बसपा सुप्रीमो मायावती को लगता है कि पार्टी से निकाले गए लोग उनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। रविवार (13 सितंबर) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा- कुछ लोग यह भ्रम फैला रहे हैं कि बहनजी बीमार हैं। लेकिन, मैं बिल्कुल ठीक हूं। मायावती ने इस साजिश का ठीकरा अपने भतीजे आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ पर फोड़ा। कहा कि आकाश, अशोक के कहने पर चल रहे हैं। लगता है कि अशोक का षड्यंत्र अभी जारी है। एक समय था, जब अशोक सिद्धार्थ मायावती के सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे। लोग बसपा में उन्हें नंबर-2 का नेता मानते थे। फिर अचानक वे मायावती की नजरों में क्यों खटकने लगे? इस पूरी अदावत की कहानी लगभग डेढ़ साल पहले शुरू हुई थी। पढ़िए रिपोर्ट… बेटे की शादी से निशाने पर आए अशोक माना जा रहा है कि मायावती और अशोक सिद्धार्थ के बीच रिश्तों में खटास की शुरुआत 7 फरवरी, 2025 को हुई। आगरा में अशोक सिद्धार्थ के बेटे की आलीशान शादी हुई थी। अशोक ने इस शादी के जरिए अपना पूरा सियासी रसूख दिखाया। जिन-जिन राज्यों के वे प्रभारी रहे थे, वहां के प्रमुख बसपा नेताओं को शादी में बुलाया गया। शादी में आकाश आनंद भी मौजूद थे। लेकिन, मायावती और आकाश के पिता आनंद कुमार इससे दूर रहे। ठीक 4 दिन बाद मायावती ने लखनऊ में बैठक बुलाई। इसमें इस शादी को अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद के ‘शक्ति प्रदर्शन’ के रूप में देखा गया। मायावती ने साफ संदेश दिया कि पार्टी में कोई दूसरा शक्ति केंद्र बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने शादी में शामिल नेताओं को चेतावनी भी दी। पहले MLC, फिर राज्यसभा सांसद बनाया अशोक सिद्धार्थ मूल रूप से फर्रुखाबाद के कायमगंज इलाके के रहने वाले हैं। राजनीति में आने से पहले वे कन्नौज में रिफ्रेक्शनिस्ट (आंखों के चश्मे का नंबर जांचने वाले) के पद पर तैनात थे। बामसेफ के जरिए वे कांशीराम और मायावती के विचारों से प्रभावित हुए। बामसेफ एससी, एसटी, ओबीसी ओर अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षित कर्मचारियों का एक संगठन है। अशोक ने 2007 में मायावती की सलाह पर सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और बसपा में शामिल हो गए। 2009 में मायावती ने उन्हें एमएलसी बनाया और 2016 में राज्यसभा भेजा। उनकी पत्नी को राज्य महिला आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया। 2010 में पहली बार अशोक सिद्धार्थ को दक्षिण भारत में पार्टी के विस्तार के लिए भेजा गया। उन्हें तमिलनाडु-कर्नाटक जैसे राज्यों का प्रभारी बनाया गया। एक के बाद एक चुनाव हारीं, फिर भी भरोसा किया 2012 में यूपी में बसपा की सरकार चली गई। पार्टी सिर्फ 89 सीटें जीत सकी। कोशिश यह थी कि 2014 के लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन करना है। लेकिन, ऐसा नहीं हो सका। पार्टी का खाता तक नहीं खुला। अशोक सिद्धार्थ को दक्षिण की जिम्मेदारी वापस लेकर लखनऊ-कानपुर मंडल की जिम्मेदारी दी गई। 2017 में भी बसपा बुरी तरह से चुनाव हार गई। महज 19 सीटों पर जीत मिली। 2019 के लोकसभा में सपा से गठबंधन हुआ तो 10 सीटों पर जीत मिली। हालांकि, उसके बाद गठबंधन तोड़ लिया। 