‘राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए काम करते अधिकारी’:हाईकोर्ट ने कहा- पुलिस की लचर व्यवस्था के चलते निर्दोष महिला जेल में रही

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा प्रदेश में तबादला, पोस्टिंग और पदोन्नति की व्यवस्था लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित रही है। इसका सीधा असर पुलिस के कामकाज पर पड़ता है। कई बार अफसरों को उनकी योग्यता और क्षमता के बजाय राजनीतिक नजदीकियों के आधार पर महत्वपूर्ण पदों पर तैनात किया जाता है। कोर्ट ने कहा- अफसरों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति होती है। फील्ड अफसर, जो ट्रांसफर-पोस्टिंग को अच्छी तरह समझते हैं, अपने व्यवहार को राजनीतिक आकाओं को खुश करने के हिसाब से ढालते हैं। इसका असर कामकाज पर पड़ता है।” अदालत ने बिना पर्याप्त जांच के गिरफ्तारियां करने, चुनिंदा लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने और गैंगस्टर एक्ट जैसे कठोर कानूनों के कथित दुरुपयोग पर भी चिंता जताई। यह टिप्पणी शुक्रवार को गाजियाबाद के एक जमीन विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। अब जानिए पूरा मामला… जमीन विवाद से शुरू हुआ मामला मामला गाजियाबाद के राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार से जुड़ा है। उनके खिलाफ पहले जमीन विवाद को लेकर धोखाधड़ी और जालसाजी समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। बाद में पुलिस ने इस मामले में गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई भी शुरू कर दी। पुलिस ने दावा किया कि आरोपी एक संगठित गिरोह के रूप में काम कर रहे हैं। इसी आधार पर गैंग चार्ट तैयार किया गया और परिवार के कई सदस्यों को आरोपी बनाया गया। इनमें ललिता त्यागी का नाम भी शामिल था। पुलिस ने ललिता त्यागी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। वह करीब 80 दिन तक जेल में रहीं। बाद में उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई को चुनौती दी। गैंगस्टर एक्ट लगाने पर उठे सवाल सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की जांच की। अदालत को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि ललिता त्यागी किसी संगठित आपराधिक गिरोह का हिस्सा थीं या उन्होंने लोगों को डराकर आर्थिक लाभ हासिल किया था। कोर्ट ने कहा- एक सामान्य जमीन विवाद को गैंगस्टर एक्ट जैसे गंभीर कानून के दायरे में लाने के लिए पर्याप्त आधार होना चाहिए। केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को गैंगस्टर नहीं माना जा सकता। अदालत ने जांच में पाया कि तत्कालीन गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर अजय मिश्रा ने गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय पर्याप्त सावधानी नहीं बरती। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अफसरों को स्वतंत्र रूप से तथ्यों की जांच कर निर्णय लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का भी जिक्र फैसले में अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पहले से तय कानूनी प्रक्रिया और उच्च अदालतों के निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए। बिना पूरी जांच और पर्याप्त आधार के किसी व्यक्ति के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि कई बार अफसरों के तबादले, नियुक्तियां और फैसले योग्यता के बजाय अन्य कारणों से प्रभावित होते दिखाई देते हैं। इससे प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। कई मामलों में गिरफ्तारी, मुकदमे और अन्य कार्रवाई पूरी सावधानी के साथ नहीं की जाती। न्यायालय का मानना है कि कानून का उद्देश्य लोगों को न्याय देना है, इसलिए हर कार्रवाई तथ्यों और सबूतों के आधार पर होनी चाहिए। कोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई की रद्द हाईकोर्ट ने राजेंद्र त्यागी और उनके परिवार के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत की गई पूरी कार्रवाई रद्द कर दी। साथ ही तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय मिश्रा को भविष्य में अधिक सावधानी, संतुलन और जिम्मेदारी के साथ निर्णय लेने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी संविधान और कानून के अनुसार काम करना है। किसी भी अफसर को अपने पद का इस्तेमाल पूरी निष्पक्षता और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए, ताकि आम लोगों का भरोसा व्यवस्था पर बना रहे। ————— ये खबर भी पढ़ें… पत्नी-बेटे की कब्र पर पति की लाश मिली:एक हाथ बेटे और दूसरा पत्नी की कब्र पर था, महोबा में 11 दिन में तीनों की मौत महोबा में दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। एक युवक की लाश पत्नी और बेटे की कब्रों के बीच मिली। एक हाथ बेटे की और दूसरा पत्नी की कब्र पर था। परिवार के मुताबिक, बेटे -पत्नी की मौत के बाद से 40 साल के सुब्हान अहमद गहरे सदमे में थे। अक्सर कब्रों के पास घंटों बैठे रहते थे। पढ़ें पूरी खबर…