सपा के 7 बागी विधायकों में से 3 को भाजपा से टिकट मिलना पक्का माना जा रहा है। इनमें ऊंचाहार के विधायक मनोज पांडेय हैं, जिन्हें योगी कैबिनेट में मंत्री बनाया गया है। चायल विधायक पूजा पाल को भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष बना चुकी हैं। राकेश प्रताप सिंह ने 14 अक्टूबर को भाजपा जॉइन कर ली है। उनके साथ विधायक अभय सिंह और विधायक विनोद चतुर्वेदी भी भाजपा में शामिल हुए। लेकिन, पार्टी में अंदरूनी खींचतान के चलते उनके विधानसभा चुनाव लड़ने पर अभी सस्पेंस बना है। बागियों में 2 और विधायक हैं- आशुतोष मौर्य और राकेश पांडेय। ये दोनों अब भी सपा में अपनी जगह तलाश रहे हैं। उन्होंने अभी तक भाजपा जॉइन नहीं की है। सपा से बगावत करने वाले 3 विधायकों को कहां से टिकट मिल सकता है, पहले यह जान लेते हैं- मनोज पांडेय अवध क्षेत्र में बड़े ब्राह्मण चेहरों में गिने जाते हैं। 2017 और 2022 की प्रचंड भाजपा लहर में भी वो ऊंचाहार सीट पर जीते थे। 2024 में सपा से बगावत के बाद भाजपा ने उनकी राजनीतिक हैसियत को देखते हुए तुरंत योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री (खाद्य एवं रसद) बनाया। उनके टिकट के पीछे 2 फैक्टर काम कर रहे हैं। पहला- वो बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं। दूसरा- पूरे अवध क्षेत्र में पकड़ रखते हैं। उनका कैडर देखते हुए तय माना जा रहा है कि भाजपा के टिकट पर ऊंचाहार सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। राकेश प्रताप सिंह अमेठी की गौरीगंज सीट से लगातार तीन बार (2012, 2017 और 2022) विधायक चुने गए। प्रभावशाली ठाकुर चेहरा हैं। अमेठी की गौरीगंज सीट ब्राह्मण-दलित बहुल है। राजनीतिक प्रभुत्व की बात करें, तो यहां लंबे समय से ठाकुर समाज का वर्चस्व रहा है। ऐसे में राकेश के टिकट के पक्ष में 2 फैक्टर काम कर रहे हैं। पहला- उनका ठाकुर और मजबूत चेहरा। दूसरा- उनकी बेदाग छवि। भाजपा संगठन में उनके टिकट का रास्ता भी तकरीबन साफ माना जा रहा है। चायल सीट से विधायक पूजा पाल अति पिछड़ा समाज से आती हैं। प्रयागराज, कौशांबी, बुंदेलखंड और अवध रीजन में पाल समाज की अच्छी आबादी है। यही वजह है कि पूजा पाल को प्रदेश संगठन में उपाध्यक्ष जैसा बड़ा पद दिया गया। पूजा पाल के पति और तत्कालीन बसपा विधायक राजू पाल की 2005 में अतीक अहमद गैंग ने सरेआम हत्या कर दी थी। इनके टिकट के पीछे भी 2 फैक्टर काम कर रहे हैं। पहला- ये मजबूत महिला चेहरा हैं। दूसरा- उन्हें टिकट देकर भाजपा पूर्वांचल, बुंदेलखंड में माहौल बनाना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं- ये तीनों नेता 2022 के चुनाव की कठिन परिस्थितियों और भाजपा लहर के बावजूद सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। इन्हें टिकट देकर भाजपा न केवल अपनी सीटें बढ़ा सकती है, बल्कि सपा के मजबूत गढ़ों को सीधे तौर पर अपने नाम कर सकती है। इन 2 बागी विधायकों के टिकट पर लटकी तलवार 1- अभय सिंह के खिलाफ खब्बू तिवारी, गोसाईंगंज में फंसा पेंच गोसाईंगंज सीट पर सपा से भाजपा में आए बाहुबली विधायक अभय सिंह और भाजपा के पारंपरिक कैडर इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ ‘खब्बू तिवारी’ के बीच रस्साकशी जारी है। 2022 के विधानसभा चुनाव के वक्त खब्बू तिवारी के जेल में होने के कारण उनकी पत्नी आरती तिवारी ने भाजपा से चुनाव लड़ा था। उन्हें अभय सिंह ने 13,079 वोटों से हराया था। यूपी सरकार के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह खुलकर अभय सिंह के समर्थन में हैं। जबकि, राष्ट्रीय महामंत्री हरीश द्विवेदी समेत कई वरिष्ठ नेता खब्बू तिवारी के साथ हैं। अयोध्या क्षेत्र में ब्राह्मण वोटबैंक साधे रखने के लिए खब्बू तिवारी की अनदेखी करना भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है। पार्टी अभय सिंह की बाहुबली छवि को लेकर भी मंथन कर रही है। ऐसा भी हो सकता है कि दोनों को अयोध्या जिले की दो अलग सीटों पर एडजस्ट कर दिया जाए। 