इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के दोषी नंदलाल राय की ‘सजा और दोषसिद्धि’ पर रोक लगा दी, जिससे वह चुनाव लड़ सके। निचली अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा दी थी। उस फैसले के खिलाफ नंदलाल ने हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी। यहां वकीलों ने दलील दी कि नंदलाल भाजपा का सक्रिय कार्यकर्ता है। 2027 विधानसभा का चुनाव चुनाव लड़ना चाहता है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा- चुनाव लड़ना नेता की ‘रोजी-रोटी’ जैसा अधिकार है। इस फैसले के बाद अब चर्चा शुरू हो गई है कि क्या आजम खान, विजय मिश्रा और अमरमणि जैसे नेताओं के 2027 में चुनाव लड़ने का रास्ता साफ हो गया है? जानेंगे आज यूपी एक्सप्लेनर में… सवाल 1: हाईकोर्ट ने किस आधार पर राहत दी? जवाब: सुप्रीम कोर्ट के वकील रोहित पांडेय बताते हैं- ‘सजा पर रोक’ और ‘दोषसिद्धि पर रोक’ दो अलग-अलग कानूनी राहत है। इसका असर भी बिल्कुल अलग होता है। ‘सजा पर रोक’ को आसान भाषा में जमानत कहा जाता है। इसका मतलब है कि अपील की सुनवाई पूरी होने तक जेल की सजा पर रोक रहेगी। लेकिन, व्यक्ति ‘दोषी’ माना जाता है, यानी कानून मानता है कि उसने अपराध किया है। जबकि ‘दोषसिद्धि पर रोक’ का मतलब है कि रोक लागू रहने तक व्यक्ति को ‘दोषी’ नहीं माना जाएगा। मतलब व्यक्ति ने अपराध किया है या नहीं, यह अभी तय नहीं है। इससे सभी कानूनी अड़चनें हट जाती हैं। व्यक्ति चुनाव भी लड़ सकता है। रोहित बताते हैं कि ऐसा होना सामान्य नहीं है। अदालतें बेहद दुर्लभ और विशेष मामलों में ही ठोस कारण होने पर ही दोषसिद्धि पर रोक लगाती हैं। नंदलाल के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी ने 3 वजहों से राहत दी… सवाल 2: क्या आजम, विजय मिश्रा और अमरमणि को फायदा मिलेगा? जवाब: तीनों नेताओं के मामले अलग-अलग हैं। ऐसे में इस फैसले का असर सभी पर अलग होगा। इसे ऐसे समझ सकते हैं… 1. आजम खान: कई मामलों में सजा से राह बेहद मुश्किल अभी की स्थिति: आजम खान पर 100 से ज्यादा मामले दर्ज हैं। इसमें से 8 मामलों में वे दोषी साबित हो चुके हैं, जबकि 8 में बरी हुए हैं। 2 पैन कार्ड और फर्जी बर्थ सर्टिफिकेट समेत अलग-अलग मामलों में 2 से 10 साल की सजा हो चुकी है। अड़चन: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के मुताबिक, अगर किसी को 2 साल या उससे ज्यादा की सजा होती है, तो वह सजा काटने के दौरान और सजा पूरी होने के 6 साल बाद तक चुनाव नहीं लड़ सकता। राहत कैसे मिलेगी: रोहित पांडेय बताते हैं- 2027 का चुनाव लड़ने के लिए आजम को उनके खिलाफ आए सभी 8 फैसलों की दोषसिद्धि और सजा पर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से रोक लगवानी होगी। आजम खान के वकील लगातार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रहे हैं। अगर चुनाव का पर्चा भरने की तारीख से पहले अदालत को लगता है कि आजम के खिलाफ मामलों में सबूत पुख्ता नहीं हैं। कोर्ट उनके खिलाफ आए सभी फैसलों में ‘सजा और दोषसिद्धि’ पर रोक लगा दे, तो वे चुनाव लड़ सकते हैं। 2. विजय मिश्रा: गंभीर धाराओें में उम्रकैद का ठप्पा अभी की स्थिति: भदोही की ज्ञानपुर सीट से 4 बार विधायक रहे बाहुबली विजय मिश्रा को 46 साल पुराने हत्या के मामले में कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके अलावा बलात्कार के मामले में 15 साल की सजा मिली है। अड़चन: नंदलाल राय के मामले में कोर्ट ने पाया था कि FIR में उनका नाम 17 दिन बाद आया था और सबूत काफी कमजोर थे। लेकिन, विजय मिश्रा के खिलाफ हत्या और बलात्कार जैसे बेहद गंभीर मामलों में अदालत ने ठोस सबूतों के आधार पर सजा तय की है। ऐसे संगीन मामलों में उच्च अदालतों से सजा और दोषसिद्धि पर रोक मिलना नामुमकिन है। 