2022 में विधानसभा का चुनाव अकेले लड़ा, महज 1 सीट पर पार्टी सिमट गई। इस दौरान भी मायावती का भरोसा अशोक के ऊपर बना रहा। मायावती ने लखनऊ के हिंद कॉलेज से MBBS कर रहीं अशोक सिद्धार्थ की बेटी प्रज्ञा से अपने भतीजे आकाश आनंद का रिश्त तय कर दिया। महाराष्ट्र-दिल्ली चुनावों के झटकों से बढ़ा अविश्वास महाराष्ट्र चुनाव (नवंबर 2024) : अशोक सिद्धार्थ को महाराष्ट्र का प्रभारी बनाया गया था। उन पर मनमर्जी से टिकट बांटने के आरोप लगे। यह बात मायावती तक पहुंची, तो उन्होंने तुरंत ही अशोक सिद्धार्थ को हटा दिया। पार्टी 237 सीटों पर चुनाव लड़ी और सभी पर हार गई। बसपा का वोट शेयर गिरकर महज 0.48% रह गया। दिल्ली चुनाव (फरवरी 2025) : दिल्ली चुनाव की पूरी कमान आकाश आनंद के पास थी। अशोक के करीबी नितिन सिंह प्रभारी थे। आरोप लगे कि बिना मायावती की इजाजत के कुछ प्रत्याशियों के टिकट फाइनल कर दिए गए। कई प्रत्याशियों ने अशोक सिद्धार्थ, नितिन सिंह और आकाश आनंद को लेकर मायावती से शिकायत की। चुनाव के बाद बसपा सभी 70 सीटों पर अपनी जमानत जब्त करवा बैठी। वोट शेयर सिर्फ 0.58% पर सिमट गया। अशोक के साथ आकाश भी नजरों से उतरते चले गए पार्टी से निकाले जाने के करीब 7 महीने बाद अशोक सिद्धार्थ ने मायावती से सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली। तब मायावती ने सितंबर- 2025 में उनकी पार्टी में दोबारा वापसी कराई, संगठन में जिम्मेदारी दी। लेकिन, करीब 1 साल बाद, 3 अगस्त को उन्हें फिर पार्टी से बाहर कर दिया। आरोप लगाया कि वह पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। अशोक को पार्टी से बाहर करने के बाद मायावती के निशाने पर आकाश आनंद भी आ गए। मायावती ने जितने भी पोस्ट किए, उन सभी में आकाश को अपना भतीजा कहने के बजाय उन्हें अशोक का दामाद लिखा। 3 सितंबर को आकाश आनंद को अपरिपक्व बताते हुए उनसे सारी जिम्मेदारियां वापस ले लीं। 9 सितंबर को कहा- आकाश की वापसी तभी होगी, जब अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास ले लें। अगले दिन सुबह अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया। लेकिन, यहां मायावती अपने वादे से पलट गईं। उन्होंने कहा कि अशोक ने संन्यास का फैसला लेने में देरी की। ससुर-दामाद की बसपा में दोबारा वापसी होगी या नहीं वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम के मुताबिक, आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ के किसी दूसरी पार्टी में जाने की संभावना न के बराबर है। दोनों नेताओं के लिए बसपा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद नहीं हुए हैं। अतीत में भी अशोक सिद्धार्थ को 2 बार पार्टी से निकाला और फिर वापस लिया जा चुका है। मायावती का रुख अब पहले जैसा सख्त नहीं है। उन्होंने ‘ससुर-दामाद’ के बजाय ‘श्री अशोक सिद्धार्थ’ शब्द का प्रयोग किया, जो नाराजगी में नरमी की तरफ इशारा करता है। बसपा में किसी फैसले या गलती से ज्यादा अंदरूनी खेमेबाजी हावी है। पार्टी के विरोधी गुट ने आकाश आनंद को घेरने के लिए अशोक सिद्धार्थ के जरिए सियासी ‘फील्डिंग’ सजाई है। मायावती किसे बनाएंगी अपना उत्तराधिकारी वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं- 1995 के स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद से मायावती के मन में अविश्वास की भावना बढ़ गई। वह आसानी से किसी पर भरोसा नहीं करतीं। अब यह अविश्वास पार्टी नेताओं से आगे बढ़कर परिवार तक पहुंचता दिख रहा। मायावती पिछले कई दशकों से पार्टी में एक ऐसे भरोसेमंद नेता की तलाश में हैं, जो उनके बाद संगठन संभाल सके। लेकिन, जब भी कोई नेता पार्टी में ज्यादा प्रभावशाली होता दिखा, उसे किनारे कर दिया। आकाश आनंद को भी उन्होंने आगे बढ़ाया। लेकिन, बाद में उन्हें अपरिपक्व बताते हुए जिम्मेदारियां वापस ले लीं। ————————- यह खबर भी पढ़ें- आकाश आनंद के लिए रामजी गौतम कैसे बने ‘खलनायक’, ससुर-दामाद को पार्टी से बाहर करने के पीछे की पूरी कहानी पढ़िए बसपा में चल रहा घमासान अब केवल ससुर-दामाद के संन्यास या निष्कासन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे पार्टी के अंदर की दो सबसे शक्तिशाली लॉबियों के बीच वर्चस्व की जंग है। एक तरफ पार्टी के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम और उनके समर्थक हैं। पढ़िए पूरी खबर…