2- निषाद कोटा और स्थानीय विरोध में उलझी विनोद चतुर्वेदी की सीट कालपी विधायक विनोद चतुर्वेदी भाजपा में शामिल तो हो गए, लेकिन उनकी राह आसान नहीं है। कालपी सीट एनडीए के सहयोगी दल ‘निषाद पार्टी’ के कोटे में रही है। 2022 में निषाद पार्टी के प्रत्याशी छोटे सिंह चौहान को विनोद चतुर्वेदी ने सिर्फ 2,816 वोटों से हराया था। निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद अपनी हारी हुई सीटें दोबारा चाहते हैं। अगर यह सीट निषाद पार्टी को मिलती है, तो विनोद चतुर्वेदी को उनकी शर्तों पर ही चुनाव लड़ना होगा। विनोद के लिए एक और मुश्किल है कि भाजपा का स्थानीय कैडर और छोटे सिंह के समर्थक इस सीट पर उन्हें बाहरी प्रत्याशी बताकर विरोध कर रहे हैं। बाकी 2 विधायक भाजपा में आएंगे या सपा में वापसी करेंगे राकेश पांडेय, जलालपुर (अंबेडकर नगर) : 2024 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी संजय सेठ के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। सपा ने अभी भी उन्हें नहीं निकाला। राकेश पांडेय अपने बेटे रितेश पांडेय को सपा के जरिए ही विधानसभा पहुंचाना चाहते हैं। इसलिए वो अभी तक भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं। आशुतोष मौर्य, बिसौली (बदायूं) : बगावत के बाद आशुतोष मौर्य ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव से मुलाकात कर माफी मांग ली थी। अखिलेश यादव से ‘क्षमादान’ मिलने के बाद वह सपा में ही सक्रिय हैं। हालांकि, 2022 में वह महज 1,834 वोटों के अंतर से जीते थे। अगर सपा से उन्हें टिकट नहीं मिलता, तो वे पाला बदल सकते हैं। अवध-बुंदेलखंड की खोई जमीन वापस पाना चाहती है भाजपा अब सवाल उठता है कि भाजपा सपा के बागी इन 7 विधायकों पर इतना फोकस क्यों कर रही? इसकी 3 बड़ी वजहें हैं- पहली- 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फैजाबाद (अयोध्या), अमेठी और कौशांबी जैसी हाई-प्रोफाइल सीटों पर हार गई थी। इन इलाकों में अपनी खोई हुई पकड़ को मजबूत करने के लिए पार्टी इन प्रभावशाली स्थानीय नेताओं का सहारा ले रही है। दूसरी- इन बागी विधायकों में ब्राह्मण- मनोज पांडेय, विनोद चतुर्वेदी, ठाकुर- राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और अति-पिछड़ा- पूजा पाल जैसे मजबूत चेहरे हैं। 2027 के चुनाव में भाजपा इन जातियों के वोटबैंक को साधकर अवध और बुंदेलखंड रीजन में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है। तीसरी- ये नेता 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर के बावजूद सपा के टिकट पर अपनी-अपनी सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रहे थे। भाजपा का मानना है कि इन्हें साथ लाकर न केवल अपनी सीटें बढ़ाई जा सकती हैं, बल्कि सपा के मजबूत गढ़ों में भी सीधे सेंध लगाई जा सकती है। सपा के विधायक क्रॉस वोटिंग करके बागी हुए थे फरवरी, 2024 में यूपी की 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव हुआ था। 10 सीटों पर 11 प्रत्याशी मैदान में होने से चुनाव फंसा था। भाजपा ने 8वें प्रत्याशी के रूप में संजय सेठ को मैदान में उतारा, जबकि सपा के पास 3 प्रत्याशियों को जिताने के लिए पर्याप्त वोट नहीं थे। मतदान के दिन सपा के 7 विधायकों (मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, पूजा पाल, विनोद चतुर्वेदी, राकेश पांडेय और आशुतोष मौर्य) ने व्हिप का उल्लंघन करते हुए भाजपा उम्मीदवार संजय सेठ के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी। इसकी बदौलत भाजपा के सभी 8 प्रत्याशी जीत गए और सपा का तीसरा उम्मीदवार चुनाव हार गया था। —————————– यह खबर भी पढ़ें- मिर्जापुर में दिव्या मित्तल की जीत आसान नहीं, NDA से मिलेगी कड़ी टक्कर, 2 बड़ी चुनौतियां सामने होंगी पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल मिर्जापुर में अपनी राजनीतिक बिसात बिछा रही हैं। चर्चा है, 2027 का विधानसभा चुनाव यहीं से लड़ेंगी। लेकिन, निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। सियासी जानकार इसकी 2 बड़ी वजह बताते हैं। पढ़िए पूरी खबर…