45 लाख गांठ वाली कालीन, डिजाइन में 50 जानवर छिपे:दावा- साड़ी के वेस्ट से बनी जयपुरी कालीन; भदोही एक्सपो में 56 देशों के खरीदार

भदोही के कार्पेट एक्सपो मार्ट में हस्तकला का अनोखा संगम दिखा। इस साल 45 लाख गांठों से बुना गया कश्मीरी ‘हैप्पी ट्री ऑफ लाइफ’ कालीन और साड़ी के कचरे से बनी जयपुरी कालीन लोगों की पसंद बनीं। अमेरिका, यूरोप समेत 56 देशों के 400 से ज्यादा खरीदार भदोही में भारतीय बुनाई की नायाब विरासत के कायल हुए। 50वां इंडिया कार्पेट एक्सपो 7 अक्टूबर को खत्म हो गया। एक्सपो में 4 राज्यों के 300 निर्यातकों और बुनकरों के स्टॉल लगे। इसमें आंध्र प्रदेश के बुनकर पहली बार शामिल हुए। कुछ अनोखी कालीन और चुनिंदा डिजाइन की सबसे ज्यादा चर्चा रही, ये कौन सी थीं, रिपोर्ट में पढ़िए… कश्मीर की मलबेरी सिल्क से बनी कालीन पहली पसंद एक्सपो में सबसे ज्यादा सुर्खियों में ‘हैप्पी ट्री ऑफ लाइफ’ कार्पेट रही। इसको जम्मू-कश्मीर से आए बुनकरों ने तैयार किया था। मलबेरी सिल्क से बने कालीन की 2 खूबियां थीं। पहली- डिजाइन। दूसरी- 45 लाख गांठों की बारीक कारीगरी। इसकी डिजाइन में पेड़ की शाखाओं और पत्तियों के बीच 50 से ज्यादा पशु-पक्षियों जैसे मोर, तोता, हिरण, बुलबुल आदि की आकृतियां उकेरी गई थीं। जो दूर से देखने पर कैनवास पेंटिंग जैसी दिखती है। लेकिन, पास जाने पर हर आकृति की अलग बारीकी सामने आती है। मलबेरी सिल्क की चमक से कालीन का डिजाइन और उभरता है। कश्मीर के एक्सपोर्टर मेहराज जान कहते हैं- कालीन की कीमत उसकी बारीक कारीगरी से तय होती है। इस कालीन में कारीगरों ने हाथ से 45 लाख गांठ लगाई हैं। 3 बुनकरों ने इसे 14 महीने में तैयार किया है। 6×9 फीट का कालीन करीब 12 किलो वजन का होता है। एक कालीन में 25 से 30 रंगों का इस्तेमाल इसको और खास बनाता है। प्रीमियम कालीनों में शामिल इसका दाम ₹9,200 प्रति वर्गफीट है। 16 साल से इंडियन कार्पेट एक्सपो में शामिल हो रहे मेहराज कहते हैं- हमारी 3 पीढ़ियां कालीन बनाती आ रही हैं। इस बार ब्रिक्स देश (10 देश) की मौजूदगी से बिजनेस अच्छा मिला। स्टॉल पर नए खरीदार नजर आए। सबसे ज्यादा ‘हैप्पी ट्री ऑफ लाइफ’ कालीन बिकी है। ‘साड़ी के वेस्ट’ से बनी जयपुरी कालीन जयपुर से आए ओमकार विजय के स्टॉल पर कालीनें हाथोंहाथ बिक रही थीं। ये कालीनें साड़ी के वेस्ट यानी कचरे से बनी थीं। मतलब, साड़ी को बनाने के दौरान जो कपड़ा वेस्ट या कबाड़ समझकर हटा दिया जाता है, उसी से यह कालीन तैयार की गईं। विदेशी ग्राहकों के सामने दावा किया जा रहा था कि ये कालीन कम से कम 200 साल चलेगा। ओमकार कहते हैं- पहले लोगों को नहीं पता था कि साड़ी के वेस्ट मटेरियल से भी खूबसूरत कालीन बनाई जा सकती है। तब यह कपड़ा कबाड़ जैसा था। अब यही मटेरियल बाजार में करीब ₹1,000 प्रति किलो के भाव से बिकता है। हमने पूछा- कालीन तैयार करने में क्या खासियत है? वह कहते हैं- ये बहुत मेहनत का काम है। कपड़े पर पहले स्केच बनता है, फिर साड़ी के कपड़े को रंग और पैटर्न के हिसाब चुना जाता है। एक कालीन में 56 तरह के रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। रंग के अलग-अलग शेड्स मिलाकर डिजाइन तैयार होते हैं। इसमें करीब 4 महीने लगते हैं, फिर फिनिशिंग में एक महीना और लगता है। यानी एक कालीन को पूरी तरह से तैयार करने में 3 कारीगरों को करीब 5 महीने लगते हैं। कालीन में हर वर्गफीट में करीब 100 गांठों की बुनाई होती है। डिजाइन इसलिए खास होता है, क्योंकि इसमें 100 से 200 साल पुराने एंटीक पैटर्न को चुना जाता है। 4 पीढ़ियों से कालीन बना रहे ओमकार के मुताबिक, एक्सपो में करीब 90% कालीन बिक गए। हमारे कालीनों की कीमत ₹2,760 प्रति वर्गफीट थी। साड़ी के कचरे से तैयार कालीन करीब 200 साल तक चल सकती है। जयपुर के सिटी पैलेस में भी इसी तरह के पुराने एंटीक डिजाइन की कालीनों का इस्तेमाल हुआ है। रूस और तुर्किये से भी नए खरीदार जुड़े। इस बार लोगों ने बेहतरीन डिजाइन वाली कालीनों को खूब पसंद किया। आंध्र प्रदेश से पहली बार पहुंचे कारोबारी आंध्र प्रदेश से आए इम्तियाज अहमद पहली बार एक्सपो में शामिल हुए। 