मिर्जापुर में दिव्या मित्तल की जीत आसान नहीं:NDA से मिलेगी कड़ी टक्कर, 2 बड़ी चुनौतियां सामने होंगी

पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल मिर्जापुर में अपनी राजनीतिक बिसात बिछा रही हैं। चर्चा है, 2027 का विधानसभा चुनाव यहीं से लड़ेंगी। लेकिन, निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। सियासी जानकार इसकी 2 बड़ी वजह बताते हैं- पहली- बूथ स्तर पर मजबूत टीम की कमी। दिव्या के पास अभी हर इलाके और बूथ तक पहुंच रखने वाली मजबूत टीम नहीं है। चुनाव में जीत के लिए सिर्फ लोकप्रिय होना काफी नहीं। हर बूथ पर वोटरों तक पहुंचना और वोट डलवाने का इंतजाम करना भी जरूरी होता है। दूसरी- चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं। दिव्या को प्रशासनिक और जमीनी कामकाज का अनुभव है, लेकिन चुनावी राजनीति का अनुभव नहीं है। ऐसे में अलग-अलग जातियों और समुदायों का समर्थन जुटाना उनके लिए चुनौती हो सकता है। दिव्या नवरात्र के पहले दिन से ही विंध्याचल में हैं। 11 अक्टूबर को वहां पहुंचने पर लोगों ने फूल-मालाएं पहनाकर उनका स्वागत किया। उन्होंने आम लोगों की तरह लाइन में लगकर मां विंध्यवासिनी के दर्शन किए। इसके जरिए संदेश दिया कि वह नेता के बजाय मिर्जापुर की बेटी बनकर रहेंगी। उन्होंने कहा कि नवरात्र खत्म होने से पहले साफ कर देंगी कि कहां से चुनावी मैदान में उतरेंगी? ऐसे में निर्दलीय चुनाव लड़ने पर उन्हें कितना समर्थन मिलेगा? किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा? इस रिपोर्ट में पढ़िए… मिर्जापुर जिले में विधानसभा की 5 सीटें हैं। छानबे, चुनार, मझवां, मड़िहान और मिर्जापुर सदर। सदर सीट दिव्या मित्तल के लिए अनुकूल मानी जा रही है। इसकी वजह यहां वैश्य मतदाताओं की बड़ी संख्या है। हालांकि, चुनाव जीतने के लिए उन्हें दूसरे समुदायों का समर्थन भी जुटाना होगा। उन्हें ब्राह्मण, यादव, बिंद, निषाद, मुस्लिम और दूसरे समुदायों के मतदाताओं का समर्थन भी हासिल करना होगा। अगर भाजपा मौजूदा विधायक रत्नाकर मिश्रा को दोबारा टिकट देती है, तो ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन हासिल करना दिव्या के लिए चुनौती बन सकता है। अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी से मिलेगी चुनौती राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्रनाथ भट्ट कहते हैं- मिर्जापुर अपना दल (एस) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल का राजनीतिक गढ़ है। करीब 20 साल से पटेल परिवार का इस क्षेत्र पर दबदबा रहा है। इसके अलावा, भाजपा के अन्य सहयोगी दल- निषाद पार्टी और सुभासपा भी दिव्या की एंट्री से असहज हैं। मझवां और चुनार क्षेत्रों में निषाद वोटों का प्रभाव है। जबकि, राजभर पहले ही दिव्या को लेकर अपना कड़ा रुख साफ कर चुके हैं। संगठनात्मक ढांचे और राजनीतिक अनुभव की कमी दलीय राजनीति में जीत का सबसे बड़ा आधार ‘बूथ मैनेजमेंट’ होता है। भाजपा, सपा या अपना दल (एस) जैसी पार्टियों के पास हर पोलिंग बूथ पर 10-15 कार्यकर्ताओं की टीम है। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में दिव्या के पास प्रशासनिक बैकग्राउंड से आए कुछ समर्थकों की टीम तो है, लेकिन हर गांव और वार्ड में वोटरों को पोलिंग बूथ तक पहुंचाने का मजबूत नेटवर्क उनके पास फिलहाल नहीं है। प्रशासनिक पद पर रहते हुए जनता से सीधे जुड़ना और चुनाव में जाकर वोट मांगना बिल्कुल अलग बात है। प्रशासनिक आदेशों से काम कराने वाली शैली और राजनेताओं वाली जमीनी समझ में बड़ा अंतर होता है। 