लखनऊ में बाढ़ पीड़ित जमीन खरीदकर फंस गए:घर धंसने का डर सता रहा; बांध बना तो जमीनों के दाम और बढ़ेंगे

लखनऊ में करीब 18 दिनों से बाढ़ के पानी से घिरा फैजुल्लागंज टापू जैसा नजर आ रहा है। सड़कों से पानी लगभग उतर चुका है, लेकिन गलियों में अब भी 2 से 4 फीट तक पानी भरा हुआ है। सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को हो रही है, जिनके मकान एक मंजिला हैं। ऐसे लोग छत पर तिरपाल डालकर फ्रिज, अलमारी और टीवी समेत अपना कीमती सामान बचा रहे हैं। फैजुल्लागंज की 60 फीटा रोड पर रहने वाले अमन वर्मा का घर भी एक मंजिला है। घर में पानी घुसने के बाद उन्होंने सामान समेटकर छत पर ठिकाना बना लिया। अमन भर्राई आवाज में कहते हैं, “बहुत से लोग कह रहे हैं कि हमने नदी में घर बनाया, इसलिए डूब गया। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि पलासियो मॉल और इकाना स्टेडियम तक पानी कैसे पहुंचा?” अमन की तरह फैजुल्लागंज में हजारों लोग छतों पर रहने को मजबूर हैं। इनमें बड़ी संख्या वे लोग भी है, जिन्होंने दूसरे जिलों से आकर यहां जमीन खरीदी और घर बनाए। अब बाढ़ देखकर वे अफसोस जताते हैं। कहते हैं- अगर पहले पता होता, तो यहां जमीन ही न खरीदते। दैनिक भास्कर की टीम बाढ़ प्रभावित इलाकों में लगातार कवरेज कर रही है। इस बार हमने डूब क्षेत्र में जमीन खरीदकर घर बनाने वाले लोगों से बात की। बाढ़ के बीच वे किन हालात से गुजर रहे हैं और क्या कह रहे हैं, आप भी सुनिए… सीतापुर के बिसवां की रहने वाली नगमा खातून दाउदनगर इलाके में सड़क किनारे बैठी हैं। वे पानी उतरने और नाव आने का इंतजार कर रही थीं। नगमा 2020 में परिवार के साथ यहां आकर बसी थीं। वे कहती हैं, “पूरा घर डूबा हुआ है। फ्रिज, अलमारी, राशन सब पानी में तैर रहा है। एक भी सामान सुरक्षित नहीं निकाल पाए। बेटा और पति बाढ़ में फंसे हैं। खबर मिली कि उनकी तबीयत खराब हो गई है। इसलिए जान जोखिम में डालकर उनसे मिलने आई हूं।” नगमा कहती हैं, “हमने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई जोड़कर यहां जमीन खरीदी थी। यहां रहते हुए करीब 6 साल हो गए। अगर जरा भी अंदाजा होता कि लखनऊ में भी बाढ़ आ सकती है, तो कभी यहां जमीन नहीं खरीदते।” ‘खून-पसीने की कमाई से घर बनवाया, अब धंस रहा’ नगमा जैसा दर्द हरदोई से आकर बसे सुशील तिवारी का भी है। सुशील कहते हैं, “हमने 2008 की बाढ़ के किस्से सुने थे, लेकिन उसके बाद कई साल तक हालात सामान्य रहे। हमने 2017 में यहां जमीन खरीदी और खून-पसीने की कमाई से मकान बनवाया। आज पूरा घर पानी में डूबा है। घर का सारा सामान बर्बाद हो गया।” सुशील कहते हैं, “लोग कहते हैं कि सस्ती जमीन के चक्कर में यहां घर बनाया होगा, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। हमने प्लॉट बहुत महंगे दाम पर खरीदा था।” ‘डूब क्षेत्र की जमीन सबसे महंगे रेट पर बिक रही’ फैजुल्लागंज और दाउदनगर इलाका 2010 के बाद धीरे-धीरे बसना शुरू हुआ था। 