मायावती पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ कराएंगी:भाजपा-सपा में गए नेता फिर संपर्क में; क्या बदल जाएगा विपक्ष का समीकरण

मायावती अपने पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ की तैयारी कर रही हैं। हालिया बैठकों में उन्होंने 2 तरह के निर्देश दिए हैं। पहला- क्षेत्र में मजबूत पकड़ वाले नेताओं को बसपा से जोड़ें। ये काम कोऑर्डिनेटर करेंगे। दूसरा- घट रहे वोटबैंक को थामने के लिए पुराने नेताओं को बसपा से जोड़ें। राजनीतिक गलियारों में बसपा-कांग्रेस गठबंधन की चर्चा है। सूत्रों के मुताबिक पश्चिमी यूपी, अवध और पूर्वांचल के कई पूर्व सांसद और विधायक बसपा के संपर्क में हैं। ये वो नेता हैं, जिन्हें अपना टिकट कटने या कैंडिडेट नहीं बनाए जाने का अंदेशा है। इनमें ज्यादातर पूर्व सांसद-विधायक हैं। सोर्स कहते हैं कि ये नेता 2 से 3 महीने में बसपा में शामिल हो सकते हैं। बसपा का गठबंधन कांग्रेस या छोटे दल के साथ होगा
20 मई को कांग्रेस के 2 बड़े दलित नेता लखनऊ में मायावती के घर पहुंचे थे। ये बाराबंकी के सांसद तनुज पुनिया और कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम थे। हालांकि, मायावती इन नेताओं से मिली नहींं। दरअसल, बसपा और कांग्रेस दोनों ने अभी तक गठबंधन को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है। अंदाजा लगाया जा रहा है कि चुनाव से पहले कांग्रेस से गठबंधन न भी हो, तब भी मायावती छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतर सकती हैं। बसपा की मजबूती से भाजपा को फायदा, सपा को नुकसान
बसपा की इस सक्रियता से सपा और भाजपा दोनों ही सतर्क हो गए हैं। अखिलेश यादव PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं। लेकिन, बसपा की वापसी से दलित और मुस्लिम वोटों में बंटवारा हो सकता है। भाजपा अपनी ओबीसी और हिंदुत्व की राजनीति पर भरोसा कर रही है। लेकिन, मायावती की ब्राह्मण आउटरीच बढ़ती है तो कुछ सीटों पर इसका असर पड़ सकता है। व,हीं बसपा के मजबूत होने का सबसे ज्यादा खतरा सपा को हो सकता है। क्योंकि, बसपा की कोशिश भी मुस्लिम वोटबैंक को अपनी ओर करने की होगी। पिछले दो चुनावों 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा में मुस्लिम वोटबैंक का बड़ा हिस्सा सपा के साथ रहा है। ऐसे में अगर मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ तो इसका सीधा नुकसान सपा को होगा। वोटों के बंटवारे से सबसे ज्यादा फायदे में भाजपा रह सकती है। क्या 2007 का फॉर्मूला फिर से आजमाएंगी मायावती?
2007 में BSP ने ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम और पिछड़ों के सामाजिक समीकरण (सोशल इंजीनियरिंग) से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। मायावती अब उसी फॉर्मूले को 2027 में दोहराने की कोशिश कर रही हैं। हाल की बैठकों में उन्होंने अपने भरोसेमंद नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपी- इनके अलावा सभी कोऑर्डिनेटर को 3 महीने में मुस्लिम भाईचारा समितियां बना लेने के लिए कहा गया है। मायावती का मानना है कि भाजपा और सपा सरकारों में उपेक्षित वर्ग अब बसपा की ओर रुख कर रहे हैं। एक्सपर्ट बोले- पुराने नेता पार्टी की कमजोरी जानते हैं…
वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम कहते हैं- ’7 साल पहले राहुल गांधी और प्रधानमंत्री के खिलाफ टिप्पणी पर निष्कासित जाटव चेहरा जय प्रकाश सिंह को पार्टी में वापस ले लिया गया है। मायावती का यह कदम दलित वोटबैंक को मजबूत करने और अनुभवी नेतृत्व को पार्टी में शामिल करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। वहीं, पूर्व विधायक वहाब चौधरी को मार्च- 2026 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बसपा से निकाल दिया गया था। लेकिन, मई में ही उनका निष्कासन रद्द करके पार्टी में वापसी कराई गई। वहाब चौधरी का पश्चिमी यूपी के मुरादनगर क्षेत्र में अच्छा प्रभाव है। सैयद कासिम कहते हैं- मायावती 2007 की जीत में अहम भूमिका निभा चुके नेताओं को प्राथमिकता दे रही हैं। पुराने नेता पार्टी की कमजोरियों को अच्छी तरह जानते हैं। उनकी वापसी से न सिर्फ संगठन मजबूत होगा, बल्कि कार्यकर्ताओं में नया जोश आएगा। 2024 के चुनाव से पहले बसपा छोड़ने वाले नेता 2019 में बसपा के पास 10 लोकसभा सांसद थे। जिनमें से ज्यादातर नेताओं ने 2024 के चुनाव से पहले पाला बदल लिया था। विधानसभा चुनाव 2022 और उसके बाद बसपा छोड़ने वाले नेता लालजी वर्मा और राम अचल राजभर, ये दोनों नेता कभी बसपा के सबसे मजबूत स्तंभ और मायावती के बेहद करीबी रणनीतिकार माने जाते थे। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इन्हें पार्टी से निकाला गया था। इसके बाद दोनों समाजवादी पार्टी में चले गए थे। फिर सपा के टिकट पर विधायक बने। आजमगढ़ के कद्दावर नेता गुड्डू जमाली ने भी बसपा का दामन छोड़कर सपा का हाथ थाम लिया था।, उन्हें बाद में सपा ने विधान परिषद (MLC) भेजा था। इमरान मसूद हालांकि कई पार्टियां बदलते रहे हैं, लेकिन कुछ समय के लिए बसपा में आए थे। फिर निष्कासन के बाद कांग्रेस में चले गए थे। नेताओं ने बसपा छोड़ने के पीछे ये वजह बताई- नेतृत्व से संवाद की कमी- कई सांसदों (जैसे रितेश पांडे) ने कहा कि लंबे समय से पार्टी आलाकमान (मायावती) से कोई सीधी मुलाकात या बातचीत नहीं हो पा रही थी। टिकट कटना या फेरबदल- बसपा में पुराने सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका देने की रणनीति के चलते भी कई जमीनी नेताओं ने पाला बदल लिया था। —————————– ये खबर भी पढ़िए- एके शर्मा यूपी में बिजली सप्लाई क्यों नहीं सुधार सके, अपने ही चेयरमैन से ठनी; 32 साल ब्यूरोक्रेसी का अनुभव काम नहीं आया गुजरात कैडर के IAS अधिकारी डॉ. एके शर्मा। 32 साल ब्यूरोक्रेसी में सर्विस देकर पॉलिटिक्स में आए। भाजपा ने डॉ. शर्मा को यूपी से विधान परिषद सदस्य (MLC) बना दिया। करीब 6 महीने बाद भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी दे दी। इस समय वे योगी सरकार में नगर विकास और ऊर्जा मंत्री हैं। पढ़िए पूरी खबर…