यूपी में जंगल और खेतों में बना डाले डिग्री कॉलेज:पहुंचने का रास्ता तक नहीं, केवल एग्जाम देने आते बच्चे, कराई जाती नकल

यूपी में कई प्राइवेट डिग्री कॉलेज जंगल और सुनसान इलाकों में खोल दिए गए हैं। कुछ कॉलेजों तक तो जाने का रास्ता भी नहीं है। यह इसलिए किया, ताकि यहां अफसर जांच-पड़ताल के लिए पहुंच ही न सकें। यूनिवर्सिटीज ने भी बिना छानबीन किए, इनको संबद्धता दे दी। ये कॉलेज भगवान भरोसे चल रहे हैं। यहां सालभर क्लास नहीं लगती है, बच्चे केवल परीक्षा देने आते हैं। कॉलेज वाले छात्रों को नकल की पूरी छूट देते हैं। इसी लालच में दूर-दराज के छात्र यहां एडमिशन ले रहे हैं। दैनिक भास्कर ने इन्वेस्टिगेशन किया कि आखिर ये कॉलेज यहां खुल कैसे गए? इनके हालात क्या हैं? कैसे दो से तीन गुना फीस लेकर ये छात्रों को पास कराने की गारंटी दे रहे हैं… हमने 3 जिलों में कॉलेज के प्रिंसिपल, टीचर और मैनेजर को डिग्रियों की सौदेबाजी करते हुए हिडेन कैमरे पर कैद किया। हमें यहां ये बड़ी धांधलियां भी मिलीं- औरैया, फर्रुखाबाद और एटा के इन कॉलेजों में BA, BSc से लेकर BEd, BTC के कोर्स चल रहे हैं। पढ़िए, पूरा इन्वेस्टिगेशन… औरैया में खेतों के बीच कॉलेज- क्लासेज बंद, एक भी छात्र नहीं… औरैया मुख्यालय से तकरीबन 20 किमी दूर ककोर में श्री कृष्ण सरोज महाविद्यालय है। मेन हाईवे से कॉलेज के लिए पक्का रास्ता नहीं है। तकरीबन 500 मीटर दूर जाने पर खेतों के बीच बिल्डिंग नजर आई। क्लास रूम बंद थे। कॉलेज में बच्चे भी नहीं थे। हमारी मुलाकात प्रिंसिपल डॉ. अनिल कुमार तिवारी से हुई। हमने हिडेन कैमरे पर उनसे जब बात करनी शुरू की, तब कॉलेज की असलियत सामने आ गई। रिपोर्टर : कॉलेज कब खुला है, मान्यता किस यूनिवर्सिटी से है? प्रिंसिपल : कॉलेज 2014 से चल रहा है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर से BA, BSc, BEd और BTC की मान्यता है। रिपोर्टर : कॉलेज तक आने को सड़क ही नहीं है? प्रिंसिपल : यहां पहले गिट्‌टी डाली गई थी। लेकिन लोगों की आपत्तियों की वजह से सड़क नहीं बन पा रही है…। रिपोर्टर : कितने स्टूडेंट और टीचर कितने हैं? प्रिंसिपल : अभी 678 स्टूडेंट और 18 टीचर हैं। स्टाफ वगैरह मिलाकर करीब 30 लोग हैं। इनमें करीब 12 लोग कानपुर से रोज आते-जाते हैं। ज्यादातर BEd और BTC वाले हैं। उन्हें तीन बजे तक रुकना चाहिए, लेकिन वे कहते हैं कि साहब, निकल जाएं। तो हम भी कह देते हैं, जाओ… बस क्लास डिस्टर्ब नहीं होनी चाहिए। रिपोर्टर : तो क्या क्लासेस रेगुलर हो रही हैं? प्रिंसिपल : कोई रेगुलर आता-वाता है नहीं…। इनमें डीएलएड और बीएड में 10-20% बच्चे आते हैं। बीएससी में तो कोई आता ही नहीं है। रिपोर्टर : ऐसा क्यों होता है? प्रिंसिपल : कहने में संकोच लगता है, लेकिन अब नकल करानी पड़ती है। नहीं कराएंगे तो पीछे हो जाएंगे और एडमिशन नहीं होंगे। यहां एक और कॉलेज है, वहां हमारे मुकाबले चार गुना छात्र हैं। एग्जाम में चाहे किसी लड़के की जगह कोई दूसरा परीक्षा दे दे… तो यहां पूरा सिस्टम ही ऐसा बन गया है। रिपोर्टर: एडमिशन प्रोसेस क्या होता है? प्रिंसिपल: एडमिशन प्रोसेस सरकारी हो या प्राइवेट, एक जैसा ही होता है। यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन कराना होता है। उसकी फीस 300 रुपए है। इसके बाद किसी भी कॉलेज में एडमिशन लिया जा सकता है। रिपोर्टर: प्राइवेट कॉलेज डॉक्यूमेंट्स वॉट्सऐप पर मंगाते हैं। क्या उसी से एडमिशन हो जाता है? प्रिंसिपल: हम भी ऐसे ही करते हैं। हमारे यहां हरदोई तक के बच्चे हैं। वे डॉक्यूमेंट भेज देते हैं, हम ऑफिस में जमा कर देते हैं और एडमिशन हो जाता है। पैसे भी ऑनलाइन आ जाते हैं। रिपोर्टर: फीस कितनी है? प्रिंसिपल: रियल फीस 1,800 रुपए है, लेकिन हम 6 हजार रुपए ले रहे हैं। एक कॉलेज 12 हजार रुपए ले रहा है। गजब की बात है कि 6 हजार फीस लेने के बावजूद हमारे यहां सिर्फ 600 एडमिशन हैं, जबकि 12 हजार लेने वाले कॉलेज में 1,700 एडमिशन हैं। कारण यह है कि वह कॉलेज स्टूडेंट को फुल सुविधा देता है। फेल भी हो जाओ तो यूनिवर्सिटी जाकर पास करा देते हैं। अब बच्चा जितनी सुविधा मिलेगी, वहीं जाएगा। छात्रवृत्ति तो सबको मिल रही है। हमें सिर्फ समाज कल्याण विभाग को लिस्ट भेजनी रहती है। रिपोर्टर: क्या बच्चा टॉप भी कर जाएगा? प्रिंसिपल: पहले प्रैक्टिकल के लिए हम लोग रात-रातभर फाइलें बनाते थे। अब तो बच्चे को पता ही नहीं होता कि प्रैक्टिकल होता क्या है। रिपोर्टर: फिर क्या सभी जगह ऐसा ही चलता होगा? प्रिंसिपल: हां, ऐसा ही चलता है, लेकिन सभी कॉलेजों में नहीं। कुछ कॉलेज अभी भी अपनी रेपुटेशन बनाए हुए हैं। लेकिन ऐसे कॉलेज 1% से भी कम रह गए हैं। रिपोर्टर: क्या यह नियम है कि जितने कोर्स होंगे, उतनी ही बिल्डिंग होनी चाहिए? प्रिंसिपल: हां, ऐसा होता है। रिपोर्टर: आप एक ही बिल्डिंग में इतने सारे कोर्स चला रहे हैं? प्रिंसिपल: देखिए, आप नियम पर जाएंगे तो नियम तो बहुत सख्त हैं। रिपोर्टर: फिर किस सिस्टम से आप लोग काम करते हैं? प्रिंसिपल: सारे सिस्टम पर एक सिस्टम ही भारी है। सब जगह वही सिस्टम काम करता है। दरअसल, हमारे कॉलेज में BA और BSc का एफिलिएशन कानपुर यूनिवर्सिटी से है, जबकि BEd का एफिलिएशन इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ले रखा है। दोनों की वेबसाइट अलग-अलग है, इसलिए खेल हो जाता है। कॉलेज मैनेजर का ऑफर- क्लासेज के लिए