100 से ज्यादा गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ा रहे:किताब-कॉपी भी खुद देते हैं…यूपी के टीचर अरुण का ‘मिशन शिक्षा’

सुल्तानपुर में एक घर के बरामदे में बहुत सारे बच्चे बैठे हैं। इनमें कुछ बच्चे एक टेस्ट पेपर लेकर ओएमआर शीट भर रहे हैं। सामने एक टीचर बच्चों को लगातार गाइड कर रहे हैं। आने वाले कुछ दिनों में बच्चे सरकार की अलग-अलग स्कॉलरशिप वाली परीक्षा में बैठेंगे। अगर वहां पास होते हैं, तो इन्हें आगे की पढ़ाई के लिए सलाना 12-12 हजार रुपए की स्कॉलरशिप मिलेगी। इस स्कॉलरशिप से कमजोर आर्थिक स्थिति वाले इन बच्चों की आगे की पढ़ाई आसान हो जाएगी। जो टीचर इन बच्चों को गाइड कर रहे हैं, उनका नाम अरुण कुमार प्रजापति है। उनके पास ये बच्चे इसलिए आते हैं, क्योंकि उनके पढ़ाने से सैकड़ों बच्चे स्कॉलरशिप प्रोग्राम में सिलेक्ट हुए। नवोदय और एकीकृत परीक्षा में पास हुए। यही वजह है कि अब 8-8 किलोमीटर दूर से बच्चे साइकिल के जरिए अरुण प्रजापति से पढ़ने आ रहे हैं। दैनिक भास्कर की टीम उनकी इस कोचिंग पहुंची। वहां की व्यवस्था को देखा। अरुण प्रजापति और उनके इन बच्चों से बात की। बच्चों की सफलताओं के बारे में जाना। पढ़िए सब कुछ… स्कॉलरशिप के लिए पढ़ाई कर रहे गरीब छात्र
सुल्तानपुर जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर पांडे बाबा स्थान है। यहीं एक घर में बहुत सारे बच्चे जमीन पर चटाई बिछाकर बैठे पढ़ाई कर रहे थे। ज्यादातर बच्चे 6वीं से लेकर 8वीं क्लास के बीच के हैं। 9 नवंबर को राष्ट्रीय आय एवं योग्यता आधारित छात्रवृत्ति परीक्षा है। इसलिए 8वीं के सभी बच्चे इसकी तैयारियों में जुटे नजर आए। परीक्षा के बारे में 8वीं क्लास के शुभम कहते हैं- जो बच्चा इसमें पास हो जाएगा, उसे 9वीं से 12वीं क्लास तक हर साल 12-12 हजार रुपए की छात्रवृत्ति मिलेगी। हम इसी की तैयारी में जुटे हैं। अगर मैं परीक्षा पास कर लूंगा, तो आगे की पढ़ाई आसान हो जाएगी। हमने शुभम से कहा कि प्राइवेट स्कूल में क्यों नहीं गए? वह कहते हैं- घर में गरीबी है, पापा दिल्ली में बैग सिलते हैं। साल में एक-दो बार आ जाते हैं। पैसा ज्यादा है नहीं, इसलिए हम सरकारी स्कूल में पढ़ रहे। यहां फ्री में कोचिंग हो जाती है। हमारे लिए बहुत राहत की बात है। शुभम के बगल बैठे आयुष गुप्ता की कहानी भी शुभम की तरह ही है। आयुष 4 किलोमीटर दूर से अरुण प्रजापति से पढ़ने के लिए आते हैं। वह कहते हैं- घर में पैसा नहीं है। मम्मी-पापा ने कहा कि सरकारी स्कूल में पढ़ लो। हमने कहा कि ठीक है। अपने दोस्तों के जरिए अरुण सर के बारे में पता चला। इसके बाद हम यहां आ गए। 9 नवंबर को राष्ट्रीय आय एवं योग्यता आधारित परीक्षा है। अगर उसमें सिलेक्शन हो जाता है, तो अच्छा रहेगा। 2022 में ज्यादा सिलेक्शन हुए, तब आइडिया आया