3. अमरमणि त्रिपाठी: जेल से छूटे पर दोषमुक्त नहीं हुए अभी की स्थिति: पूर्वांचल के कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में उम्रकैद की सजा पा चुके हैं। अच्छे आचरण की वजह से यूपी सरकार ने साल 2023 में उन्हें रिहा कर दिया था। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने हत्या नहीं की। अड़चन: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 (3) के तहत, सजा की पूरी अवधि पूरी होने के 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकता। अमरमणि के मामले में यह अवधि 2029 में खत्म होगी। वकील रोहित पांडेय बताते हैं- सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के मुताबिक, किसी मामले में दोषसिद्धि पर रोक लगाना बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है। यह राहत केवल तब मिलती है, जब अदालत को लगे कि आरोपी को किसी साजिश के तहत फंसाया गया है। या उसके खिलाफ दिए गए फैसले में भारी कानूनी कमियां हैं। इन तीनों नेताओं के मामलों में स्थितियां पूरी तरह अलग हैं। इसलिए किसी दूसरे मामले की राहत का फायदा इन्हें नहीं मिल सकता। सवाल 3: कई बार नेता जेल में रहते हुए चुनाव लड़ते और जीतते हैं? जवाब: भारतीय कानून में एक बहुत अजीब विरोधाभास है- जेल में बंद कैदी चुनाव लड़ सकता है और जनता उसे वोट देकर जिता भी सकती है। लेकिन, यह कैदी किसी भी चुनाव में वोट नहीं डाल सकता। दरअसल, जेल में बंद कैदियों की 2 कैटेगरी होती हैं। सारा खेल इसी का है। इसलिए पहले ये कैटेगरी समझते हैं, फिर जानेंगे कि कैदी वोट क्यों नहीं डाल सकते… पहली कैटेगरी- अंडरट्रायल: जब किसी पर सिर्फ मुकदमा चल रहा हो, कोर्ट ने उसे सजा न सुनाई हो, तब वह चुनाव लड़ सकता है। फिर चाहे गंभीर आरोपों की वजह से उसे जेल में रखा गया हो और कोर्ट ने जमानत देने से मना कर दिया हो। इसी वजह से मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, आजम खान, राजा भैया समेत कई नेता जेल से चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं। लेकिन, चुनाव जीतने का मतलब यह नहीं होता कि उसके सारे गुनाह या मुकदमे खत्म हो गए। शपथ लेने के लिए मिलती है पैरोल: सांसद या विधायक बनने के बाद शपथ लेने के लिए कुछ घंटों या दिनों की विशेष कस्टडी पैरोल मिलती है। संसद की कार्यवाही में शामिल होना: शपथ लेने के बाद वापस जेल जाना पड़ता है। संसद या विधानसभा सत्र में तभी शामिल हो सकते हैं, जब कोर्ट मंजूरी दे। अगर कोर्ट से सजा हो जाए तो? अगर जेल में रहते हुए, चल रहे मुकदमे में कोर्ट 2 साल या उससे ज्यादा की सजा सुना दे, तो सांसदी या विधायकी उसी वक्त खत्म हो जाएगी।