नहीं, सिर्फ पेपर दिलाने आना कानपुर-इटावा हाईवे से करीब 3 किलोमीटर अंदर औरैया के बमुरीपुर में सुमनरानी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी खेतों के बीच बना मिला। कॉलेज तक पहुंचने के लिए कच्चा रास्ता है। जब हमारी टीम यहां पहुंची, तब मैनेजर राम सागर द्विवेदी और बाबू कॉलेज बंद कर निकल रहे थे। उन्होंने बताया कि 4 बजे से पहले ही कॉलेज बंद कर दिया, क्योंकि उस समय कोई छात्र नहीं था। स्टाफ के मुताबिक, कॉलेज में 16 टीचर और करीब 500 छात्र रजिस्टर्ड हैं। रिपोर्टर ने बेटी के एडमिशन की बात कही रिपोर्टर: हम लखनऊ में रहते हैं। परिवार यहां रहता है। बेटी NEET की तैयारी कर रही है। हम एडमिशन चाहते हैं। मैनेजर: अभी तो साइट हर जगह बंद है। आप डॉक्यूमेंट दे दो, हम फॉर्म भरवा लेंगे। रिपोर्टर: तो क्या कॉलेज आने की जरूरत पड़ेगी? मैनेजर: नहीं, आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सिर्फ पेपर दिलाने आना होगा। रिपोर्टर: प्रैक्टिकल में भी आना पड़ेगा? मैनेजर: प्रैक्टिकल तो वैसे हो जाता है। जरूरत पड़ेगी तो आपको फोन करना पड़ेगा, वैसे हो ही जाता है। डॉक्यूमेंट भेजिए, एडमिशन हो जाएगा रिपोर्टर: एडमिशन कैसे होगा? मैनेजर: आप तो डॉक्यूमेंट भेज दो… हो जाएगा। रिपोर्टर: फीस कितनी है? उसी में सब सुविधा रहेगी या अलग से कुछ लगेगा? मैनेजर: 3,500 रुपए फीस है। इसके अलावा यूनिवर्सिटी वाले AI और साइबर का एक पेपर कराते हैं। उसके 500 रुपए यूनिवर्सिटी वाले लेते हैं। जब होगा, तब ही लगेगा। बाकी सब हो जाएगा। फर्रुखाबाद के कॉलेज में पानी भरा, स्टाफ बोला- प्रॉस्पेक्टस छोड़ो, एडमिशन लो औरैया से करीब 130 किमी का सफर तय कर हम फर्रुखाबाद पहुंचे। बरेली-दिल्ली हाईवे पर अमृतपुर में वीरेंद्र सिंह कटियार महाविद्यालय मिला। कॉलेज चारों तरफ से पानी से घिरा हुआ था। यहां कर्मचारी सतीश सिंह से मुलाकात हुई। एडमिशन के नाम पर बातचीत के दौरान वह हमें कॉलेज दिखाने के लिए तैयार हो गए। कॉलेज के बेसमेंट में बनी क्लासरूम पानी में डूबी मिलीं। क्लास में रखा सामान निकालकर पहली मंजिल पर रख दिया गया था। यह कॉलेज कानपुर के छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से संबद्ध है। कॉलेज के रिकॉर्ड में करीब 200 स्टूडेंट और 10 टीचर दर्ज हैं। रिपोर्टर: कॉलेज में कोई मिलेगा? एडमिशन कराना था। कर्मचारी: कोई नहीं है… बताओ। BSc, BEd या BTC, किसमें एडमिशन कराना था? रिपोर्टर: BSc में कराना है। कर्मचारी: हो जाएगा। रिपोर्टर: हम लखनऊ में रहते हैं। बेटी का एडमिशन कराना है। वह यहीं रहती है। कर्मचारी: तो आप कागज वॉट्सऐप पर भेज देना… हो जाएगा। रिपोर्टर: कॉलेज का कोई प्रॉस्पेक्टस है? कर्मचारी: प्रॉस्पेक्टस क्या करोगे आप? बस 4 फोटो, आधार कार्ड की फोटोकॉपी, ईमेल आईडी, हाईस्कूल-इंटर की मार्कशीट की फोटोकॉपी और मोबाइल नंबर चाहिए। रिपोर्टर: तो यहां रोज आना-जाना होगा? कर्मचारी: नहीं, रोज नहीं आना है। जब परीक्षा देनी होगी, प्रैक्टिकल होगा या कोई समस्या होगी, तब आपको बुलाया जाएगा। रिपोर्टर: फीस कितनी होगी? कर्मचारी: फीस 4 हजार रुपए प्रति सेमेस्टर है। प्रैक्टिकल की फीस अलग है। आप पहले बता देना, क्योंकि हमारा सेंटर अलग जाता है। हम हर बच्चे का पैसा वहां व्यक्तिगत रूप से जमा करते हैं… नकल की सुविधा के लिए। रिपोर्टर: फेल तो नहीं हो जाएगा बच्चा? कर्मचारी: हम गारंटी तो नहीं लेंगे। अगर बच्चा लिखता रहेगा… मतलब उसका हाथ कागज पर चलता रहेगा, तो फेल नहीं होगा। रिपोर्टर: जब बच्चा आएगा ही नहीं, तो पढ़ेगा कैसे? कर्मचारी: उसके लिए नोटबुक ले लीजिए। बच्चा नहीं आए तो भी कोई दिक्कत नहीं है। रिपोर्टर: यहां पढ़ाई होती है? कर्मचारी: हां, जो बच्चे आना चाहें, वे पढ़ सकते हैं। रिपोर्टर: आपके यहां टीचर हैं? कर्मचारी: 10 टीचर हैं। रिपोर्टर: कितने बच्चे हैं? कर्मचारी: बच्चे आते ही नहीं हैं। रिपोर्टर: तब भी कितने बच्चे एनरोल हैं? कर्मचारी: हमारे पास 240 बच्चों की सीट है। इस समय 200 बच्चे हैं। रिपोर्टर : आप कह रहे हैं कि बच्चा आए या न आए। लेकिन अटेंडेंस भी तो मांगी जाती होगी। कर्मचारी : हमें तो हर बच्चे की 75% अटेंडेंस देनी पड़ती है। हमारी तो मजबूरी है… संभालना पड़ता है। रिपोर्टर : आपके प्रिंसिपल का क्या नाम है? कर्मचारी : सरकारी कॉलेज में तो प्राचार्य गजेटेड होते हैं। हमारे यहां जो प्राचार्य हैं। वह फर्रुखाबाद ही रहते हैं। पुष्पेंद्र गंगवार नाम है। रिपोर्टर : आते नहीं है क्या? कर्मचारी : नहीं… आते हैं। रिपोर्टर : ऐसा नहीं हो सकता है कि बच्चा फर्स्ट डिविजन आ जाए 75% नंबर आ जाए। इसका कुछ अलग पैसा पड़ेगा क्या? कर्मचारी : नहीं… पैसा कुछ नहीं पड़ेगा। बस बच्चा लिखता रहे। बच्चे को सुविधाएं सब दी जाएंगी। रिपोर्टर : नकल हो जाती है? कर्मचारी : हां… वही बता रहे हैं। हमारी सेटिंग है। उनके बच्चे हमारे यहां आते हैं। हमारे बच्चे उनके यहां जाते हैं। रिपोर्टर : मतलब सेंटर दूसरे कॉलेज में जाता है। कर्मचारी : यहां बगल में ही हमारा राम निवास डिग्री कॉलेज है। रिपोर्टर : किस यूनिवर्सिटी से मान्यता है आप लोगों की? कर्मचारी : कानपुर से है। रिपोर्टर : तो वह सुविधा सिर्फ प्रैक्टिकल के लिए है या सब चीजों के लिए। कर्मचारी : नहीं सबके लिए है…। कोई दिक्कत बच्चे को नहीं आएगी, वो पास हो जाएगा। रिपोर्टर : नंबर नहीं बढ़ पाएगा? कर्मचारी : अरे नंबर नहीं… हमारे यहां बच्चों का 