2022 के चुनाव में एक भी निर्दलीय प्रत्याशी नहीं जीता यूपी में 1952 से लेकर 2022 के 18वें विधानसभा चुनाव तक कुल 500 से ज्यादा निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधायक बन चुके हैं। आजादी के शुरुआती दशकों में दल-बदल, पार्टियों के बिखराव और स्थानीय दबदबे से बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीतते थे। लेकिन, पिछले कुछ दशकों में दलीय राजनीति में आए बदलाव से निर्दलीय विधायकों की संख्या कम हुई है। विधानसभा के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव में एक भी निर्दलीय प्रत्याशी नहीं जीता था। 2017 के चुनाव में सिर्फ 3 निर्दलीय विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इन 3 निर्दलीय विधायकों में कुंडा सीट से रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, बाबागंज सीट से उनके समर्थक विनोद सरोज और नौतनवां सीट से अमनमणि त्रिपाठी शामिल थे, जिन्होंने जेल में रहते हुए चुनाव जीता था। राजा भैया ने समर्थन किया, तो ठाकुर वोट मिलेंगे राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल का मानना है- जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के अध्यक्ष राजा भैया दिव्या मित्तल को समर्थन दे सकते हैं। 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान राजा भैया और अनुप्रिया पटेल के बीच राजनीतिक अदावत देखने को मिली थी। राजा भैया ने अपना दल (एस) के प्रत्याशी का विरोध किया था। वहीं, दिव्या मित्तल और अनुप्रिया पटेल के बीच की प्रशासनिक खींचतान जगजाहिर है। अगर राजा भैया का समर्थन दिव्या को मिलता है, तो मिर्जापुर के बड़े ठाकुर वोटबैंक का रुख दिव्या के पक्ष में मोड़ना आसान हो सकता है। दिव्या को संसाधनों की कमी नहीं होगी, ये लोग सपोर्ट करेंगे दिव्या के समर्थकों का कहना है कि डीएम रहते हुए उन्होंने लहुरियादह गांव में पीने के पानी की समस्या दूर कराई थी। दिव्या की लोकप्रियता और ईमानदार छवि उनकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर वह चुनाव लड़ती हैं, तो मिर्जापुर और सोनभद्र के व्यापारी, खनन कारोबारी, ठेकेदार और वैश्य समाज के लोग चुनाव के लिए पैसे जुटाने में उनकी मदद कर सकते हैं। दिव्या मित्तल की प्रशासनिक छवि और लोकप्रियता की चर्चा जरूर है। लेकिन, यूपी की राजनीति में राजनीतिक दलों के संगठन और जातीय समीकरणों की अहम भूमिका रहती है। ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। ————————- यह खबर भी पढ़ें- दिव्या मित्तल के सवालों पर अनुप्रिया पटेल ने चुप्पी साधी:दूसरे मुद्दों पर बोलती रहीं, लखनऊ में कार्यकर्ताओं से कहा- 2027 में NDA हैट्रिक लगाएगा दिव्या मित्तल यूपी कैडर की 2013 बैच की पूर्व IAS अधिकारी हैं। उन्होंने 30 अगस्त को नौकरी से इस्तीफा दिया था। 29 सितंबर उन्होंने घोषणा की कि वह उत्तर प्रदेश से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करेंगी। उन्होंने मिर्जापुर से चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं। भास्कर पोल में भी आम जनता की यही राय निकलकर सामने आई थी। पढ़िए पूरी खबर…