6 पीढ़ियों से कालीन बना रहे इम्तियाज के मुताबिक, आंध्र प्रदेश में कालीन के कारोबार से जुड़ी करीब 22 से 25 कंपनियां हैं। 100 से 200 लोग इस कारोबार से जुड़े हैं। वह कहते हैं- इस तरह के एक्सपो विदेशी खरीदार तक बुनकर की सीधी पहुंच बनाते हैं, हमें नए बाजार नहीं तलाशने पड़ते। भदोही का टाइगर कार्पेट भदोही के बिस्मिल्लाह के स्टॉल पर रखी खास ‘टाइगर कार्पेट’ भी खरीदारों को खूब पसंद आई। शुद्ध सिल्क से बनी 6×9 फीट की कालीन तैयार करने में 3 से 4 महीने लगते हैं। बिस्मिल्लाह के मुताबिक, इसको तैयार करने में 25 से 30 स्टेप से गुजरना होता है। डिजाइन बनाने से लेकर बुनाई और फिर फिनिशिंग तक हर चरण में कारीगरों की अलग-अलग भूमिका होती है। इसकी कीमत करीब ₹736 प्रति वर्गफीट है। अब तक बेल्जियम, फ्रांस और जर्मनी के खरीदार ऐसी कालीनें खरीद चुके हैं। टाइगर की आकृति वाली कालीन फ्लोर कवरिंग की कैटेगरी में बेहद खास मानी जाती है। अमेरिका से एक्सपो में पहुंचे अमन आनंद बताते हैं- भारतीय कालीनों की अमेरिका में अच्छी मांग है। अमेरिकी बाजार में न्यूट्रल शेड के कालीन पसंद किए जाते हैं। इसके पीछे वहां के घरों का आकार भी एक वजह है। मोदी की तस्वीर उकेरी कालीन, लोगों को पसंद आई वाराणसी की ज्ञान देवी ने पीएम मोदी की तस्वीर को कार्पेट पर उकेरा। वह कहती हैं- मैं प्रधानमंत्री से काशी में मिली थी। उन्होंने हंसकर मुझसे बात की थी। इसके बाद मैंने कालीन पर उनकी तस्वीर बनाने के बारे में सोचा। फिर कई महीने की मेहनत के बाद ये कालीन तैयार हो सका। वह कहती हैं- मैं कमलगांव की रहने वाली हूं, हाथ से बुनाई करती हूं। हर रोज बुनाई से मुझे ₹400 मजदूरी मिल जाती है। एक्सपो के उद्घाटन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी ज्ञान देवी के स्टॉल पर पहुंचे और उनका काम देखा। उन्होंने ज्ञान देवी से उनकी कमाई के बारे में भी पूछा। ज्ञान देवी को कार्पेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (CEPC) की ओर से एक्सपो में बुलाया गया था। जिससे विदेशी खरीदार और दूसरे लोग सीधे देख सकें कि कालीन तैयार करने में बुनकर किस तरह हाथ से काम करते हैं। उनके पति जोखन बिंद कालीन में कलर डाई का काम करते हैं। ज्ञान देवी के काम की कहानी सिर्फ एक परिवार की रोजी-रोटी नहीं, बल्कि उस बड़ी कारीगर आबादी की तस्वीर है, जिसके हाथों से भारतीय कालीनों को पहचान मिलती है। करीब 10 साल पहले ज्ञान देवी को गुजरात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मानित भी किया था। 4 दिन में 46 करोड़ के कालीन बिके भदोही के 50वें इंडिया कार्पेट एक्सपो में ₹36.8 करोड़ से ₹46 करोड़ के कालीन बिकने का अनुमान है। विदेशी खरीदारों की मौजूदगी से निर्यातकों को आने वाले समय में नए ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। इस आयोजन में 56 देशों से 212 से ज्यादा विदेशी खरीदार और 231 बाइंग रिप्रेजेंटेटिव एक्सपो में पहुंचे। विदेशी ग्राहकों के साथ डील करने वाले कारीगर कहते हैं- विदेशी बाजार के लिए सिर्फ कालीन की बुनाई अच्छी होना पर्याप्त नहीं। खरीदार किस रंग, डिजाइन और आकार को पसंद करते हैं, इसका भी असर कारोबार पर पड़ता है। ————————- यह खबर भी पढ़ें- एयरपोर्ट जैसा लखनऊ का गोमतीनगर रेलवे स्टेशन, AC में बैठकर ट्रेन का इंतजार, फुरसत हो तो शॉपिंग करिए ग्लास और स्टील की भव्य इमारत, प्रवेश द्वार पर चमकती विशाल LED स्क्रीनें और एयरपोर्ट जैसी चाक-चौबंद सुरक्षा…। यह लखनऊ का गोमतीनगर रेलवे स्टेशन है। स्टेशन परिसर में कदम रखते ही आपको भारतीय रेल स्टेशनों पर दिखने वाली अफरा-तफरी नहीं मिलेगी। आने और जाने के लिए अलग-अलग एलिवेटेड रैंप बने हैं। लखनऊ का ये रेलवे स्टेशन कितना खास है, ये जानिए…