2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी 53 सीटों पर अचानक सुस्त पड़ती दिख रही है। वजह है- 9 जिलों में संगठन का पूरी तरह ध्वस्त होना। पिछले 3 महीनों में अखिलेश यादव ने अनुशासनहीनता, गुटबाजी और निष्क्रियता पर ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए 7 जिलों के संगठन भंग कर दिए। जबकि 2 जिलों में पद लंबे समय से खाली हैं। फिलहाल, इन जिलों में पुराने जिलाध्यक्ष ही ‘कार्यवाहक’ के तौर पर काम खींच रहे हैं। नतीजतन, बूथ प्रबंधन से लेकर वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) तक के जमीनी काम ठप पड़े हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर नई नियुक्तियों में देरी क्यों हो रही? अंदरखाने खबर है कि लोकल गुटबाजी, नेताओं की विधानसभा टिकट पर दांवपेंच और PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का संतुलन बैठाने के चक्कर में अखिलेश यादव की यह लिस्ट फंसी हुई है। सबसे पहले जान लेते हैं कि 9 जिलों में खाली पदों के पीछे वजह क्या है- एटा और कासगंज- 19 सितंबर को लखनऊ में पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की मौजूदगी में नेताओं के बीच विवाद हुआ था। इसके बाद एटा के जिलाध्यक्ष वाहिद महमूद जुबैरी और कासगंज के जिलाध्यक्ष विक्रम यादव को हटाकर पूरी इकाइयां भंग कर दी गईं। मथुरा- 16 सितंबर को सपा अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश पदाधिकारी पर महिला बैंककर्मी से उत्पीड़न के आरोप में FIR दर्ज हुई। इसके बाद अखिलेश यादव के निर्देश पर मथुरा की जिला, महानगर और सभी फ्रंटल इकाइयों को भंग कर दिया गया। गोरखपुर- शहर में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कार्यकर्ताओं के बीच कुर्सी को लेकर मारपीट हो गई थी। इस अनुशासनहीनता के बाद जिला और महानगर इकाई दोनों को भंग कर दिया गया। कन्नौज- 17 अक्टूबर को हुए PDA सम्मेलन में अपेक्षा के मुताबिक भीड़ नहीं जुटने और संगठनात्मक निष्क्रियता के चलते प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल के निर्देश पर जिला संगठन भंग किया गया। हरदोई- 13 जून को तत्कालीन जिलाध्यक्ष शराफत अली का एक आपत्तिजनक ऑडियो-वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें पूर्व जनप्रतिनिधियों पर अभद्र टिप्पणियां थीं। इसके बाद पूरी जिला कार्यकारिणी भंग कर दी गई। संतकबीरनगर- सांसद पप्पू यादव से जुड़े एक विवाद में जिला संगठन के निष्क्रिय रहने पर कार्रवाई की गई। बदायूं- आपसी गुटबाजी के कारण एक साल पहले जिला कार्यकारिणी भंग की गई थी। अब तक नई नियुक्ति नहीं हो सकी है। प्रयागराज (यमुनापार)- जिलाध्यक्ष पप्पू लाल निषाद के निधन के बाद से यह पद खाली पड़ा है। जातियों को साधने में फंसा है पेंच पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश यादव दिवाली से पहले इन नियुक्तियों को अंतिम रूप दे सकते हैं। वे सभी जिलों में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के तहत संतुलित तैनाती करना चाहते हैं। हटाए गए 9 जिलाध्यक्षों और 2 महानगर अध्यक्षों में 5 मुस्लिम, 3 यादव, 1 वैश्य, 1 निषाद और 1 गौतम (दलित) समाज से थे। अब स्थानीय जातीय समीकरणों को साधते हुए नए चेहरों पर मंथन चल रहा है। टिकट के दावेदार पद से हटेंगे: पार्टी सूत्रों का कहना है कि जो जिलाध्यक्ष या महासचिव आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट मांग रहे हैं, उनका टिकट फाइनल होते ही उन्हें संगठन पद से हटाकर नए व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जाएगी। जिससे चुनावी कामकाज प्रभावित न हो। संगठन भंग होने से अटक रहे ये 5 बड़े काम —— ये पढ़ें – भाजपा से कम सीटें जीतकर भी सपा ने कैसे चौंकाया: MLC चुनाव का वोटिंग पैटर्न 2027 विधानसभा में भी रहा तो किसे नुकसान उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव में भाजपा से 1 सीट कम जीतकर भी सपा ने सबको चौंका दिया। इसकी वजह स्नातक खंड सीटों के नतीजों में छिपा है। इसमें सपा ने 5 में से 3 सीटें जीत लीं। शिक्षक खंड के प्रत्याशियों को सिर्फ शिक्षक चुनते हैं, लेकिन स्नातक खंड के चुनाव में युवा वोटरों की अहम भूमिका होती है। चुनाव नतीजों से संकेत मिल रहे हैं कि युवा वोटरों की पसंद बदल रही है। पढ़िए पूरी खबर…