85% तक आता है। एटा के कॉलेज के रास्ते में दलदल, रिपोर्टर के पैर फंसे फर्रुखाबाद से करीब 115 किमी दूर एटा के सराय अगहत में हमें वीराने में एक कॉलेज बना मिला। लाला राम लड़ैते राम श्री देवी महाविद्यालय तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है। कॉलेज मुख्य सड़क से करीब 500 मीटर दूर है, लेकिन खराब रास्ते के कारण कई कोशिशों के बाद हमारी कार आगे नहीं जा सकी। इसके बाद हमने स्थानीय व्यक्ति से मोटरसाइकिल किराए पर ली। रास्ता इतना खराब था कि चलते समय पैर तक गड्ढों में धंस गए। इसी दौरान पैर धोने के बहाने हम कॉलेज परिसर में दाखिल हुए। यहां ब्रिजेंद्र सिंह मिले, जिन्होंने खुद को टीचर बताया। कॉलेज की स्थिति देखकर ऐसा लगा कि लंबे समय से यहां नियमित गतिविधियां नहीं हो रही हैं। कॉलेज अलीगढ़ की राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय से संबद्ध है। एडमिशन के लिए सिर्फ दस्तावेज लाने की बात रिपोर्टर: कॉलेज किसका है? टीचर: यह उमेश मास्टर साहब का है। उनका एक इंटर कॉलेज भी है, जो अलीगंज रोड पर है। रिपोर्टर: यहां क्या पढ़ाया जाता है? एडमिशन हो रहे हैं? टीचर: यहां बीए, बीएससी है। एडमिशन हो रहे हैं। रिपोर्टर: एडमिशन के लिए फॉर्म मिल जाएगा? टीचर: कागज ले आओ, बस हो जाएगा। हाईस्कूल, इंटर की मार्कशीट और आधार कार्ड। एडमिशन के बाद सिर्फ एग्जाम और प्रैक्टिकल के लिए आने की बात रिपोर्टर: यहां बच्चों को आना-जाना होता है? टीचर: अब बच्चे को आना है तो आए… नहीं तो एडमिशन करा दो। फिर जब एग्जाम हो या प्रैक्टिकल हो, तो बच्चे को ले आना। रिपोर्टर: बीएससी की कितनी फीस है? टीचर: 3,500 रुपए प्रति सेमेस्टर। एक साल के 7 हजार रुपए हैं। रिपोर्टर: बच्चे पास हो जाते हैं? टीचर: हां, प्रैक्टिकल के नंबर हम ही लोग देते हैं। बाहर से टीचर आते हैं, लेकिन मैनेज हो जाता है। नंबर की चिंता मत करिए, बढ़िया करा देते हैं। रिपोर्टर : पैसा बढ़ाकर दे तो रैंक भी बढ़िया आ जाएगा? टीचर : एक साल का 7 हजार रुपया लगेगा। उसमें ही सब कुछ हो जाएगा। रिपोर्टर : फर्स्ट आ जाएगा बच्चा? टीचर : अरे कोई दिक्कत नहीं है। कानपुर से अच्छी है अलीगढ़ यूनिवर्सिटी। रिपोर्टर : हम 3500 दिए तो कॉलेज की जिम्मेदारी हो गई? टीचर : इसी में सब कुछ है…। रिपोर्टर : एग्जाम में कॉपी कैसे लिखेगी? टीचर : वह सब हो जाएगा…नहीं कुछ अलग से नहीं देना होगा। कई बच्चे आते ही नहीं हैं। जो एग्जामिनर आते हैं, वही नंबर चढ़ा देते हैं। एटा में कॉलेज गेट पर ताला, झाड़ियां देखकर लगा कई दिन से खुला ही नहीं एटा के अलीगंज तहसील स्थित नकटई खुर्द में श्री हीरालाल स्मारक महाविद्यालय बना हुआ है। यहां तकरीबन 500 मीटर का रास्ता