कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में न्यूरो सर्जन का इस्तीफा:अब तक 28 डॉक्टर कर चुके रिजाइन,11 विभागों में एक भी डॉक्टर नहीं

लखनऊ के चक गंजरिया स्थित कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में डॉक्टरों के इस्तीफे का सिलसिला थम नहीं रहा है। अब न्यूरो सर्जरी विभाग के एक और डॉक्टर ने संस्थान से किनारा कर लिया है। नियमित चिकित्सक डॉ. मयंक सिंह ने नौकरी छोड़ दी है। SGPGI में सेलेक्शन के बाद उन्होंने रिजाइन कर दिया। इससे दिमाग में ट्यूमर, ब्रेन कैंसर और जटिल न्यूरो संबंधी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की मुश्किलें बढ़ने की संभावना है। कैंसर संस्थान में कुल 32 नियमित डॉक्टर हैं। आठ बांड के तहत डॉक्टर तैनात हैं। जबकि एक महिला डॉक्टर कानपुर से प्रतिनियुक्त पर हैं। कुल 41 डॉक्टर हैं। न्यूरो सर्जरी विभाग में अभी तक तीन नियमित व दो बांड के तहत डॉक्टर तैनात थे। इनमें नियमित डॉ. मयंक सिंह ने नौकरी छोड़ दी है। उनका पीजीआई में चयन हो गया है। बिना डॉक्टर के चल रहे 11 विभाग कैंसर संस्थान के 11 विभागों में एक भी डॉक्टर नहीं है। इन विभागों में न तो कोई जांच हो रही है न ही इलाज। जबकि डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं। कई विभागों में तो करोड़ों की मशीन हैं। जो कि ताले में बंद धूल फांक रही हैं। मेडिकल आंकोलॉजी, मेडिकल फिजिस्स, डेंटेस्ट्री, न्यूक्लीयर मेडिसिन, बायोकेमेस्ट्री, हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन, पैलिएटिव केयर, पीएमआर, त्वचा, हीमैटोलॉजी व रेडियोडायग्नोसिस विभाग है। जल्द शुरू होंगे दो विभाग चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विजय वरूण ने बताया कि संस्थान में 121 नियमित डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं। जिसमें 41 पदों पर डॉक्टर भरे हैं। उन्होंने बताया कि संविदा पर चार डॉक्टरों का चयन हुआ है। इन्हें ऑफर लेटर जारी किया जा चुका है। जल्द ही चारों डॉक्टरों के ज्वाइन करने की उम्मीद है। इनके आने से हीमैटोलॉजी व रेडियो डायग्नोसिस विभाग का संचालन शुरू हो सकेगा। 28 डॉक्टर कह चुके हैं अलविदा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में मरीज और उनके तीमारदार हर दिन उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचते हैं। ब्रेन ट्यूमर से जूझ रहे मरीजों में कई ऐसे होते हैं, जिनमें समय पर सर्जरी न होने पर बीमारी तेजी से बढ़ने का खतरा रहता है। ऐसे में विशेषज्ञ डॉक्टर की कमी मरीजों की परेशानी को और बढ़ा सकती है। कैंसर संस्थान से अब तक 28 से ज्यादा डॉक्टर नौकरी छोड़ चुके हैं। वहीं कई अन्य डॉक्टर भी संस्थान छोड़ने की तैयारी में हैं। लगातार हो रहे पलायन से संस्थान की कई महत्वपूर्ण सेवाओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है। कम वेतन से डॉक्टरों ने नाराजगी डॉक्टरों की नाराजगी की बड़ी वजह वेतन और भत्तों में असमानता बताई जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि केजीएमयू, पीजीआई व लोहिया संस्थान में तैनात डॉक्टरों और कैंसर संस्थान के विशेषज्ञों की योग्यता समान है। लेकिन वेतन-भत्तों में अंतर है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ लंबे समय से अपनी मांगें उठा रहे हैं। विशेषज्ञों के जाने का असर सीधे मरीजों पर पड़ रहा है। दूर-दराज जिलों से आने वाले कैंसर मरीजों को तारीख मिलने का इंतजार करना पड़ता है। कई मरीज ऐसे भी हैं, जिनके लिए हर गुजरता दिन बीमारी के बढ़ने का खतरा लेकर आता है। तीमारदार इलाज की आस में संस्थान की ओपीडी से लेकर ऑपरेशन की तारीख तक के लिए परेशान हो रहे हैं। लगातार डॉक्टरों की कमी इस लक्ष्य के सामने चुनौती बनती जा रही है। अब संस्थान प्रशासन के सामने विशेषज्ञों को रोकने और मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने की बड़ी चुनौती है। ये डॉक्टर जा चुके हैं वेतन विसंगतियों और प्रशासनिक कारणों से कुछ वर्षों में 28 डॉक्टर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। इनमें न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग की डॉ. सोनम सुमन, ओरल एंड मैक्सिलोफेशल सर्जरी विभाग के डॉ. गौरव सिंह, मेडिकल आंकोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. ईशा जफा, क्रिटिकल केयर विभाग के डॉ. साई सरन, ईएनटी विभाग की डॉ. इंदु शुक्ला, आंको एनस्थीसिया डॉ. सौरभ विज, डॉ. स्वाति, एनस्थीसिया विभाग के डॉ. तन्मय घटक, डॉ. तापस सिंह, प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉ. बृजेश मिश्रा, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन डॉ. सत्य प्रकाश, सर्जरी डॉ. एचएस पाहवा, गायनी विभाग की डॉ. वंदना व माइक्रोबायोलॉजी विभाग की डॉ. पारुल तैनात हैं।