अरुण सर से हमने पूछा कि बच्चों को फ्री में पढ़ाने का यह आइडिया कहां से आया? वह कहते हैं- 2022 में सुल्तानपुर जिले से राष्ट्रीय आय एवं योग्यता आधारित छात्रवृत्ति परीक्षा में 29 बच्चों का सिलेक्शन हुआ। इसमें 8 बच्चे हमारे उच्च प्राथमिक विद्यालय कैथाना से पास हुए थे। पास होने के बाद वो बच्चे बहुत खुश थे। उनकी इसी खुशी ने मुझे प्रभावित किया। मन में आया कि क्यों न और बच्चों को इस तरह से खुशी दी जाए। अरुण सर कहते हैं- पहले तो हमने मुदिगरपुर प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया। वहां 4-5 स्कूलों के बच्चे आते थे। इसके बाद हमारी मुलाकात अरविंद जी से हुई। उन्होंने पढ़ाई के लिए अपना यह घर दे दिया। कहा कि आप यहीं शुरू कर दीजिए। हमने यहां शुरू किया, यहां बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी, करीब 15 स्कूलों के बच्चे आने लगे। इनकी संख्या 150 के पास पहुंच गई। आप समझिए पिछले 3 साल में करीब 150 बच्चे अलग-अलग परीक्षाओं में सफल हुए। एनटीए जो परीक्षा करवाती है, उसमें 25-30 बच्चे सफल हुए। पिछले दिनों एक बच्चा नवोदय में सिलेक्ट हुआ, एकीकृत परीक्षा में 2 बच्चे सफल हुए। इसी तरह से कुछ और परीक्षाओं में भी बच्चे सफल हुए हैं। लड़कियां 8-8 किलोमीटर दूर से आ रहीं
इस कोचिंग की खास बात यह है कि यहां लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या ज्यादा है। ये सभी सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं। पहले कभी कहीं कोचिंग नहीं की, क्योंकि आर्थिक रूप से सभी का परिवार कमजोर है। उन्हें अरुण सर के पास एक उम्मीद दिखी। ऑप्टिकल मार्क रिकग्निशन (ओएमआर) भर रही शेजल बताती हैं- 6-7 किलोमीटर दूर से आती हूं। पापा सब्जी बेचते हैं, भइया भी उनके साथ दिल्ली में ही रहता है। अभी टेस्ट में 150 सवाल सही हो जा रहे। ऐसा ही रहा, तो सिलेक्शन हो जाएगा। आगे चलकर मुझे पुलिस अफसर बनना है। 8वीं में पढ़ने वाली रेशमा निषाद 8 किलोमीटर दूर से आती हैं। सुबह स्कूल में पढ़ाई करती हैं और 2 बजे कोचिंग आती हैं। रेशमा कहती हैं- साथ में पढ़ने वाली सहेलियों ने यहां के बारे में बताया। हमने अपने पापा से कहा तो उन्होंने आने की इजाजत दे दी। अब पूरा फोकस है कि स्कॉलरशिप परीक्षा पास कर लूं, जिससे सहायता मिल जाए। आगे चलकर डॉक्टर बनना है, जिससे जनता की सेवा कर सकूं। साथ बैठी रिया वर्मा, साक्षी विश्वकर्मा भी रेशमा की ही तरह दूर से आती हैं। उन्हें यह कोचिंग संस्थान एक उम्मीद लगती है। अदिति यादव 5वीं क्लास में पढ़ती हैं। पिता की मौत हो चुकी है। पहले कहीं कोचिंग नहीं करती थीं। कहती हैं- यहां पैसा नहीं लगता, इसलिए आती हूं। वह पिता की मौत के बारे में बताते हुए थोड़ा भावुक हो जाती हैं। इसी तरह से 6वीं क्लास में पढ़ने वाली महक कनौजिया कहती हैं- नवोदय का फॉर्म डाला था, लेकिन नहीं निकल पाया। अब आगे की तैयारी कर रही हूं। सर सब कुछ अच्छा पढ़ाते हैं। मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अपने पैसे से किताब-कापियां खरीदकर देते हैं अरुण
