला रंग अंबेडकरवाद और दलित चेतना से जुड़कर बसपा की स्थायी पहचान बन गया। भगवा रंग- हिंदुत्व की राजनीति का उभार 1980 में भाजपा का गठन हुआ और पार्टी ने भगवा रंग को अपनी पहचान बनाया। पार्टी इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़ा बताती है। वहीं, आलोचक भगवा रंग को हिंदूवादी विचारधारा और RSS से जोड़कर देखते हैं। लाल रंग- समाजवाद की पहचान मार्च, 1948 में कांग्रेस के नासिक सम्मेलन के बाद राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण (जेपी) जैसे समाजवादी नेता पार्टी से अलग हो गए। उन्होंने ‘सोशलिस्ट पार्टी’ बनाई। जेपी ने वैश्विक क्रांतियों और वामपंथी/समाजवादी आंदोलनों से प्रेरित होकर लाल टोपी पहनना शुरू किया। 1992 में सपा बनी तो लाल टोपी उसकी पहचान बन गई। 2017 के बाद अखिलेश यादव ने इसे और मजबूती से अपनाया। इससे यह रंग सपा की पहचान बन गया। हरा रंग- दोहरी पहचान हरा रंग यूपी में दो अलग संदर्भों में इस्तेमाल हुआ। चौधरी चरण सिंह की पार्टियों में इसे किसान और हरियाली से जोड़ा गया। वर्तमान के आम राजनीतिक विमर्श में हरा रंग मुस्लिम पहचान और अल्पसंख्यक-केंद्रित राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। सवाल-2: अलग-अलग जाति और धर्म के लोगों पर रंगों का क्या असर पड़ता है? जवाब: राजनीतिक एक्सपर्ट्स के मुताबिक दशकों से चली आ रही रंगों की राजनीति अब समुदायों की पहचान का हिस्सा बन गए हैं। नीला झंडा देखते ही दिमाग में बसपा-दलित, भगवा देखकर भाजपा और हिंदुत्व जबकि हरे रंग का मुस्लिम समुदाय से जुड़ाव समझ आता है। पार्टियों के रंगों का असर असर सिर्फ खास समुदाय (हिंदू, मुस्लिम, दलित, अगड़ा) तक सीमित नहीं रहता, यह विपक्षी पार्टी को भी उकसाता है। रंग समुदायों पर यह कैसे असर करते हैं, इसे यूं समझ सकते हैं… दलित वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल बताते हैं कि यूपी में करीब 21% दलित हैं और नीले रंग को अपनाने का सबसे सीधा लक्ष्य यही तबका है। नीला रंग डॉ. अंबेडकर की पार्टी और बाद में बसपा के झंडे-चुनाव चिन्ह से जुड़ा होने के कारण दलित वोटर के मन में अपनापन जगाता है। यादव/OBC लाल रंग यूपी में यादव और OBC मतदाताओं में पार्टी के प्रति पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे विश्वास को मजबूत करता है। इसकी जड़ें 1948 के समाजवादी आंदोलन से जुड़ती हैं। लाल रंग उसी संघर्ष और क्रांतिकारी आदर्श की पहचान है। बाद में यह रंग मुलायम सिंह और अब अखिलेश यादव की छवि से इतना गहरा जुड़ा कि यादव-OBC वोटर के लिए लाल टोपी देखना सीधे अपनी पार्टी की पहचान जैसा है। हिंदू रतनमणि बताते हैं कि भगवा रंग का असर सिर्फ अगड़ी जातियों तक सीमित नहीं, बल्कि गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित पर भी फैलता है। यही वजह है कि भाजपा ने 2014 के बाद गैर-प्रभावी OBC और गैर-जाटव अनुसूचित जातियों को भगवा-हिंदुत्व और विकास के इर्द-गिर्द लामबंद करने की रणनीति अपनाई। मुस्लिम हरा रंग मुस्लिम वोटर के लिए भरोसे और इस्लामी परंपरा का प्रतीक है। इसका असर ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों तरह से असर होता है। सपा जैसे दलों ने इसे अपने झंडे में शामिल करके दोहरा संदेश दिया। हालांकि, सपा अपने झंडे के हरे रंग को हरियाली और आशा का प्रतीक बताती है। सवाल-3: राजनीति में रंग इतने अहम क्यों हैं? जवाब: वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सिद्धार्थ कलहंस के मुताबिक… पहचान की सबसे तेज भाषा: रंग किसी भी नीति या भाषण से पहले पहुंचता है। एक झलक में वोटर के दिमाग में पार्टी, विचारधारा और समुदाय का जुड़ाव बैठ जाता है। यही वजह है कि दशकों से हर बड़े दल ने अपने झंडे, चुनाव चिन्ह और नेताओं की पोशाक तक में एक तयशुदा रंग-कोड बनाए रखा है। कम पढ़े और ग्रामीण वोटर तक सीधी पहुंच: यूपी जैसे राज्य में जहां गांव-कस्बों में बड़ी आबादी है, वहां रंग-प्रतीक भाषण या घोषणापत्र से कहीं ज्यादा तेजी से और आसानी से समझ में आने वाला संकेत है। झंडा देखकर ही तय हो जाता है यह किसकी रैली है। संगठन का संकेत: जब रंग-बदलाव सिर्फ एक नेता तक सीमित न रहकर पूरे संगठन (जैसे सपा की छात्र इकाई की ड्रेस बदलना) तक पहुंचता है, तो यह वोटर को भरोसा देता है कि यह पार्टी की सोची-समझी रणनीति है। सवाल-4: क्या रंग पार्टी की हार-जीत भी तय कर सकते हैं? जवाब: नहीं… रंग सिर्फ समुदाय में विश्वास पैदा करने के माध्यम हैं, चुनावी नतीजे तय करने वाले मुख्य कारण नहीं। जैसे ब्राह्मण समुदाय पर सपा के रंग-प्रयोग का कोई असर नहीं दिखा। यहां सपा को PDA के P को पंडित का शॉर्ट फॉर्म और परशुराम पीठ जैसे प्रतीकों का सहारा लेना पड़ा। एक्सपर्ट मानते हैं कि यह तबका भावनात्मक जल्दबाजी में किसी दल के साथ नहीं जाता। इससे साफ है कि असली फैसला उम्मीदवार चयन, जमीनी संगठन और समुदाय के ठोस राजनीतिक भरोसे पर टिका होता है, सिर्फ रंग पर नहीं। मायावती का सपा पर ‘गिरगिट की तरह रंग बदलने’ का आरोप खुद इस बात का सबूत है कि रंग-बदलाव चर्चा और राजनीतिक हलचल जरूर पैदा करता है, लेकिन यह विरोधी दल के मूल वोट बैंक की पकड़ को तुरंत खत्म नहीं करता। चुनावी मुकाबला अब भी जमीन पर ही तय होगा। ——————————————————- ये एक्सप्लेनर भी पढ़ें… यूपी में पेपर लीक कानून केंद्र से ज्यादा सख्त:यहां उम्रकैद, केंद्र में सिर्फ 10 साल जेल; क्या अब प्रदेश का कानून बेकार हो जाएगा पेपर लीक रोकने के लिए केंद्र सरकार का नया बिल 31 जुलाई को राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद कानून बन गया। इसमें अधिकतम 10 साल की सजा का प्रावधान है। वहीं, यूपी में 2024 से लागू पेपर लीक कानून में उम्रकैद तक का प्रावधान है। इसलिए यह ज्यादा सख्त दिख रहा है। अगर पहले से मौजूद कानून इतना सख्त है, तो पेपर लीक की घटनाएं रुकती क्यों नहीं? पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में…