ऐसा दिखेगा, जैसे किसी जंगल में आप जा रहे हैं। कॉलेज के गेट पर ताला लगा हुआ था। ग्राउंड में बड़ी-बड़ी झाड़ियां थीं। ये कॉलेज कई दिनों से खुला नहीं था। कुछ समय इंतजार करने के बाद भी कॉलेज में कोई नहीं आया। इस कॉलेज को अलीगढ़ की राजा महेंद्र प्रताप सिंह स्टेट यूनिवर्सिटी से संबद्धता मिली हुई है। यहां करीब 12 टीचर और 650 स्टूडेंट रजिस्टर्ड हैं। नियमों की ढिलाई का फायदा कॉलेज उठा रहे
सवाल : ये कॉलेज सुनसान इलाकों में कैसे खुल जाते हैं? मॉनिटरिंग क्यों नहीं होती? जवाब : सरकार का मानना है कि सभी को उच्च शिक्षा मिले, इसलिए नियमों में ढिलाई दी जाती है। कॉलेज इसका फायदा उठाते हैं। कॉलेज को संबद्धता देने से पहले एक कमेटी वहां जाती है और देखती है कि मानक पूरे हैं या नहीं। संबद्धता मिलने के बाद कोई दौरा नहीं होता है। अगर कॉलेज की शिकायत होती है, तब यूनिवर्सिटी नए सिरे से पैनल बनाती है। इसके बाद ही निरीक्षण हो सकता है। सवाल : इन कॉलेज को फंड कितना और किससे मिलता है? जवाब : यूपी में ज्यादातर यूनिवर्सिटी में BA या BSc की प्रति सेमेस्टर फीस 1000 से 1200 रुपए होती है। यानी साल की 2400 रुपए। इसमें कॉलेज 80% तक ट्यूशन फीस जोड़कर साल के 6 से 7 हजार रुपए तक वसूलते हैं। परीक्षा से पहले भी एक फिक्स चार्ज सारे छात्रों से लिया जाता था। इस तरह से ये एक बड़ी रकम बन जाती है। सवाल : फिर ये कॉलेज कमाई कैसे करते हैं? जवाब : मान लीजिए किसी कोर्स की फीस 4000 रुपए है। कॉलेज में 300 बच्चे रजिस्टर्ड हैं। ऐसे में प्रति सेमेस्टर 12 लाख रुपए एक कोर्स से मिल रहे हैं। इसमें से यूनिवर्सिटी की फीस, टीचर सैलरी वगैरह निकाल दी जाए, तब भी प्रति सेमेस्टर 8 लाख रुपए बचते हैं। सवाल : फिर बच्चे ऐसे कॉलेज में एडमिशन लेते क्यों हैं? जवाब : इसमें 3 तरह के बच्चे ऐसे कॉलेज पहुंचते हैं- (सवालों के जवाब कानपुर यूनिवर्सिटी प्रिंसिपल्स एसोसिएशन के महामंत्री प्रोफेसर डॉ. वीके कटियार से बातचीत के आधार पर है।) ————————— भास्कर इन्वेस्टिगेशन पढ़ें – यूपी में रिश्वत ले रहे विधायक, ऑन-कैमरा बेनकाब:भाजपा विधायक ने खुद कैश लिया, सपा विधायक 35% कमीशन पर अड़ी यूपी में विधायक खुद विकास के नाम पर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। सड़क, नाली और स्ट्रीट लाइट लगवाने के लिए ये अनुशंसा-पत्र तभी लिखते हैं, जब इन्हें 35% से 40% कमीशन मिलता है। अनुशंसा-पत्र विधायक का वह लेटर है, जिसके आधार पर CDO (चीफ डेवलपमेंट ऑफिसर) विधायक निधि से पैसा जारी करते हैं। 35 से 40% पैसा विधायक की जेब में जाने के बाद काम की क्वालिटी क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। पढ़िए पूरी खबर…