दूसरी कैटेगरी- दोषी: जब कोर्ट किसी को दोषी मानकर 2 साल या उससे ज्यादा की सजा सुना देता है, तो ऐसा कैदी चुनाव नहीं लड़ सकता। अब जानिए कैदी वोट क्यों नहीं डाल सकते… जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 62(5) के मुताबिक किसी भी कैटेगरी के कैदी, किसी भी तरह के चुनाव में वोट नहीं डाल सकते। इसके पीछे 2 वजह हैं… 1. लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखना: अगर जेल में बंद सभी कैदियों को वोट डालने की इजाजत दी गई, तो चुनाव के दिन सुरक्षा का संकट खड़ा हो जाएगा। कैदियों को पोलिंग बूथ तक लाने या जेल के अंदर वोटिंग कराने के लिए भारी पुलिस बल की जरूरत होगी। इससे कैदियों के भागने या आपस में हिंसक झड़प होने का खतरा बढ़ जाएगा। 2. नागरिक अधिकारों पर रोक: अदालतों ने समय-समय पर अपने फैसलों में कहा है कि वोट डालना ‘मौलिक अधिकार’ नहीं है। बल्कि, यह कानून के जरिए दिया गया ‘वैधानिक अधिकार’ है। जब कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है और जेल जाता है, तो समाज की सुरक्षा के लिए उसकी आजादी छीन ली जाती है। इसी तर्क के आधार पर जब तक व्यक्ति जेल में है, तब तक वोट नहीं डाल सकता। लेकिन, किसी आरोपी को कोर्ट से जमानत मिल चुकी है या कोई दोषी पैरोल पर जेल से बाहर आया है, तो वह पोलिंग बूथ पर जाकर वोट डाल सकता है। ———————————— ये एक्सप्लेनर भी पढ़ें… क्या 2027 विधानसभा चुनाव टालने पड़ेंगे, इलाहाबाद हाईकोर्ट बोला- 3 महीने में पंचायत चुनाव कराएं, क्या ये संभव है…? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 3 महीने के भीतर यूपी में पंचायत चुनाव कराने का आदेश दिया है। हालांकि, जिस शासनादेश के तहत प्रशासकों की नियुक्ति की गई थी, उसे कोर्ट ने वैध माना है। यानी प्रशासक अगले तीन महीने तक अपने पद पर बने रहेंगे। ऐसे में क्या विधानसभा चुनाव टल सकता है? पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में…
दूसरी कैटेगरी- दोषी: जब कोर्ट किसी को दोषी मानकर 2 साल या उससे ज्यादा की सजा सुना देता है, तो ऐसा कैदी चुनाव नहीं लड़ सकता। अब जानिए कैदी वोट क्यों नहीं डाल सकते… जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 62(5) के मुताबिक किसी भी कैटेगरी के कैदी, किसी भी तरह के चुनाव में वोट नहीं डाल सकते। इसके पीछे 2 वजह हैं… 1. लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखना: अगर जेल में बंद सभी कैदियों को वोट डालने की इजाजत दी गई, तो चुनाव के दिन सुरक्षा का संकट खड़ा हो जाएगा। कैदियों को पोलिंग बूथ तक लाने या जेल के अंदर वोटिंग कराने के लिए भारी पुलिस बल की जरूरत होगी। इससे कैदियों के भागने या आपस में हिंसक झड़प होने का खतरा बढ़ जाएगा। 2. नागरिक अधिकारों पर रोक: अदालतों ने समय-समय पर अपने फैसलों में कहा है कि वोट डालना ‘मौलिक अधिकार’ नहीं है। बल्कि, यह कानून के जरिए दिया गया ‘वैधानिक अधिकार’ है। जब कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है और जेल जाता है, तो समाज की सुरक्षा के लिए उसकी आजादी छीन ली जाती है। इसी तर्क के आधार पर जब तक व्यक्ति जेल में है, तब तक वोट नहीं डाल सकता। लेकिन, किसी आरोपी को कोर्ट से जमानत मिल चुकी है या कोई दोषी पैरोल पर जेल से बाहर आया है, तो वह पोलिंग बूथ पर जाकर वोट डाल सकता है। ———————————— ये एक्सप्लेनर भी पढ़ें… क्या 2027 विधानसभा चुनाव टालने पड़ेंगे, इलाहाबाद हाईकोर्ट बोला- 3 महीने में पंचायत चुनाव कराएं, क्या ये संभव है…? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 3 महीने के भीतर यूपी में पंचायत चुनाव कराने का आदेश दिया है। हालांकि, जिस शासनादेश के तहत प्रशासकों की नियुक्ति की गई थी, उसे कोर्ट ने वैध माना है। यानी प्रशासक अगले तीन महीने तक अपने पद पर बने रहेंगे। ऐसे में क्या विधानसभा चुनाव टल सकता है? पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में…