2018 के बाद यहां रियल एस्टेट का कारोबार अचानक बढ़ गया। बाहरी जिलों से आने वाले नौकरीपेशा लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई यहां के प्लॉट्स में लगा दी। स्थानीय निवासी मोइनुद्दीन बताते हैं- दाउदनगर की 60 फिटा मेन रोड पर जमीन का रेट इस समय 6 हजार रुपए प्रति स्क्वायर फीट तक पहुंच चुका है। प्राइम लोकेशन पर तो लोग 7 से 8 हजार रुपए स्क्वायर फीट तक वसूल रहे हैं। अंदर की गलियों में भी आप चले जाएं, तो कहीं भी 2 से 3 हजार रुपए प्रति स्क्वायर फीट से सस्ती जमीन नहीं मिलेगी। यह कोई कच्ची कॉलोनी नहीं थी, जहां कौड़ियों के भाव जमीन मिली हो। मोइनुद्दीन से जब पूछा गया कि क्या इतनी भीषण बाढ़ के बाद अब यहां जमीनों के दाम गिरेंगे? उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- बिल्कुल नहीं! अब तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बांध बनाने का ऐलान कर दिया है। प्रॉपर्टी डीलर और बिल्डर इसका ढिंढोरा पीटकर जमीन और महंगी बेचेंगे। असल समस्या ये है कि पहले जब थोड़ा-बहुत पानी भरता था, तो पंपिंग सेट से निकाल दिया जाता था। लेकिन अबकी बार ऐसा मुमकिन नहीं हुआ। एक्सपर्ट बोले- रिवरफ्रंट के नाम पर नदी का दायरा घटाया, गलत किया फैजुल्लागंज में करीब 40 हजार से ज्यादा मकान पानी की चपेट में आए हैं, जिनमें से लगभग 50% घर एक-मंजिला हैं। लखनऊ में आई इस बाढ़ से 4 लाख से ज्यादा की आबादी प्रभावित हुई है। रिसर्च पत्रिका ‘एनवायरमेंटल सस्टेनेबिलिटी’ में प्रकाशित 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लखनऊ में रिवरफ्रंट बनाते समय गोमती नदी की चौड़ाई 450 मीटर से घटाकर 240 मीटर कर दी गई। नदी के बहने का दायरा भी 250 मीटर से समेटकर 100 से 125 मीटर तक कर दिया गया। नदी के दोनों किनारों पर कंक्रीट की ऊंची दीवारें खड़ी कर दी गईं। नतीजा ये हुआ कि इस बार जब पानी का भारी बहाव आया, तो कंक्रीट के संकरे रास्ते से नदी का पानी आगे निकल ही नहीं पाया। बैक मारकर रिहायशी इलाकों में तबाही मचाने लगा। खतरे के निशान से नीचे था जलस्तर, फिर भी डूबे 40 हजार घर गोमती में 5 बार बाढ़ आ चुकी, आगे भी खतरा मंडरा रहा प्रोफेसर दत्ता बताते हैं कि गोमती नदी पीलीभीत से निकलकर गाजीपुर तक करीब 900 किलोमीटर का सफर तय करती है। इस दौरान इसमें 185 छोटी-बड़ी सहायक नदियां और धाराएं मिलती हैं, जिनमें 35 मुख्य नदियां हैं। दुर्भाग्य से, हमने कई सहायक नदियों को सरकारी कागजों में ‘नाला’ घोषित करके पाट दिया और उन पर इमारतें खड़ी कर दीं। प्रकृति अपना रास्ता कभी नहीं भूलती, और यही आज लखनऊ भुगत रहा है। —————– ये भी पढ़ें- लखनऊ में बाढ़ पीड़ित नाव देख दौड़ पड़ते हैं:चोरी हो जाएगी, इसलिए घर नहीं छोड़ा; छत पर तिरपाल डालकर समय काट रहे लखनऊ का फैजुल्लागंज करीब 2 हफ्तों से बाढ़ के पानी से घिरा है। गोमती नदी का जलस्तर बढ़ने से स्थिति भयावह हो चुकी है। 50 हजार से ज्यादा घरों में 5 फीट तक पानी भरा है। एक मंजिला मकानों में रहने वाले लोग छतों पर तिरपाल डालकर दिन काट रहे हैं। बाढ़ प्रभावित लोगों ने क्या बताया और मौके पर क्या हालात दिखे? आइए, जानते हैं…