जिस जगह अरुण कोचिंग पढ़ाते हैं, वहीं एक कमरे में उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी तमाम किताबें रखी हैं। वह ये किताबें बीच-बीच में बच्चों को देते हैं। इसके अलावा ओएमआर शीट, कॉपी जैसी चीजें वह खुद ही मार्केट से खरीदते हैं और बच्चों को देते हैं। इसके लिए वह बच्चों से कोई पैसा नहीं लेते। जो टेस्ट कॉपी होती है, उसे जांचने के लिए वह अपने घर ले जाते हैं। कई बार बच्चे वॉट्सऐप पर सवाल पूछ लेते हैं, वह उसे भी हल करके भेज देते हैं। हमने अरुण से उनके बारे में पूछा। पूछा कि आखिर कैसे यह सब मैनेज कर रहे? अरुण अपने बारे में बताते हैं- मेरा घर इसी सुल्तानपुर के पाकरपुर गांव में है। शुरुआत में प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई की। फिर प्रयागराज में पढ़ाई की। नौकरी नहीं मिली। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना शुरू किया। 2004 में विशिष्ट बीटीसी के जरिए नौकरी लग गई। पहले अमेठी में नौकरी की। वहीं प्रमोशन हुआ और जूनियर हाईस्कूल में टीचर हो गया। 2015 से कैथाना के उच्च प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को पढ़ा रहा हूं। 1 लाख से ज्यादा सैलरी, खर्च उतना है नहीं
अरुण कहते हैं- मेरे परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 1 बेटी है। बड़ा बेटा ताइवान में पढ़ रहा, छोटा लखनऊ में यूपीएससी की तैयारी कर रहा है। बेटी 12वीं कर चुकी है। वह भी सेमी कंडक्टर में इंजीनियरिंग करने के लिए भाई के पास ताइवान जाना चाहती है। मेरी सैलरी इस वक्त 1 लाख रुपए के ऊपर है। खर्च के रूप में दोनों बेटों को पैसा भेज दिया, कुछ पैसा घर के खर्च में लगता है। बाकी इन्हीं बच्चों के लिए खर्च करता हूं। अरुण कहते हैं- मैंने बच्चों की समस्याओं को बहुत करीब से देखा है। स्कूल में किसी बच्चे का चप्पल टूट जाता है, तो वह रोने लगता है। उसे डर होता है कि पापा मारेंगे। सरकार ने इन लोगों के लिए बहुत चीजें की हैं, लेकिन अभी भी बहुत सारी चीजें करने की जरूरत है। फिलहाल इस वक्त अरुण प्रजापति की यह कोचिंग आसपास के इलाकों में किसी वरदान से कम नहीं। प्राइमरी में पढ़ने वाले इन बच्चों के लिए एक अवसर तैयार किया है। न सिर्फ पढ़ाई के लिए, बल्कि कॉन्फिडेंस बढ़ाने का भी काम किया जा रहा है। इसमें जितने भी बच्चे पढ़ने आते हैं, वो सभी आर्थिक रूप से कमजोर हैं। कई तो ऐसे हैं जिनके पिता नहीं हैं। ———————— ये खबर भी पढ़ें… बहराइच में डूबे 8 लोग नहीं मिले, मगरमच्छ खा गए?, गांव जाने के लिए कोई सड़क नहीं 29 अक्टूबर को बहराइच के भरथापुर में 22 लोग नाव पर सवार हुए। गांव पहुंचने से पहले नाव डगमगाई और डूब गई। 13 लोग जैसे-तैसे बच गए। 9 लापता हो गए। 3 घंटे बाद एक महिला की लाश मिल गई। बाकी के 8 लोग जिसमें 5 बच्चे थे, नहीं मिल रहे। NDRF, SDRF, PAC सर्च अभियान में जुड़े। 5 किलोमीटर तक के एरिया में खोजा गया। 48 घंटे बीत गए लेकिन कोई नहीं मिला। आशंका है कि इस नदी में मगरमच्छ और घड़ियाल की भरमार है, वह सबको खा गए। पढ़ें पूरी खबर